एलर्जी क्या है और क्यों होती है, कारण, लक्षण, योग चिकित्सा और सुझाव

एलर्जी क्या है और क्यों होती है, कारण, लक्षण, योग चिकित्सा और सुझाव जानना बहुत ही जरूरी है। जब कोई वस्तु या अन्य कारक किसी व्यक्ति के अनुकूल नहीं पड़ता तो इसके लिये एलर्जी (Allergy) शब्द का प्रयोग करते हैं। एलर्जी ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ है, अन्य कार्य। इस प्रकार एलर्जी को प्रतिरक्षा प्रणाली की गड़बड़ी के कारण उत्पन्न माना गया है। सर्वप्रथम 1960 में जर्मन डॉ. क्लेमेंट ने एलर्जी शब्द का प्रयोग किया। हमारे शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली का कार्य मुख्यत: श्वेत रक्त कोशिकाएँ करती हैं। इन्हें ग्रेनुलोसाइटस या लिम्फोसाइटस कहते हैं। शरीर में प्रतिरक्षा सैनिक के रूप में इनकी संख्या सवा खरब से भी अधिक है।

एलर्जी क्या है और क्यों होती है, कारण, लक्षण, योग चिकित्सा और सुझाव

एलर्जी क्या है

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जब कोई जैव या अजैव माइक्रो आर्गेनिज्म या एण्टीजेन शरीर के अन्दर प्रविष्ट होते हैं तो ऐसी स्थिति में श्वेत रक्त कोशिकाएँ एण्टीबॉडीज का निर्माण करती हैं। विषाणु तथा कीटाणु दोनों एण्टीजोन हैं क्योंकि इनका निर्माण शरीर में भिन्न प्रोटीनों द्वारा होता है। अतः श्वेत रक्त कोशिकाओं को शीघ्र पता चल जाता है कि यह विजातीय पदार्थ हमारे लिये हानिकारक है या उपयोगी एण्टीबॉडीज हानिकारक एण्टीजेन से जुड़कर उसे समाप्त कर देता है।

एलर्जी क्या है

एलर्जिक व्यक्तियों में अहानिकारक वस्तुओं के प्रति भी शरीर को रोग प्रतिरोधक क्षमता सजग होकर प्रतिक्रिया करने लगती हैं। ऐसा क्यों होता है ? यह अभी अज्ञात की धुंध में है। फिर भी मोटे तौर पर इतना तो स्पष्ट ही है कि एलर्जी (एलर्जी क्या है) के दुष्प्रभाव को नष्ट करने के लिए शरीर स्वतः प्रतिरक्षाकारी व्यवस्था करता है। एलर्जी की प्रक्रिया प्रारम्भ होते ही दिमाग कुछ खास एसीटीएच आदि रसायनों का रिसाव बढ़ा देता है जो गुर्दे पर स्थित एड्रिनल ग्रन्थि को उत्तेजित कर एड्रिनलिन तथा कोर्टोकोस्टीरायड हार्मोन को उत्पादन हेतु प्रेरित करते हैं। इससे शरीर में संचित ग्लाइकोजिन ग्लूकोस में परिवर्तित होकर खूब सारी ऊर्जा तथा गर्मी पैदा करते हैं इस गर्मी से एलर्जेन तथा एण्टीजेन जलकर नष्ट हो जाते हैं।

डॉ. फिलीप गेल एवं राबिन कूंव ने स्पष्ट किया है कि एलर्जी चार प्रकार की होती है-टाइप 1 से टाइप 4 तक आधुनिक सभ्यता के अनुसार एलर्जी को टाइप 1 के अन्तर्गत रखा जाता है। खोज के आधार पर इसे इम्यूनोग्लोब्यूलीन (IGE) से सम्बन्धित माना जाता है। जैसा कि पहले बताया गया है कि विषाणु कीटाणु दोनों एण्टीजेन है जो एलर्जी प्रतिक्रिया को उत्पन्न करते हैं। इन्हें एलर्जेन कहा जाता है। इनके बारे में जानकारी आवश्यक है-

एलर्जेन (एलर्जी उत्पन्न करने वाले एंटीजेन) के प्रकार

1. श्वसन संस्थान को प्रभावित करने वाले एलर्जीन

धूल के कण, पराग, धुआं, गन्ध, इत्र, गंधयुक्त रसायन।

2. त्वचा को प्रभावित करने वाले एलर्जेन

कीटनाशी रसायन, साबुन, सोड़ा, डिटर्जेन्ट पाउडर, चमड़ा, पंख, पेंट, कुछ विशिष्ट प्रकार के कैक्टेक्स, बिच्छू घास, आधे पौधे, तीव्र धूप, शीतल तथा गर्म हवा के झोंके।

3. औषधि एलर्जेन

कुछ एलर्जी (एलर्जी क्या है) अवरोधी एण्टीहिस्टामिन औषधियों का काफी समय तक त्वचा पर प्रयोग करने से एलर्जी प्रक्रिया होती है। औषधियों में मिले रंग-रसायनों विशेष कर पीले रंग की डाइटास्ट्राजीन तथा लाल रंग की अमरंथ से भयंकर एलर्जी प्रतिक्रिया होती है । खाद्य पदार्थों में परिरक्षक तत्व (प्रिजरवेटिव) सोडियम बेंजोएट, हाइड्रोन्सी बेंजोएट तथा सल्फर डाइऑक्साइड से भी एलर्जी उत्पन्न होती है। कोयले से प्राप्त होने वाले एस्प्रीन तथा ट्राइटूजीन में एलर्जिक प्रतिक्रिया करते हैं। कुछ प्राकृतिक आहार जैसे-बादाम, खजूर, सेब, संतरा, टमाटर, खीरा, ककड़ी आदि में भी सैलीसिलेट्स होते हैं जो किसी-किसी को एलर्जी उत्पन्न कर सकती है।

इनमें जेम्स, जैली, गोंद, टूथपेस्ट, सॉफ्ट ड्रिंक्स आदि भी शामिल हैं। पेन्सिलिन एलर्जी तो बहुचर्चित है जिससे लाखों लोग मौत के घाट उतर चुके हैं। इसके अलावा बारबीयूरेट, फिनोथियाजीन, इण्डोमियासिन, टेट्रसाइक्लिन सल्फोनाइडस भी हैं जिनके प्रयोग से होने वाले रिएक्शन से शरीर पर चकत्ते पड़ना, सांस फूलना, सूजन या जुकाम के कई कारण हो सकते हैं।

4. वातावरणीय एलर्जेन तत्व

अत्यधिक ठंड, प्रकाश, तनाव, सूर्य प्रकाश शोर आदि से भी एलर्जिक प्रक्रिया हो सकती है।

5. कीटाणु एलर्जेन तत्व

कीड़े, कीटाणु, वायरस, परजीवी, फफूंद आदि माइक्रोआर्गेनिक सम्बंधी एलर्जेन तत्व इस सूक्ष्म कीटाणुओं के सम्पर्क से भी एलर्जी होने की सम्भावना हो सकती है।

6. रेंगने वाले कीड़ों एलर्जेन तत्व

मधुमक्खी, बर्र के डंक, मकड़ी तथा अन्य रेंगने वाले कीड़ों के सम्पर्क से भी घातक एलर्जी हो सकती है।

7. आहारजन्य एलर्जी

चाय, कॉफी, अण्डे, गाय का दूध, चॉकलेट, मुर्गे, किसी को भी एलर्जी उत्पन्न कर सकते हैं क्योंकि इनमें ग्लुटोन नामक प्रोटीन होता है।

एलर्जी के लक्षण

हवाओं के माध्यम से उत्पन्न होने वाली एलर्जी में छींक, खाँसी, ब्रोंकोकन्सट्रिक्शन, अस्थमा, हिजिंग (सांस लेने में आवाज आना), डिसनिया (सांस लेने में कठिनाई) उत्पन्न हो जाता है। नाक एवं फेफड़ों की एलर्जी में नेजल म्यूकोसा में सूजन आ जाती है। इसे एलर्जीक राइनिटीस भी कहते हैं। इसका अन्य नाम ‘हे फीवर’ भी है। इससे नाक में सुगबुगाहट होती है, छींके आने लगती हैं, आँखें लाल हो जाती हैं। आँख की इस एलर्जी को एलर्जीक कंजक्टीवाइटिस कहते हैं। कान की एलर्जी में कान में कुछ भरा-भरा सा लगता है, दर्द भी हो सकता है। यूश्चेशियन ट्यूब के अवरुद्ध हो जाने से सुनाई देना बाधित हो जाता है।

त्वचा की एलर्जी में यह खुरदुरी हो जाती है एवं फटने लगती है । इसी प्रकार आहार नली की एलर्जी में पेट दर्द, उल्टी, दस्त होने लगते हैं तथा पेट में गैस भर जाती है । होंठों में सूजन आ जाती है। गेहूँ, जौ, जई, राई में ग्लूटोन नामक प्रोटीन सिलिएक रोग पैदा कर देता है। जिसमें रोगी के वजन में काफी कमी आ जाती है, पेट फूलना, बदबूदार गैस निकलती है एवं अपचित वसायुक्त पाखाना होता है।

योग चिकित्सा

यौगिक चिकित्सा निरापद तथा सर्वाधिक प्रभावशाली है क्योंकि इसके द्वारा रोग के मूल कारणों का निवारण किया जाता है। अधिकांशतः जीवनी शक्ति के अभाव में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होने लगते हैं। योग इस अभाव को ही दूर करता है। अत: एलर्जी के लिए यौगिक क्रियाऐं अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होती हैं।

आसन

एलर्जी के रोग को प्लीहा एवं लीवर से सम्बन्धित माना जाता है, अतः इन अंगों के रोगों में जो आसन उपयोगी सिद्ध हुए हैं, उन्हीं को एलर्जी रोग में भी कराया जाता है । रोगी को क्रियाशील करने के लिए सूक्ष्म व्यायाम कराने चाहिये।

  1. पश्चिमोत्तानासन
  2. भुजंगासन
  3. मत्स्येन्द्रासन
  4. अर्ध मत्स्येन्द्रासन
  5. उत्तानपादासन
  6. हलासन
  7. सर्वांगासन
  8. चक्रासन

आदि आसनों का अभ्यास अपनी क्षमता अनुसार किसी कुशल योग चिकित्सक की देख-रेख में करें । उक्त आसन रोगी के अवरुद्ध प्राणों का नियमन करके जीवनी शक्ति का अभिवर्धन करते हैं।

प्राणायाम

  1. दीर्घ श्वसन का अभ्यास
  2. अनुलोम-विलोम प्राणायाम
  3. नाड़ी शोधन प्राणायाम
  4. सूर्यभेदी प्राणायाम

क्रियाऐं – एलर्जी के प्रभाव को कम करने के लिए नेति, कपालभाति, कुंजल, लघु शंख प्रक्षालन का अभ्यास लाभदायक सिद्ध होता है। अतः यदि संभव हो तो रोगी को यह अभ्यास करने चाहिये।

योगनिद्रा – रोगी की स्थिति के अनुसार योग निद्रा निर्देशित करें। इसके साथ-साथ शवासन, हलासन आदि भी लाभदायक होते हैं।

ध्यान – ध्यान, अजपा जप, गायत्री मंत्र, महा मृत्युंजय मंत्र का जप करने से अचेतन में स्थित रोगों के कारणों का निदान संभव हो जाता हैं।

आहार सम्बन्धी सुझाव

कब्ज एलर्जी को बढ़ाता है, अतः गरिष्ठ, खटाई मसालेदार भोजन का सेवन करें यथासंभव तरल भोजन को प्रधानता दें। वातज एवं कफज भोजन से भी परहेज करना चाहिये। यदि संभव हो तो रोगी को निम्नलिखित भोजन कम अपनाना चाहिये । इससे न केवल एलर्जी, वरन् अन्य रोगों से भी बचाव हो सकता है-

  1. एलर्जी के रोगियों को 5-6 दिन तक नाशपाती, गाजर, लौकी, ककड़ी के रस अथवा सोयाबीन की छाछ पर रहना चाहिये।
  2. 2-3 दिन तक ढाई घण्टे के अन्तराल पर सिर्फ पानी या नीबू पानी, शहद पर उपवास करें। इसके बाद तीन दिन तक रस का ही सेवन करें।
  3. इसके बाद अपने आहार में दोनों समय उबली सब्जी और मध्यकाल में रस लें।
  4. एक समय चोकरदार आटे की एक मोटी रोटी, उबली सब्जी तीन सौ ग्राम तथा सलाद डेढ़ सौ ग्राम लें।
  5. प्रात:काल रस, दोपहर में मौसम के अनुसार फल तथा शाम को उबली सब्जी का सेवन करें। दोनों समय एक-एक रोटी तथा अन्य आहार पूर्ववत् रखें।
  6. प्रतिदिन एक-एक रोटी अपनी भूख के अनुसार बढ़ाते हुए अपने पूर्ण आहार पर आ जायें।

परहेज / वर्जित

  • चाय, चीनी, मिर्च मसाले, कॉफी, टॉफी, बिस्कुट, ब्रेड, मछली, अण्डा, माँस, छिलके रहित दाल, पालिश किए हुए चावल का प्रयोग बिल्कुल न करें।
  • इन चीजों से परहेज न केवल रोग के दौरान वरन् सभी आम दिनों में भी करें तो बहुत से रोगों से बचा जा सकता है।

अन्य सावधानियाँ

  1. सीलन वाले कमरों में न रहें क्योंकि सीलन एवं बन्द कमरे एलर्जी को पनपने में सहायक होते हैं।
  2. स्वच्छ एवं हवादार कमरे में धूल आदि का प्रभाव न पड़ता हो, वहाँ रहने की व्यवस्था बनानी चाहिये।
  3. प्रतिदिन प्रातः खुली हवा में सैर करना लाभदायक होता है।
  4. चिन्ता आदि मानसिक तनाव से बचें। सर्वथा विधेयात्मक चिन्तन ही करें।
  5. अपनी दैनिक दिनचर्या संयमित, नियमित एवं नियोजित रखने का यथासंभव प्रयास करें।
  6. स्थानीय प्राकृतिक योग-चिकित्सा-संस्थाओं से सम्पर्क करके सभी प्राकृतिक योग-तकनीकों के सम्बन्ध में सही एवं वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त करके ही अपनी क्षमतानुसार योग अपनायें।
  7. रोग उत्पन्न करने वाले पदार्थों के सेवन से अनिवार्य रूप से बचें।
  8. 8. आधुनिक चिकित्सा में प्रयोग की जाने वाली औषधियों के साइड इफेक्ट को जानकर ही प्रयोग करें।

इस प्रकार सतत् यौगिक क्रियाओं का अभ्यास एवं नियमित दिनचर्या अपनाकर एलर्जी पर न केवल नियंत्रण प्रत्युत रोग को दूर करने में सफलता प्राप्त की जा सकती है।

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अस्वीकरण – यहां पर दी गई जानकारी एक सामान्य जानकारी है। यहां पर दी गई जानकारी से चिकित्सा कि राय बिल्कुल नहीं दी जाती। यदि आपको कोई भी बीमारी या समस्या है तो आपको डॉक्टर या विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। Candefine.com के द्वारा दी गई जानकारी किसी भी जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

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Mamta Jain

मैं ममता जैन मीडिया क्षेत्र में मैं तीन साल से जुड़ी हुई हूं। मुझे लिखना काफी पसन्द है और अब मैने यही मेरा प्रोफेशन बना लिया है। मैं जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएट हूं। हेल्थ, स्वास्थ्य, मनोरंजन, सरकारी योजना, क्रिकेट, न्यूज़ और ब्यूटी पर लिखने में मेरा स्पेशलाइजेशन है। हेल्थ और ब्यूटी से जुड़ी जानकारी जानने के लिए मुझे फॉलो करें।

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