बुद्धिमान शिष्य : बुद्धिमान शिष्य की सफलता की कहानी

बुद्धिमान शिष्य: बहुत समय पहले की बात है। एक बहुत विद्वान सिद्धपुत्र उज्जैन में रहते थे। उनके ज्ञान की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी सब यही मानते थे कि सिद्धपुत्र से जो कोई भी शिक्षा लेता है, उसका जीवन सफल होता है। उनके शिष्य दूर दूर जाकर उनके द्वारा दिए गए ज्ञान का प्रकाश फैला रहे थे।

बुद्धिमान शिष्य

बुद्धिमान शिष्य

एक दिन सिद्धपुत्र के दो शिष्य उनके पास आए। उन्होंने कहा- “गुरुदेव ! हम आपका आशीर्वाद लेने आए हैं। हमें ऐसा गुरुमंत्र दीजिए, जिससे हमारा जीवन सफल हो।”

सिद्धपुत्र ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा- ” शास्त्रों की जो शिक्षा मैंने तुम्हें दी हैं, उसे अपनी बुद्धि के अनुसार प्रयोग करोगे तो सफलता पाओगे एक बात हमेशा याद रखना कि शास्त्र के वचनों को देश काल के अनुसार समझना ही विद्वान मनुष्य की पहचान है। लकीर का फकीर बनकर कभी सफलता नहीं मिलती।”

शिष्यों ने गुरु की बात सुनी और उन्हें प्रणाम करके चल दिए। दोनों जब अपने-अपने घर जा रहे थे, तो रास्ते में नदी पड़ी नदी में जल काफी गहरा था। दोनों सोचने लगे कि नदी कैसे पार करें? वहां कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था, जो उन्हें नदी पार करा सके।

एक शिष्य का नाम था सुमति और दूसरे का नाम था आनंद। ‘यथा नाम तथा गुण’ वाली कहावत के अनुरूप सुमति बुद्धिमान था। वह हर बात को परिस्थिति के अनुसार समझकर निर्णय लेता था। दूसरी ओर आनंद नाम का शिष्य बुद्धि से कोई बात सोचने की कोशिश नहीं करता था। वह तो पोथी-पत्रा निकाल कर ढूंढने लगता था कि शास्त्र में क्या कुछ लिखा है। सुमति कुछ भी समझाए, वह मनमानी करता था। शास्त्र वचन उसके लिए पत्थर की लकीर जैसे थे।

दोनों सोच रहे थे कि नदी पार कैसे करें ? तभी सुमति ने समझाया – ” मित्र ! हम नदी के किनारे-किनारे थोड़ी दूर चलते हैं। जहां कहीं घास पर पगडंडी दिखाई देगी, वहां से नदी पार करेंगे।”

“ऐसा किसलिए मित्र ? पगडंडी देखकर नदी पार करने का आदेश तो शास्त्र में कहीं लिखा नहीं है। क्यों न हम प्रतीक्षा करें? कोई व्यक्ति आएगा, तो उससे मदद मांगेंगे।” आनंद ने सुमति से कहा।

‘भाई! हर बात शास्त्र में लिखी हो, यह जरूरी तो नहीं है। जहां पगडंडी होगी, वहां 44 आदमी अवश्य आते होंगे। यहां कहीं भी ऐसा कोई निशान नहीं है, जिससे पता चल सके कि यहां कोई आदमी पानी लेने आता होगा।” सुमति ने अपनी बात तर्कसहित आनंद को समझा दी और नदी के बहाव की ओर चल पड़ा।

आनंद थोड़ी देर तो खड़ा रहा। जब उसने देखा कि सुमति चला ही जा रहा है, तो उसे डर लगा। वह सोचने लगा कि मैं अकेला यहां कब तक रहूंगा। आखिर वह भी सुमति के पीछे-पीछे चल पड़ा। दोनों कुछ ही दूर आए थे कि उन्हें घास में बनी हुई पगडंडी नजर आई। दोनों उत्साहपूर्वक आगे बढ़े। जब वे पास आ गए, तो देखा कि वहां नदी का पाट ऊपर की तुलना में छोटा है और पास गए, तो उन्हें नदी पर बना हुआ लकड़ी का पुल दिखाई दिया।

सुमति ने खुश होकर आनंद से कहा-” अब हमारी मुसीबत दूर हो गई है। सोचो जरा कि अगर हम वहीं खड़े रहकर किसी का इंतजार करते रहते, तो नदी पार कैसे कर पाते !” आनंद ने सुमति की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। दोनों ने लकड़ी के पुल से नदी पार कर ली। शाम होने को थी। वे नगर में पहुंच गए।

दोनों मित्र कहीं विश्राम करने के लिए जगह ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे थे तभी उन्हें एक बूढ़ी स्त्री मिली। दोनों ने देखा कि वह बुढ़िया पानी का घड़ा लिए जा रही थी। दोनों तेज कदमों से चलते हुए बुढ़िया के पास पहुंच गए।

सुमति ने बुढ़िया को देखकर कहा-“हे मां! क्या तुम इस नगर में ही रहती हो? हम दोनों मित्र विद्या पूरी करके अपने घर लौट रहे हैं। क्या यहां रात को विश्राम करने के लिए कोई जगह मिल सकती है ?” आनंद चुपचाप खड़ा ही रहा। उसने सोचा- “मां तो वह होती है, जो जन्म दे। फिर व्यर्थ ही इस बूढ़ी स्त्री को मेरा मित्र मां कहकर शास्त्र के विरुद्ध आचरण कर रहा है। यह स्त्री इसके पिता की पत्नी कहां है?” लेकिन वह चुप ही रहा, कुछ बोला नहीं।

दूसरी ओर सुमति ने जब बूढ़ी स्त्री को ‘मां’ कहकर पुकारा, तो जादू का सा असर हुआ। बुढ़िया का एकमात्र बेटा एक वर्ष से परदेस गया हुआ था। वह अपने बेटे का इंतजार कर रही थी। जब सुमति ने ‘मां’ कहकर पुकारा तो वह भाव-विभोर हो गई।

उसने दोनों को गौर से देखा। दोनों के माथे पर चंदन का तिलक लगा हुआ था। उनके पास कपड़े के थैलों में मोटी-मोटी पुस्तकें भी थीं। बुढ़िया ने दोनों को पंडित ही समझ लिया।

उसने पूछा- क्या तुम मेरे परदेश गए बेटे के वापस आने की बात बता सकते हो? मैं उसके बिना बेचैन हूं। मेरा घर बहुत बड़ा है, लेकिन बेटे के बिना तो सब सूना पड़ा हुआ है। तुम लोग बताओ कि मेरा बेटा कब मिलेगा।” सुमति ने देखा कि बेटे की याद आते ही बुढ़िया भाव-विभोर हो गई। उसके कांपते हाथों से जल का घड़ा छूट गया और धरती पर गिरते ही फूट गया।

जैसे ही बुढ़िया के हाथ से जल का भरा हुआ घड़ा धरती पर गिरकर फूटा, वैसे ही आनंद ने शास्त्र निकाल कर पढ़ा। शास्त्र में लिखा हुआ था।

‘तज्जातेण या तज्जातं, तण्णिभेण य तण्णिभें।

तारूवेण य तारूवं सरिसं सरिसेण णिद्दिसे ॥”

इस गाथा का अर्थ पुस्तक में इस प्रकार लिखा हुआ था।

” जो जिससे पैदा हुआ था, वह उसी में मिल गया। वह जिसके समान था, उसी के समान हो गया। वह जिसके रूप जैसा था, उसी के रूप वाला हो गया है। जो जैसा था, वैसे के साथ मिलकर वैसा ही हो गया है।”

शास्त्र की इस गाथा को पढ़कर आनंद ने बिना कुछ सोचे-विचारे कह दिया- “बुढ़िया तेरा बेटा तो मर गया है।” उसकी बात सुनकर बुढ़िया कांप कर गिर पड़ी और बेहोश हो गई। सुमति ने बिखरे हुए जल के छींटे उस बुढ़िया के मुख पर दिए। उसे होश आ गया। बड़ी उदास नजर से उसने सुमति की तरफ देखा सुमति ने उसे डाइस दिया और सहारा देकर बिठाया।

जब वह कुछ ठीक हुई, तो सुमति बोला- “मां चिन्ता न करो। मेरे मित्र से कुछ भूल हो गई है।

तुम्हारा बेटा घर वापस आ गया है। जाओ, और घर जाकर देखो।” सुमति की बात सुनकर बूड़ी स्त्री उत्साहपूर्वक उठी। वह घर पहुंची तो देखा कि सचमुच उसका बेटा परदेस से घर आ गया है। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह तुरंत वस्त्रों का जोड़ा और रुपये लेकर वहाँ लौटी, जहां दोनों मित्र बैठे थे। उसने सुमति को वस्त्र और रुपये देकर कहा-“तुम सच्चे पंडित हो। मेरा बेटा जीवित है और घर लौट आया है। मेरी यह भेंट स्वीकार करो और मेरे घर चलो।’ बुढ़िया की बात सुनकर आनंद क्रोधित हो उठा। उसने सुमति से कहा- “मित्र! कल सुबह होते ही तुम्हें मेरे गुरुजी के आश्रम चलना होगा। गुरुजी ने मुझसे धोखा किया है। मुझे गलत पढ़ाया है। तुम यदि नहीं चलोगे, तो मैं तुम्हें भी मार दूंगा।”

सुमति समझ गया कि मित्र आनंद क्रोध की आग में जल रहा है। अज्ञान के अंधकार में उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा है। जलन के कारण यह मित्रता का धर्म भी भूल गया है। सुमति ने सोचा “क्रोध में जलते हुए आदमी से तर्क करना तो वैसा ही है, जैसे जलती हुई आग में फंस डालना। फूंस ही जलेगा, आग बुझ न पाएगी।” सुमति शांत रहा। उसने कोई तर्क नहीं किया। वे दोनों एक पेड़ के नीचे लेट गए। आनंद रातभर सोया नहीं। उसे डर था कि कहीं सुमति उसे छोड़कर घर न चला जाए। सुमति निश्चिंत भाव से सोया ।

“सुबह होते ही आनंद ने सुमति को जगाया। वे दोनों फिर सिद्धपुत्र के आश्रम में जा पहुंचे। दोनों ने गुरुजी को प्रणाम किया। आश्चर्य से डूबे गुरुजी ने पूछा- “कहो वत्स! क्या अपने घर नहीं गए ?” आनंद क्रोध से भरा हुआ था ही। गुरुजी से बोला- ” आपने धोखा किया है गुरुजी। मुझे गलत पढ़ाया है आपने। इसीलिए मेरा अपमान हुआ है। बताइए, आपने पक्षपात क्यों किया है? मुझे गलत क्यों पढ़ाया है ?”

सिद्धपुत्र शांत बैठे रहे। आनंद ने उन्हें सारी बात बताई तो वह मुस्कराए। फिर बोले- “बेटा आनंद! तुम्हारा दोष यह है कि तुमने विद्या नहीं सीखी, बल्कि शास्त्रों के अक्षरों को पढ़ा है। क्या तुमने यह नहीं पड़ा कि विद्या विनय देती है? कहां है तुम्हारी विनय ?”

गुरु की बात सुनकर आनंद लज्जित हुआ। गुरु ने ही फिर कहा-“तुम लकीर के फकीर बने रहो, तो दोष किसका है ? तुमने क्रोध को ही नहीं जीता, तो ज्ञान कैसे पा सकते हो ? सोचो बेटा! रेत वाली मिट्टी से क्या कोई कुशल कुम्हार भी अच्छा बर्तन बना सकता है ? तुमने खुद को पहचाना ही नहीं।”

सिद्धपुत्र ने अब शांत भाव से सुमति को पास बुलाकर पूछा- “बेटा, सुमति! तुमने कैसे जान लिया कि उस बूढ़ी स्त्री का पुत्र लौट आया है ?”

सुमति ने बताया- “गुरुदेव ! जब वह बूढ़ी स्त्री जल का घड़ा लेकर आ रही थी, तब उसने दूर से किसी युवक को आते हुए देखा। तभी उसके हाथ कांपे और घड़ा गिरकर फूट गया। आनंद ने जो गाथा पढ़ी, उसका अर्थ बुढ़िया को उसने बताया कि तेरा बेटा मर गया है। यह सुनकर वह बेहोश हो गई। “

सुमति थोड़ा रुका। देखा कि सिद्धपुत्र बड़े ध्यान से उसकी बात सुन रहे हैं। आनंद भी शांत खड़ा था। शिष्य सुमति बोला, “मैंने अनुमान लगाया कि युवक की झलक पाकर बुढ़िया के हाथ खुशी के आवेग में कांपे होंगे। वह युवक अवश्य उसका पुत्र है, जिसे वह कमजोर नजर के कारण ही पहचान नहीं पाई।’

तुरंत गुरुदेव ने सुमति को रोक कर पूछा-“लेकिन बेटा अगर तुम्हारा अनुमान गलत होता, तब क्या होता ?” “मेरे भी मन में एक बार यह शंका आई थी गुरुदेव मैंने सोचा कि जो बुढ़िया बेटे के मरने की बात सुनते ही बेहोश हो गई है, उसे बचाना मेरा धर्म है। मेरे मन में आया कि अगर मेरा अनुमान गलत भी हुआ, तो बुढ़िया की आशा तो बनी रहेगी। इस प्रकार उसके प्राण बच जाएंगे और हम भी जीवहत्या के पाप से बच जाएंगे।”

सुमति ने कहा आचार्य सिद्धपुत्र अपने शिष्य की बुद्धिमानी देखकर गद्गद् हो उठे। उन्होंने आनंद को संबोधित करते हुए कहा- ” देखा आनंद! केवल लकीर का फकीर बनकर शास्त्रों को रट लेने से ज्ञान नहीं मिलता। शास्त्र ज्ञान के साथ-साथ बुद्धि का प्रयोग भी तो करना चाहिए। अब तो तुमने अंतर देख लिया है न ? शास्त्र का अर्थ लेकर तो तुमने उस बूढ़ी स्त्री को मार ही दिया था। यह तो सुमति की तर्कशक्ति और बुद्धिमानी का कमाल है कि वह बच गई।” आनंद लज्जित खड़ा था। उसने आचार्य के चरण छूकर कहा-“मुझे क्षमा कर दें, गुरुदेव। अब

मैं शास्त्र – ज्ञान के साथ व्यवहार और मर्यादा का भी ध्यान रखूंगा। मैं प्रण करता हूं कि अब क्रोध नहीं करूंगा। मुझे आशीर्वाद दीजिए।”

आचार्य सिद्धपुत्र ने कहा- “तुम्हारा कल्याण हो।” और दोनों शिष्य अपने नगर को चल पड़े।

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Arjun

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