होली पर निबंध? होली क्यों मनाई जाती है?

होली पर निबंध (Holi Par Nibandh), भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही समय-समय पर अनेक त्योहार मनाये जाते रहे हैं। भारतीय त्योहारों में होली भी एक प्रमुख त्योहार है। मनुष्य सदैव से ही उत्सवों में रुचि लेता रहा है। दिनचर्या की नीरसता और ऊब से बचने के लिए मनुष्य उत्सवों का आयोजन करता है। त्योहार या उत्सव मनुष्य के उल्लास को प्रकट करते हैं तथा मानव जीवन को आमोद-प्रमोद के अवसर प्रदान करते हैं।

होली पर निबंध (Holi Par Nibandh)

होली पर निबंध

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होली पर निबंध

होली मनाने का समय

होली का त्योहार बसन्तोत्सव के रूप में मनाया जाता है। बसन्त के आगमन से शरद् काल की ठिठुरन समाप्त हो जाती है। प्रकृति में नव-जीवन का संचार होने लगता है। वृक्षों के जीर्ण पत्ते गिरने लगते हैं और उन पर नई कोंपलें फूटने लगती हैं।

खेतों में पीली चूनर ओढ़े सरसों झूमती दिखाई देती है। सारी धरती पर आम्रवन का सौरभ फैल जाता है। फसलें अन्न के कणों से बोझिल होकर झूम-झूम उठती हैं। मानव जीवन में भी एक अपूर्व उल्लास और उमंग छा जाती है। इसी उल्लासपूर्ण वातावरण में होली मनायी जाती है।

मनाने का कारण

भारत एक कृषि प्रधान देश है। किसान अपनी फसल पकने पर सर्वप्रथम अन्न कण अग्नि देवता को समर्पित करता है और खुशियाँ मनाता है। इसे बसन्तोत्सव के रूप में भी मनाने की परम्परा भारतवर्ष में प्राचीन काल से प्रचलित है।

यही उल्लास भरा पर्व होली के रूप में मनाया जाता है। यह भी कहा जाता है कि ईश्वर-द्रोही हिरण्याकपिशु अपने ईश्वरभक्त पुत्र प्रहलाद को मरवा डालना चाहता था। हिरण्याकपिशु की बहिन होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठ गयी। प्रहलाद तो बच गया, लेकिन होलिका जल गयी। धर्म की इसी विजय को आज भी होली के रूप में मनाया जाता है।

पौराणिक कथा

होली का संबंध एक प्राचीन पौराणिक कथा से भी जुड़ा है। कहते हैं कि पहले हिरण्यकशिपु नाम का अंहकारी और नास्तिक विचारों का राजा था। उसका पुत्र प्रह्लाद ईश्वर-भक्त और बड़े ही धार्मिक विचारों का बालक था। प्रह्लाद का पिता उसे भगवान् विष्णु की भक्ति से रोकता था, किन्तु बालक ने अपना निश्चय नहीं बदला। अनेक प्रयत्न करने पर भी जब हिरण्यकशिपु प्रह्लाद का कुछ नहीं बिगाड़ सका तो उसने प्रह्लाद को अपनी बहिन होलिका की गोदी में बिठाकर आग में जला देने का प्रयत्न किया।

प्रह्लाद तो जलती आग से बच गया, किन्तु उसे गोद में लेकर बैठने वाली राक्षसी होलिका जलकर भस्म हो गई। इसी प्रसन्नता के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष भारतीय जनता होली मनाती है। किसी चौराहे में लकड़ियों का एक बड़ा ढेर एकत्रित करके जल, कुमकुम, चावल, पुष्प और पतासों आदि से उसक. पूजन किया जाता है और तब उसमें आग लगाई जाती है। इसी दिन किसान गेहूँ और चने के बूट लाकर उन्हें आग में भूनकर खाते हैं, जिसे होलक कहते हैं। इस प्रकार यह नवान्न भक्षप का त्यौहार हो गया।

रंग क्रीडा

होली का दूसरा दिन ‘दुलैंडी’ कहलाता है। इस दिन खूब राग-रंग होता है। बालक, युवक, वृद्ध और नारियां प्रातः ही रंग की पिचकारियां और गुलाल लिए निकल पड़ते हैं और सब प्रकार का भेद-भाव भूलकर एक-दूसरे पर रंग डालकर और गुलाल लगाकर हर्ष प्रकट करते हैं। इस अवसर पर ऊँच-नीच की, स्त्री-पुरुष की छोटे-बड़े की समस्त वर्जनाएं त्याग दी जाती है। रंग खेलते हुए लोग परस्पर गले मिलते हैं तथा स्नेह सम्बन्ध की मिठाइयाँ बँटती हैं।

प्रीति-भोज होते हैं। यह दिलों को मिलाने वाला दिन होता है, इससे नया स्नेह-सम्बन्ध जुड़ता है। इस दिन शत्रु भी अपनी शत्रुता भुलाकर आपस में एक दूसरे के गले लग जाते हैं। जीवन में एक बार फिर नई आशाएं, नई उमंगें छा जाती हैं। इस अवसर पर बजने वाले ढोलक, करताल, झांझ और मंजीरों की मधुर मंद्र ध्वनि उन्हीं उमंगों को प्रकट करती हैं। होली की इस उमंग ने भक्तों के हृदय को भी तरंगित किया। तभी तो मीराबाई ने कहा है

फागुन के दिन चार होली खेल मना रे
सील सन्तोष की केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे ॥
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर बरसत रंग अपार रे ।।

त्योहार का वर्णन

फाल्गुन मास आरम्भ होते ही हर मौहल्ले और गाँव में एक स्थान पर होली रख दी जाती है। फाल्गुन की पूर्णिमा ही होली का दिन है। घर-घर पकवान बनते हैं। रात को होली में आग लगायी जाती है। जौ और गेहूँ की बालें अग्नि में भूनकर लोग खाते हैं।

अगले दिन प्रातः से ही रंग, गुलाल और अबीर की होली आरम्भ होती है। सभी लोग जाति और धर्म का भेद भुलाकर एक-दूसरे पर रंग डालते हैं। मुसलमान और ईसाई भी इसमें सम्मिलित होते हैं। ब्रज की होली तो आज भी देखने योग्य है।

इस त्योहार पर बच्चों में विशेष उत्साह दिखाई देता है। वे एक-दूसरे को रंग में भिगोकर बहुत आनन्दित होते हैं। दोपहर तक रंग डालने का कार्यक्रम चलता रहता है, फिर सब नहा-धोकर नये कपड़े पहनकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं।

कुरीतियाँ और गलत धारणाएँ

होली मिलन का त्योहार है, फिर भी इस अवसर पर अक्सर लड़ाई-झगड़ा देखने को मिलता है। कारण स्पष्ट है कि कई लोग रंगों के इस त्योहार का महत्व नहीं समझते। यह त्योहार बैर-भाव मिटाता है, किन्तु इस अवसर पर मंदिरा और भाँग के कारण होली के आदर्शों पर चोट लगती है।

इस हर्षोल्लास के त्योहार पर गुब्बारों की मार और कीचड़ हर्ष को विषाद में बदल देती है। हाँ होली का रंग जमाने के लिए नाच-गाने, हास्य कवि गोष्ठियाँ की जाएँ। इस अवसर पर मित्रों को आमन्त्रित कर होली मिलन का आयोजन किया जाय।

कुछ लोग इस शुभ दिन, गांजा, भांग, सुलफा तथा शराब पीते हैं, परन्तु यह न तो शुभ है और न हर्ष मनाने का उचित ढंग ही। होली भारतीय संस्कृति का एक पवित्र त्यौहार है। अतः हमें इस दिन को एक पवित्र, मंगलमय और आनन्दमय त्यौहार के रूप में ही मनाना चाहिए।

उपसंहार

होली का संदेश है कि हम सारे जातीय एवं धार्मिक भेद-भाव को भुलाकर इस त्योहार को प्रेमपूर्वक मनायें। हमें इसे एक आदर्श सांस्कृतिक पर्व के रूप में मनाना चाहिए। एक-दूसरे पर प्रेम का ऐसा रंग उड़ेलें कि सब सराबोर हो जायें और निश्छल भावना से गले मिलें, तभी हमारा होली मनाना सार्थक होगा।

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Arjun

मेरा नाम अर्जुन है और मैं CanDefine.com में एडिटर के रूप में कार्य करता हूँ। मैं CanDefine वेबसाइट का SEO एक्सपर्ट हूँ। मुझे इस क्षेत्र में 3 वर्ष का अनुभव है और मुझे हिंदी भाषा में काफी रुचि है। मेरे द्वारा स्वास्थ्य, कंप्यूटर, मनोरंजन, सरकारी योजना, निबंध, जीवनी, क्रिकेट आदि जैसी विभिन्न श्रेणियों पर आर्टिकल लिखता हूँ और आपको आर्टिकल में सारी जानकारी प्रदान करना मेरा उद्देश्य है।

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