डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जीवन परिचय? डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी पर निबंध?

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जीवन परिचय (Dr. Syama Prasad Mukherjee Ka Jeevan Parichay), डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जन्म 06 जुलाई 1901 को मध्य प्रदेश स्थित महू छावनी में हुआ था। उनके पिता का नाम आशुतोष मुखर्जी था। एवं उनकी माता का नाम जोगमाया देवी मुखर्जी था। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी (Dr. Syama Prasad Mukherjee Biography in Hindi) का जन्म 06 जुलाई सन् 1901 में हुआ। आपके पिता श्री आशुतोष मुखर्जी थे। यह कलकता विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे।

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जीवन परिचय (Dr. Syama Prasad Mukherjee Ka Jeevan Parichay)

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जीवन परिचय
Dr. Syama Prasad Mukherjee Biography in Hindi

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जीवन परिचय (Dr. Syama Prasad Mukherjee Ka Jeevan Parichay)

जन्म06 जुलाई 1901
जन्म स्थानकलकत्ता
पिता का नामआशुतोष मुखर्जी
माता का नामजोगमाया देवी मुखर्जी
मृत्यु23 जून 1953

शिक्षा

आप कुशाग्रबुद्धि थे। हर परीक्षा में सर्वप्रथम आते थे। कलकता विश्वविद्यालय से वकालत की परीक्षा पास कर आपने विलायत से बैरिस्टरी परीक्षा पास की।

भारत लौटने पर आप विश्वविद्यालय के सीनेट के सदस्य चुने गये। आपने विश्वविद्यालय के अनेक पदों पर रहकर सेवा करना आरम्भ कर दिया। अन्त में आप उपकुलपति बना दिये गये, उपकुलपति पद पर आपने अनेक प्रशंसनीय कार्य किये।

आपने बंगला भाषा के शब्दकोष का निर्माण करवाया तथा बंगला भाषा में उच्च कोटि की पुस्तकें लिखवाई । सन् 1924 से सन् 1938 तक आप समाज सुधार और शिक्षा की उन्नति में लगे रहे।

कार्य क्षेत्र

सन् 1939 में आप बंगाल लेजिस्लेटिव के सदस्य चुने गये। डॉक्टर सावरकर की प्रेरणा से आपने हिन्दू महासभा को अपना लिया। आपके तथा श्री निर्मल चटर्जी के प्रयत्नों से पूरा बंगाल पाकिस्तान में जाने से बच गया। इस प्रयत्न के बाद फजल उल हक के मन्त्रिमण्डल में सम्मिलित हो गये।

किन्तु गवर्नर के अहितकारी कार्य करने के कारण, आपने इस पद को त्याग दिया। सन् 1943 के अकाल में आपने लोगों की बहुत सेवा की। ढाका में हिन्दू-मुसलमानों का झगड़ा समाप्त किया। डायरेक्ट एक्शन आन्दोलन में आपने लोगों की जानें बचायीं ।

कांग्रेस की हिन्दू विरोधी नीति को देखकर आपने जनसंघ की स्थापना की। आपने कश्मीर को बचाने के लिए आन्दोलन आरम्भ कर दिया।

आप कश्मीर की दशा को जानने के लिए वहाँ जाना चाहते थे, परन्तु परमिट न मिलने पर आप बिना टिकट के ही जम्मू के लिए चल दिये। किन्तु कढुआ पर बन्दी बना लिए गये और निशात बाग की छोटी कोठी में रख दिये गये।

उपसंहार

यहाँ आप अस्वस्थ हो गये। उपचार होने पर भी आपका रोग बढ़ता गया और 26 जून, 1953 को प्रातः 3 बजकर 40 मिनट पर आपका स्वर्गवास हो गया। आपका शव कलकत्ता लाया गया। 27 जून को दिन के 11 बजे अन्तिम यात्रा 77, आशुतोष मुखर्जी रोड से आरम्भ हुई। आपकी शव यात्रा का जुलूस लगभग पाँच मील लम्बा था। लगभग तीन बजे आपका दाह संस्कार कर दिया गया।

यह भी पढ़े –

Leave a Reply

Your email address will not be published.