भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध? बेरोजगारी की समस्या पर निबंध हिंदी में?

भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध (Bharat Me Berojgari Ki Samasya Par Nibandh), बेरोजगारी ने देश के समक्ष विकट समस्या का रूप धारण कर लिया है। इससे देश में गरबी बढ़ती जा रही है और संप्रति देश की जनसंख्या के पचास प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बेरोजगारी की समस्या पर निबंध हिंदी में?

भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध (Bharat Me Berojgari Ki Samasya Par Nibandh)

भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध
भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध (Bharat Me Berojgari Ki Samasya Par Nibandh)

भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध (Bharat Me Berojgari Ki Samasya Par Nibandh)

देश की स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद से कांग्रेसी, गैर कांग्रेसी और भाजपाई सरकारें केंद्र में सत्तारूढ़ होती रही हैं। इन सभी ने सत्ता संभालते समय अपने कार्यक्रमों की घोषणा की। इन कार्यक्रमों में एक कार्य बेरोजगारी हटाना और सबको काम देना अवश्य रहता रहा है।

इसे मूर्तरूप देने के लिए ‘जवाहर रोजगार योजना’, ‘प्रधानमंत्री रोजगार योजना’, ‘स्वरोजगार योजना’ ‘समन्वित रोजगार योजना आदि नामों से योजनाओं की घोषणा भी होती रही है। किंतु बेरोजगारी पर अंकुश नहीं लग पाया।

वह निरंतर बढ़ती रही है। आज देश में करोड़ों की संख्या में लोग बेरोजगार हैं। बेरोजगारी ने युवा पीढ़ी में कुंठा और आक्रोश की सृष्टि की है। उसी का प्रतिफलन समाजविरोधी कार्यों के रूप में हो रहा है। शांति व्यवस्था की समस्या भी उपस्थित हो रही है। सर्वाधिक खेदजनक स्थिति यह है कि सत्ताधारियों के प्रति लोगों में अविश्वास पनप रहा है। यदि बेरोजगारी को क्रमशः घटाया नहीं गया, तो वह देश के लिए घातक सिद्ध होगी।

बेरोजगारी क्या है

जब किसी व्यक्ति को अपनी जीविका के लिए कोई काम नहीं मिलता है, तो उसे बेरोजगार कहते हैं और उसकी इस समस्या को बेरोजगारी कहते हैं। भारत विकासशील देश है। अतः यहां की बेरोजगारी विकसित देशों से भिन्न है।

यहां पूंजी के साधन समिति हैं, अतः सभी को काम देना संभव नहीं है। यहां बेरोजगारी संरचनात्मक है। पूंजी के संसाधनों की वृद्धि पर ही बेरोजगारी को कम किया जा सकता है। इसे समाप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि संसाधनों की अपेक्षा रोजगार चाहने वालों की संख्या अधिक तेजी से बढ़ रही है।

भारत बेरोजगारी के कई रूप हैं, जिनमें से निम्नलिखित प्रमुख हैं-

  1. छिपी बेरोजगारी
  2. अल्प रोजगार
  3. खुली बेरोजगारी
  4. मौसमी बेरोजगारी
  5. शिक्षित बेरोजगारी

छिपी अथवा गुप्त बेरोजगारी

यह बेरोजगारी प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखाई देती है। इसीलिए इसे गुप्त अथवा छिपी बेरोजगारी कहा जाता है। यह बेरोजगारी कृषि क्षेत्र में दिखाई देती है। यहां आवश्यकता से अधिक लोग काम में लगे होते हैं। यदि उनमें से कुछ लोगों को हटा दिया जाए, तब भी उत्पादन में कोई कमी नहीं होगी। इस प्रकार उत्पादन की आवश्यकता से अधिक लोगों को छिपी बेरोजगारी का शिकार माना जाता है।

अल्प बेरोजगारी

जब किसी व्यक्ति को उसकी योग्यता से कम कार्य मिलता है अथवा जब कुछ ही समय के लिए काम मिलता है, तो उस स्थिति को अल्प रोजगार अथवा अल्प बेरोजगारी कहा जाता है। यदि किसी इंजीनियर को क्लर्क का काम दिया जाएगा, तो उसकी योग्यता का पूरा लाभ नहीं मिलेगा।

खुली या पूर्ण बेरोजगारी

जब कोई व्यक्ति काम करने को तैयार हो, लेकिन उसे काम न मिले, तो उस स्थिति को पूर्ण या खुली बेरोजगारी कहा जाता है। भारत में पूर्ण बेरोजगारी बहुत अधिक है। यहां करोड़ों की संख्या में बेरोजगार लोग हैं और इनकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है।

मौसमी बेरोजगारी

जब किसी व्यक्ति को वर्ष के कुछ ही महीनों के लिए काम मिलता है और शेष समय में वह बेकार रहता है, तो उस स्थिति को मौसमी बेरोजगारी कहा जाता है। भारत में इस प्रकार की बेरोजगारी कृषि क्षेत्र में है।

इस क्षेत्र में बोवाई और कटाई के समय श्रमिकों को पूरा काम मिलता है। लेकिन शेष समय में काम नहीं मिलता है। अतः वहां मौसमी बेरोजगारी रहती है। इसी तरह की बेरोजगारी चीनी उद्योग में भी होती है। वहां अधिकांश श्रमिक पेराई के मौसम के बाद बेरोजगार ही रहते हैं।

शिक्षित बेरोजगारी

शिक्षित बेरोजगारी शिक्षा के विस्तार से देश में सभी प्रकार के शिक्षितों की संख्या में वृद्धि हुई है। ये शिक्षित नौकरी ही चाहते हैं। लेकिन नौकरियों की संख्या इतनी अधिक नहीं है कि सभी को नौकरी दी जा सके। इस कारण भारी संख्या में शिक्षित व्यक्ति बेरोजगार हैं।

यहां तक कि इंजीनियरिंग की उपाधिधारी लोग भी बेरोजगार हैं। भारत में बेरोजगारी एक सतत वृद्धिगत समस्या है और इससे देश के समक्ष अनेक समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।

बेरोजगारी के कारण देश अनेक समस्याओं के दुश्चक्र में फंस गया है। कई क्षेत्रों में इसका दुष्परिणाम स्पष्ट दिखाई दे रहा है। सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि बेरोजगारी के कारण उपलब्ध मानव संसाधन का बड़ा भाग व्यर्थ हो रहा है।

इसके प्रयोग से देश की समृद्धि में सम्यक् वृद्धि की जा सकती है और लाखों लोगों को सुख का जीवन सुलभ कराया जा सकता है। बेरोजगारी से आर्थिक गिरावट आती है और प्रति व्यक्ति आय में कमी आती है। समाज में निर्धनता और ऋणग्रस्तता बढ़ती है।

कहा गया है कि, ‘बुभुक्षितं किं न करोति पापम् ।’ भूखे बेरोजगार लोग मानसिक तनाव के शिकार होते हैं और वे चोरी डकैती, बेईमानी, अनुशासनहीनता, मूल्यहीनता जैसे असामाजिक कार्यों में लग जाते हैं। इस प्रकार शांति व्यवस्था बाधित होती है। बेरोजगारी देश में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न कर रही है।

सरकारों द्वारा चलाए जा रहे जनकल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में बाधा उपस्थित होती है। सरकारें अक्षम मान ली जाती हैं और उन्हें जनमत ठुकरा देता है। बेरोजगारी के कारण कुपोषण उत्पन्न होता है और जनस्वास्थ्य अनेक रोगों की चपेट में आ जाता है।

संक्षेपतः बेरोजगारी देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति जर्जर कर रही है। इस समस्या का युद्धस्तर पर निराकरण बहुत जरूरी है। इस समस्या को सुलझाने के पूर्व इसके उत्पन्न होने के कारणों को जानना उचित होगा।

भारत में बेरोजगारी की समस्या के निम्नलिखित मुख्य कारण हैं-

  1. जनसंख्या विस्फोट
  2. दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली
  3. लघु एवं कुटीर उद्योगों का ढीला विकास
  4. यंत्रीकरण के प्रति अधिक झुकाव
  5. पूंजी निर्माण की धीमी गति
  6. कृषि कार्यों में अनिश्चितता
  7. सामाजिक कुरीतियां

जनसंख्या विस्फोट

जनसंख्या विस्फोट का प्रभाव जनसंख्या संबंधी आंकड़े बताते हैं कि भारत में जनसंख्या प्रतिवर्ष 2.5 प्रतिशत की गति से बढ़ रही है अर्थात् प्रति वर्ष लगभग दो करोड़ की वृद्धि हो रही है। अनुमान है कि सन् 200 तक देश की जनसंख्या एक अरब हो जाएगी। इस वृद्धि की गति को बढ़ना नहीं, विस्फोट कहना चाहिए।

कहा जाता है कि जनसंख्या वृद्धि के अनुसार पचास हजार रोजगारों की प्रतिवर्ष आवश्यकता है। लेकिन पंचवर्षीय योजनाओं और अन्य रोजगार संबंधी कार्यक्रमों से एक लाख से अधिक रोजगारों के अवसर नहीं उपलब्ध हो रहे हैं। इस संदर्भ के सारे प्रयासों को जनसंख्या की वृद्धि असफल सिद्ध कर रही है। फलतः बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ रही है।

दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली

दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली स्वतंत्रता के पश्चात् शिक्षा का अधिक विस्तार हुआ है और यह शिक्षा मुख्यतः पुस्तकीय है। अतः इस शिक्षा को प्राप्त कर शिक्षितों में किसी व्यवसाय अथवा व्यापार करने की क्षमता नहीं है। ये केवल सरकारी नौकरी चाहते हैं।

ये शारीरिक श्रम नहीं करना चाहते हैं। अनुमानतः प्रतिवर्ष ऐसे दस लाख लोग बेकारों की संख्या में सम्मिलित हो जाते हैं। आवश्यकता यह है कि शिक्षा को रोजगारपरक बनाया जाए, जिससे बेरोजगारों की संख्या को नियंत्रित किया जा सके। ये बेरोजगार लोग समाज में अशांति पैदा कर रहे हैं।

लघु एवं कुटीर उद्योगों का ढीला विकास

लघु एवं कुटीर उद्योगों की उपेक्षा-स्वतंत्रता के पूर्व के वर्षों में लघु और कुटीर उद्योग भारी संख्या में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराते थे। परंतु आजादी के बाद इन उद्योगों की उपेक्षा की गई और बड़े उद्योगों के लगाने को महत्त्व दिया गया।

बड़ी-बड़ी कपड़ा मिलों के खुलने से हथकरघा उद्योग चौपट हो गया। इसी तरह चूड़ी, धागे, खिलौने, कोल्हू, से तेल और गन्ना पेरने जैसे उद्योगों को मशीनीकरण चौपट कर दिया है और भारी संख्या में लोगों को बेरोजगार बनाया है।

महात्मा गांधी ने ग्रामीण कुटीर उद्योगों के पक्ष में कहा था, ‘यदि हमारे गांवों का अपने जीवन की प्रमुख आवश्यकताओं के उत्पादन पर नियंत्रण न रहा, तो वे उस आजादी को कायम नहीं रख सकते, जिसका सुख वे अनादिकाल से उठाते आ रहे हैं। इसीलिए गांधीजी ने स्वदेशी अपनाने का आंदोलन भी किया था। स्पष्ट है कि कुटीर और लघु उद्योगों की उपेक्षा से बेरोजगारी बढ़ रही है।

यंत्रीकरण के प्रति अधिक झुकाव

यंत्रीकरण की ओर अधिक झुकाव देश के बड़े उद्योगों में आधुनिक यंत्रों का प्रयोग बढ़ रहा है। इसे उच्च प्रौद्योगिकी कहा जाता है। स्वचालित यंत्रों ने हजारों की संख्या में श्रमिकों को बेकार बना दिया है। भारत में जनशक्ति की संख्या बहुत बड़ी है।

उसे काम देने में उद्योगों का योग होना नितांत आवश्यक है, किंतु यंत्रीकरण इसमें बाधक है। फलस्वरूप यंत्रीकरण बेरोजगारी बढ़ाने का साधन बन गया है। आदमी का स्थान मशीन को देना भारत जैसे देश के हित में नहीं है।

पूंजी निर्माण की धीमी गति

देश के औद्योगिक और स्वरोजगार की योजनाओं को मूर्तरूप देने के लिए भारी पूंजी की आवश्यकता है। किंतु भारत में पूंजी का अभाव है। विदेशी ऋण का भार निरंतर बढ़ता जा रहा है। जो पूंजी उपलब्ध है, उसका अधिकांश आतंकवाद, अलगाववाद, युद्धास्त्रों के निर्माण आदि पर खर्च हो रहा है।

अतः नए उद्योगों के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं उपलब्ध है। इसी तरह स्वरोजगार योजना के लिए भी वांछित पूंजी का अभाव है। इसके अतिरिक्त स्वरोजगार के लिए सरकार द्वारा स्वीकृति धनराशि को रोजगार के विभिन्न घटकों से प्राप्त करने में लालफीताशाही और रिश्वतखोरी ने विशेष बाधा उत्पन्न किया है।

अनेकशः लोग सहायता प्राप्त करने में असफल होते हैं। अतः देश में न तो उद्योगों को लगाने में गति आ रही है और न तो स्वरोजगार के प्रति लोगों में ललक की पनप रही है। परिणाम यह है कि उद्योगों का अभाव और स्वरोजगार योजना की विफलता से बेरोजगारी बढ़ रही है।

कृषि कार्यों में अनिश्चितता

कृषि कार्य में अनिश्चितता देश की अधिकांश जनसंख्या गांवों में रहती और उनका जीवन कृषि पर आधृत है। कृषि का कार्य आज भी प्रकृति पर निर्भर है। प्रतिवर्ष बाढ़, सूखा और अन्य प्राकृतिक विपदाओं से कृषि कार्य प्रभावित होता है। कृषि उत्पादन अनिश्चित है। वहां रोजगार के अन्य किसी साधन का अभाव है। अतः कृषि कार्य में लगे लोगों में गुप्त बेरोजगारी और मौसमी बेरोजगारी बढ़ रही है।

सामाजिक कुरीतियां

भारत में सामाजिक कुरीतियों ने भी बेरोजगारी बढ़ाने में योगदान किया है। ब्राह्मण श्रम का काम करने से परहेज करता है। वह चमड़े का उद्योग नहीं लगा सकता। बड़ी जाति के लोग अन्य जातियों के धंधों को करने में अपमान समझते हैं। ब्राह्मण और क्षत्रिय हल नहीं जोतते हैं। वे मजदूरी भी नहीं करते हैं।

ऐसे कामों को वे छोटा समझते हैं। इस प्रवृत्ति के कारण बड़ी जातियों में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। भारत में सामाजिक कुरीति के कारण ही उच्च जातियों की स्त्रियां घर से बाहर जाकर काम नहीं करती हैं और इस वर्ण की स्त्रियां बेकार और बेरोजगार हैं। इस बेरोजगारी का विशेष प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई देता है।

भारत में बेरोजगारी के प्रमुख कारणों को जान लेने के बाद यह विचार करना अत्यंत उचित होगा कि कैसे इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। यह बात स्पष्ट रूप से जान लेनी चाहिए कि बेरोजगारी ऐसी समस्या है, जिसका उन्मूलन नहीं किया जा सकता।

केवल उसे कम या नियंत्रित किया जा सकता है। बेरोजगारी को नियंत्रित करने में निम्नलिखित सूत्रों से महत्त्वपूर्ण सफलता मिल सकती है। भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध

  1. जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण बेरोजगारी रोकने के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य जनसंख्या वृद्धि को रोकना है। इसके कारण ही रोजगार के अवसर निरंतर कम पड़ते जा रहे हैं। इसके लिए परिवार नियोजन को राष्ट्रीय जन आंदोलन बनाया। जाए। परिवार को सीमित करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जाए। आवश्यक हो, तो इस संबंध में उचित कानून बनाया जाए।
  2. पूंजी का सृजन- देश में उद्योगों को लगाने और स्वरोजगार को प्रभावी करने के लिए विभिन्न स्रोतों से पूंजी का सृजन किया जाए। राष्ट्रीय बचत योजनाओं को प्रोत्साहित कर पूंजी का सृजन किया जा सकता है। पूंजी-सृजन से अधिकाधिक लोगों को स्वरोजगार के लिए धन मुहैया किया जा सकेगा और विभिन्न उद्योगों की स्थापना होगी। इन उद्योगों में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त होगा और बेरोजगारी को कम करने में सहायता मिलेगी।
  3. कुटीर उद्योगों का विकास देश के ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक परंपरागत कुटीर धंधे वहां की आबादी की बेरोजगारी को दूर करने में सहायक रहे हैं। आजादी मिलने के बाद से उनकी ओर ध्यान नहीं गया और धीरे-धीरे वे समाप्त हो गए। जैसे-बढ़ईगिरी, लोहारगिरी, तेल पेरने का काम, खचिया बनाने का काम, धुनाई और हथकरघा का काम। इन धंधों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। इनसे ग्रामीण बेरोजगारी को कम करने में सहायता मिलेगी। इसके अतिरिक्त बेकार युवकों को साबुन, मोमबत्ती, दियासलाई आदि घरेलू उपयोग की वस्तुओं के निर्माण के लिए साधन सुलभ कराकर बेरोजगारी पर अंकुश लगाया जा सकता है। •महिलाओं को पापड़, आचार मुरब्बा आदि खाद्य पदार्थों को बनाने के लिए सहायता देकर उनकी बेरोजगारी को दूर किया जा सकता है। इन कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने में अधिक पूंजी भी नहीं लगेगी।
  4. कृषि क्षेत्र में सुधार और सहायक धंधों का विकास-कृषि कार्य को आधुनिक बनाकर उसमें अधिक लोगों को नियोजित किया जा सकता है। किसानों को उन्नत बीज, उचित मात्रा में उर्वरक, आधुनिक कृषियंत्र और फसलचक्र को उपलब्ध करा दिया जाए, तो उत्पादन आशातीत बढ़ेगा और कृषि में अधिक लोगों को रोजगार भी मिलेगा। कृषि क्षेत्र में गुप्त बेरोजगारी और मौसमी बेरोजगारी है। इसे दूर करने के लिए सहायक धंधों को चालू करना जरूरी है। उपर्युक्त प्रकार की बेरोजगारी को दूर करने में दुग्ध उत्पादन, मत्स्यपालन, कुक्कुटपालन, बागबानी आदि का धंधा बहुत कारगर सिद्ध होगा।
  5. रोजगारपरक शिक्षा पर जोर-अन्य कोटि के बेरोजगारों से शिक्षित बेरोजगारों की समस्या अधिक जटिल हैं। इनकी संख्या भयंकर रूप में बढ़ रही है। इन्हें . रोजगार परक शिक्षा देकर विभिन्न रोजगारों में नियोजित किया जा सकता है। प्रयास यह होना चाहिए कि ये युवक अपना रोजगार शुरू करें। आरंभ में इन्हें आवश्यक दिशा-निर्देश और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराकर बेरोजगारी से बचाया जा सकता है। यह भी आवश्यक है कि युवा पीढ़ी में शारीरिक श्रम के प्रति रुझान पैदा की जाए। ऐसा होने पर बेरोजगारी तो नियंत्रित होगी ही, साथ ही युवा-अनुशासनहीनता और समाज विरोधी कार्यों से भी मुक्ति मिलेगी।
  6. सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन-समाज में वर्ण, जाति, परंपरा और अंधविश्वास के कारण भी बेरोजगारी बढ़ रही है। इनसे मुक्त होने पर ही लोगों में कार्य के प्रति लगाव उत्पन्न होगा। उच्चवर्ण के लोगों में यह धारणा बद्धमूल है कि उन्हें छोटी जाति के लोगों द्वारा किए जाने वाले कामों को नहीं करना चाहिए। इसीलिए ब्राह्मण क्षत्रिय दूध बेचने, तेल पेरने, कुक्कुट पालने आदि कार्यों से अपने को अलग रखते हैं। ये लोग बेकार रहेंगे, लेकिन किसी भी ऐसे काम में नहीं लगेंगे, जिससे उनकी उच्चता का भ्रम टूटता है। उच्चजातियों में बेरोजगारी और गरीबी का यह बड़ा कारण है। आवश्यकता है कि उन्हें समझाया जाए कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता है। काम को निष्ठापूर्वक करना ही उचि है। यदि ऐसा हो जाए तो बेरोजगारी से मुक्ति के साथ ही समाज में समरसता बढ़ेगी।

उपर्युक्त कार्यों को सुनियोजित और देश के स्तर पर कार्यान्वित किया जाए, तो निश्चय ही बेरोजगारी को नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त होगी। बेरोजगारी में नियंत्रित करने के केंद्रीय सरकार के साथ ही विभिन्न राज्यों की सरकारों ने भी प्रयास किया है और कर रही है। सरकारी स्तर पर बेरोजगारी दूर करने के लिए किए जा रहे कार्यक्रम अग्रलिखित हैं

  1. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम – भारत सरकार द्वारा सन् 1980 ई. में लागू किए गए इस कार्यक्रम के उद्देश्य हैं- (क) ग्रामीण क्षेत्रों में अल्प रोजगार वाले पुरुषों और स्त्रियों को अधिक काम दिलाना। (ख) ग्रामीण क्षेत्रों में कुएं, सड़कें, नालियों आदि के निर्माण के कार्यों द्वारा रोजगार के अवसर सुलभ करना।
  2. समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम क्षेत्रों में पूर्ण रोजगार की व्यवस्था करने के उद्देश्य से यह कार्यक्रम सरकार द्वारा सन् 1978 ई. में शुरू किया गया। इस योजना से अब तक लाखों लोगों को रोजगार सुलभ कराया गया है
  3. जवाहर रोजगार योजना यह योजना सन् 1980 ई. में लागू की गई। इस योजना का लक्ष्य प्रत्येक निर्धन ग्रामीण परिवार के कम-से-कम एक सदस्य को उसके घर के पास वर्ष में 50 से 100 दिनों तक कार्य देना है।
  4. स्वरोजगार योजना- यह योजना सन् 1983 ई. में शिक्षित बेरोजगारों को उन्हें अपना धंधा शुरू करने में सहायता देने के लिए लागू की गई। इस योजना के अंतर्गत 10 लाख से कम जनसंख्या वाले नगरों के शिक्षित बेरोजगारों को अपना काम धंधा शुरू करने में प्रशिक्षण और आवश्यक धन उपलब्ध कराया जाता है।
  5. रोजगार कार्यालयों का खोला जाना—बेरोजगारों को मार्गदर्शन और रोजगारों की सूचना देने के लिए प्रायः सभी जिला मुख्यालयों पर रोजगार कार्यालय खोले गए हैं।

इनके अतिरिक्त लघु उद्योगों और कुटीर उद्योगों को आर्थिक और अन्य सुविधाएं भी दी जा रही हैं। इसी तरह ग्रामीण भूमिहीन गारंटी योजना और कृषकों तथा बेरोजगार युवकों की सहायता के लिए कृषि सेवा केंद्र भी खोले गए हैं। सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं निष्ठापूर्वक प्रयास करें तो बेरोजगारी पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है।

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