ब्रोंकाइटिस तथा इयोसिनोफीलिया के लक्षण, कारण, चिकित्सा, योग, आसन, प्राणायाम और परहेज

ब्रोंकाइटिस तथा इयोसिनोफीलिया के लक्षण, कारण, चिकित्सा, योग, आसन, प्राणायाम और परहेज जानना बहुत ही जरूरी है। ब्रोंकाइटिस (Bronchitis) (श्वसनी शोथ) मुख्य श्वांस नली एवं इसकी शाखाओं के संक्रमण (इन्फेक्शन) तथा सूजन इत्यादि को कहते हैं। यह अचानक शुरु होने वाले अल्पकालीन रोग (एक्यूट) तथा लम्बे समय तक रहने वाले पुराने रोग (क्रॉनिक) दोनों रूपों में पाया जाता है। सामान्य रूप से यह रोग सर्दी-जुकाम एवं फ्लू आदि से पनपता है और अन्त में अपनी चपेट में निम्न श्वसन नलिकाओं को भी ले लेता है।

ब्रोंकाइटिस तथा इयोसिनोफीलिया के लक्षण

ब्रोंकाइटिस तथा इयोसिनोफीलिया के लक्षण

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ब्रोंकाइटिस के कारण

इसके प्रमुख कारण ठंड, नमीयुक्त वातावरण, धुंध, धुआँयुक्त वातावरण है। लम्बे समय तक मुँह से ठंडी हवा लेने से भी यह रोग पनपता है, क्योंकि मुँह से साँस लेने पर फेफड़ों में शुद्ध वायु नहीं जा पाती है अतः वे अपनी प्रक्रिया ठीक से नहीं कर पाते, इसलिये प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ जाती है।

इसका प्रारम्भ बदलते मौसम में बाहर की हवा लगने, गीले बदन में सर्दी लगने से भी होता है। यदि सामान्य जुकाम या शीत को नजर अंदाज कर दिया जाये तो वह नीचे उतरकर श्वसनियों तथा फेफड़ों को रोगग्रस्त कर ब्रोंकाइटिस अथवा निमोनिया या अन्य गम्भीर रोग उत्पन्न कर सकता है।

ब्रोंकाइटिस के लक्षण

इसका प्रमुख लक्षण है सूखी खाँसी ऊपरी वक्षस्थल में पीड़ा का अनुभव होना जैसे-जैसे रोग बढ़कर अन्य श्वसनिकाओं में फैलता उजाता है, छाती में जकड़न -सी होने लगती है। साँसों में घरघराहट होती है तथा साँस फूलने महसूस लगती है। ब्रोंकाइटिस की शुरुआत में कफ का निर्माण कम मात्रा में होता है और यह आसानी से बाहर नहीं आता। इसमें रक्त की बूँदें भी आ सकती है। एक या दो दिन में कफ गाढ़ा होने लगता।

यह रोग जैसे-जैसे श्वसन नलिका में नीचे स्तर तक पहुँचता है तो बुखार की शिकायत होने लगती है। कभी-कभी यह रोग नियंत्रण से बाहर हो गम्भीर रूप धारण कर लेता है तो साँस का फूलना बढ़ जाता है। बुखार बंढ़ जाता है, शरीर की जीवन-रक्षक प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है। और रोग फेफड़ों तक पहुँच जाता है रोग की इस अवस्था को निमोनिया कहते हैं। इसमें रोगी की जीवन-रक्षा सिर्फ एण्टीबायोटिक्स की अधिक मात्रा से हो सकती है।

इयोसिनोफीलिया

यह रोग श्वसन तंत्र का एक ऐसा रोग है जिसके लक्षण ब्रोंकाइटिस तथा दमा (अस्थमा) दोनों से मिलते-जुलते हैं। चिकित्सकों की मान्यता है कि जब चिरकालिक सर्दी, जुकाम या ब्रोंकाइटिस का रोगी धीरे-धीरे अस्थमा की ओर बढ़ रहा हो तो उसे श्वसन रोग की एक परिवर्तित अवस्था को इयोसिनोफीलिया (Eosinophilia) कहते हैं। इयोसिनोफिल श्वेत रक्त कणों का ही एक प्रकार है जो अनेक रासायनिक प्रतिक्रियाओं के प्रदर्शन में मध्यस्थता करता है। इन कणों की संख्या में वृद्धि, एलर्जी के रूप में मुख्यतः फेफड़ों को प्रभावित करती है।

इयोसिनोफीलिया के कारण

इसका प्रमुख कारण है एलर्जी, जिसके कारण रक्त में प्रतिक्रिया स्वरूप इयोसिनोफिल्स बढ़ जाते हैं। यह एलर्जी अनेक बाह्य प्रोटीन तथा औषधियों के शरीर में प्रवेश करने से होती है। विषुवतीय प्रदेशों में यह फाइलेरिया के रोगाणुओं या पेट के कीड़ों के प्रति एलर्जी के प्रकटीकरण के रूप में देखा जाता है। यह रोग औद्योगिक इलाकों में भी आम है। वहाँ प्रदूषण इसकी शुरुआत करने में मुख्य भूमिका निभाता है। यह रोग अक्सर बच्चों में तब पकड़ में आता है जब उनमें बार-बार या लगातार सर्दी, खाँसी के लक्षणों को देखते हुए उनके रक्त का परीक्षण किया जाता है।

आधुनिक चिकित्सा

इयोसिनोफीलिया के रोगी में जब फाईलेरिया के संक्रमण का सन्देह होता है तब उसे हाइयोथिल कार्बेमेजाइन नामक दवा दी जाती है पर लम्बे अन्तराल में यह प्रभावहीन हो जाती है। इसी प्रकार ब्रोंकाइटिस में एण्टीबायोटिक्स का सहारा लिया जाता है पर यह भी कुछ दिनों में प्रभावहीन हो जाती है। इस प्रकार इन दोनों रोगों में आधुनिक चिकित्सा सफल नहीं है। इसके स्थाई उपचार के लिए यौगिक चिकित्सा सफल सिद्ध होती है।

क्रानिक ब्रोंकाइटिस एवं इयोसिनोफीलिया की यौगिक चिकित्सा

यौगिक चिकित्सा इन दोनों रोगों का स्थाई समाधान है जो तकलीफ में राहत तो पहुँचाती ही है साथ-साथ कमजोर एवं सम्वेदनशील अंगों को भी शान्ति प्रदान करती है। तीव्र प्रारम्भिक लक्षणों के दौरान कोई भी योगासन आदि क्रिया नहीं करनी चाहिये।

प्रत्युत पूर्ण विश्राम अति आवश्यक है। स्थिति में सुधार महसूस होने पर पवनमुक्तासन समूह के अभ्यास एवं मकरासन करें। इसके उपरान्त जब वे लोग अन्य आसन करने के योग्य हो जायें तब अन्य लोगों के साथ अपनी सुविधा एवं शारीरिक क्षमता के अनुसार निम्नलिखित आसनों में से चयन कर लें और उनका अभ्यास किसी योग्य योग्य चिकित्सक के निर्देशन में शुरु करें-

आसन

1सूर्य नमस्कार
2वज्रासन
3शशांकासन
4भुजंगासन
5उष्ट्रासन
6मार्जारी आसन
7धनुरासन
8कंधारासन
9चक्रासन
10पश्चिमोत्तानासन
11अर्द्धमत्येद्रासन
12सर्वांगासन
13हलासन
14त्रिकोणासन
15हस्त उत्थानासन
16द्विकोणासन
17लोलासन

प्राणायाम

वैसे यदि रोगी चाहें तो अपनी सुविधा एवं क्षमतानुसार सभी प्राणायामों को बारी-बारी से कर सकता है पर विशेषतः उसे उज्जायी प्राणायाम, कपाल भाति प्राणायाम भस्त्रिका एवं नाड़ी शोधन प्राणायाम तो करने ही चाहिये।

उपयोगी सुझाव एवं निर्देश

भोजन

शुरुआत में सिर्फ फलों का रस और सब्जियों का सूप लेना चाहिये इसके बाद पतली खिचड़ी का सेवन करें। हल्की उबाली हुई या कच्ची सब्जियों का सेवन प्रचुर मात्रा में करना चाहिये प्याज-लहसुन तथा मूली तथा नीबू, संतरे आदि फलों से कफ ढीला पड़कर आसानी से बाहर आ जाता है। गर्म दूध में थोड़ी-सी अदरक तथा हल्दी डालकर पीने से भी कफ आसानी से बाहर निकल जाता है। इसका सेवन रात्रि में सोने से पहले या भोजन के स्थान पर किया जा सकता है।

परहेज

  1. ठंडे खाद्य एवं पेय पदार्थों का सेवन न करें।
  2. अधिक गर्म या घुटने भर कमरों में न रहें जहाँ शुद्ध हवा न आती हो।
  3. छाती एवं गले को ढककर गर्म रखें पर खुली हवा जरूरी है।
  4. ब्रोंकाइटिस के रोगियों को सबेरे ठण्डे पानी से स्नान न करें। दौरे के समय गर्म भापयुक्त जल से स्नान करें।
  5. खाँसी को रोकने का प्रयास न करें क्योंकि यह संक्रमणयुक्त पदार्थों को बाहर निकालने में सहायता करती है।
  6. धूम्रपान अवश्य छोड़ दें अन्यथा किसी भी प्रकार का इलाज सफल नहीं हो सकता है।
  7. प्रतिदिन थोड़ा टहलना स्वास्थ्यवर्धक है। थोड़ी-थोड़ी देर लम्बी गहरी साँसें अवश्य लेना चाहिये।
  8. रात्रि में सोने से पहले भाप लेना लाभप्रद है। गर्म पानी में एक चम्मच सरसों का तेल मिलाकर पैर धोना चाहिये।
  9. रोगी को साँस लेने में यदि बहुत तकलीफ हो रही हो तो हाथ-पैरों को ऊपर की ओर (हृदय की ओर) सख्त मालिश करें, आराम मिलेगा।

इसी प्रकार पथ्य, परहेज एवं धूम्रपान व नशे का त्याग कर उचित मार्गदर्शन में यौगिक क्रियाएँ उक्त दोनों रोगों से मुक्त करा सकती हैं।

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अस्वीकरण – यहां पर दी गई जानकारी एक सामान्य जानकारी है। यहां पर दी गई जानकारी से चिकित्सा कि राय बिल्कुल नहीं दी जाती। यदि आपको कोई भी बीमारी या समस्या है तो आपको डॉक्टर या विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। Candefine.com के द्वारा दी गई जानकारी किसी भी जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।