चंद्रमा अपना आकार क्यों बदलता है? चंद्रमा किसे कहते हैं?

चंद्रमा अपना आकार क्यों बदलता है: चन्द्रमा, हमारी पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। जिस प्रकार पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा करती है उसी प्रकार चन्द्रमा भी अपनी धुरी पर घूमते हुए पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इसके साथ-साथ चन्द्रमा, सूर्य की भी परिक्रमा करता रहता है। रात के आकाश में सबसे तेज चमकने वाले चन्द्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं होता है। यह सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है। यह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करता है, जो हमारी पृथ्वी पर लगभग 1.25 सेकेण्ड में पहुँचता है। इस प्रकाश को चाँदनी (Moon Light) कहते हैं।

चंद्रमा अपना आकार क्यों बदलता है

चंद्रमा अपना आकार क्यों बदलता है

चन्द्रमा पृथ्वी से लगभग 3,84,000 किमी की दूरी पर है। इसका व्यास पृथ्वी के व्यास का एक चौथाई है। पृथ्वी के अधिक निकट होने के कारण रात के आकाश में यह सबसे बड़ा और चमकीला दिखाई देता है। चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण बल, पृथ्वी की तुलना में छठवाँ भाग है।

आइए समझे आप पृथ्वी पर जहाँ खड़े है वहाँ से एक छलांग लगाइए। जितनी ऊँची छलांग आपने एक बार में लगाई है उसकी छः गुना ऊँची छलांग आप चन्द्रमा पर एक बार में लगा सकते हैं।

चन्द्रमा की गतियाँ

यह अपने अक्ष पर घूमते हुए 27 दिन 7 घंटे और 43 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है। परन्तु इस अवधि में पृथ्वी भी सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपनी कक्षा में आगे बढ़ जाती है। इसलिए पृथ्वी पर किसी स्थान के ऊपर से पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके फिर उसी स्थान के ऊपर आने में चन्द्रमा को 29 दिन 12 घंटे और 44 मिनट लगते हैं। इतने ही समय में चन्द्रमा अपने अक्ष पर एक चक्कर (परिभ्रमण) पूरा करता है। इसी कारण हमें सदैव चन्द्रमा का एक ही भाग दिखाई देता है।

चन्द्रमा के आकार बदलने की प्रक्रिया

आपको प्रतिदिन चन्द्रमा के अलग-अलग आकार और रूप दिखाई देते हैं। यह एक हँसिया जैसी आकृति से शुरू होकर हर रात बड़ा होते-होते थाली सा गोल हो जाता है। इसके बाद यह घटना शुरू करता है और घटते-घटते बिल्कुल छिप जाता है। इसके बाद यह फिर बढ़ना शुरू करता है और यह क्रम चलता रहता है।

जिस रात चन्द्रमा थाली सा गोल दिखाई देता है, उस रात को पूर्णिमा (Full Moon) कहते हैं। जिस रात चन्द्रमा बिल्कुल नहीं दिखाई देता, उस रात को अमावस्या (New Moon) कहते हैं। एक महीने में एक बार पूर्णिमा और एक बार अमावस्या होती है। चन्द्रमा के आकार में प्रतिदिन आने वाले इस बदलाव को हम ‘चन्द्रमा की कलाएँ’ कहते हैं।

अमावस्या से पूर्णिमा तक (बढ़ते चन्द्रमा) के पखवाड़े को ‘शुक्ल पक्ष’ कहते हैं। पूर्णिमा से अमावस्या तक (घटते चन्द्रमा) के पखवाड़े को कृष्ण पक्ष कहते हैं। पृथ्वी के घूमने के कारण एक पूर्णिमा से दूसरी पूर्णिमा तक अपनी कलाओं को पूरा करने में चन्द्रमा को 29 दिन 12 घण्टे 44 मिनट लगते हैं। इस अवधि को ‘चन्द्रमास’ कहते हैं।

चन्द्रमा पर सबसे पहले जाने वाले व्यक्ति

विशाल अन्तरिक्ष एवं विभिन्न खगोलीय पिण्ड (चन्द्रमा, सूर्य आदि) हमेशा से हमारे मन में जिज्ञासा उत्पन्न करते रहे हैं। आधुनिक विज्ञान और तकनीकी के विकास ने मानव को अन्तरिक्ष में झाँकने और वहाँ की यात्रा करने में समर्थ बनाया शक्तिशाली दूरदर्शी (टेलिस्कोप) और अन्तरिक्ष यान (रॉकेट) के आविष्कार ने मनुष्य को इस योग्य बनाया कि वह वाह्य अन्तरिक्ष के बारे में जानकारी प्राप्त कर सके।

पूर्व सोवियत संघ (वर्तमान रूस) के यूरी गागरिन प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने अन्तरिक्ष में यात्रा की। 12 अप्रैल 1961 को वोस्तोक-1 नामक अन्तरिक्ष यान से इन्होंने पृथ्वी की परिक्रमा की। रॉकेट की सहायता से मनुष्य चन्द्रमा पर भी पहुँच चुका है। 29 जुलाई 1969 को संयुक्त राज्य अमेरिका का अपोलो-2 नामक अन्तरिक्ष यान चन्द्रमा पर पहुँचा। इस यान से जाने वाले नील आर्मस्ट्रांग प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने चन्द्रमा पर कदम रखा।

उनके अन्य सहयात्री एडविन एल्ड्रिन एवं माइकल कॉलिन्स थे अब तक की गई खोजों के अनुसार चन्द्रमा पर वायुमण्डल न होने के कारण वहाँ जीवन सम्भव नहीं है। भारतीय वायुसेना के पूर्व पायलट राकेश शर्मा अन्तरिक्ष में यात्रा करने वाले प्रथम भारतीय थे। इन्होंने 2 अप्रैल 1984 को सोवियत संघ के अन्तरिक्ष यान सोयूज टी-11 से अन्तरिक्ष की यात्रा की।

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