गॉल ब्लैडर स्टोन का कारण, लक्षण, चिकित्सा और यौगिक उपचार

गॉल ब्लैडर स्टोन का कारण, लक्षण, चिकित्सा और यौगिक उपचार की जानकारी होना बहुत ही आवश्यक है। पित्ताशय की पथरी (गॉल ब्लैडर स्टोन) एक कष्टदायक रोग है वैसे तो हमारे शरीर की हड्डियाँ कैल्शियम से ही बनती हैं, फिर भी पित्ताशय, गुर्दे (किडनी), (Gall Bladder Stone) मूत्राशय तथा इनसे सम्बन्धित नाड़ियों में कैल्शियम की अधिकता हो जाती है तो उसके जमाव होने से पथरी बनने लगती है।

गॉल ब्लैडर स्टोन का कारण

गॉल ब्लैडर स्टोन का कारण

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पित्ताशय का स्थान एवं कार्य

पित्ताशय माँसपेशी की एक तंग मुँह वाली पित्त की थैली होती है जो यकृत (लीवर) के दाहिने भाग के नीचे होती है। पित्त वसायुक्त भोजन को छोटी आँत में पहुँचाकर पचने में सहायता करता है। यकृत से जो पित्त स्रावित होता है, वह अस्थाई रूप से पित्ताशय (गॉल ब्लैडर) में जमा होता है किन्तु जब भोजन छोटी आंत में पहुँच जाता है तो पित्ताशय से पित्त वहाँ पहुँचकर भोजन पचाता है।

गॉल ब्लैडर (पित्ताशय) की पथरी कैल्शियम व कॉलेस्ट्रॉल से बनती है। रोग की अवस्था में पित्ताशय केवल पित्त के लवण को आत्मसात करता है एवं कोलेस्ट्राल के तत्व वहाँ एकत्रित होते रहते हैं जो समय पाकर पत्थर-सा बन जाते हैं और पीड़ा देने लगते हैं यह रोग पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में जो 40 वर्ष से अधिक एवं मोटी होती हैं, उनको होता है।

गॉल ब्लैडर स्टोन का कारण

यद्यपि इसके कारणों को पूरी तरह समझ पाना कठिन है, फिर भी उनके प्रमुख कारण निम्नलिखित हो सकते हैं-

  1. कोलेस्ट्राल, फास्फोलिपिड्स और पित्त कणों में असन्तुलन होना।
  2. मोटापा एवं उम्र के बढ़ने के साथ कोलेस्ट्राल के पित्तस्राव में वृद्धि होना।
  3. यकृत (लीवर) में पित्त लवण और फास्फोलिपिड के स्राव में कमी हो जाना।
  4. पहले द्रव्य एवं उनका क्रिस्टल में परिवर्तित होना।
  5. कोलेस्ट्राल क्रिस्टल, कैल्शियम विलिरुविनेट तथा म्यूकोप्रोटीन के कारण पित्ताशय में गाढ़ा श्लेष्मा बनना।
  6. पित्ताशय की आन्तरिक कार्य प्रणाली में अनियमितता के कारण उसमें पित्त का जमा होते रहना।
  7. पित्ताशय में काली पथरी हिमोलीसिस एवं सिरोसिस के कारण होती है।
  8. पित्त नलिका में भूरी पथरी बैक्टीरिया आदि के संक्रमण के कारण होती है।

सम्भावित कारण

उक्त कारणों के अतिरिक्त कुछ अन्य सम्भावित कारण भी हो सकते हैं जैसे- यह रोग ग्रहण किये गये भोजन की प्रकृति पर निर्भर करता है। इसके अन्य कारण हैं- डायबिटीज, क्रोन्स रोग, सिस्टिक फाइब्रोसिस सिरोसिस तथा महिलाओं में उनकी बढ़ती हुई उम्र की जटिलता से यह रोग पनपता है। भोजन में रेशेदार सब्जियों का अभाव, रिफाइण्ड, शक्कर और स्टार्च की अधिकता के कारण इस रोग के बढ़ने की सम्भावना अधिक रहती है। डिहाइड्रेशन, कुपोषण तथा व्यायाम के अभाव से भी यह रोग पनप सकता है।

गॉल ब्लैडर स्टोन के लक्षण

  • इस रोग में टेढ़ी आकृति के पत्थर जब पित्ताशय की थैली (गॉल ब्लैडर) को छूते हैं तो पित्त की थैली की झिल्ली में ऐंठन होता है। जो विशेषकर गरिष्ठ भोजन करने के कुछ घण्टे बाद नाभि की दायीं ओर पित्त की थैली के आस-पास महसूस होती है। पथरी के आकार में वृद्धि के साथ दर्द भी बढ़ता जाता है जो पीठ तक जाकर दो ढाई घण्टे तक रहता है।
  • इस रोग में आमतौर पर बुखार, पसीना आना, उल्टी होना, कब्ज, डायरिया, नाक से गाढ़ा द्रव बहना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
  • कभी दर्द दायें कन्धे तक पहुँच जाता है। कुछ रोगियों में तो पित्ताशय को काटकर निकाल देने के उपरान्त भी दर्द पूर्ववत उठता रहता है।

आधुनिक चिकित्सा

इस रोग में दर्द को कम करने में चिकित्सक बहुधा ऐंटिवायटिक्स देते हैं. फिर दो सप्ताह तक किनोडिआक्सिलिक एसिड (250 एम.जी.) देते हैं । उक्त दवाओं से क्षणिक आराम तो मिल जाता है पर इसके दुष्प्रभाव स्वरूप यकृत (लीवर) खराब हो जाता है और दस्त होने लगते हैं। शल्य चिकित्सा से भी इसका उपचार करने का प्रयास किया जाता है परन्तु ज्यादातर पूर्णरूप से प्रभावी नहीं होता।

यौगिक उपचार

  • पित्ताशय की पथरी का यौगिक उपचार भी गुर्दे की पथरी के समान ही है।
  • पथरी को बार-बार बनने से रोकने के लिए पुरानी एवं छोटी पथरी को या उसके चूर्ण को बाहर निकालने के लिए यौगिक उपचार एक आदर्श पद्धति है।
  • आसनों के माध्यम से प्राण का अवरोध समाप्त करके उसके प्रभाव को क्रियाशील बनाया जा सकता है। पथरी को बनने से रोका जा सकता है।

आसन

  1. त्रिकोणासन
  2. वज्रासन
  3. व्याघ्रासन
  4. सुप्त वज्रासन
  5. उष्ट्रासन
  6. शशांक भुजंगासन
  7. आकर्ण धनुरासन
  8. कटि चक्रासन
  9. अर्ध मत्स्येन्द्रासन
  10. मयूरासन
  11. कूर्मासन
  12. मेरुदण्डासन

प्राणायाम

  1. नाड़ीशोधन प्राणायाम
  2. भस्त्रिका प्राणायाम
  3. अग्निसार क्रिया तथा उड्डयन बन्ध का भी अभ्यास करें।

कुछ अनुभवजन्य उपचार

  • जब दर्द उठे तो तुरन्त गर्म पानी की बोतल से एक मिनट सिंकाई कर फिर उसके बाद ठंडे पानी में तौलिया भिगोकर 20 सेकण्ड तक ठंडा सेंक करें।
  • सबेरे 25 ग्राम कच्चे आलू का रस व 25 ग्राम गाजर के रस में 50 ग्राम पानी मिलाकर पी लें। दिन में एक बार मीठे फल, एक बार गेहूँ के चोकर की चाय तथा एक बार सलाद खायें।
  • गुर्दे की पथरी के संदर्भ में जो अन्य क्रियाऐं एवं सुझाव बताये गये हैं। एवं इस पित्ताशय की पथरी के रोग में भी लागू होंगे।

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