खून की कमी के लक्षण, कारण, यौगिक चिकित्सा, आहार और सावधानी

खून की कमी के लक्षण, कारण, यौगिक चिकित्सा, आहार और खून की कमी में क्या सावधानी बरतनी चाहिए। हमारे शरीर में शरीर के भार का तेरहवाँ भाग रक्त का होता है। शरीर में बहने वाले रक्त (Anemia) में लाल कणिकाओं (R.B.C.) का कम हो जाना ही, ‘रक्ताल्पता’ है। सामान्य स्थिति में खून के अन्दर हीमोग्लोबिन 13 से 16 ग्राम प्रति सौ मिली. तथा लाल कण 40 से 50 लाख प्रति घन मिमी. होता है। इनसे कम होने पर रक्तहीनता की शिकायत मानी जाती है।

खून की कमी के लक्षण, कारण, यौगिक चिकित्सा, आहार और सावधानी

खून की कमी के लक्षण

यह भी पढ़े – एपेंडिक्स क्या है, कारण, लक्षण, यौगिक चिकित्सा, आहार और कैसे होता है

वैसे तो बच्चे, पुरुष, स्त्रियाँ सभी इस रोग के शिकार हो सकते हैं पर भारत में लगभग 88 प्रतिशत गर्भवती महिलाऐं खून की कमी की शिकार है। इस स्थिति का मुख्य कारण स्वास्थ्य नीति में स्वास्थ्य शिक्षा की कमी एवं अज्ञानता है। दवाईयों से खून की कमी को दूर नहीं किया जा सकता, बल्कि आहार, विहार, आचार के प्रति सजगता परिवर्तन एवं शिक्षण ही आम जनता को इस भयावह स्थिति से बाहर निकाल सकता है।

खून की कमी के लक्षण

  1. भोजन का न पचना
  2. भूख न लगना
  3. चेहरे का रंग सफेद हो जाना
  4. नाखूनों का सफेद हो जाना
  5. आलस्य बने रहना
  6. शरीर में जल्दी थकावट आना
  7. शरीर का तापमान कम रहना
  8. आँखों की पलकों के नीचे की त्वचा निस्तेज एवं पीली पड़ जाना
  9. साँस फूलना
  10. चेहरे व पैरों में सूजन आ जाना
  11. आँखों के सामने अँधेरा छाना
  12. सोकर या बैठकर उठने पर सिर दर्द, चक्कर आना
  13. हृदय की धड़कन तीव्र हो जाना
  14. जीभ थुलथुली एवं लाल होना
  15. मुख के कोनों पर जख्म हो जाना
  16. पैरों में सुईयों सी चुभने जैसी सम्वेदना होना

खून की कमी का कारण

अलग-अलग कारणों से उत्पन्न खून की कमी के आधार पर रक्तहीनता का वर्गीकरण निम्नवत् किया जा सकता है-

  1. लौह तत्व की अभावजन्य रक्तहीनता-शरीर में सामान्यतः 5-6 लीटर खून होता है। लाल तथा सफेद रक्तकोशिकाऐं, प्लेटलेट्स तथा प्लाज्मा खून के मुख्य घटक हैं। लाल कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन पाया जाता है जो ऑक्सीजन को एक-एक कोषों तक पहुँचाता है। हीमोग्लोबिन का लाल रंग लौहयुक्त पोरफायरिन वर्णक के कारण होता है। जब हीमोग्लोबिन में इस लौह तत्व की कमी हो जाती है तो रक्तहीनता की शिकायत उत्पन्न हो जाती है क्योंकि लौह का अधिकांश भाग हीमोग्लोबिन के निर्माण में काम आता है।
  2. लोहे की कमी से रक्तहीनता-प्रतिदिन सामान्य पुरुष को 1 मिग्रा. गर्भावस्था में महिलाओं को 5 मिग्रा. तथा मासिक धर्म के समय 2 मिग्रा. लोहा चाहिये। लोहे की कमी से कोशिकाओं तथा खून का निर्माण रुक जाता है फलत: खून की कमी हो जाती है।
  3. मैगाब्लास्टिक रक्तहीनता-लोहे के अतिरिक्त विटामिन बी-12 तथा फॉलिक एसिड की शरीर में कमी हो जाने से इस प्रकार की रक्तहीनता हो जाती है।
  4. परनीसियस रक्तहीनता-जब आँतों द्वारा विटामिन बी-12 का अवशोषण नहीं होता है तो इस प्रकार की रक्तहीनता उत्पन्न हो जाती है। आमाशय की दीवारें गैस्ट्रिक जूस तथा हाइड्रोक्लोरिक एसिड का निर्माण कम करती हैं तो लोहा व विटामिन बी का अवशोषण नहीं होता है फलतः खून की कमी हो जाती है। यदि इस प्रकार की रक्तहीनता लगातार बनी रहती है तो आमाशय का कैंसर उत्पन्न हो सकता है।
  5. जी-6 पी.डी. की कमी के कारण रक्तहीनता-इस प्रकार की रक्तहीनता वस्तुतः जेनेटिक्स होती है जो प्रायः लड़कों में ही होती है। जी 6 पी. डी. की कमी से लाल रक्त कोशिकाओं की दीवारें अच्छी तरह से बन नहीं पातीं। हृदय रोग की दवा क्वीनीडन, एण्टीबायोक्सि सल्फोनामाइड्स तथा दर्दनाशक नाइट्र्फ्यू राजोन के प्रयोग से यह रोग उग्र रूप धारण कर लेता है।
  6. सिकल सेल अर्थात् सामान्य हीमोग्लोबिन जन्य रक्तहीनता- इस प्रकार की रक्तहीनता जहाँ पर बार-बार मलेरिया होता है, वहाँ के लोगों में लाल रक्त कोशिकाएँ हँसिये की आकार की तथा हीमोग्लोबिन विकृत हो जाने के कारण उत्पन्न हो जाती है क्योंकि मलेरिया से जूझने के लिए प्रतिरोधक शक्ति पैदा करने के लिए जो दवाओं का प्रयोग किया जाता है, वे अपना दुष्प्रभाव तो छोड़ती ही हैं।
  7. थैलेसिमिया रक्तहीनता – गलत ग्रुप का खून चढ़ाने ग्लेण्डूलर फीवर, अधिक ठंड के प्रति एण्टीबॉडीज का निर्माण, रक्तचाप की दवा मिथाइलडोपा के सेवन से इस प्रकार की रक्तहीनता उत्पन्न होती है।
  8. हीमोलाइटिक रक्तहीनता-जब किन्हीं कारणोंवश लाल रक्त कोशिकाओं का विघटन तेजी से होने लगता है तो इस प्रकार की रक्तहीनता उत्पन्न हो जाती है।
  9. एप्लास्टिक रक्तहीनता-टायफाइड की दवाइयाँ, रेडियोथैरेपी आण्विक विकिरण तथा स्टीरायड ग्रुप की दवाइयों के प्रयोग से इस प्रकार की रक्तहीनता उत्पन्न हो जाती है। कभी-कभी विषाणुजन्य हिपेटाइटिस, थायराइड, पिट्यूटरी तथा अस्थि मज्जा के रोग भी इस प्रकार की रक्तहीनता उत्पन्न कर देते हैं। आर्सेनिक, शीशा, आयोडीन, टेट्रसाइक्लिन खानेवाला सोड़ा धातु की विषाक्तता से रक्तहीनता उत्पन्न होती है।

यौगिक चिकित्सा

आसन

  1. योग मुद्रा
  2. पश्चिमोत्तानासन
  3. अर्द्ध मत्स्येन्द्रासन
  4. भुजंगासन
  5. सर्वांगासन

प्राणायाम

  1. लम्बे गहरे श्वास-प्रश्वास का अभ्यास
  2. उड्डियान बन्ध
  3. नाड़ी शोधन प्राणायाम
  4. अग्निसार प्राणायाम
  5. उज्जायी प्राणायाम

आहार सम्बन्धी सुझाव

हमारा रक्त क्षार प्रधान होता है अतः रोगियों को प्रचुर मात्रा में क्षार प्रधान आहार का सेवन करना चाहिये। इसके लिए खूबानी केला, नाशपाती, सेब, जामुन, काली किशमिश, मुनक्का, आडू, चेरी, शहतूत, नीबू, संतरा, मौसम्मी का भरपूर सेवन करें। इससे रक्त पुनर्जीवन प्राप्त कर सतेज हो जाता है रोगियों को प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, लोहा, फॉलिक एसिड, विटामिन बी-12, कॉपरयुक्त आहार का सेवन लाभप्रद होता है।

प्रोटीन की दृष्टि से दूध, छाछ, दही, कर्णीयुक्त चावल, अंकुरित अनाज श्रेष्ठ है। यह अमृतान्न कहलाता है अतः रक्तहीनता के रोगियों के लिए वरदान है क्योंकि इसमें विटामिन बी 12, सी. ई., ए. थायमिन रिवोफ्लोविन, फौलिक एसिड, बायोटिन इत्यादि नाना प्रकार के एंजाइम पैदा हो जाते हैं। दूसरे लोहा फौलिक एसिड शरीर में शीघ्र अवचूषित होकर रक्तहीनता को दूर करता है।

सब्जियों में पालक, टमाटर, गाजर, पत्तागोभी, खीरा, ककड़ी, मूली, शलजम के पत्ते, गेहूँ के पौधों का रस, मटर, आलू, सोयाबीन, प्याज के पत्तों, अजवायन, नारियल, बादाम, काजू, अखरोट, मूँगफली, अंकुरित अनाज, अर्थात् मोंठ, चना, गेहूँ, मसूर, उड़द, तिल, अजवायन आदि को अंकुरित करके खायें।

सावधानी

खाने वाले सोड़े का प्रयोग न करें क्योंकि यह लोहे के अवशोषण को बाधित करता है। सम्पूरक लोहे की गोलियाँ एवं टॉनिक का भी प्रयोग न करें क्योंकि इससे अनेक हानियाँ हो सकती हैं। शाक-सब्जियों से प्राप्त लौह तत्व प्राकृतिक होता है जो लोहे के पाचन एवं अवशोषण में सहायता करने के साथ ही लोहे के दुष्प्रभाव को भी नियंत्रित करता है।

उपवास

खून की कमी में रोगियों का 2-3 नीबू, पानी, शहद या सिर्फ पानी पर उपवास करने से शरीर में संचित लोहा, कैल्शियम, कोबाल्ट, कॉपर आदि खनिज लवणों का अवचूषण भली-भाँति होने लगता है तथा हीमोग्लोबिन बढ़ जाता है। भोजन के बाद 150 ग्राम सेब खायें। क्योंकि इसमें लौह रक्षक एवं शोषक तत्व पाया जाता है जो अनाजों में स्थित फायटिन एवं फायटेट को विष प्रभावी बनाकर लोहा के अवशोषण में सहायता पहुँचाता है। वस्तुतः हम सब अपने जीवन के निर्माता हैं। रोगरूपी शत्रु को पनपने मत दीजिये। इसका पता लगते ही पूरी ताकत से नियंत्रण में लाना चाहिये। अगर इतना कर लिया जाये तो योग एवं उचित आहार के सेवन द्वारा सुन्दर स्वास्थ्य की प्राप्ति सुलभ है।

यह भी पढ़े – मोटापा क्यों बढ़ता है, कारण, लक्षण, प्रकार, आहार, रोकथाम और दुष्परिणाम

अस्वीकरण – यहां पर दी गई जानकारी एक सामान्य जानकारी है। यहां पर दी गई जानकारी से चिकित्सा कि राय बिल्कुल नहीं दी जाती। यदि आपको कोई भी बीमारी या समस्या है तो आपको डॉक्टर या विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। Candefine.com के द्वारा दी गई जानकारी किसी भी जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

Follow us on Google News:

Mamta Jain

मैं ममता जैन मीडिया क्षेत्र में मैं तीन साल से जुड़ी हुई हूं। मुझे लिखना काफी पसन्द है और अब मैने यही मेरा प्रोफेशन बना लिया है। मैं जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएट हूं। हेल्थ, स्वास्थ्य, मनोरंजन, सरकारी योजना, क्रिकेट, न्यूज़ और ब्यूटी पर लिखने में मेरा स्पेशलाइजेशन है। हेल्थ और ब्यूटी से जुड़ी जानकारी जानने के लिए मुझे फॉलो करें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *