आर्किमिडीज कौन थे? आर्किमिडीज का जीवन परिचय?

आर्किमिडीज कौन थे

आर्किमिडीज कौन थे (Archimedes Kaun The), (सिसली) साइराक्यूज के वैज्ञानिक आर्किमिडीज का नाम उन वैज्ञानिकों की सूची में लिया जा सकता है, जिन्होंने अपने सिद्धांत न केवल प्रस्तुत किए अपितु उन्हें सिद्ध करने के लिए प्रयोग भी किए। आर्किमिडीज के जीवन में एक ही उसूल था। वे सत्यता के प्रमाण पर ही विश्वास रखते थे। आगे चल कर उनके ही प्रयोगों के आधार पर अनेक अनुसंधान कार्य संभव हो सके और महान आविष्कार हुए।

आर्किमिडीज कौन थे (Archimedes Kaun The)

आर्किमिडीज कौन थे

आर्किमिडीज कौन थे (Archimedes Kaun The)

उनके विषय में एक प्रसंग कहा जाता है। उनके काल में साइराक्यूज पर ‘हीरों द्वितीय’ नामक शासक का शासन था। उसे युद्ध कला में दक्षता प्राप्त थी। प्रत्येक युद्ध की विजय के उपलक्ष्य में वह यूनानी देव को बहुमूल्य भेंट अवश्य चढ़ाता ।

एक बार उसे युद्ध में भारी विजय प्राप्त हुई। विजयोल्लास में भर कर उसने घोषणा की “इस समारोह में हम देवता को स्वर्ण मुकुट की भेंट देंगे।” इस घोषणा से प्रजा भी उत्साहित हो उठी। अगले ही दिन दरबार में शाही स्वर्णकार को बुलाया गया।

आर्किमिडीज के द्वारा किये गये आविष्कार एवं खोजें

S.No आविष्कार एवं खोजें
1.विशिष्ट घनत्व के सिद्धांत की खोज
2.आधारी सिद्धांत की खोज
3.अनेक गणितीय सूत्रों का अनुसंधान

राजा ने कहा “तुम्हें राजकोष से स्वर्ण दिया जाएगा। उसी स्वर्ण से तुम्हें शुद्ध मुकुट तैयार करना है। उस पर की गई कारीगरी तो अद्भुत हो स्वर्ण ही साथ ही यह भी ध्यान रहे कि उसमें किसी धातु की मिलावट न हो क्योंकि भेंट का शुद्ध होना आवश्यक है।”

स्वर्णकार ने स्वर्ण लिया व अपने घर की राह ली। कुछ ही दिन में मुकुट तैयार हो गया। स्वर्णकार मुकुट सहित दरबार में पहुँचा और राजा के सामने पेश किया। निःसंदेह मुकुट अद्वितीय बना था। राजा ने मुकुट को थाम कर प्रशंसात्मक दृष्टि से निहारा परंतु एक शंका ने भी सिर उठाया “कहीं मुकुट में मिलावट तो नहीं?” राजा के मन में विचार आया कि यदि स्वर्णकार ने मुकुट के सोने में किसी अन्य धातु की मिलावट की होगी तो पाप का भागी तो उन्हें ही बनना होगा। बड़ी कठिन समस्या थी, मुकुट को क्षति पहुँचाए बिना जाँच कैसे हो?

प्रायः ऐसे क्षणों में ही उन्हें अपने प्रसिद्ध व ज्ञानी वैज्ञानिक आर्किमिडीज का स्मरण हो आता था। आर्किमिडीज के पास हर समस्या का हल रहता है। वह अवश्य ही कोई उपाय खोज निकालेंगे। यह विचार कर उन्होंने आर्किमिडीज को बुलवा भेजा। आर्किमिडीज भी राजा का बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने दरबार में पहुँच कर अभिवादन किया व यथास्थान बैठ गए।

राजा ने कहा “प्रिय आर्किमिडीज ! आज एक आवश्यक कार्य के लिए मैंने तुम्हें कष्ट दिया।” “कैसा कार्य ? महाराज !” “मैंने अपने ईष्ट की भेंट के लिए यह मुकुट बनवाया था। मुकुट की बनावट तो अनुपम है परंतु”

“परंतु क्या?” “हमें यह संदेह है कि स्वर्णकार ने सोने में चाँदी की मिलावट की है ताकि वह बहुमूल्य धातु को चुरा सके। आप इस विषय में पता लगाएँ। केवल इतना ध्यान रहे कि मुकुट की सुंदरता नष्ट न हो।” आर्किमिडीज ने राजा को आश्वस्त किया “मैं शीघ्र ही आपके संदेह का निवारण कर दूँगा।

बस, थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी।” “हम प्रतीक्षा करेंगे क्योंकि हम जानते हैं कि आप सत्यता की प्रमाणिक जाँच को ही आधार मानते हैं।” आपको दरबार से लौट कर आर्किमिडीज चिंतित हो उठे। उनकी पत्नी यूरेका ने समस्या का कारण पूछा तो वह भी सोच में पड़ गई। वास्तव में समस्या विचारणीय थी। “मिलावट की जाँच और मुकुट को क्षति पहुँचाए बिना।”

इसी तरह कई दिन बीत गए परंतु समस्या का कोई हल नहीं मिला। अचानक एक दिन हल मिला, वो भी ऐसी हास्यजनक परिस्थिति में कि क्या कहें। आर्किमिडीज उस समय की प्रथा के अनुसार हमाम (स्नानागार) में स्नान करने पहुँचे। ज्यों ही वे स्नान करने के लिए पानी से भरे टब में घुसे टब का पानी किनारों से बाहर की ओर उछला।

यूँ तो यह दृश्य पहले भी कई बार उन्होंने देखा होगा परंतु उस दिन इस दृश्य ने उन्हें एक अद्भुत विचार दिया। वे मारे प्रसन्नता के उछल पड़े। टब से निकल कर शरीर पर कपड़ा लपेटा व घर की ओर चिल्लाते हुए भागे “यूरेका, यूरेका ! मैंने पा लिया।” वे इतने उत्साहित थे कि शरीर पर कपड़े पहनने की सुध भी न रही। यूरेका ने पति को इस दशा में देखा तो जान गई कि उन्हें अवश्य ही अपनी समस्या का समाधान मिल गया है।

वे उन्हें पर्याप्त एकांत देने के उद्देश्य से हट गईं। उन्हें पता था कि आर्किमिडीज को अपने प्रयोगों में किसी तरह का व्यवधान अच्छा नहीं लगता। जब वे अपने विचार का प्रमाण पा लेंगे तो स्वयं ही उसके विषय में बताएंगे। निःसंदेह आदर्श पत्नी के रूप में यूरेका अपने कर्तव्यों के विषय में जानती थीं।

आर्किमिडीज ने अपनी गवेषणा के आधार पर प्रयोग करने आरंभ किए। उन्होंने प्रयोग करते समय कई प्रकार के छोटे-बड़े पानी से भरे बर्तन लिए। कई दिन के प्रयोगों के पश्चात् उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि विभिन्न पदार्थ पानी की एक-सी मात्रा को विस्थापित नहीं करते। स्वर्ण व चाँदी से भार में अंतर है। अतः सोने का घन उतने ही भार के चाँदी के घन की अपेक्षा कम पानी विस्थापित करता है।

इसी सिद्धांत के बल पर उन्होंने स्वर्ण मुकुट में धातुओं की मिलावट की जाँच का निश्चय किया। निश्चित दिन वे राजसभा में जा । महाराज हीरों ने पूछा पहुँचे। “क्या आपने स्वर्ण मुकुट की जाँच की ?” “नहीं महाराज ! मैं चाहता हूँ कि शुद्धता की जाँच आप उपस्थिति में हो। अतः आप मुझे पानी से भरे तीन एक समान बर्तन मंगवा दें।”

राजाज्ञा का तत्काल पालन हुआ। आर्किमिडीज ने एक बर्तन में मुकुट के भार के बराबर स्वर्ण रखा। दूसरे बर्तन में उसी भार के बराबर चाँदी रखी और तीसरे बर्तन में मुकुट रख दिया गया। सबने देखा कि मुकुट ने सोने से अधिक व चाँदी से कम पानी विस्थापित किया था। यह देखकर आर्किमिडीज ने निष्कर्ष निकाला “मुकुट न तो शुद्ध सोने से बना है और न ही शुद्ध चाँदी से।”

“अर्थात् ?” महाराज ने पूछा। “महाराज! इसमें धातुओं की मिलावट की गई है। आपका संदेह निराधार नहीं था।” आर्किमिडीज ने उत्तर दिया। स्वर्णकार मारे भय के थर-थर काँप रहा था परंतु हीरों के शब्दकोष में ‘क्षमा’ शब्द के लिए कोई स्थान नहीं था। दुष्ट बेईमान को मृत्युदण्ड दिया गया और आर्किमिडीज को अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए।

इसी घटना के कारण उन्होंने जाना था कि ठोस पदार्थों को उनके द्वारा विस्थापित पानी की मात्रा से माप सकते हैं। इस सिद्धांत को “विशिष्ट घनत्व” के नाम से जाना गया। इस सिद्धांत के आधार पर कितने निर्माण हुए, यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है।

आर्किमिडीज ने एक ऐसी मशीन का आविष्कार भी किया था जिसकी सहायता से अधिक भार को भी बहुत कम परिश्रम द्वारा उठाया जा सकता था। इस मशीन के प्रदर्शन के लिए उन्होंने राजा को समुद्र के किनारे बुलवाया। सभी इस अनोखे आश्चर्य को देखने के लिए उत्सुक थे।

आर्किमिडीज ने मजबूत जंजीर के एक सिरे को अपनी मशीन की घिरनियों में से निकाला व दूसरे सिरे को नाल से लदे जहाज से बाँध दिया। फिर उन्होंने पहला सिरा राजा को थमा कर कहा “महाराज ! आप इस जंजीर को खींचें ।” महाराज हीरों ने एक नजर उस भारी जहाज पर डाली और फिर हँस कर बोले “लगता है, वैज्ञानिक महोदय आज हमारी खिल्ली उड़वाना चाहते हैं।

हमें तो इसी का विशेष प्रयोजन जान पड़ता है।” आर्किमिडीज ने कहा “नहीं महाराज ! मैं तो स्वप्न में भी ऐसा नहीं सोच सकता। आप जंजीर खींचें तो सही।” महाराज ने झिझकते हुए उस जंजीर को खींचा। अरे यह क्या! सभी देख कर आश्चर्यचकित हो उठे। हल्के से श्रम से ही माल से लदा जहाज पानी से ऊपर उठ गया। उपस्थित सज्जन वाह-वाह कर उठे।

आर्किमिडीज ने गणित के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके द्वारा निकाले गए कई सूत्र इतने सटीक हैं जिन्हें देखकर हम दंग रह जाते हैं। इस यूनानी वैज्ञानिक ने अपने देश के कल्याण के लिए अनेक मशीनों का निर्माण किया। उनके आधारी सिद्धांत का प्रयोग तो आज भी किया जाता है। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं जिनमें ऑन फ्लोटिंग बॉडीज व मेजरमेण्ट ऑफ द सर्किल विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

सारा देश अपने इस भले वैज्ञानिक से स्नेह रखता था। सिसली नगरवासियों को अपने आर्किमिडीज पर गर्व था। अभी उन्होंने देश के लिए बहुत कुछ करना था। अनेक सूत्र व सिद्धांत आविष्कृत होने शेष थे।

अचानक रोम ने सिसली पर आक्रमण कर दिया। यूनानवासियों ने जी-जान से अपने देश की रक्षा की। उन दिनों आर्किमिडीज ने एक ऐसा यंत्र बनाया जिसकी सहायता से रोम के जलयानों को विशाल काँटे की सहायता से उठा लिया जाता था। जब वे जलयान फंस जाते तो उन्हें समुद्री चट्टान से टकरा कर नष्ट कर दिया जाता।

यूनान की रोम के आगे एक न चली और सेनापति मार्सेलस ने सिसली पर अधिकार जमा लिया। आर्किमिडीज की महानता से वह भी भली-भांति परिचित था। उसने अपने सैनिकों को स्पष्ट रूप से आदेश दिया “आर्किमिडीज को किसी भी तरह की हानि न पहुँचाई जाए।

यह व्यक्ति अद्भुत मस्तिष्क का धनी है।” आर्किमिडीज अपने ही घर में बैठे किसी गणितीय सूत्र में उलझे थे कि द्वार पर रोम का एक सैनिक आ पहुँचा। उस मदमस्त सैनिक ने बिना सोचे-समझे आर्किमिडीज को मौत के घाट उतार दिया और आर्किमिडीज इस संसार से बहुत दूर चले गए।

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