नीति निदेशक तत्व क्या है? भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्त्व?

भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्त्व (Bhartiya Samvidhan Me Niti Nirdeshak Tatva), भारतीय संविधान विश्व का विशालतम संविधान है। इसमें 95 अनुच्छेद और 9 अनुसूचियां हैं। जबकि कनाडा के संविधान में 147, आस्ट्रेलिया के संविधान में 128 और अमेरिका के संविधान में केवल 7 अनुच्छेद हैं।

भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्त्व (Bhartiya Samvidhan Me Niti Nirdeshak Tatva)

भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्त्व

यह भी पढ़े – भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकार? जाने मौलिक अधिकार के बारे में।

भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्त्व (Bhartiya Samvidhan Me Niti Nirdeshak Tatva)

संविधान को इतना विस्तृत रूप देने के अनेक कारण । इसमें संघ-संविधान के साथ-साथ राज्यों का संविधान भी ब्योरेवार दिया गया है। इसके अतिरिक्त ऐसे अनेक विषय इसमें रखे गए हैं, जो प्रायः संविधान में नहीं होते हैं, जैसे लोकसेवा आयोग, निर्वाचन आयोग, वित्त आयोग का संगठन और कार्य, भाषा संबंधी उपबंध और अनुसूचित जातियों, ऐंग्लो इंडियनों तथा विशेष समुदायों के प्रतिनिधित्व संबंधी अनुबंध।

इतना ही नहीं, संविधान में प्रत्येक विषय का पूरा ब्योरा देने का प्रयत्न किया गया है, जिससे कोई शंका या संदेह न रह जाए। संविधान के अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व’ का उल्लेख किया गया है।

भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्त्वों को सम्मिलित करने का विचार संभवतः आयरलैंड के संविधान से प्रभावित है। आयरलैंड के पूर्व गणतंत्रीय स्पेन के संविधान में भी ऐसे तत्त्वों का उल्लेख हुआ है। इसका आभास फ्रांस की प्रसिद्ध ‘मानव तथा नागरिक के अधिकारों की घोषणा’ और टामस जैफर्सन द्वारा लिखित अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा’ में भी मिलता है।

इन तत्त्वों का महत्त्व और उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 37 में स्पष्ट कर दिया गया है, ‘इस भाग (8) में दिए गए उपबंधों को किसी न्यायालय द्वारा बाध्यता न दी जा सकेगी, किंतु तो भी इनमें दिए हुए तत्त्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्त्वों का प्रयोग करना राज्य का कर्तव्य होगा।

प्रश्न उठता है कि जब इन तत्त्वों का कोई विधि-सम्मत अस्तित्व नहीं है तो इन्हें संविधान में क्यों स्थान दिया गया। इसका कारण यह है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि नागरिकों को सर्वतोमुखी विकास के लिए अपेक्षित सभी सुविधाओं को मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान किया जा सके।

अतः संविधान निर्माताओं ने देश की परिस्थितियों के अनुसार कुछ सुविधाएं अधिकार के रूप में प्रदान कर दीं। साथ ही आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, न्यायिक तथा अंतरर्राष्ट्रीयता के क्षेत्र में अपने भविष्य के लक्ष्यों को निर्धारित कर दिया।

वही तत्त्व नीति-निदेशक तत्त्व हैं, जो नीति निर्धारण के संबंध में सरकार को मार्गदर्शन करते रहेंगे। सरकार इन्हें व्यावहारिक रूप देने का हर संभव प्रयास करेगी। परंतु ऐसा करने के लिए उसे न्यायालय द्वारा बाध्य नहीं किया जा सकता है।

नीति-निदेशक तत्त्व

नीति-निदेशक तत्त्वों को पांच भागों में बांटा जा सकता है-

  1. आर्थिक सुरक्षा संबंधी तत्त्व
  2. सामाजिक व्यवस्था संबंधी तत्त्व
  3. सांस्कृतिक और शिक्षा संबंधी तत्त्व
  4. न्याय संबंधी तत्त्व
  5. अंतर्राष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा संबंधी तत्त्व

आर्थिक सुरक्षा संबंधी तत्त्व-

संविधान के नीति-निदेशक तत्त्वों में निम्नलिखित आर्थिक तत्त्वों का उल्लेख किया गया है। इस संबंध में राज्य ऐसी व्यवस्था करेगा कि-

  1. प्रत्येक स्त्री-पुरुष को समान रूप से जीविका के साधन उपलब्ध हों।
  2. धन और उत्पादन के साधन कुछ थोड़े-से व्यक्तियों के हाथ में इकट्ठे न हों जाएं।
  3. प्रत्येक नागरिक को चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, समान कार्य के लिए समान वेतन मिले।
  4. पुरुष एवं स्त्री के स्वास्थ्य तथा शक्ति और बच्चों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो।
  5. बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी तथा अन्य कारणों से जीविका कमाने में असमर्थ व्यक्तियों को आर्थिक सहायता मिल सके।
  6. गांवों में व्यक्तिगत अथवा सहकारी आधार पर चल रहे उद्योग-धंधों को प्रोत्साहन दिया जाए।
  7. कृषि तथा उद्योगों में लगे श्रमिकों को उचित वेतन मिल सके तथा उनका जीवन-स्तर ऊंचा हो।
  8. कृषि तथा पशुपालन व्यवसाय को आधुनिक ढंग से संगठित तथा विकसित किया जाए।
  9. भौतिक साधनों का न्यायपूर्ण वितरण हो।
  10. समाज के कमजोर वर्गों को निःशुल्क कानूनी सहायता मिल सके।
  11. औद्योगिक संस्थानों के प्रबंध में कर्मचारियों की भागीदारी हो।
  12. गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक ढोरों की नस्ल के परिरक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करेगा।

सामाजिक व्यवस्था संबंधी तत्त्व

नागरिकों के सामाजिक उत्थान के लिए राज्य निम्नलिखित व्यवस्थाएं करेगा-

  1. समाज के विभिन्न वर्गों विशेषकर अनुसूचित जातियों, पिछड़ी जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा एवं उत्थान के संबंध में।
  2. लोगों के जीवनस्तर में तथा स्वास्थ्य में सुधार हो सके। मद्यपान तथा अन्य मादक पदार्थों पर रोक लगाई जा सके।
  3. नागरिकों को कार्य करने को न्यायोचित तथा मानवोचित स्थिति प्राप्त हो सके।
  4. नागरिकों का शोषण और नैतिक पतन न हो सके।
  5. समस्त श्रमजीवियों को निर्वाह योग्य वेतन मिल सके।

सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधी तत्त्व

राज्य सांस्कृतिक क्षेत्र में निम्नलिखित नीतियों के पालन करने का प्रयत्न करेगा-

  1. संविधान लागू होने के दस वर्ष के अंदर 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करेगा।
  2. देश के समस्त नागरिकों के लिए समान आचार संहिता की व्यवस्था करेगा।
  3. राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारकों, भवनों तथा वस्तुओं की देखभाल तथा संरक्षण की व्यवस्था करेगा।

न्याय संबंधी तत्त्व

न्यायिक क्षेत्र में सुधार लाने के लिए राज्य निम्नलिखित सिद्धांतों का अनुसरण करेगा-

  1. राज्य देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून तथा न्यायालय की व्यवस्था करेगा।
  2. न्यायापालिका को कार्यपालिका से अलग करने का प्रयत्न किया जाएगा।
  3. देश के समस्त गांवों में ग्राम पंचायतों की व्यवस्था की जाएगी, जिससे देश में स्वायत्त शासन की व्यवस्था हो सके।
  4. सारे देश में समान दीवानी कानून संहिता लागू करने का प्रयास किया जाएगा।

अंतर्राष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा संबंधी तत्त्व

अंतर्राष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षाबनाए रखने के लिए राज्य निम्नलिखित सिद्धांतों का पालन करेगा-

  1. अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा के प्रयासों को प्रोत्साहन देना।
  2. अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने को प्रोत्साहन देना।
  3. विभिन्न राष्ट्रों के बीच न्याय एवं सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाने की दिशा में कार्य करेगा।

नीति-निदेशक तत्त्वों के पीछे न्यायिक संरक्षण न होने के कारण आलोचकों ने इन्हें निरर्थक, कोरी शुभकामना, मिथ्या स्वप्न और नैतिक उपदेश कहा है। परंतु आलोचक यह नहीं समझते कि इनके पीछे जनमत की शक्ति है और जनमत की अवहेलना करना किसी सरकार के लिए आसान नहीं है।

विगत 50 वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने नीति निदेशक तत्त्वों में से अनेक को लागू किया है। उदाहरणार्थ-समान कार्य के लिए समान वेतन, बालिकाओं के लिए निःशुल्क शिक्षा, ग्राम पंचायतों का गठन, कृषि की उन्नति के लिए विशेष प्रयास और न्यायपालिका और कार्यपालिका को पृथक् किया गया है।

इसके अतिरिक्त उद्योगों के प्रबंध में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है तथा अनुसूचित जातियों- जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों को संरक्षण प्रदान किया गया है। किंतु अभी बहुत कुछ करना शेष है, जैसे सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता की व्यवस्था नहीं की गई है।

इससे समाज के विभिन्न वर्गों में समानता नहीं हो पाएगी। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से उत्तर मांगा है कि अब तक समान नागरिक संहिता के संबंध में उसने क्या कार्रवाई की है। इसी तरह दुधारू पशुओं का वध प्रतिबंधित करने के लिए भी कोई कानून नहीं बना है। सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य 14 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों को निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था का है। इस संदर्भ में सरकारी घोषणा तो होती है, किंतु वह व्यवहार में दिखाई नहीं दे रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.