चारुचंद्र बोस का जीवन परिचय? चारुचंद्र बोस पर निबंध?

चारुचंद्र बोस का जीवन परिचय (Charu Chandra Bose Ka Jeevan Parichay), भारत की स्वतंत्रता के इतिहास में एक से एक अनुपम बलिदान के चित्र मिलते हैं। ऐसे चित्र मिलते हैं, जिनके साहस और वीरता की कहानियां बड़े-बड़े वीरों को भी आश्चर्य में डाल देती हैं। चारुचंद्र बोस का बलिदान भी उन्हीं बलिदानों में एक है।

चारुचंद्र बोस का जीवन परिचय (Charu Chandra Bose Ka Jeevan Parichay)

चारुचंद्र बोस का जीवन परिचय

चारुचंद्र बोस का जीवन परिचय (Charu Chandra Bose Ka Jeevan Parichay)

वे किशोर वय के होने पर भी महान वीर थे। मनुष्य होते हुए भी सिंह के समान थे। वे जिस प्रकार देश के लिए चिरनिद्रा में सोये, वह कहानी ओजस्विनी तो है ही, प्रेरणादायिनी भी है। चारुचंद्र बोस 16-17 वर्ष के बालक थे। उनके हाथों और पैरों की उंगलियां गायब थीं। शरीर के बहुत ही दुबले-पतले थे।

किन्तु मन बड़ा प्रबल था, देशभक्ति की भावनाओं से परिपूर्ण था। उन्हें देश की स्वतंत्रता प्राणों से भी अधिक प्रिय थी। वे कहा करते थे- हे स्वतंत्रते, क्या तू रक्त की प्यासी है? यदि हां, तो मैं तुझे अपना रक्त पिला कर तृप्त करूंगा, चाहे जैसे भी हो, मैं तुझे प्राप्त करूंगा- अवश्य प्राप्त करूंगा।

चारु को विशाल कलकत्ता नगरी की चप्पा-चप्पा भूमि मालूम थी। वे सदा बहुत ही व्याकुल-से दिखाई पड़ते थे। उनसे जब कोई उनकी व्याकुलता का कारण पूछता था, तो वे उत्तर तो कुछ नहीं देते थे, किन्तु दीर्घ निःश्वास लेकर मौन हो जाया करते थे।

ऐसा लगता था, मानो उनके हृदय में कोई बहुत बड़ी वेदना हो। वस्तुतः उनके हृदय में बहुत बड़ी वेदना थी। वह वेदना थी, देश की दासता की वेदना। वे शीघ्र से शीघ्र देश को दासता की वेदना से मुक्त करने के लिए समाकुल रहा करते थे।

चारुचंद्र प्रतिदिन हावड़ा से टालीगंज जाते थे और अलीपुर के व्यायालय के चारों ओर चक्कर लगाया करते थे। वे न्यायालय में भी जाते के घर-उपर उन्मुक्त क भांति घूमते हुए दिखाई पड़ते थे। किन्तु वे पागल नहीं थे। वे अपने किसी महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही न्यायालय में इधर-उधर घूमा करते थे।

चारु का महान उद्देश्य क्या था- क्या आप इसे जानना चाहते हैं? उन दिनों कलकत्ता में आशुतोष विश्वास नामक एक सरकारी वकील था। वह क्रान्तिकारियों और देशभक्तों को सजा दिलाने में बड़ा तेज था।

वह झूठे मुकद्दमे बनाता, गवाहियां एकत्र करता और झूठी गवाहियों के द्वारा क्रान्तिकारियों को या तो जेल की सजा दिलाता या फिर सूली का दंड दिलाता। कलकत्ते की गली-गली में वह बदनाम था। आखिर क्रान्तिकारियों ने विश्वास को सबक सिखाने का निश्चय किया।

चारु भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य थे। जब दल की बैठक में विचार होने लगा कि विश्वास की हत्या कौन करेगा, तो चारु ने घोषणा की कि मैं करूंगा। चारु प्रतिदिन अलीपुर न्यायालय में यह देखने के लिए जाते थे कि विश्वास न्यायालय में कब आता है, कैसे आता है, और किस तरह के कपड़े पहनता है।

जब उन्होंने विश्वास के सम्बन्ध में पूरी जानकारी प्राप्त कर ली, तो एक दिन उन्होंने जज के सामने ही विश्वास को मारने का निश्चय किया न्यायालय में विश्वास जज के सामने ही खड़ा था। चारु ने देखा कि विश्वास के चारों ओर पुलिस के सिपाही है। गोली चला पर उसे गोली नहीं लग सकेगी। अतः उस दिन विश्वास चारु की गोलियों से बच गया।

1909 ई० के 10 दिसम्बर का दिन था। संध्या के चार बज रहे थे। विश्वास जाली सिक्के के एक मुकद्दमे के सम्बन्ध में दौड़-धूप कर रहा था। ज्यों ही वह न्यायालय के पूर्वी द्वार से निकल कर दक्षिण की ओर जाने लगा, उसे एक गोली लगी। गोली चारु ने ही चलाई थी।

विश्वास बड़े जोर से चीख उठा- हाय बाप रे! वह दक्षिण की ओर दौड़ पड़ा। चारु ने हाथ में पिस्तौल लिये हुए उसका पीछा किया। उन्होंने उस पर दूसरी गोली चलाई। गोली उसके शरीर के आर-पार निकल गई। वह कोर्ट इंस्पेक्टर के कमरे में जाकर गिर पड़ा और सदा के लिए मौन हो गया।

एक पुलिसमैन ने दौड़कर चारु को पकड़ लिया। उसने देखा, चारु के दाहिने हाथ में पिस्तौल है, पर पिस्तौल का घोड़ा बायें हाथ से बंधा है। क्योंकि चारु के दाहिने हाथ की हथेली बेकार थी, उससे पिस्तौल नहीं चलाई जा सकती थी।

इसीलिए उन्होंने पिस्तौल के घोड़े को डोरी से बायें हाथ में बांध रखा था। जब बायें हाथ में बंधी डोरी का झटका लगता था, तो घोड़ा गिर पड़ता था और गोली बाहर निकल पड़ती थी। चारु ने तीसरी गोली चला कर पुलिस मैन को भी शान्त कर दिया।

दो दूसरे पुलिसमैनों ने दौड़कर चारु को दबोच लिया। उन्होंने घूंसों और थप्पड़ों से चारु पर चोट पहुंचाई चारु ने उस चोट को सहते हुए बड़ी निर्भीकता के साथ कहा, “मुझे प्रसन्नता है कि मैंने देशद्रोही विश्वास की हत्या करके उचित रूप में अपने कर्तव्य का पालन किया।”

चारु को कारागार में बड़ी-बड़ी यातनाएं दी गईं। उन्हें बर्फ की सिल्लियों पर सुलाया गया। गर्म लोहा उनके शरीर में लगाया गया। पुलिस उन्हें तरह-तरह की यातनाएं देकर यह जानना चाहती थी कि उनके साथियों में और कौन-कौन लोग हैं।

पुलिस ने जब चारु को अधिक तंग किया, तो उन्होंने पुलिस को बताया कि ढाका के बेनिया लेन के निवासी पांचोली सान्याल ने उनसे कहा था कि विश्वास को मार डालने के लिए उनके नाम लाटरी निकली है। मैंने उसी के आधार पर विश्वास की हत्या की।

किन्तु पुलिस ने जब ढाका में बेनिया लेन मुहल्ले में पांचोली सान्यास की खोज की, तो वहां इस नाम का कोई भी मनुष्य नहीं मिला। पुलिस दांत पीसकर रह गई, क्योंकि चारु ने पुलिस को धोखे में डालने के लिए उसे कल्पित नाम बताया था।

कारागार के आंगन में शामियाना लगाकर एक न्यायालय की स्थापना की गई। उसी न्यायालय में एक मजिस्ट्रेट ने चारु के मुकद्दमे की सुनवाई की। बिना किसी गवाही के पुलिस के बयान के आधार पर ही मजिस्ट्रेट ने चारु को फांसी का दंड दिया। चारु ने मजिस्ट्रेट के फैसले को सुनकर कहा, मुझे आपके फैसले पर कुछ नहीं कहना है।

मैंने विश्वास की हत्या की है। वह देशद्रोही था, क्रान्तिकारियों और देशभक्तों को दंड दिलाया करता था। मैंने उसकी हत्या करके अपने कर्तव्य का पालन किया है। मैं नहीं चाहता कि मेरा मुकद्दमा सेशन में भेजा जाय। मैं शीघ्र से शीघ्र फांसी पर चढ़ जाना चाहता हूं, क्योंकि मुझे अब कुछ भी कहना नहीं है।

फिर भी चारु का मुकद्दमा सेशन में भेज दिया गया। 22 फरवरी को मुकद्दमा पेश हुआ और 23 फरवरी को जज ने अपना निर्णय सुना दिया। निर्णय वही, जो मजिस्ट्रेट ने किया था। चारु के फांसी के दंड को जज ने भी दुहराया था।

चारु ने जज के फैसले को सुनकर कहा था, मैं इस फैसले के विरुद्ध अपील नहीं करना चाहता, क्योंकि मैंने अपना कार्य पूर्ण कर लिया है। मैं जिस कार्य के लिए धरती पर आया था, वह पूरा हो गया है। मैं अब और जीवित नहीं रहना चाहता।

1909 ई० की 19 मार्च का प्रातःकाल था। सूर्य की किरणें निकल आई थीं। गगन मंडल में पक्षी इधर से उधर उड़ रहे थे। अलीपुर जेल में चारु को फांसी पर चढ़ा दिया गया। फांसी का फंदा गले में डालने के पूर्व चारु ने कहा था, मैं हिन्दू हूं, पुनर्जन्म में विश्वास रखता हूं। फांसी पाने के पश्चात् मैं पुनः जन्म ग्रहण करूंगा और पुन: अंग्रेजी शासन को उलटने का प्रयत्न करूंगा। जब तक भारत स्वतन्त्र नहीं होगा, मैं इसी प्रकार बार-बार फांसी पर चढ़ता रहूंगा और बार-बार जन्म लेता रहूंगा।

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