डॉ. के. आर. नारायणन का जीवन परिचय? डॉ. के. आर. नारायणन पर निबंध?

डॉ. के. आर. नारायणन का जीवन परिचय (Dr K R Narayanan Ka Jeevan Parichay), डॉ. के. आर. नारायणन का जन्म 27 अक्तूबर, 1920 को केरल राज्य के उजावूर नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम रामन वैद्य था एवं उनकी माता का नाम पुन्नाथठुरावीथी पप्पियाम्मा था। राष्ट्रपति का पद गरिमा का पद है। इस पद को भारत के दसवें राष्ट्रपति के रूप में डॉ. के. आर. नारायणन ने गौरवान्वित किया। भारत एक लोकतान्त्रिक देश है। लोकतन्त्र का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि देश के सर्वोच्च पद को दलित वर्ग के डॉ. के. आर. नारायणन ने सुशोभित किया है।

डॉ. के. आर. नारायणन का जीवन परिचय (Dr K R Narayanan Ka Jeevan Parichay)

डॉ. के. आर. नारायणन का जीवन परिचय

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डॉ. के. आर. नारायणन का जीवन परिचय (Dr K R Narayanan Ka Jeevan Parichay)

जन्म27 अक्तूबर, 1920
27 अक्तूबर, 1920केरल राज्य के उजावूर नामक ग्राम
पिता का नामरामन वैद्य
माता का नामपुन्नाथठुरावीथी पप्पियाम्मा
राष्ट्रपति25 जुलाई, 1997
मृत्यु9 नवम्बर 2005

महामहिम राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा का कार्यकाल समाप्त होने पर आप सर्वसम्मति से इस पद के लिए चुने गये थे। आपने 25 जुलाई, 1997 को भारत के राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण की। डॉ. के. आर. नारायणन का जन्म 27 अक्तूबर, 1920 को केरल राज्य के उजावूर नामक ग्राम में हुआ था। आपके पिता रामन वैद्य थे। आस-पास के क्षेत्र में आपका काफी सम्मान था, लेकिन वे बहुत ही निर्धन थे।

अतः आपकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में ही विषम परिस्थितियों में पूरी हुई। आप मैट्रिक में प्रथम आये और छात्रवृत्ति प्राप्त करके केरल विश्वविद्यालय से 1943 में अंग्रेजी भाषा में एम. ए. किया। एम. ए. करने के पश्चात् आप काम की तलाश में दिल्ली आ गये।

दिल्ली आकर आप कुछ दिन तक ‘कामर्स एण्ड इण्डस्ट्री’ नामक पत्र में कार्य करते रहे। फिर भारतीय ओवरसीज विभाग में दो सौ चालीस रुपये मासिक वेतन पर कार्य करने लगे, किन्तु आपका पत्रकार मन यहाँ नहीं लगा। इस काम को छोड़कर आपने सौ रुपये मासिक पर एक समाचार पत्र में नौकरी कर ली।

आपको ‘हिन्दू’ और ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ जैसे सम्मानित पत्रों में कार्य करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। ‘महात्मा गांधी : व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ पर एक प्रभावशाली लेख लिखने के कारण आप ‘सोशल वैलफेयर’ के नियमित लेखक बने।

लेखन और पत्रकारिता के कारण ही ‘टाटा छात्रवृत्ति प्राप्त करके आप लन्दन के स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में प्रवेश लेकर अध्यय करने लगे। वहाँ से उपाधि प्राप्त करके सन् 1948 में जब आप भारत लौटे तो विदेश विभाग में कार्य करने लगे।

फिर आपको रंगून स्थित भारतीय दूतावास में भेज दिया गया। वहाँ पर आपका परिचय एक बर्मी युवती से हुआ और सन् 1951 में आप बर्मी युवती के साथ दाम्पत्य सूत्र में बँध गये। आज वे बर्मी युवती श्रीमती ऊषा नारायणन एक आदर्श भारतीय महिला का जीवन व्यतीत कर रही हैं।

कार्य क्षेत्र

अब आपके जीवन में स्थायित्व आ गया था। आपको राजनीति का भली-भाँति ज्ञान हो चुका था। भारत सरकार के संचालक आपसे प्रभावित थे, अतः आपको क्रमशः अमेरिका, चीन, तुर्की, थाईलैण्ड आदि देशों में राजदूत जैसे महत्वपूर्ण मिशन पर भेजा गया।

वहाँ आपने अपनी योग्यता का परिचय दिया। सन् 1976 में जब राजदूत बनकर आप चीन गये तो सन् 1962 से टूटे रिश्तों को जोड़ने जैसा महत्वपूर्ण कार्य करके आपने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया।

चीन से लौटने पर आप विदेश मन्त्रालय में विदेश सचिव के पद पर सन् 1978 में सेवानिवृत होने तक अपनी योग्यता का परिचय देते रहे। सन् 1979 में जनता दल सरकार ने आपको जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उपकुलपति के पद पर नियुक्त किया।

श्रीमती इन्दिरा गांधी जब पुनः सत्ता में आई तो आपको पुनः अमेरिका का राजदूत बनाकर भेज दिया गया। सन् 1984 में आप कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार बनकर केरल राज्य से चुनाव में विजयी होकर लोकसभा में आ गये।

तत्पश्चात् आप योजना मन्त्रालय, विदेश मन्त्रालय और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मन्त्रालयों में राज्यमन्त्री के रूप में कार्यरत रहे। सन् 1991 में पुनः केरल से चुनाव में विजयी हुए। 29 जुलाई, 1992 में शासक दल की ओर से उपराष्ट्रपति पद के लिए आपके नाम की घोषणा की गयी।

विपक्ष ने भी आपका इसके लिए समर्थन किया। 21 अगस्त, 1992 को आपको उपराष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गयी। महामहिम राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा का कार्यकाल समाप्त होने पर आपको 25 जुलाई, 1997 को सर्वसम्मति से देश का राष्ट्रपति चुना गया।

उपसंहार

इनकी मृत्यु 9 नवम्बर 2005 को हुई थी। निश्चय ही भारतीय प्रजातन्त्र के लिए यह सर्वाधिक गौरव की बात है कि उसने इतिहास में पहली बार एक दलित परिवार के किसी व्यक्ति को भारतीय गणराज्य के सर्वोच्च पद पर आसीन होने का अवसर दिया।

सच तो यह है कि भारतीय स्वतन्त्रता की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर डॉ. के. आर. नारायणन को इस सर्वोच्च पद पर बिठाकर भारतीय जनता ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उस स्वप्न को सत्य कर दिया, जिसमें उन्होंने एक हरिजन राष्ट्रपति की कल्पना की थी।

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