होमी जहांगीर भाभा का जीवन परिचय? होमी जहांगीर भाभा की मृत्यु कैसे हुई?

होमी जहांगीर भाभा का जीवन परिचय

होमी जहांगीर भाभा का जीवन परिचय (Dr. Homi Jehangir Bhabha Ka Jeevan Parichay), डॉ. होमी जहांगीर भाभा का जन्म 30 अक्टूबर, सन् 1909, महानगरी मुंबई में हुआ था। उनके पिता का नाम हरमुस जी जहांगीर भाभा शिक्षा शास्त्री व विद्वान थे।

होमी जहांगीर भाभा का जीवन परिचय (Dr. Homi Jehangir Bhabha Ka Jeevan Parichay)

होमी जहांगीर भाभा का जीवन परिचय
होमी जहांगीर भाभा का जीवन परिचय (Dr. Homi Jehangir Bhabha Ka Jeevan Parichay)

होमी जहांगीर भाभा का जीवन परिचय (Dr. Homi Jehangir Bhabha Ka Jeevan Parichay)

डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने देश के विकास में जो अमूल्य योगदान दिया उसे भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने भारत को परमाणु युग के द्वार पर ला खड़ा किया। भारतीय इतिहास के प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों में उनका नाम सदैव अग्रणी रहेगा।

वह एक सच्चे देशभक्त थे व शांति ही उनके जीवन का मूल मंत्र था परंतु वे शांति के नाम पर किसी तरह के दबाव में कभी नहीं आए। उनकी योजनाओं व कार्यों ने देश के मस्तक को सदैव ऊँचा किया।

डॉ. होमी जहांगीर भाभा के द्वारा किये गये आविष्कार एवं खोजें

S.No आविष्कार एवं खोजें
1.कॉस्मिक किरणों संबंधी अनुसंधान
2.परमाणु ऊर्जा के विकास पर अनेक अनुसंधान
3.अंतरिक्ष अनुसंधान में अनेक प्रयोग
4.इलेक्ट्रानिकी व सूक्ष्म विज्ञान के प्रयोगों को नया रूप दिया

उन्हीं के प्रयत्नों के फलस्वरूप परमाणु शक्ति को देश की भलाई के लिए प्रयोग में लाया गया। कई बार ऐसे अवसर भी आए जब दूसरे देशों ने लालच देकर उनकी योग्यता व अनुसंधान से लाभ उठाना चाहा परंतु उन्होंने सभी प्रस्तावों को ठुकरा दिया और देश सेवा को ही सच्चा धर्म माना।

भारत के औद्योगिक विकास में पिछले अनेक वर्षों से पारसी समुदाय की अहम् भूमिका रही। पारसियों के स्वभाव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे बाल्यकाल से ही बालकों के हृदय में देशभक्ति के संस्कार उत्पन्न करते हैं।

इन लोगों ने देश की बहुत सेवा की है। ऐसे ही एक संपन्न पारसी परिवार में, महानगरी मुंबई में 30 अक्टूबर, सन् 1909 को डॉ. होमी जहांगीर भाभा का जन्म हुआ। उनके पितामह हरमुस जी जहांगीर भाभा शिक्षा शास्त्री व विद्वान थे।

वे अनेक वर्षों तक मैसूर में शिक्षा विभाग के निदेशक भी रहे। अपनी उदार शिक्षा नीतियों के कारण वे विशेष रूप से सराहे जाते थे। डॉ. होमी भाभा के पिता श्री जे.एच. भाभा भी बंबई के जाने-माने वकीलों में एक थे। वे टाटा कंपनी के कानूनी सलाहकार भी थे।

प्रसिद्ध टाटा परिवार के स्वामी सर दोराब जी टाटा के साथ उनकी बुआ का विवाह हुआ था। होमी भाभा की माता का नाम था ‘मेहरबाई’। बचपन से ही होमी भाभा को अनेक प्रतिष्ठित व जाने-माने लोगों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो ज्ञान व बुद्धि में तत्कालीन समाज में सर्वोपरि माने जाते थे। डॉ. होमी की बुआ अर्थात् लेडी टाटा का अपने भतीजे से विशेष अनुराग था।

बैरिस्टर पिता नहीं चाहते थे कि होमी छोटी आयु से ही विदेश में पढ़ने चले जाएँ। उन्हें भय था कि ऐसा होने पर होमी स्वदेश की जड़ों से दूर हो जाएंगे, अतः उन्हें कैथेड्रल हाई स्कूल में भेजा गया। समीप ही बुआ का घर था इसलिए वे खाने की छुट्टी में दोपहर का खाना खाने वहीं जाते थे।

उस खाने की मेज पर बालक होमी ने अनेक हस्तियों का परिचय पाया। प्रायः वे सभी किसी-न-किसी महत्त्वपूर्ण विषय पर चर्चा करते जिसे होमी बहुत ध्यान से सुनते। शायद यही कारण था कि वे अल्पायु में ही होनहार, गंभीर व जिज्ञासु प्रवृत्ति के छात्र कहलाने लगे थे।

होमी की माता ने अपने पुत्र को पारसी संप्रदाय की प्राचीन परंपराओं का ज्ञान दिया। व्यापार कुशलता व प्रबंधन का पैतृक गुण भी होमी ने अपने परिवार से ही पाया। वास्तव में उनके चारों ओर सदा एक ऐसा वातावरण रहता जिससे सदैव कुछ नया व अलग सीखा जा सकता था और होमी ने उस वातावरण का पूरा लाभ उठाया। अन्य धनी-मानी परिवार के बिगड़े रईसजादों की सूची में उनका नाम कभी नहीं आया। संपन्नता होने पर भी परिवार में संस्कारों की गहरी पकड़ थी।

बचपन में ही होमी का कला के प्रति झुकाव स्पष्ट दिखाई देने लगा था। वे जब भी अपनी ननिहाल जाते तो उन्हें अच्छा व बढ़िया संगीत सुनने का अवसर मिलता क्योंकि उनकी मामी संगीत की अनन्य उपासिका थीं। इसी झुकाव के चलते होमी को संगीत की अच्छी समझ हो गई। थोड़ा बड़े होने पर तो वे भारतीय शास्त्रीय संगीत की बारीकियाँ भी समझने लगे थे।

चित्रकारी भी उन्हें कम प्रिय न थी। प्रकृति के मनोरम दृश्यों को वे सरलता से कागज पर उतार देते। पिता ने उन्हें एक कलाकार के णस चित्रकला सीखने भी भेजा। निःसंदेह होमी यदि वैज्ञानिक न होते तो वे एक अच्छे चित्रकार बन सकते थे। विदेश में भी उन्होंने अनेक प्रसिद्ध चित्रकारों की चित्रकला का गहन अध्ययन किया था।

अल्पायु में ही उन्होंने अपने समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग करना सीख लिया था। माता-पिता ने भी किशोर पुत्र के स्वभाव व योग्यताओं का उचित आकलन करते हुए उसे सदैव प्रोत्साहित किया। किसी भी बालक में संस्कारों को विकसित करने की भूमिका माता-पिता को ही निभानी पड़ती है। उनके माता-पिता ने यह कार्य बखूबी किया।

होमी के पिता चाहते थे कि पुत्र के मस्तिष्क का भली-भांति विकास हो। उनके द्वारा लाए गए खिलौने विशेष रूप से यांत्रिक होते ताकि उन्हें जोड़ कर कोई-न-कोई आकृति बन सके। इस प्रकार हम देखते हैं कि होमी ने बचपन में ही अपनी दिनचर्या को इतनी रुचियों में व्यवस्थित कर लिया था कि उन्हें भोग-विलास के अन्य साधनों के उपभोग का समय ही नहीं मिल पाया।

केवल एक ही कारण था जिससे उनके माता-पिता प्रायः चिंतित हो उठते। होमी को नींद बहुत कम आती थी। प्रायः माता-पिता की यही मान्यता रहती है कि यदि बच्चा अपनी पूरी नींद ले तो उसके विकास के लिए यह बहुत लाभकारी है। होमी को बहुत कम नींद आती थी। कई चिकित्सकों से परामर्श लिया गया। बालक के स्वास्थ्य की जाँच भी हुई परंतु सब कुछ सामान्य था। माता-पिता अब भी पूरी तरह चिंतामुक्त नहीं हो पाए थे।

तब एक विदेशी चिकित्सक ने बालक का निरीक्षण कर कहा “इस बालक का मस्तिष्क तेज है। ग्राह्य क्षमता अधिक है व चिंतन करने में इसकी विशेष रुचि है। सदा कुछ-न-कुछ सोचने के कारण ही इसे नींद कम आती है। वैसे स्वास्थ्य की दृष्टि से बालक को कोई रोग नहीं है अतः आप निश्चित ही रहें।”

जॉन कैथल हाई स्कूल में होमी की गणना श्रेष्ठ छात्रों में की जाती थी। सीनियर कैम्ब्रिज की परीक्षा में वे अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुए। पुस्तकालय में संगीत, कला व विज्ञान की पुस्तकों की संख्या नित्यप्रति बढ़ती ही जाती थी और साथ ही होमी के मस्तिष्क की समझ भी।

सन् 1926 में उन्होंने एलफिन्सटन कॉलेज से एफ०वाई०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। तत्पश्चात् उन्होंने बंबई के रॉयल इन्स्टीट्यूट ऑफ साइंस में आई०सी०एस० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें विदेश भेजने का निश्चय किया गया।

होमी भाभा वैज्ञानिक बनना चाहते थे परंतु उनके पिता की इच्छा थी कि वे इन्जीनियर बनें। अतः गणित के अध्ययन के लिए उन्हें कैम्ब्रिज भेजा गया । इच्छा न होने पर भी उन्होंने गणित पढ़ा और उसमें अप्रतिम योग्यता का परिचय दिया। इंजीनियरिंग की ट्राईपास परीक्षा में उन्होंने परिश्रमपूर्वक अच्छे अंक प्राप्त किए और छात्रवृत्ति भी पाई ।

इस छात्रवृत्ति को पाने के बाद गणित और भौतिकी के अध्ययन की इच्छा और भी बलवती हो उठी। उन्होंने दो वर्ष तक प्रो. पी०ए०एम० डिस्क के निर्देशन में सैद्धांतिक भौतिकी का अध्ययन किया। सन् 1932 में उन्हें एक और छात्रवृत्ति मिली “गड़ज्वेल ट्रेवलिंग स्टूडेंटशिप”। तब उन्होंने एक वर्ष तक ज्यूरिख में प्रो. डब्ल्यू. पालि के पास अनुसंधान कार्य किए। गणित व भौतिक की पढ़ाई के साथ-साथ वे यूरोपीय देशों की चित्रकला का भी अध्ययन करते रहे।

कई महान चित्रकारों ने उनकी चित्रकला को देखा व सराहा। उन्हीं दिनों उन्होंने अपने संगीत शिक्षा को भी आगे बढ़ाया परंतु संगीत साधना के लिए सतत् अभ्यास व समय की आवश्यकता थी जो उनके लिए असंभव था।

ऑइजक न्यूटन छात्रवृत्ति व (The Senior Studentship for Great Britain of the Exlibition of 1951) जैसी छात्रवृत्तियाँ प्राप्त करना भी कोई आसान नहीं था। उन्हें नील्स बोर की भौतिक विज्ञान प्रयोगशाला में अनुसंधान का अवसर प्राप्त हुआ।

नाभिकीय भौतिकी में उन्हें विशेष रुचि थी। अंतरिक्ष विकिरणों पर दिए गए व्याख्यान भी विद्वजनों द्वारा सराहे गए। भौतिकी जगत में उन्होंने प्रारंभिक किरणों पर काम किया जिससे सूर्य से आने वाली विकिरण का अध्ययन हो पाया। इस ज्ञान द्वारा बहुत लाभ प्राप्त हुआ।

उनके कास्मिक किरणों संबंधी कार्यों से प्रभावित होकर सन् 1939 में रॉयल सोसायटी में उन्हें स्कूल ऑफ कास्मिक के रिसर्च में सैद्धांतिक भौतिक शास्त्री के रूप में नियुक्त किया। वे प्रायः छुट्टियों में भारत आते परंतु द्वितीय महायुद्ध छिड़ने पर वे पुनः इंग्लैंड नहीं गए।

वे बंगलौर में इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ साइंस में कार्य करने लगे। मौलिक अन्वेषणों के कारण वे वैज्ञानिक जगत में भी प्रसिद्ध हो चले थे। उन्हें इसी संस्थान में कॉस्मिक किरणों में अनुसंधान विभाग में प्राध्यापक बना दिया गया। इकत्तीस वर्ष की आयु में उन्हें रॉयल सोसायटी ने अपना फैलो चुना।

दूसरा विश्वयुद्ध जोरों पर था। युद्ध में अनेक खतरनाक हथियारों का प्रयोग हो रहा था। उन्हीं दिनों डॉ. भाभा को ब्रिटेन व अमरीका की ओर से प्रस्ताव मिले कि वह उनकी सहायता के लिए आगे आएँ और फौजी ताकतों को बढ़ावा दें परंतु डॉ. भाभा ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया।

भारत में प्रयोगशालाओं का अभाव था। डॉ. भाभा भली-भांति जानते थे कि मौलिक अनुसंधान के बिना प्रगति असंभव है। सन् 1945 में उन्होंने टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना की। सन् 1947 में स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने डॉ. होमी जहांगीर भाभा के विचारों को पूरा सम्मान देते हुए यथासंभव सहायता देने का प्रयास किया।

डॉ. भाभा का मानना था कि अर्द्ध विकसित राष्ट्र परमाणु शक्ति के उपयोग से शांति व अर्थव्यवस्था तथा औद्योगिक प्रगति के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर सकते हैं। पंडित नेहरू ने उनके विचारों को पूरा समर्थन दिया और अनुसंधान कार्य में प्रयुक्त होने वाली सभी सामग्रियों को नियत समय पर पहुँचाने का उपयुक्त प्रबंध कर दिया।

डॉ. भाभा के प्रयासों से ही टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में ऊर्जा परीक्षण का प्रबंध हो पाया। सन् 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग बनने के पश्चात् परमाणु ऊर्जा के विकास पर बहुत अनुसंधान हुए। सन् 1956 में भारत प्रथम परमाणु ऊर्जा भट्टी ‘अप्सरा’ की ट्रॉबे में स्थापना हुई। उन्हीं के निर्देशन में साथरस और जटलीना नामक दो न्यूक्लीयर रिएक्टर भी लगाए गए।

डॉ. भाभा को कई बार विदेशों में भाषण के निमंत्रण प्राप्त हुए। एडिनबरा, कोलम्बिया व कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों में भाषणों के माध्यम से उन्होंने परमाणु शक्ति के शांतिपूर्ण उपयोगों के विषय में बताया।

अनेक विश्वविद्यालयों से उन्हें डी०एस०सी० की मानद उपाधियाँ प्राप्त हुई। सन् 1954 में उन्हें महामहिम राष्ट्रपति महोदय द्वारा पद्मभूषण की उपाधि से अलंकृत किया गया। सन् 1964 में जब ट्रांबे में प्लूटोनियम संयंत्र आरंभ हुआ तो वे फूले नहीं समाए। अनेक देशों ने उनके इस प्रयास को सराहा।

अमरीकी परमाणु शक्ति आयोग के एक सदस्य का कहना था “मेरे विचार में संसार में केवल भारत ही एक ऐसा देश है जो परमाणु के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए अनुसंधान कर रहा है। प्लूटोनियम से तो एटम बम बनाए जाते हैं परंतु भारत में इसका प्रयोग विद्युत बनाने के लिए किया जा रहा है।”

डॉ. भाभा ने अपने संयंत्र की स्थापना का सारा श्रेय सहयोगी वैज्ञानिकों व इंजीनियरों को दिया व इस अवसर पर कहा “बड़े एवं शक्तिशाली देश इतना तो जान ही गए होंगे कि भारत भी बम बनाने में समर्थ हो गया है। सरकार द्वारा संकेत पाते ही हम आसानी से एटम बम बना सकते हैं परंतु हम ऐसा करेंगे नहीं। भारत एक शांतिप्रिय राष्ट्र है अतः परमाणु शक्ति को हम शांतिपूर्ण कार्यों के लिए ही प्रयोग में लाएंगे।”

डॉ. होमी जहांगीर भाभा स्वभाव से ही सरल व आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे। अपनी वैज्ञानिक गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए उन्होंने विवाह तक नहीं किया। वे प्रायः कहते कि संपूर्ण विज्ञान जगत ही मेरा परिवार है।

उन्होंने विश्व को ज्ञान दिया कि समुद्री जल की हाईड्रोजन शक्ति का उपयोग किया जा सकता है। अन्य देशों के वैज्ञानिकों ने अनेक विचारों को सम्मान देते हुए इस विषय में अनुसंधान किए व लाभान्वित भी हुए। सन् 1949 में उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि से विभूषित किया। सन् 1954 में उन्हें राष्ट्रपति द्वारा पद्मभूषण की उपाधि से अलंकृत किया गया तथा सन् 1961 में उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि दी गई।

देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों द्वारा उन्हें विज्ञान की सेवाओं व शोधपत्रों के लिए सम्मानित किया गया। इतने व्यस्त जीवन में भी डॉ. भाभा चित्रकला व संगीत के लिए समय निकाल ही लेते थे। चित्रकला के अध्ययन के लिए तो उन्होंने अनेक विदेशी चित्रकारों की कृतियों का भी विश्लेषण किया था। उनके चित्रों में विशेषकर भारतीय संतों की आकृतियाँ देखने को

मिलती हैं। कहते हैं कि उनकी कुछ कृतियाँ ब्रिटिश आर्ट गैलरी में आज भी सुशोभित हैं डॉ. भाभा ने अपनी उपलब्धियों द्वारा इलेक्ट्रानिकी, अंतरिक्ष विज्ञान, सूक्ष्म विज्ञान के प्रयोगों को नया रूप दिया। उनके सभी कार्यों की सूची बनाई जाए तो यह एक लंबी सूची होगी।

उन्होंने अनेक कारखानों की स्थापना की व उनकी स्थापना के लिए सभी आवश्यक सुविधाएँ भी जुटाई। उन्होंने अंतरिक्ष अनुसंधान में भी अनेक प्रयोग किए। टाटा संस्थान में उन्होंने गुब्बारों की सहायता से कास्मिक किरणों पर अनेक प्रयोग किए, फिर उपग्रहों की बारी आई।

उपग्रहों से प्राप्त जानकारी हमारे लिए बहुत उपयोगी रही। सन् 1963 में केरल के तुम्बा नामक स्थान से 27 फुट लंबा रॉकेट आकाश में एक सौ अस्सी किलोमीटर की ऊँचाई पर छोड़ा गया था। पोखरन के परमाणु विस्फोटों की सफलता भी किसी से छिपी नहीं है परंतु यह दिन देखना उनके भाग्य में न था।

57 वर्षीय डॉ. भाभा अंतर्राष्ट्रीय अणु शक्ति सम्मेलन में भाग लेने के लिए वियना जा रहे थे। अचानक उनका विमान ‘कंचनजंघा’ पहाड़ की चोटी से टकरा गया। 26 जनवरी, 1966 को वे हमसे सदा के लिए बिछुड़ गए। उनके निधन का समाचार सुन सभी स्तब्ध हो उठे। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गाँधी ने कहा “डॉ. भाभा ने परमाणु शक्ति के विकास का काम हाथ में लिया था।

ऐसे नाजुक वक्त पर हमने उन्हें खो दिया है। भारत के लिए तो यह बहुत बड़ी चोट है। वे भारत के सच्चे सपूत थे। उनके द्वारा की गई सेवाओं को देश भुला नहीं सकता। उनके निधन से हमने इतना कुछ खो दिया है जिसे बता सकना कठिन है।”

12 जनवरी, 1967 को उनके सम्मान में “परमाणु ऊर्जा संस्थान, ट्रांवे” का नाम बदल कर “भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र” रखा गया। यह केंद्र सदैव कई प्रतिभाओं का मार्ग दर्शन करता रहेगा व डॉ. भाभा की स्मृति को चिरजीवत बनाए रखेगा।

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