गुरु गोविन्द सिंह का जीवन परिचय? गुरु गोविन्द सिंह पर निबंध?

गुरु गोविन्द सिंह का जीवन परिचय: गुरु गोविन्द सिंह का जन्म 26 पौष 1723 ई. पटना में हुआ था। उनके पिता का नाम तेगबहादुर था। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है “जब-जब धर्म की हानि होती है और पाप की बढ़ोतरी होती है तब-तब मैं अवतार लेता हूँ।” जब हिन्दू जनता औरंगजेबी अत्याचारों से बहुत दुःखी हो गई, तब गुरु गोविन्द (Guru Gobind Singh Biography in Hindi) के रूप में भगवान् ने अवतार लिया। आपने हिन्दू धर्म की रक्षा ही नहीं की बल्कि उन्हें धर्म की रक्षा के लिए तलवार उठाना सिखाया, उनमें वीरता की भावना भरी। उन्हें त्याग और बलिदान का पाठ पढ़ाया।

गुरु गोविन्द सिंह का जीवन परिचय

गुरु गोविन्द सिंह का जीवन परिचय
Guru Gobind Singh Ka Jeevan Parichay

Guru Gobind Singh Biography in Hindi

जन्म26 पौष 1723 ई.
जन्म स्थानपटना
पिता का नामतेगबहादुर
मृत्युसन् 1764 में केवल 42 वर्ष

परिचय

गुरु गोविन्द सिंह का जन्म पटना में 26 पौष 1723 ई. को हुआ था। आपका पाँच वर्ष का बचपन पटना में ही बीता। इसके पश्चात् इनके पिता तेगबहादुर ने बिलासपुर के राजा से आनन्दपुर नामक स्थान को पाँच सौ रुपयों में खरीद लिया, तब से आप वहाँ रहने लगे।

आपकी शिक्षा आनन्दपुर में ही हुई। आपकी अस्त्र-शस्त्र चलाने में रुचि हो गई। अतः आपको अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा भी दी गई। आपको बचपन से ही घुड़सवारी तथा शिकार खेलना अच्छा लगता था। वीरता के कार्य करने में आपको बहुत आनन्द आता था।

कार्य

गद्दी पर बैठते ही आपने हिन्दू जाति को संगठित करने का विचार किया। आपने प्रत्येक घर से एक वीर पुरुष माँगा। इस प्रकार हिन्दू जाति में वीर भावना भरना आरम्भ कर दिया। उन्होंने समाज में फैले हुए जातिभेद और छुआछूत को दूर करने का प्रयत्न किया। उन्होंने एक बड़ा भोज दिया जिसमें चारों जातियों के लोगों ने साथ-साथ भोजन किया। इस भोज में भाग लेने वालों ने हिन्दू जाति की रक्षा का संकल्प लिया।

सन् 1746 में गुरु गोविन्द सिंह ने आनन्दपुर में बहुत बड़ा सम्मेलन किया। इस सम्मेलन में लोग दूर-दूर से आये निश्चित समय के बीतने पर जनता बड़ी उत्सुकता से गुरुजी के आने की प्रतीक्षा कर रही थी। इसी समय आप नंगी तलवार हाथ में लेकर सम्मेलन में आये।

आपने बड़े जोश में कहा, “आज चण्डी धर्म की रक्षा के लिए बलि चाहती है। जो धर्म की रक्षा के लिए बलि देने को तैयार हो वह आगे आये।” गुरुजी ने इन पाँच प्यारों को धर्म के रक्षक के रूप में चुना आपने पानी में मिश्री घोली। उस पानी पर अपनी तलवार घुमाई। फिर उस पानी को इन पाँचों को पिलाया। ये पंज प्यारे कहलाये, इन पाँचों से ही आपने खालसा धर्म की स्थापना की।

अब आपने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए सेना बनाई। इसमें पाँच हजार वीर शामिल हुए। इनक सैनिक शिक्षा दी गई। औरंगजेब ने गुरु गोविन्द सिंह की शक्ति को नष्ट करने के लिए बहुत बड़ी सेना भेजी। लाहौर और सरहिन्द के नवाबों को भी उनकी शक्ति को नष्ट करने का आदेश दिया।

आनन्दपुर में घमासान युद्ध हुआ। गुरु गोविन्द सिंह के पाँच हजार वीरों ने मुगल सेना के तीस हजार सैनिकों के दाँत खट्टे कर दिये। औरंगजेब ने खीजकर दुबारा बहुत बड़ी सेना भेजी। यातायात के साधनों के कट जाने के कारण सिख सेना की खाद्य सामग्री समाप्त हो गई। गुरुजी ने अपनी माता और अपने दो बच्चों को गंगू रसोइये के साथ भेज दिया।

शिष्यों के आग्रह पर गुरुजी अन्धेरी रात में निकलकर भाग गये। रसोइये ने धन के लालच में आकर गुरुजी के बच्चों को नवाब वजीर खाँ को सौंप दिया। नवाब ने दोनों बच्चों से इस्लाम धर्म स्वीकार करने को कहा। बच्चों के मना करने पर उन्हें जिन्दा ही दीवार में चुनवा दिया। जब गुरुजी ने यह समाचार सुना तो कहा धर्म हेतु जिसके सुत लागे । मातु पिता जानो बड़ भागे ॥

उपसंहार

गुल खाँ और अताउल्ला खाँ का पिता गुरुजी के हाथ से मारा गया था। तब से दोनों भाई गुरुजी की शरण में आ गये थे। एक दिन गुरुजी सो रहे थे। गुल खाँ के मन में बदले की भावना जागी। उसने गुरुजी के पेट में छुरा घोंप दिया।

गुरुजी ने तुरन्त उसका सिर काट दिया। कुछ समय बाद घाव ठीक हो गया। एक दिन म्यान में से तलवार बड़े जोर के साथ खींची जिससे घाव खुल गया। बहुत इलाज करने पर भी नहीं भरा। इसी घाव के कारण सन् 1764 में केवल 42 वर्ष की आयु में आपका स्वर्गवास हो गया।

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