ग्राम सुधार पर निबंध? ग्रामोत्थान पर निबंध?

ग्राम सुधार पर निबंध (Gram Sudhar Pra Nibandh) :- भारत एक कृषि प्रधान देश है। कृषि ही जीविका का मुख्य साधन होने से यहाँ की अस्सी प्रतिशत से अधिक जनता आज भी गाँवों में ही रहती है। गाँव भारत की मूल इकाई हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति का जन्म इन्हीं गाँवों में हुआ है। भारत में लगभग छह लाख गाँव हैं। इनकी तुलना में नगरों की संख्या नगण्य है। कविवर सोहनलाल द्विवेदी का यह कथन उचित ही है कि-

ग्राम सुधार पर निबंध (Gram Sudhar Pra Nibandh)

ग्राम सुधार पर निबंध

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ग्राम सुधार पर निबंध

“है अपना हिन्दुस्तान कहाँ? वह बसा हमारे गाँवों में।”

एक समय ऐसा था, जब भारत के गाँवों की दशा बहुत सुन्दर और उन्नत थी। किसान सुखी और सम्पन्न थे। यहाँ घी-दूध की नदियाँ बहती थीं। धरती अन्न के रूप में सोना उगलती थी। कृषि एवं कुटीर उद्योग ग्रामीण जीवन के प्रमुख आधार थे। जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति गाँवों में ही सरलता से हो जाती थी। किसानों के साथ ही उनकी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले लुहार, बढ़ई, सुनार, अन्य शिल्पी, व्यापारी, वैद्य, पुरोहित, शिक्षक भी वहाँ रहते थे। वे सभी लोग वहाँ परस्पर मेल-जोल से रहते थे और सहयोग से कार्य करते थे। तब गाँव एक स्वतन्त्र आर्थिक इकाई के रूप में स्थिर थे। उन्हें आज के समान नगरों पर अधिक आश्रित नहीं रहना पड़ता था।

ग्रामों की अवनति

आज वे सभी बातें स्वप्न-सी लगती हैं। अब गाँवों की दशा एकदम विपरीत दिख रही है। आज भारत के छोटे किसान की दशा दयनीय हो रही है। कृषि से उनकी जीविका का निर्वाह नहीं हो रहा। फलतः घबराकर रोजगार की तलाश में वह किसान शहर की ओर भागा चला आ रहा है। भारत के गाँवों की इस दुर्दशा की उत्तरदायी ब्रिटिश सरकार थी। उसने अपने शासन काल में कृषि सुधार और ग्राम विकास से मुँह मोड़ लिया था। उसने अपने आर्थिक लाभ के लिए गाँवों के कुटीर उद्योग और ग्राम-शिल्प को प्रत्येक सम्भव उपाय से कुचल दिया था।

शिक्षा और ज्ञान का प्रसार करने वाली पाठशालाओं को हतोत्साहित कर बन्द होने को विवश कर दिया। ग्रामीण अशिक्षित रहने लगे तो-जमींदारों, सूदखोर महाजनों, सरकारी कर्मचारियों की बन आई। उन्होंने भोले-भाले ग्रामीणों का खूब शोषण किया। शिक्षण के अभाव, मद्यपान, मुकद्दमों आदि ने तो उनकी और भी दुर्दशा कर दी। इतना ही नहीं उनके चरित्र का भी लोप हो गया। आशय यह कि गाँवों में मुत्यु, रोग, भूख और आलस्य का वास हो गया है। खेती के साधन भी नष्ट हुए और कृषि का प्राण-बैल, गाय, भैंस आदि भी नष्ट होने लगीं।

गाँवों की समस्याएँ और समाधान

गाँवों की मुख्य समस्या ग्रामीणों का अशिक्षित होना और उनकी निर्धनता है। ये दोनों समस्याएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। अशिक्षा के कारण ही गाँवों में अनेक सामाजिक कुरीतियाँ और अन्धविश्वास पनप गए हैं, इन्हें तभी सफलता से कुचला जा सकता है, जबकि प्रत्येक ग्रामवासी शिक्षित हो। इसके लिए गाँवों में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च विद्यालयों का निर्माण होना चाहिए।

सरकार भूमि-विकास और किसानों की हालत सुधारने के लिए कई कानून बना रही हैं, खेती की उन्नति की भी नई वैज्ञानिक विधियाँ विकसित हो रही हैं, पर इसका लाभ, सभी किसानों को नहीं मिल रहा। कुछ मुट्ठी भर चालाक लोग उसका लाभ उठा रहे हैं। इन्हें समझने के लिए किसान का शिक्षित होना जरूरी है। शिक्षित किसान ही इनका लाभ प्राप्त कर सकता है।

गाँवों की अन्य समस्या पीने के पानी की भी है। भारत में हजारों गाँव ऐसे हैं, जहाँ आज भी जनता को जल प्राप्त नहीं होता। गाँवों के पोखर व तालाब व छोटी नदियाँ नष्ट हो रही हैं। इन तालाबों को फिर से खोदकर उन्हें मैले पानी से छुटकारा दिलाना होगा। कई पुराने कुओं को जिनमें पानी नहीं है, या गन्दा है-भरकर उनके स्थान पर नए कुओं का-विशेषकर-नलकूप का निर्माण करना चाहिए। पीने के पानी के साथ ही सिंचाई के साधन बढ़ाने के लिए भी नहरों और नल-कूपों का जाल बिछाया जाना चाहिए।

गाँव में अस्वच्छता की भी समस्या है। प्रायः घरों का कूड़ा-करकट लोग घर के बाहर फेंक देते हैं। घरों का गन्दा पानी बाहर बहता रहता है। इससे दुर्गन्ध उत्पन्न होती है, मच्छर-मक्खी पैदा होते हैं। इसके लिए नालियाँ और ईंटों की पक्की नालियों का प्रबन्ध आवश्यक है, जिससे स्वच्छता बनी रहे। आज भी हजारों गाँवों में वैद्य, डाक्टर या हकीम नहीं हैं। लोग रोगी होने पर बिना औषध के ही मर जाते हैं। अतः गाँवों में निःशुल्क औषधालयों की या चलते-फिरते अस्पतालों की व्यवस्था होनी चाहिए।

गाँवों की उन्नति के कुछ उपाय

गाँवों और कृषि की उन्नति का आधार मुख्यतः- गाय, बैल, भैंस आदि हैं। गाय का दूध स्वास्थ्य का तथा गोबर खाद का आधार है। बैल हल चलाने के लिए अनिवार्य हैं। भले ही आज कुछ बड़े खेतों पर ट्रैक्टर चलने लगे हैं, फिर भी बैलों की उपयोगिता असंदिग्ध है और रहेगी। दूध के लिए गाय, भैंसे भी चाहिए। नगरों में भी दूध गाँवों से ही जाता है। अतः इस पशुधन का विकास व नस्ल सुधार अत्यन्त अनिवार्य है। इनसे एक ओर गाँव वालों का दूध व खाद मिलेंगे वहीं दूसरी ओर दूध बेचने से उनकी अतिरिक्त आय भी होगी।

आजकल खेती के विकास की अनेक नई विधियाँ विकसित हो रही हैं। नए कृषि औजारों और वैज्ञानिक विधि से खादों का निर्माण हो रहा है। नए सुधरे बीजों का उत्पादन हो रहा है। खेती के विकास के लिए किसानों को इनका समुचित उपयोग सिखाना चाहिए। इससे एक ओर देश अन्न के मामले में आत्मनिर्भर होगा, दूसरी ओर किसानों को आर्थिक लाभ भी होगा। इसके साथ ही साग-सब्जियों और फलों का उत्पादन बढ़ाना भी आवश्यक है।

इन्हें वे स्वयं भी खा सकते हैं और अधिक मात्रा में इनका उत्पादन कर बेच भी सकते हैं। कृषि की उन्नति में खादों का मुख्य हाथ होता है। सबसे अच्छी खाद गोबर की खाद है। पर गोबर के ओपले बनाकर लोग उनसे जलावन का काम लेते हैं। इसके लिए गाँवों में खेतों के आस-पास या खाली भूमि पर ऐसे वृक्षों का आरोपण करना चाहिए जो कि फलों का, चारे का और ईंधन का काम दे सकें। जिससे कि गोबर को जलाने के काम न लाया जाए, बल्कि वह खाद के काम आए। अब तो ‘बायो गैस प्लांट’ भी बन चुके हैं; जिनसे एक ओर गोबर से खाना पकाने की गैस बनती है और दूसरी ओर उस गोबर का खाद के रूप में प्रयोग हो जाता है। इस सुविधा का लाभ उठाया जाना चाहिए।

गाँवों की उन्नति के लिए वहाँ कुटीरोयोगों व ग्राम-शिल्पों का विकास, यातायात के साधनों और गाँवों को नगर तक जोड़ने वाली सड़कों का विकास तथा बिजली की आपूर्ति भी होनी चाहिए। देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों की नवीनतम जानकारी के लिए वहाँ रेडियो या टेलीविजन और समाचार-पत्रों के पहुँचाने की व्यवस्था भी यथासम्भव होनी चाहिए।

गाँवों में किसानों को बिवाह, मुंडन, जनेऊ आदि उत्सवों के अवसर पर या कभी आर्थिक तंगी में महाजनों से भारी सूद पर कर्ज भी लेना पड़ता है। सूदखोर महाजनों से ग्रामवासियों को छुटकारा देने के लिए गाँवों में सहकारी बैंकों की स्थापना होगी चाहिए। वहाँ से वे थोड़े ब्याज पर ऋण पा सकें। साथ ही उनके माल की बिक्री के लिए सहकारी समितियाँ भी होनी चाहिए। ताकि बड़े व्यापारी उनका शोषण न कर सकें। गाँवों में आज हजारों की संख्या में बन्धुआ मजदूर हैं। ग्रामों की उन्नति के लिए उनकी मुक्ति भी आवश्यक है। गाँवों में आजकल मुकदमेबाजी भी बढ़ती जा रही है। इससे ग्रामवासियों का समय व धन दोनों नष्ट होते हैं। अतः उनके लिए पंचायत व्यवस्था को अधिक सुसंगठित करना चाहिए; ताकि वे वहीं न्याव प्राप्त कर सकें। उन्हें सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय के चक्कर न लगाने पड़ें।

शिक्षित और अशिक्षित बेरोजगारों की समस्या गाँवों में भी है, जिसके कारण वे नगरों की ओर पलायनकरते हैं। उनके लिए भी कुटीरोद्योगों की, बागवानी कि मत्स्य पालन आदि कार्यों की व्यवस्था वहाँ होनी चाहिए, ताकि उन्हें वहीं जीविका के साधन मिल जाय तो वे नगरों की ओर न भागे।

उपसंहार

वस्तुतः गाँव देश की इकाई हैं। जिस दिन भारत में ग्रामोत्थान हो जाएगा सारे देश का उत्थान हो जाएगा। अतः उनकी उन्नति के लिए पूरा ध्यान देना चाहिए। ग्राम सुधार पर निबंध

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Kamlesh Kumar

मेरा नाम कमलेश कुमार है। मैं मास्टर इन कंप्यूटर एप्लीकेशन (Master in Computer Application) में स्नातकोत्तर हूं और CanDefine.com में एडिटर के रूप में कार्य करता हूँ। मुझे इस क्षेत्र में 3 वर्ष का अनुभव है और मुझे हिंदी भाषा में काफी रुचि है। मेरे द्वारा स्वास्थ्य, कंप्यूटर, मनोरंजन, सरकारी योजना, निबंध, जीवनी, क्रिकेट आदि जैसी विभिन्न श्रेणियों पर आर्टिकल लिखता हूँ और आपको आर्टिकल में सारी जानकारी प्रदान करना मेरा उद्देश्य है।

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