गाय पर निबंध हिंदी में? क्या गाय पालतू जानवर है?

गाय पर निबंध (Cow Par Nibandh In Hindi), गाय पालतू पशु है। यह बहुत सीधा जानवर है। हिन्दू लोग इसे गौ-माता कहते हैं। इसका दूध माता के समान लाभदायक होता है। इसका दूध हल्का, पौष्टिक और जल्दी पचने वाला होता है।

गाय पर निबंध (Cow Par Nibandh In Hindi)

गाय पर निबंध

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गाय पर निबंध (Cow Par Nibandh In Hindi)

जब कोई माता बच्चे को अपना दूध पिलाने में असमर्थ हो जाती है तब उसे गाय का दूध पिलाया जाता है। रोगी को गाय का दूध दिया जाता है। गाय का दूध पुष्टिकारक होता है। इसका प्रमाण यह है कि गाय का बछड़ा बहुत उछल-कूद करता है, जबकि भैंस का बच्चा सुस्त रहता है।

गायें अनेक रंगों की होती हैं-सफेद, काली, लाल, भूरी और चितकबरी। इनमें काली गाय अच्छी मानी जाती है। कुछ गायें थोड़ा दूध देती हैं और कुछ अधिक। हमारे देश में हरियाणा की गायें बहुत दूध देती हैं। विदेशी गायें भी बहुत अधिक दूध देती हैं। उन गायों का दूध मशीनों से निकाला जाता है।

गाय का शरीर

गाय के चार पैर होते हैं। पैरों का नीचे का भाग चिरा हुआ होता है। ये खुर कहलाते हैं। इसके दो सींग होते हैं। इनसे यह अपने शत्रुओं से अपनी रक्षा करती है। इसके एक पूँछ होती है। इससे यह मक्खियों और मच्छरों को उड़ाती है। इसके गले के नीचे खाल लटकी रहती है। इसे सास्ना कहते हैं। इसकी आँखें बड़ी-बड़ी होती हैं।

भोजन

यह हरी घास एवं भूसा खाती है। भूसे में खली-दाना इत्यादि मिलाते हैं, इसे सानी कहते हैं। भक्त लोग गौओं को आटे की लोई खिलाना पुण्य समझते हैं। कुछ भक्त अनाथ गौओं को घास या भूसा भी खिलाते हैं।

प्राचीन काल में भारत में दूध की नदियाँ बहती थीं। हर गृहस्थ गाय पालना अपना कर्तव्य समझता था। ब्रज में गायें बहुत अधिक पाली जाती थीं। नन्द के यहाँ एक लाख गायें थीं। कृष्ण इन गायों को चराते थे। गौओं की उपयोगिता समझकर गौशालाएँ स्थापित की गई हैं। इन गौशालाओं में लूली, लंगड़ी, बूढ़ी और अपाहिज गायें रहती हैं। हिन्दू इनकी सहायता को पुण्य कार्य समझते हैं।

प्राचीन काल में प्रत्येक गाँव में गोचर भूमि छोड़ी जाती थी। इस भूमि में गायें घास चरती थीं। वह भूमि अब खेती में बदल गई है। यदि हम चाहते हैं कि देश में पहले की तरह दूध की नदियाँ बहें तो हमें गौरक्षा की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

लाभ

गाय का दूध पीने के काम आता है। गाय के दूध से दही जमाया जाता है। दूध से खोया बनता है। खोये से तरह-तरह की मिठाइयाँ बनती हैं। इसके मूत्र से अनेक औषधियाँ शुद्ध की जाती हैं। इसका गोबर कण्डे बनाने या खाद के काम आता है। इसके गोबर से लिपे हुए घर कीटाणुओं से रहित हो जाते हैं। इसके बछड़े खेती के काम आते हैं। इसकी खाल, हड्डियाँ और आँतें सभी काम में आती हैं।

महत्व

हमारी पुराणों में कामधेनु का उल्लेख किया गया है। वह मनुष्यों की इच्छापूर्ति करने वाली कही गयी है। वास्तव में गायें हमारे लिए कामधेनु हैं। यदि हम इनकी सेवा उचित तरीके से करें तो अवश्य ही इनसे हमारी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो सकती हैं।

ये हमारे सामाजिक जीवन की एकता के स्रोत हैं। ये सरलता, सौम्यता, शिष्टता तथा पवित्रता की दात्री हैं। इनका दूध स्वास्थ्यवर्द्धक होता है। बहुत से रोग गाय की सेवा और दूध से अच्छे हो जाते हैं। गौमूत्र से अनेक दवाइयाँ तैयार की जाती हैं जिनसे भयानक से भयानक रोग भी दूर हो जाते हैं। आयुर्वेद में तो इसकी बहुत प्रशंसा की गई है।

इसके गोबर में कीटाणुओं को मारने की अपूर्व क्षमता है। इसलिए घर अधिकतर गोबर से ही लीपे जाते हैं। इसके गोबर से गणेशजी की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है। अपने पापों को दूर करने के लिए लोग गौदान करते हैं। गाय को धर्म अधिष्ठात्री माना जाता है। अतः गाय हमारे पारलौकिक जीवन को भी सफल बनाने का एक साधन है।

आर्थिक दृष्टि से गाय हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी पशु है। भारत जैसे देश के लिए तो इससे बढ़कर उपयोगी कोई दूसरा पशु नहीं है। इसके दूध से भिन्न-भिन्न प्रकार के खाने योग्य पदार्थ बनते हैं। इसके बछड़े, बैल हमारी कृषि के आधार हैं। जीते-जी तो यह हमारा उपकार करती ही है, मरने के बाद इसके चमड़े से विभिन्न प्रकार के जीवनोपयोगी सामान बनाये जाते हैं।

उपसंहार

उपर्युक्त बातों को दृष्टि में रखकर यह आवश्यक हो जाता है कि हमें इनकी रक्षा का भरसक प्रयत्न करना चाहिए। यज्ञोपवीत संस्कार के समय प्रत्येक बालक से गौरक्षा की प्रतिज्ञा कराई जाती है। भगवान् कृष्ण गौरक्षा के कारण गोपाल कहलाये थे। भगवान् राम ने चित्रकूट पर भरतजी को राजनीति का उपदेश देते हुए प्रातः उठकर गौओं के दर्शन का उपदेश दिया था।

अपने अन्तिम समय में मुगल सम्राट बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ को उपदेश देते हुए कहा था-पुत्र! गायों को तुम अपनी माता समझकर उनकी रक्षा करना। उपर्युक्त उदाहर ‘ से पता चलता है कि गाय का महत्व न तो एकदेशीय है और न साम्प्रदायिक। अतः गौरक्षा करना हम सभी का परम पवित्र कर्तव्य है।

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