वैश्वीकरण या ग्लोबलाइजेशन पर निबंध? वैश्वीकरण की शुरुआत कब हुई थी?

वैश्वीकरण या ग्लोबलाइजेशन पर निबंध:- वैश्वीकरण अंग्रेजी शब्द ‘Globalization‘ का हिन्दी रूपान्तरण है, जिसे भूमण्डलीकरण भी कहा जाता है। वैश्वीकरण एक प्रक्रिया है जिसे सामान्यतः लोग आर्थिक दृष्टिकोण से देखते हैं, जबकि यह केवल आर्थिक जगत तक ही सीमित नहीं है, इसका प्रभाव तकनीकी, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों पर भी पड़ता है। इसलिए यह कहा जा सकता है. कि वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा पूरे विश्व के लोग आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक एवं राजनीतिक शक्तियों के संयोजन के माध्यम से विकास हेतु प्रयत्नशील हैं।

वैश्वीकरण या ग्लोबलाइजेशन पर निबंध

वैश्विकरण या ग्लोबलाइजेशन पर निबंध

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वैश्वीकरण की परिभाषा

वैश्वीकरण का अर्थ है किसी वस्तु, सेवा, विचार, पद्धति, पूँजी, बौद्धिक सम्पदा अथवा सिद्धान्त को विश्वव्यापी करना अर्थात् विश्व के प्रत्येक देश का अन्य देशों के साथ किसी वस्तु, सेवा, विचार, पद्धति, पूँजी, बौद्धिक सम्पदा अथवा सिद्धान्त का अप्रतिबन्धित आदान-प्रदान।

वैश्विकरण या ग्लोबलाइजेशन पर निबंध

वैसे तो 16वीं शताब्दी में साम्राज्यवाद की शुरूआत के साथ ही वैश्वीकरण की शुरूआत मानी जा सकती है, किन्तु वर्तमान परिदृश्य में देखा जाए तो इस शब्द का उपयोग 1980 से किया जा रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से अर्थशास्त्रियों एवं राजनीतिज्ञों ने व्यापारिक हितों के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर परस्पर सहयोग के महत्त्व को समझा और इसी के परिणामस्वरूप वैश्वीकरण के सिद्धान्त को एक-एक कर दुनिया के सभी देशों ने स्वीकार करना प्रारम्भ किया और आज स्थिति यह है कि संचार क्रान्ति के कारण विश्व के देशों के बीच दूरियाँ इतनी कम हो चुकी हैं कि इसे ‘ग्लोबल विलेज’ अर्थात् ‘वैश्विक गाँव’ कहा जाने लगा है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया में तकनीकी प्रगति के बाद विश्व बैंक की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रही है। सबसे पहले विश्व बैंक ने ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबन्धों को हटाने की संस्तुति की थी।

वैश्वीकरण के कई लाभ हैं। इसके कारण विश्व बाजार तक कम्पनियों की पहुँच आसान हो जाती है, जिससे आर्थिक विकास को गति मिलती है एवं औद्योगिक प्रगति की दर बढ़ जाती है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एवं सहयोग के कारण वैश्विक शान्ति को बढ़ावा मिलता है। औद्योगिक प्रगति के कारण रोजगार में वृद्धि होती है। रोजगार में वृद्धि के फलस्वरूप लोगों की क्रय शक्ति में भी वृद्धि होती है। इन्हीं लाभों के कारण कहा जाता है।

कि वैश्वीकरण के कारण विकासशील देशों को अधिक लाभ हुआ है एवं इन देशों में विकास की दर बढ़ी है। वैश्वीकरण के बाद से विकासशील देशों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति की उनके पूर्व की स्थिति से तुलना करने पर पता चलता है कि वैश्वीकरण के कारण इन देशों में सकल घरेलू उत्पाद, निवेश, राजकोषीय घाटा, मुद्रास्फीति, निर्यात, निरक्षरता, शिशु मृत्यु दर इत्यादि में उत्साहवर्द्धक सुधार हुआ है।

वैश्वीकरण से आर्थिक प्रगति तो हुई किन्तु इसका लाभ निर्धन लोगों को नहीं मिल सका। वैश्वीकरण से भारत एवं अन्य विकासशील देशों में उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा तो मिला, किन्तु इसका सबसे बुर प्रभाव यह हुआ कि इसके कारण दुनिया भर में पाश्चात्य संस्कृति को बढ़ावा मिला। भारत में वैश्वीकरण के प्रभाव के कारण ही शहरीकरण की दर तेज हो गई। शहरीकरण की प्रक्रिया में गति आने के कारण गाँवों से लोगों का पलायन शहर की ओर हुआ, जिससे गाँवों की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। भारत एक कृषिप्रधान देश है, इसकी आत्मा गाँवों में बसती है।

गाँवों की अर्थव्यवस्था बिगड़ने के कारण कृषि के अन्य क्षेत्रों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा एवं महँगाई अत्यधिक बढ़ गई, जिससे आम आदमी का जीवन कष्टमय हो गया। वैश्वीकरण से अविकसित देशों को एक ओर हानि उठानी पड़ती है, वहाँ के गरीब श्रमिकों को कम पारिश्रमिक पर काम करने के लिए विवश होना पड़ता है, क्योंकि अधिक पारिश्रमिक माँगने की स्थिति में रोजगार से हाथ धोने का खतरा बना रहता है। वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के कारण अविकसित एवं विकासशील देशों के लोग विकसित देशों की तुलना में काफी कम पारिश्रमिक पर काम करने के लिए तैयार रहते हैं। भारत में बीपीओ उद्योग इसका उदाहरण है।

भारत में वैश्वीकरण की आवश्यकता तब महसूस की गई जब 1991 में वित्तीय संकट के कारण इसे अपना सोना गिरवी रखकर विदेशों से ऋण लेना पड़ा। भारत में वैश्वीकरण को स्वीकृति देने के बाद से विदेशी निवेशकों ने भारत में अत्यधिक पूँजी निवेश करना शुरू किया। इससे आयात-निर्यात को भी अत्यधिक बढ़ावा मिला है। सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी तथा ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में असाधारण प्रगति हुई है एवं इन क्षेत्रों के भारतीय विशेषज्ञों की माँग दुनियाभर में बढ़ी है। आज बड़ी संख्या में भारत के विशेषज्ञ विश्व के अनेक देशों में कार्यरत हैं।

वैश्वीकरण ने पूरे विश्व को आर्थिक सुधार का एक सुनहरा अवसर प्रदान किया है। भले ही इससे कुछ नुकसान सम्भव है किन्तु किसी भी देश का अन्य देशों के सहयोग के बिना अकेले प्रगति पथ पर अग्रसर रहना लगभग असम्भव है। अतः राष्ट्रीयता की भावना का सम्मान करते हुए यदि अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग एवं सौहार्द की भावना को बढ़ावा दिया जाए तो इससे निःसन्देह विकासशील ही नहीं विकसित देशों को भी लाभ होगा। यदि आपस में व्यापार करने वाले देश एक-दूसरे को बाजार के दृष्टिकोण से न देखकर आर्थिक प्रगति हासिल करने के लिए सहयोगी के तौर पर देखें तो इससे न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार होगा, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सौहार्द में भी वृद्धि होगी।

बहरहाल, संचार एवं सूचना क्रान्ति के कारण दुनिया आज ग्लोबल विलेज का रूप ले चुकी है। ऐसी स्थिति में सही तौर पर देखा जाए तो वैश्वीकरण समय की मांग है एवं आर्थिक प्रगति के दृष्टिकोण से यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान समय में जटिल आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए विश्व का कोई भी देश सभी मामलों में पूर्णतया आत्मनिर्भर होने का दावा नहीं कर सकता, उसे किसी-न-किसी कारण से किसी अन्य देश पर अवश्य निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एवं सहयोग को बढ़ावा देकर तेजी से आर्थिक प्रगति हासिल करने के लिए वैश्वीकरण आवश्यक है।

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Arjun

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