भास्कराचार्य का जीवन परिचय? भास्कराचार्य की खोज क्या है?

भास्कराचार्य का जीवन परिचय (Bhaskaracharya Ka Jeevan Parichay), उनका जन्म 1114 ई में हुआ। जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। उन दिनों इतिहास लेखन की परंपरा न होने के कारण हम उनके जन्मस्थान के बारे में स्वयं को अनभिज्ञ पाते हैं। भास्कराचार्य के पिता गणित व वेद के महापण्डित थे। उन्होंने अपने पुत्र को शिक्षित करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी। मेधावी पिता की संतान भी मेधावी ही थी। भास्कराचार्य ने पिता के कृतित्व को पढ़ा व समझा।

भास्कराचार्य का जीवन परिचय (Bhaskaracharya Ka Jeevan Parichay)

भास्कराचार्य का जीवन परिचय

भास्कराचार्य का जीवन परिचय (Bhaskaracharya Ka Jeevan Parichay)

न तो शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी यंत्र हैं और न ही अन्य उपकरण। एक व्यक्ति संध्या से आकाश की ओर टकटकी लगाए बैठा है। वह बीच-बीच में बाँस की नलिका से कुछ देख कर अपने पास लिख भी रहा है। केवल एक बार देख कर लिखे सिद्धांतों से ही उसे संतोष नहीं होता। गणनाओं की शुद्धता की जाँच के लिए वह पूरी-पूरी रात यूँ ही काट देता है।

भास्कराचार्य के द्वारा किये गये आविष्कार

S.No आविष्कार
1.गणित व ज्योतिष के अनेक सिद्धांत
2.लीलावती नामक ग्रंथ में छंद पद्धति का पालन

इस वर्णन को पढ़ कर पाठकगण भी निश्चित रूप से अनुमान लगा चुके हैं कि हम किसी खगोलशास्त्री के विषय में चर्चा करने जा रहे हैं। वे खगोलशास्त्री हैं, महानतम गणिताचार्य ‘भास्कराचार्य जी ।

उन्होंने ही हमें सिखाया कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। तभी प्रत्येक वस्तु आकाश की ओर जाने की बजाए पृथ्वी पर ही गिरती है। पृथ्वी किसी आधार पर नहीं टिकी अपितु अपनी ही शक्ति से स्थिर है। जिस प्रकार कदम्ब के फूल की गाँठ चारों ओर से केसरों से घिरी रहती है उसी प्रकार पृथ्वी भी चारों ओर यज्ञशाला, उद्यान, नगरों व गाँवों से घिरी है।

गणित व ज्योतिष में उनकी विशेष रूप से रुचि थी। मुस्लिमों के आक्रमण से भारतीय संस्कृति पर खतरा आन पड़ा था। उन्होंने अपने ग्रंथों द्वारा गणित व ज्योतिष की ऐसी सामग्री प्रस्तुत की जो आज वर्षों पश्चात् भी उतनी ही सार्थक व सटीक है।

उन्होंने सिद्धांत शिरोमणि (दो भाग) लीलावती, बीजगणित, व्याकरण कुतूहल की रचना की। सिद्धांत शिरोमणि को ज्योतिष के सिद्धांतों का श्रेष्ठ प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है। इसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ तथा कई विद्वानों ने इस पर टीकाएं भी लिखीं। अपने ही सिद्धांतों के स्पष्टीकरण के लिए उन्होंने वासना भाष्य नामक टीका लिखी।

अंकगणित पर लिखी पुस्तक लीलावती भी बहुत प्रसिद्ध रही। लीलावती नामक कथा को संबोधित कर प्रश्नोत्तर रूप में अंकगणित व ज्यामिति के प्रश्न सरल व रोचक शैली में दिए गए हैं। इस विषय में एक जनश्रुति प्रचलित है। कहते हैं कि लीलावती भास्कराचार्य की पुत्री थी। लीलावती के जीवन में विवाह योग नहीं था किंतु उन्होंने गणनाओं के आधार पर लीलावती के विवाह के लिए एक शुभ मुहूर्त खोज ही निकाला

लीलावती वधू वेष में सजाई गई। चारों ओर पूर्ण सावधानी बरती जा रही थी कि उस शुभ मुहूर्त में ही लगन संपन्न हो। उस समय, समय जानने के लिए नाड़िका यंत्र की सहायता ली जाती थी। यह एक ताँबे का बरतन था जिसके पेंदे में छोटा-सा छिद्र रहता। छिद्र से धीरे धीरे पानी बरतन में जमा होता रहता जिससे सही समय की सूचना मिल जाती थी।

लीलावती ने जब कौतूहल वश उस पात्र में झाँका तो उसके आभूषण का एक मोती अनजाने में ही पात्र में जा गिरा। कोई जान भी न पाया और मोती ने छिद्र का मुख बंद कर दिया और विवाह का शुभ मुहूर्त बीत गया। लीलावती के दुःख को कम करने के लिए पिता ने कहा

“मैं तुम्हारे नाम से ग्रंथ की रचना करूँगा जिससे तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा…।” और इस प्रकार उन्होंने गणित का महान ग्रंथ अपनी पुत्री को समर्पित कर दिया। कुछ अन्य विद्वानों की धारणा है कि लीलावती उनकी पत्नी का नाम था।

चाहे जो भी हो, लीलावती वास्तव में ज्ञानवर्द्धक ग्रंथ है। छंद पद्धति का पालन इस ग्रंथ में भी किया गया है जिससे इसकी शैली और भी मनोरम हो गई है। इस ग्रंथ की महानता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका अनुवाद अंग्रेजी व फारसी भाषाओं में भी हुआ। यूरोपीय विद्वानों ने भी इसके महत्त्व को स्वीकारा ।

इस ग्रंथ में जोड़ घटा, गुणा, भाग, वर्ग, वर्गमूल, धन व धनमूल के अतिरिक्त त्रैराशिक, पंचराशिक आदि प्रश्न भी शामिल किए गए हैं।

भास्कराचार्य ने अपने ग्रंथों में दशमलव पद्धति का भी प्रयोग किया। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती विद्वानों के सिद्धांतों की कमियों को विनम्रतापूर्वक दूर करने का प्रयास किया। बीजगणित में दिए गए कुछ सिद्धांत तो इतने उच्च स्तर के हैं कि उन्हें समझ पाना हमारे लिए कठिन ही नहीं अपितु असंभव भी है। केवल गणितज्ञ ही उन सूत्रों के पीछे छिपे अर्थों को पहचान सकते हैं परंतु एक सीमा तक

धनात्मक व ऋणात्मक राशियों को दिखाने के लिए उन्होंने नया तरीका खोज निकाला था। ऋणात्मक राशि दर्शाने के लिए वे संख्या के ऊपर एक बिंदु लगा देते थे। उन्हें धनात्मक व ऋणात्मक संस्थाओं के वर्गमूल की भी पूरी जानकारी थी।

ज्यामिति के क्षेत्र में उन्हें बहुभुजों की विशेषताओं का भी ज्ञान था। उनके द्वारा निकाला गया पाई (r) का मान (3. 141666) था जो स्वीकृत मान के आस-पास ही है।

विद्वानों की धारणा है कि उन्हें अवकल शास्त्र (कैलकुलस) का भी ज्ञान था। यह भी सत्य है कि लेबनीज नामक विद्वान ने इस विषय में विस्तृत ज्ञान दिया परंतु भास्कराचार्य के ग्रंथों में भी उसका वर्णन मिलता है।

भास्कराचार्य जी स्वभाव से ही उत्साही व परिश्रमी थे। उनके विषय में एक पाश्चात्य विद्वान ने लिखा है “उनकी विवेचन सूक्ष्मता उच्चकोटि की थी। हमें यह स्वीकारना होगा कि उनके द्वारा स्थापित गणित-ज्योतिष के सिद्धांतों की तुलना आधुनिक गणित ज्योतिष से नहीं कर सकते।”

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