देश की बढ़ती जनसंख्या पर निबंध? जनसंख्या वृद्धि एक अभिशाप पर निबंध?

देश की बढ़ती जनसंख्या पर निबंध (Desh Ki Badhti Jansankhya Par Nibandh), किसी भी देश की सरकार को अपने देश की पूरी आबादी को उसकी प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करना अनिवार्य होता है। इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए सरकारें विभिन्न योजनाओं-परियोजनाओं को कार्यान्वित करती हैं। जनसंख्या वृद्धि एक अभिशाप पर निबंध? बढ़ती जनसंख्या पर निबंध?

देश की बढ़ती जनसंख्या पर निबंध (Desh Ki Badhti Jansankhya Par Nibandh)

देश की बढ़ती जनसंख्या पर निबंध

देश की बढ़ती जनसंख्या पर निबंध (Desh Ki Badhti Jansankhya Par Nibandh)

जनता की प्राथमिक आवश्यकताएं हैं-भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और रोजगार। किंतु विश्व की आबादी के दो तिहाई भाग को भर पेट भोजन नहीं उपलब्ध है। हर वर्ष विश्व में करोड़ों लोग भूखों मर रहे हैं।

उन्हें आवास के अभाव में खुले आसमान के नीचे चिलचिलाती धूप और तूफानी सर्दी को झेलना पड़ता है। वस्त्र, शिक्षा और रोजगार का भी अधिकांश आबादी के लिए कोई प्रबंध नहीं हो पाया है। भारत में भी ये समस्याएं हैं। यहां की जनसंख्या के लिए भी जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएं उपलब्ध नहीं हैं।

इसका सर्वप्रमुख कारण निरंतर अबाध गति से बढ़ती हुई जनसंख्या है। इसे नियंत्रित करने के सारे प्रयत्न असफल सिद्ध हो रहे हैं। किंतु इस समस्या का समाधान खोजना अनिवार्य है, अन्यथा देश भीषण दुर्गति में फंस जाएगा।

संपूर्ण विश्व की आबादी लगभग

संपूर्ण विश्व की आबादी छह अरब है, इसमें से लगभग एक अरब भारत में बसते हैं। भारत से अधिक चीन की ही आबादी है। लेकिन इस देश ने अब जनसंख्या की वृद्धि पर नियंत्रण कर लिया है। इधर भारत की आबादी दो प्रतिशत से अधिक ही प्रतिवर्ष बढ़ रही है।

सन् 1991 ई. की जनगणना के अनुसार देश की जनसंख्या पच्चासी करोड़ तीस लाख थी। अनुमान है कि 2001 ई० की जनगणना तक यह एक अरब हो जाएगी। इस बेतहाशा बढ़ती को रोकने के प्रयास सफल नहीं हो रहे हैं और यह स्थिति देश के विकास को बाधित कर रही है।

अरबों-खरबों की कल्याणकारी योजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं, लेकिन उनसे इच्छित लाभ नहीं प्राप्त हो रहा है। आवागमन के लिए रेल, बस और हवाई सेवा का बहुत विस्तार हुआ है। परंतु रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर यात्रियों की लंबी कतारें लगी रहती हैं।

शिक्षा की कमी

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विद्यालयों-महाविद्यालयों की संख्या तिगुनी-चौगुनी बढ़ी है, फिर भी सभी छात्रों को प्रवेश नहीं मिल पाता है। और बहुत बड़ी संख्या में छात्रों को शिक्षा से वंचित रहना पड़ता है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों पर राशन का सामान लेने के लिए भारी भीड़ लग रही है। नौ पंचवर्षीय योजनाओं को लागू कर जो विकास दर बढ़ती है, उसको पांच वर्षों में बढ़ी जनसंख्या सोख जाती है।

सरकार के प्रयास

सरकार जी-तोड़ प्रयास कर रही है कि सभी को आवास सुलभ हो जाए। प्रति वर्ष लाखों घर बनाए जा रहे हैं, लेकिन आधे से अधिक लोग झुग्गी-झोपड़ियों और फुटपाथों को आवास बनाने को विवश हैं। आजादी मिलने के बावन वर्ष बाद भी आधे से अधिक आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है।

पूरे देश को सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं भी नहीं उपलब्ध हैं। वातावरण के प्रदूषण से तरह-तरह के रोग फैल रहे हैं। लोगों में विक्षोभ बढ़ रहा है और उसकी अभिव्यक्ति हड़तालों, प्रदर्शनों, चक्काजाम आदि के रूप में हो रहा है।

उपर्युक्त भयावह स्थिति को उत्पन्न करने में देश की बढ़ती आबादी का मुख्य हाथ है। बढ़ती आबादी देश के समक्ष विकट समस्या के रूप में खड़ी है। इस समस्या को नियंत्रित करना नितांत आवश्यक है। सरकार ने जनसंख्या की वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए ‘परिवार नियोजन’ नाम की योजना को लागू किया।

लोगों को समझाया गया, ‘दो या तीन बच्चे बस’ नसबंदी कराने के लिए प्रोत्साहन स्वरूप आर्थिक सहायता दी गई। स्त्रियों को गर्भ निरोधकों का प्रयोग करने की विधि बताई गई और मुफ्त में गर्भ निरोधकों का वितरण किया गया। किंतु इसका कोई उत्साहपूर्वक नतीजा नहीं निकला।

देश में आपातस्थिति लागू होने पर 1974 ई. में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी ने परिवार नियोजन कार्यक्रम पर ध्यान दिया। उन्होंने प्रत्येक अध्यापक और सरकारी कर्मचारी को कम-से-कम तीन लोगों से नसबंदी करवाना अनिवार्य बना दिया। यह कोटा पूरा न करने वाले कर्मचारियों का वेतन रोकवा दिया।

डॉक्टरों ने फर्जी प्रमाण-पत्र देना शुरू किया। जनता में परिवार नियोजन के प्रति घृणा और आक्रोश बढ़ गया अनेक बार लोगों को पकड़कर जबरदस्ती उनकी नसबंदी की गई। भयवश लोगों ने अस्पतालों की ओर जाना बंद कर दिया। इस प्रकार परिवार नियोजन का कार्यक्रम मंद पड़ गया।

आपातकाल के समाप्त होने पर नई सरकार ने परिवार नियोजन को परिवार कल्याण नाम देकर लागू किया। इस बार इसे ऐच्छिक रखा गया। खूब जोर-शोर से प्रचार किया गया। लेकिन यह अभियान भी अधिक सफल नहीं होता दिखाई पड़ रहा है।

एक परिवर्तन अवश्य हुआ है कि अब ‘दो या तीन बच्चे बस’ की जगह ‘हम दो हमारे दो’ का नारा चालू किया गया है। सरकारी कर्मचारियों में जिनके दो बच्चे हैं, उन्हें ही वेतन में एक अग्रिम बढ़ोत्तरी दी गई है और उन्हीं के बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क दिया जा रहा है।

इससे कर्मचारियों में परिवार नियोजित रखने की इच्छा बढ़ेगी। दो बच्चों के प्रसव तक माताओं को सरकारी अनुदान भी दिया जा रहा जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए सरकारी स्तर पर जो भी कार्यक्रम अपनाए गए हैं, उन्हें जनता ने अपना कार्यक्रम नहीं माना है।

लोगों ने समाज कल्याण विभाग को अनुदान देने वाला विभाग मान लिया है। सरकारी कर्मचारियों ने भी इस कार्यक्रम को नौकरी मानकर काम किया है। जरूरत यह है कि परिवार कल्याण के कार्य को सेवा कार्य मानकर किया जाए। साथ ही, इस बात पर विचार किया जाए कि जनसंख्या की बढ़न्ती के कौन-से प्रमुख कारण हैं और उन अवरोधों को दूर किया जाए।

ऐसा करने पर भी जनसंख्या नियंत्रण के कार्यक्रम सफल होंगे। जनसंख्या की बढ़न्ती पर नियंत्रण के लिए अपनाए गए कार्यक्रमों की असफलता के प्रमुख कारण हैं- शिक्षा का अभाव, धार्मिक परंपराएं, सामाजिक अंधविश्वास, बाल विवाह और बहु-विवाह।

इन कारणों से उत्पन्न बाधाओं को स्पष्ट रूप में समझकर उनका निराकारण करने पर ही जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण किया जा सकता है। भारत में कुल आबादी के लगभग तिरपन प्रतिशत लोग ही शिक्षित हैं। इस प्रतिशत में शहरी क्षेत्र का ही अंश अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का प्रतिशत चालीस से अधिक नहीं है।

महिलाओं में शिक्षा की कमी

महिलाओं में शिक्षा का प्रतिशत आश्चर्यजनक रूप में बहुत कम अशिक्षित लोगों में वह क्षमता ही नहीं होती कि वे अपने और अपने बच्चों के सुंदर और सुखमय भविष्य के संबंध में कोई सुनिश्चित योजना बना सकें। अशिक्षित होने के कारण लोग संतुलित परिवार के लाभ को शंका की दृष्टि से देखते हैं और संतति निरोध संबंधी उपायों को नहीं अपनाते हैं।

अतः जरूरी है कि लोगों को शिक्षित किया जाए। उन्हें जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित साहित्य पढ़ने-समझने को दिया जाए। इसी प्रकार उनमें जनसंख्या की वृद्धि से होने वाली कठिनाइयों और हानियों को समझने और उनसे मुक्ति पाने का विवेक जगेगा। सभी स्तरों पर विद्यार्थियों को जनसंख्या नियंत्रण की शिक्षा दी जाए।

प्रौढ़ और अनौपचारिक शिक्षा में जनसंख्या वृद्धि की समस्या का ज्ञान कराया जाना चाहिए। शिक्षित समाज स्वतः अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को समझेगा और जनसंख्या की वृद्धि पर अंकुश लगाएगा। यद्यपि सरकार सभी को शिक्षित करने के लिए पुरजोर प्रयास कर रही है, फिर भी इसमें कई वर्ष लगेंगे।

सरकार ने लड़कियों को कॉलेज स्तर तक निःशुल्क शिक्षा देने का फैसला किया है। यह योजना न केवल शिक्षा, अपितु जनसंख्या नियंत्रण के लिए भी लाभदायी सिद्ध होगी।

जनसंख्या वृद्धि का बड़ा कारण

जनसंख्या वृद्धि का एक बड़ा कारण समाज में प्रचलित धार्मिक परंपराएं हैं। धार्मिक रूढ़ि है कि बच्चे देना-लेना भगवान की मर्जी है। अतः उसमें मनुष्य का चाधा डालना ईश्वर के कार्य में हस्तक्षेप है। इस रूढ़ि के कारण लोग गर्भ-निरोध के उपाय नहीं अपनाते हैं।

भले एक दर्जन बच्चे हो जाएं। इसी तरह यह भी धार्मिक परंपरा प्रचलित है कि पुत्रवान् को ही स्वर्ग प्राप्त होता है। पुत्र शब्द का अर्थ ही है-पुंत नामक नरक से पिता का ऋण करने वाला। साथ ही भारत में पिता का उत्तराधिकारी पुत्र ही मान्य है। अतः स्वर्ग प्राप्ति और उत्तराधिकारी के लोभ में लोग अनेक पुत्रियों को जन्म देते हैं।

कभी-कभी अंततः पुत्र की प्राप्ति हो भी जाती है। इस प्रकार की अनेक धार्मिक रूढ़ियां और परंपराएं समाज में प्रचलित हैं, जिनके कारण जनसंख्या में अनावश्यक वृद्धि होती है। अतः आवश्यक है कि ऐसी धार्मिक रूढ़ियों से जन-सामान्य को मुक्त किया जाए। ऐसा होने पर जनसंख्या नियंत्रण के कार्यक्रम की ओर लोगों का झुकाव होगा।

भारतीय समाज विभिन्न प्रकार

भारतीय समाज विभिन्न प्रकार के विश्वासों से ग्रसित है। वह उन्हें ब्रह्म रेखा मानता है। आज भी लोग तंत्र-मंत्र, झांड-फूंक आदि पर विश्वास करते हैं। लोग आधुनिक औषधि विज्ञान को शंका की दृष्टि से देखते हैं।

ऐसे लोगों को जब तक परंपरागत अंधविश्वासों से मुक्त नहीं किया जाता, तब तक वे लोग जनसंख्या नियंत्रण के कार्यक्रमों को नहीं अपनाएंगे। अतः मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्र के पिछड़े वर्ग और निम्न वर्ग के बीच अभियान चलाकर उन्हें अंधविश्वासों से मुक्त किया जाए। अन्यथा ये वर्ग पूर्ववत् जनसंख्या वृद्धि का कारण बने रहेंगे।

बाल-विवाह और बहु-विवाह जनसंख्या वृद्धि का बड़ा कारण

जनसंख्या वृद्धि का एक बड़ा कारण बाल-विवाह और बहु-विवाह भी है। पिछड़ी जातियों में बाल-विवाह का सिलसिला चालू है। इससे अपरिपक्व अवस्था से ही बच्चों का जन्म होने लगता है और वह लंबे समय तक जारी रहता है।

ऐसे विवाहों से अस्वस्थ बच्चों की संख्या में वृद्धि होती है। यद्यपि कानून द्वारा बाल-विवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है, फिर भी वह प्रभावी नहीं है। इस कुप्रथा को रोकने के लिए सामाजिक आंदोलन करना जरूरी है।

‘हिंदू विवाह अधिनियम’ को लागू कर हिंदुओं पर पत्नी के जीवित रहने पर दूसरा विवाह करने पर प्रतिबंध है, लेकिन मुसलमानों को उनके धर्मानुसार चार पत्नियां रखने की छूट है। इस छूट का परिणाम है कि मुसलिम परिवारों में बच्चों की संख्या वेग से बढ़ रही है।

धर्म की आड़ में चार पत्नियां रखने की छूट पर बंधन लगाया जाना चाहिए। यह परंपरा घोर अमानवीय और जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास को ध्वस्त करने चाली है।

जनसंख्या वृद्धि के उपर्युक्त कारणों का समाधान कर लेने पर जनसंख्या पर नियंत्रण करना आसान हो जाएगा। इस कार्य में सरकारी प्रयास के साथ ही सामाजिक संस्थाओं का भी सहयोग लिया जाना चाहिए। देश की खुशहाली में जनसंख्या की बढ़न्ती को रोकने पर ही वृद्धि संभव है।

अतः देश के सभी नागरिकों को समवेत रूप में इस कल्याणकारी कार्य में जुट जाना चाहिए। ‘छोटा परिवार खुशियां अपार’ अथवा ‘छोटा परिवार सुखी परिवार के नारे को सार्थक बनाना देश सेवा का प्रतीक है। देश की बढ़ती जनसंख्या पर निबंध

यह भी पढ़े –

Leave a Reply

Your email address will not be published.