सिंधु घाटी सभ्यता क्या है? सिंधु घाटी सभ्यता की विशेषताएं और महत्‍वपूर्ण जानकारियाँ

सिंधु घाटी सभ्यता क्या है (Indus Valley Civilisation):- सिंधु घाटी (Sindhu Ghati Sabhyata in Hindi) सभ्यता को विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में प्रमुख माना गया है या फिर हम यह कह सकते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता सबसे प्राचीन सभ्यता है। यह सभ्यता मुख्य रूप से दक्षिण एशिया के उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में फैली हुई थी। शोध के अनुसार यह माना गया है कि सिंधु घाटी सभ्यता लगभग कम से कम 8000 वर्ष पुरानी सभ्यता है। क्योंकि यह सभ्यता सिंधु नदी के घाटी के किनारे बसी थी इसलिए इस सभ्यता का नाम सिंधु घाटी सभ्यता रखा गया। इस घाटी के प्रमुख केंद्र थे – हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल, कालीबंगा ,धोलावीरा और राखीगढ़ी

सिंधु घाटी सभ्यता क्या है

सिंधु घाटी सभ्यता क्या है
सिंधु घाटी सभ्यता क्या है

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सिंधु सभ्यता और हड़प्पा सभ्यता में अंतर

कई इतिहासकारों के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता का मुख्य केंद्र हड़प्पा को माना गया है सिंधु सभ्यता और हड़प्पा सभ्यता में कोई अंतर नहीं है। जिसके कारण सिंधु घाटी सभ्यता को ही हड़प्पा सभ्यता के नाम से जाना जाता है। सिंधु सभ्यता इंडस नदी के किनारे बसी हुई सभ्यता को कहा गया था। जबकि उच्चारण के भिन्नता के कारण और अन्य कारणों के कारण इंडस नदी को ही सिंधु नदी का नाम दिया गया।

सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी महत्‍वपूर्ण जानकारी Short Notes

  • सिंधु घाटी सभ्यता की अवधि 2500 ई.पू.-1750 ई.पू. थी।
  • सबसे पहले कपास का उत्पादन हड़प्पावासियों ने किया था। (सिंधुवासियों का मुख्य खाद्यान्न गेहूं व जौ था। सबसे पहले कपास उगाने का श्रेय सिंधु सभ्यता के लोगों को जाता है।)
  • सिंधु घाटी सभ्यता सुनियोजित शहरों के लिए प्रसिद्ध थी । (सिंधु सभ्यता की सभी सड़कें मिट्टी से बनी हुई थीं ।)
  • सिंधु घाटी के लोग मातृ देवी की पूजा करते थे । (सिंधु सभ्यता के निर्माता भूमध्यसागरीय (द्रविड़) थे। सिंधुवासी मातृ देवी, पशुपति महादेव और प्रकृति की पूजा करते थे। सिंधुवासी राजस्थान स्थित में खेतड़ी की खानों से तांबा प्राप्त करते थे। )
  • सिंधु घाटी सभ्यता के लोग पशुपति शिव की पूजा करते थे।
  • सिंधुघाटी के लोग पीपल के वृक्ष की पूजा करते थे।
  • आर्य अग्नि की आराधना करते थे। (सिंधुवासी द्रविड़ थे जो प्रकृति, सूर्य, अग्नि, मातृदेवी और पशुपति की आराधना करते थे।)
  • सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि पढ़ी नहीं जा सकी है। (सिंधुवासियों की लिपि चित्र प्रधान लिपि थी। इस लिपि में लगभग 400 वर्ण हैं। लिपि की लिखावट दाई से बाई ओर मानी गई है। पिग्गट ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वां राजधानियां बताया है।)
  • सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल धोलावीरा (गुजरात) है।
  • सिंधुघाटी सभ्यता में कालीबंगा मिट्टी के पात्र, मिट्टी की चूड़ियों के लिए प्रसिद्ध है।
  • सिंधु सभ्यता कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था थी।
  • नगर-नियोजन सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी। (सिंधु घाटी सभ्यता अपनी विशिष्ट एवं उन्नत नगर योजना के लिए विश्व प्रसिद्ध है। सिंधु अथवा हड़प्पा सभ्यता के नगर का अभिविन्यास शतरंज पट (ग्रिड प्लानिंग) की तरह होता था, जिसमें मोहनजोदड़ो की उत्तर दक्षिणी हवाओं का लाभ उठाते हुए सड़कें करीब-करीब उत्तर से दक्षिण तथा पूर्ण से पश्चिम को ओर जाती थीं। इस प्रकार चार सड़कों से घिरे आयतों में आवासीय भवन तथा अन्य प्रकार के निर्माण किए गए थे।)
  • सैंधववासी दशमलव प्रणाली पर आधारित बाटों का प्रयोग करते थे। अधिकांश बाट 16 या उसके गुणज भार के हैं।
  • सुरकोटदा से घोड़े की हड्डियां मिली हैं।
  • हड़प्पा रावी नदी के किनारे अवस्थित है। (हड़प्पा के टीलों की तरफ सबसे पहले चार्ल्स मैसन ने 1826 में ध्यान आकर्षित किया। हड़प्पा से एक दर्पण प्राप्त हुआ है, जो तांबे का बना हुआ है। हड़प्पा से कांसे की बनी एक नर्तकी की मूर्ति, (मोहनजोदड़ो) तांबे की बनी हुई एक इक्का गाड़ी प्राप्त हुई है। हड़प्पा रावी नदी के तट पर स्थित है, जिसकी खुदाई 1921 में दयाराम साहनी के नेतृत्व में हुई।)
  • लोथल सिंधु सभ्यता के खुदाई स्थल का एक हिस्सा है जो गुजरात में स्थित है। यह उस समय एक प्रसिद्ध बंदरगाह था।
  • सिंधुघाटी सभ्यता का पत्तन नगर लोथल है।
  • हड़प्पाकालीन स्थल लोथलगुजरात में था । (भोगवा नदी के किनारे पर अहमदाबाद के पास स्थित लोथल बंदरगाह से सिंधुवासी अन्य देशों और सिंधु स्थलों के साथ व्यापार करते थे )
  • हड़प्पा सभ्यता के सिक्कों पर गैंडासील मुहर का प्रयोग किया गया था।
  • सिंधु घाटी सभ्यता में सबसे पहले खुदाई हड़प्पा में हुई थी।
  • मोहनजोदड़ो की खोज राखालदास बनर्जीने 1922 में की थी।
  • मोहनजोदड़ो का अर्थ मृतकों का टीला है। * पशुपति शिव व पुजारी का सिर मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुआ है।
  • विशाल स्नानागार मोहनजोदड़ो में पाया गया है।
  • नाचने वाली लड़की की मूर्ति मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई है।
  • सिंधु घाटी सभ्यता नगरीय सभ्यताथी जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी।
  • सिंधुघाटी सभ्यता कांस्य युगीन सभ्यता थी।
  • सिंधु घाटी के लोगों को लोहा धातु की जानकारी नहीं थी । (घोड़े और लोहे के साक्ष्य इस सभ्यता से नहीं मिले हैं।)
  • सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों की मुद्रा में शिव की आकृति चित्रित थी।
  • मानव द्वारा उपयोग की गई पहली धातु तांबा थी।
  • लोथल से युगल शवधान प्राप्त हुआ है जिसमें सिर पूरब तथा पैर पश्चिम की तरफ लिटाए गए हैं।
  • सिंधु सभ्यता में लोथलसे तराजू प्राप्त हुआ है।
  • सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित लोथल, धोलावीरा, रंगपुर गुजरात में हैं।
  • सिंधु घाटी सभ्यता में, धौलावीरा जल संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है। (गुजरात के कच्छ जिले के मचाऊ तालुका में मासर एवं मानहर नदियों के मध्य अवस्थित इस सभ्यता स्थल की खोज जगतपति जोशी ने 1967-68 में की लेकिन इसका विस्तृत उत्खनन 1990-91 में रवींद्रसिंह बिस्ट ने किया था।)
  • हड़प्पा सभ्यता में मोहरें सेलखड़ी या टेराकोटा से बनी हैं।
  • कालीबंगा भारत के राजस्थान के हनुमानगढ़ में स्थित है।
  • सिंधु सभ्यता के कालीबंगा से हल चलाने का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।
  • हड़प्पा सभ्यता में ऊंट की हड्डी कालीबंगा में मिली थी। (कालीबंगा के उत्खनन में निचली सतह से पूर्व सिंधु सभ्यता और ऊपरी सतह से सिंधु सभ्यता के अवशेष मिले हैं। कालीबंगा से प्राप्त फर्श में अलंकृत ईंटों का प्रयोग किया गया है। कालीबंगा से काली मिट्टी की चूड़ियां, जुते हुए खेत के साक्ष्य, अग्निकुंड या हवन कुंड के साक्ष्य, लकड़ी की नाली प्राप्त हुई हैं ।)
  • सिंधु घाटी सभ्यता में मिट्टी के बर्तनों के निर्माण के सबसे पुराने साक्ष्य कालीबंगा में पाए गए हैं।
  • राखीगढ़ी हड़प्पाई स्थल हरियाणा में स्थित है।
  • दैमाबाद से हड़प्पाकालीन रथ की एक प्रतिमा प्राप्त हुई थी।

सिंधु घाटी सभ्यता के विनाश के क्या कारण थे

इसके विनाश/ खत्म /अवसान/पतन का मुख्य कारण ज्ञात नहीं हुआ है। लेकिन इतिहासकारों के अनुसार इस सभ्यता के पतन का कोई एक कारण नहीं बल्कि कई कारण हो सकता है। जैसे मोहनजोदड़ो मैं एक कमरे से लगभग 14 नर कंकाल प्राप्त हुए जो किसी प्रकार के महामारी या आक्रमण का संकेत देता है, गंभीर अग्निकांड के भी प्रमाण प्राप्त हुए हैं, जल निकासी के कारण महामारी की संभावना कम हो सकती है। कई विद्वानों के अनुसार इस सभ्यता का अंत बाढ़ के प्रकोप के कारण माना गया है।

ऐसा इसलिए क्योंकि यह सभ्यता सिंधु घाटी के नदियों के किनारे बसी हुई थी जहां बाढ़ का आना एक प्राकृतिक स्वर और स्वाभाविक घटना माना गया है। कई विद्वानों का यह भी कहना है कि यह सभ्यता इतनी बड़ी थी कि अकेले बाढ़ इसके विनाश का कारण नहीं हो सकती इसलिए उनके अनुसार बाहरी देशो द्वारा आक्रमण या महामारी या भीषण आग लग जाना भी विनाश का कारण हो सकता है। मोहनजोदड़ो में 26 ऐसे नर कंकालों की भी प्राप्ति हुई है जिनके सर पर किसी 9 केले अस्त्र से घाव के निशान पाए गए हैं।

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