जगदीश चंद्र बसु का जीवन परिचय? जगदीश चंद्र बसु की खोज क्या है?

जगदीश चंद्र बसु का जीवन परिचय (Jagdish Chandra Basu Ka Jeevan Parichay), आचार्य जगदीश चंद्र बसु का जन्म 30 नवम्बर, 1858 को पूर्वी बंगाल (आधुनिक बंगला देश) के मैमनसिंह जिले के ‘रारीखाल’ नामक गाँव में हुआ। पिता श्री भगवान चंद्र बसु डिप्टी मैजिस्ट्रेट थे।

जगदीश चंद्र बसु का जीवन परिचय

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Jagdish Chandra Basu Ka Jeevan Parichay

उनकी महानता व दयालुता के किस्से प्रायः लोग सुनाया करते परंतु अपराधियों को वे कड़े से कड़ा दंड देने में भी नहीं चूकते थे। उनके इसी रवैये के कारण शत्रुओं का भी अभाव न था। दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति उनसे बदला लेने के अवसर खोजा करते।

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जगदीश चंद्र बसु के द्वारा किये गये आविष्कार

S. No आविष्कार
1.विद्युत चुंबकीय तरंगों का ध्रुवीकरण
2.‘क्रेस्कोग्राफ’ यंत्र

भारत की वैज्ञानिक तयों की श्रृंखला में आचार्य जगदीश चंद्र बसु एक ऐसा नाम है जिसने भारतीयों के सुप्त आत्मविश्वास को जागृत करने में महती योगदान दिया। आचार्य बसु ने ही स्पष्ट शब्दों में कहा था

“एक ही पद के लिए अंग्रेज व भारतीय के वेतन में अंतर क्यों ? मुझे भी अंग्रेज प्रोफेसर जितना वेतन मिलना चाहिए। यह तो मेरा अधिकार है।”

उन दिनों वे कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में भौतिक विज्ञान के अस्थायी प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे। सरकारी शिक्षा विभाग एक ही पद पर किसी अंग्रेज को जो वेतन देता था उतना किसी भारतीय को नहीं दिया जाता था। आचार्य बसु ने इसका विरोध किया और पूरे तीन वर्ष तक वेतन नहीं लिया।

इन तीन वर्षों में उन्हें अनेक आर्थिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। पिता रोगी थे अतः उनकी चिकित्सा के लिए ऋण लेना पड़ा परंतु बसु अपने हठ पर अड़े रहे हालांकि वे इस कार्यकाल में भी पूरी लगन व परिश्रम से पढ़ाते रहे। छात्र अपने इस प्रोफेसर के पढ़ाने के ढंग से बेहद प्रभावित थे।

अंततः पूरे तीन वर्ष पश्चात् शिक्षा विभाग ने उनकी माँग को पूरा किया तथा पिछला वेतन भी दिया गया। इस प्रकार जगदीश चंद्र बसु ने अपना अधिकार पाया।

कहते हैं कि एक बार डाकुओं ने क्रोधित होकर उनके घर में आग लगा दी थी। सब कुछ आग की लपटों में जलकर स्वाहा हो गया परंतु भगवान दास जी अपने उसूलों पर अडिग रहे। दृढ़ता का यही गुण शायद आचार्य जगदीश ने अपने पिता से ही पाया ।

भगवान चंद्र जी सच्चे अथों में समाज सेवक थे। ग्रामीण जनता को कम ब्याज पर ऋण की सुविधा दिलवाना, कृषि मेलों व प्रदर्शनियों को प्रोत्साहन देना व दीन-हीन जन की सेवा ही उनका धर्म था। जब भारत में पहली कपड़ा मिल खुली तो उन्होंने उसमें अपना सारा धन लगा दिया। वे भारत को एक प्रगतिशील राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। ऐसे पिता की संतान होना भी कोई कम गर्व का विषय नहीं है।

जगदीश अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र थे। उनकी पाँच बहनें थीं। सरल प्रभा, स्वर्ण प्रभा, लावण्य प्रभा, हेम प्रभा व चारू प्रभा । बहुत ही दुलार से जगदीश का लालन-पालन हुआ। प्रकृति से उनका असीम लगाव था। बंगाल की प्राकृतिक सुषमा से वे आजीवन अभिभूत रहे।

सृष्टि के नवीनतम रूपों से परिचित होने पर उनके आश्चर्य का पारावार न रहता। कोई भी नई वस्तु अथवा जीवन देखते ही उनकी जिज्ञासा जोर मारती और वे पिता के पास प्रश्नों की पोटली लिए जा पहुँचते। भगवान चंद्र जी ने भी पुत्र को सदा संतोषजनक उत्तर दिए ताकि उसके सहज विकास में कोई बाधा न आए।

जगदीश को हमउम्र बालकों के साथ खेलने की अपेक्षा जीव-जंतुओं व पौधों के निकट रहने में विशेष आनंद की अनुभूति होती थी। कभी वे गाँव के पोखर से विषहीन सर्प ढूँढ लाते तो कभी बीजों के अंकुर से बने पौधों का कौतूहल से निरीक्षण करते।

यही कौतूहल आगे चल कर उनकी गवेषणाओं का आधार बना। प्रारंभिक शिक्षा के लिए उन्हें फरीदपुर की पाठशाला में भर्ती कराया गया। इस पाठशाला में वे पाँच वर्ष तक पढ़े। अध्यापकों ने छात्र की कुशाग्र बुद्धि का परिचय पाया और उनसे असीम स्नेह रखने लगे।

सन् 1869 में उनके पिता का बर्दवान में स्थानांतरण हो गया। उन्हें असिस्टेंट कमिश्नर बना दिया गया था। इस स्थानांतरण के कारण जगदीश को अपना स्कूल बदलना पड़ा। कलकत्ता के सेंट जेवियर स्कूल में अंग्रेजी ही पढ़ाई का माध्यम थी जबकि अब तक जगदीश ने बंगला माध्यम से शिक्षा ग्रहण की थी।

एकांत प्रेमी जगदीश को चिढ़ाने में अन्य छात्रों को विशेष रूप से आनंद आता था। कुछ दिन तो वे सहन करते रहे परंतु एक दिन एक बच्चे की पिटाई लगा दी जिससे अन्य छात्रों ने अपनी शरारतें स्वयं ही छोड़ दीं ।

छात्रावास के कोने में जगदीश के हाथों का बगीचा दर्शनीय था। ट्यूबवैल की धारा के ऊपर एक पुल बनाया गया था। छोटे-छोटे फूलों वाले पौधों के समीप ही पालतू जानवरों के पिंजरे थे जिनमें खरगोश व कबूतर रहते थे। जगदीश अपने जेब खर्च से पैसे बचा कर इस शौक की पूर्ति करते थे।

अन्य छात्र पीठ पीछे उनकी खिल्ली उड़ाते परंतु उन्हें भी जगदीश के बगीचे की सैर व पालतू पशुओं से खेलने में मजा आता था। जगदीश ने शीघ्र ही अंग्रेजी भाषा के ज्ञान की कमी को पूरा कर लिया और अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुए।

कलकत्ता के सेंट जेवियर कॉलेज में भौतिकी को उन्होंने अध्ययन का विषय चुना। विज्ञान विषय लेकर बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् उन्हें विदेश भेजने का प्रबंध किया जाने लगा। पिता की हार्दिक इच्छा थी कि पुत्र लोक सेवा कर सके अतः वे उन्हें कोई सरकारी अधिकारी बनाने के हक में न थे। उन्हीं दिनों जगदीश असम गए और कालाज़ार ज्वर से पीड़ित हो गए।

उनकी उच्च शिक्षा के मार्ग में धन की कमी एक बहुत बड़ी बाधा थी। पिता का रुपया कपड़ा मिल में डूब गया था अतः माता जी ने पुत्र की शिक्षा के लिए अपने आभूषण बेच दिए व रुपयों का प्रबंध किया।

लंदन के लिए प्रस्थान करते समय भी जगदीश की तबीयत ठीक नहीं थी अतः उन्हें समुद्री यात्रा में बहुत कष्ट हुआ। सन् 1880 में ये लंदन विश्वविद्यालय में भरती हुए। वहाँ उन्होंने भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, जीव विज्ञान व वनस्पति विज्ञान पढ़ना आरंभ किया और अच्छे अंक पाए परंतु दूसरे ही वर्ष उन्होंने चिकित्सा छात्र का अध्ययन छोड़ना पड़ा क्योंकि प्रयोगशाला की दुर्गंध से उन्हें बुखार हो जाता था।

संभवतः ईश्वर की इच्छा कुछ और ही थी। सन् 1884 में उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से बी.ए. आनर्स तथा लंदन विश्वविद्यालय से बी.एस.सी. की परीक्षा पास की। उनकी योग्यता से प्रभावित होकर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने डी.एस.सी. की उपाधि प्रदान की।

विदेश शिक्षा के दौरान उन्हें अनेक विख्यात वैज्ञानिकों के साथ काम करने का अवसर मिला। वे उन्हें अपने साथ अनुसंधान कार्य में शामिल करना चाहते थे परंतु परिवार की आर्थिक स्थिति व पिता की बिगड़ती हालत ने जगदीश को लौटने पर विवश कर दिया।

उन दिनों हमारे देश में प्रतिभाओं के समुचित विकास की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। भारतीयों को अपने से दोयम मानने वाली अंग्रेज सरकार किसी भी कीमत पर भारतीय प्रतिभाओं को ऊँचा उठने नहीं देना चाहती थी।

इसका ज्वलंत उदहारण आचार्य बसु ही हैं। उन्हें एक अस्थायी पद की प्राप्ति के लिए जाने कितने पापड़ बेलने पड़े। फिर वेतन व स्वाभिमान की उस लड़ाई के विषय में भी आप जान ही चुके हैं।

उनका संबंध अगले तीस वर्षों तक प्रेसीडेंसी कॉलेज से रहा। जब तीन वर्ष पश्चात् शिक्षा विभाग ने उनका पूरा वेतन एक साथ दिया तो प्रत्येक व्यक्ति उनके जीवट की प्रशंसा कर उठा।

श्री दुर्गा मोहन दास नामक सज्जन, भगवान चंद्र जी के मित्र थे, उन्होंने जगदीश को अपना दामाद बनाने का प्रस्ताव रखा जिसे तत्काल स्वीकार कर लिया गया। मोहन दास जी की पुत्री अबला, मद्रास के मेडीकल कॉलेज की छात्रा थीं। सन् 1887 में जगदीश चंद्र व अबला देवी विवाह बंधन में बंध गए।

इन दोनों का वैवाहिक जीवन मधुर व सुखदायक रहा। बस, संतान सुख उनके भाग्य में न बदा था। उनके यहाँ एक ही संतान हुई जो अल्पायु में ही मर गई। किसी भी सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे किसी नारी का सहयोग अवश्य रहता है। अबला देवी ने भी पति को ऐसा ही सहयोग दिया। जीवन में अनेक अवसर ऐसे भी आए जब आचार्य बसु निराश हो उठे परंतु अबला देवी ने सदा पति को अपने आशापूर्ण वचनों द्वारा प्रोत्साहित किया।

अबला देवी सार्वजनिक कार्यों में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेतीं। विद्या सागर वाणी भवन व नारी शिक्षा समिति नामक संस्थाओं की स्थापना उन्हीं के द्वारा हुई।

आचार्य जगदीश चंद्र बसु अपने अध्यापन कार्य से संतुष्ट थे परंतु अनुसंधान कार्य रने की बलवती इच्छा को रोक पाना उनके लिए कठिन था। कॉलेज में नाम मात्र के लिए भी कोई प्रयोगशाला नहीं थी। तब उन्होंने निजी प्रयत्नों द्वारा कॉलेज में प्रयोगशाला खुलवाई तथा अध्यापन से बचे समय को प्रयोगों में व्यतीत करने लगे।

भौतिकी के क्षेत्र में उनका योगदान अप्रतिम है। उन्होंने विद्युत लहरों के संबंध में महत्त्वपूर्ण गवेशणाएं कीं। विद्युत-चुंबकीय तरंगों के ध्रुवीकरण की खोज भी उल्लेखनीय रही। सन् 1895 ई. में कलकत्ता के टाऊन हॉल में उन्होंने बंगाल के गवर्नर की उपस्थिति में अपने प्रयोग द्वारा सिद्ध कर दिया कि विद्युत चुंबकीय तरंगों को एक निश्चित स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जा सकता है।

इसके लिए उन्होंने करीब बीस फीट ऊँचा खंभा गाड़ा जिस पर गोलाकार धातु की तश्तरी (प्लेट) लगी थी। इस प्लेट को उन्होंने रेडिएटर से जोड़ दिया। करीब 75 फीट की दूरी पर ऐसी ही एक प्लेट थी जिसे रिसीवर से जोड़ा गया था। रेडिएटर से आचार्य बसु ने विद्युत चुंबकीय तरंगें भेजीं जो तीन दीवारें पार कर रिसीवर तक पहुँची जिससे विद्युतीय घंटी बजी व एक पिस्तौल भी दागी गई।

इसके पश्चात् उन्होंने इन तरंगों को प्रेसीडेंसी कॉलेज से अपने निवास स्थान तक भेजने का प्रयोग आरंभ किया जो कि कॉलेज से करीब एक मील की दूरी पर था। प्रयोग अभी चल ही रहा था कि उन्हें ब्रिटिश एसोसिएशन के लिवरपूल सत्र में भाग लेने का आमंत्रण मिला और प्रयोग पूर्ण नहीं हो पाया।

यूरोप की अनेक पत्रिकाओं में इस प्रयोग का पूरा विवरण छपा व पश्चिमी विद्वान एक भारतीय वैज्ञानिक की प्रतिभा के कायल हो गए। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी बसु को उनके अनुसंधान कार्य में आर्थिक सहायता देना चाहती थी परंतु बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि शिक्षा विभाग ने ही इस प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न कर दी।

स्वाभिमानी बसु अपने किसी भी अधिकार का दुरुपयोग करने के पक्ष में न थे। उनके इस निर्णय ने अनेक उच्चाधिकारियों को उनके विरुद्ध कर दिया और अनेक सुविधाएं मिलते-मिलते रह गई।

बसु लिंवरपूल सत्र में भाग लेने विदेश पहुँचे तो वैज्ञानिक उनके शोधपत्र से बेहद प्रभावित हुए। रॉयल इंस्टीट्यूट के एक भाषण के दौरान उन्होंने अपने यंत्रों का प्रदर्शन किया। पश्चिमवासियों के लिए यह किसी अचंभे से कम न था।

उन्हें हैरानी तो इस बात की थी कि बसु कितनी सहजता से अपने उपकरणों की गोपनीयता को प्रकट कर देते थे। अपने उपकरणों की नकल किए जाने के विषय में वे बिल्कुल उदासीन थे। हालांकि उनके साथ एक बार ऐसा हुआ भी।

एक विदेशी मित्र ने उनके ही एक यंत्र को अपने नाम से पेटेंट करवा लिया परंतु वे सब कुछ भूल कर अनजान बने रहे। अनेक पश्चिमी उद्योगपतियों ने भारी रकम की पेशकश की परंतु बसु विज्ञान को धन प्राप्ति का साधन नहीं मानते थे। उनका मानना था कि वैज्ञानिक के आविष्कार उसकी निजी संपति न होकर समस्त मानवता की धरोहर होते हैं।

सन् 1899 में उनकी विद्युत चुंबकीय तरंगों की खोज के आधार पर मारकोनी ने वायरलैस टेलीग्राफी का आविष्कार किया। यदि बसु अपने उसी प्रयोग पर कुछ दिन और काम करते तो संभवतः बेतार द्वारा संदेश भेजने का श्रेय उन्हें ही मिलता।

बसु ने रेडियो तरंगों के क्षेत्र में भी कार्य किया। सन् 1888 में हर्ट्ज ने विद्युत चुंबकीय तरंगों का अस्तित्व प्रमाणित कर दिया था। बसु ने उनके निष्कर्षों को और भी शुद्ध कर दिया। उनकी प्रारंभिक प्रयोगशाला में ही ऐसे उपकरण बने जिससे आधुनिक विकास का प्रसारण संभव हो सका।

आचार्य बसु ने प्रयोगों द्वारा सिद्ध कर दिया कि छोटी विद्युत-चुंबकीय लहरें भी परावर्तन व वर्तन के गुणों को प्रदर्शित करती हैं। आचार्य बसु यदि भौतिकी के क्षेत्र में ही रहते तो संभवतः अनेक अनुसंधान प्रकाश में जाते परंतु सन् 1898 में वे बायोफिज़िक्स के क्षेत्र में आ गए। यह बात अलग है कि भाग्य ने ही उन्हें भौतिकी के क्षेत्र में गवेषणा का अवसर प्रदान किया। वास्तव में वे जीवशास्त्र की शिक्षा पाना चाहते थे।

प्रकृति प्रेमी बसु का मानना था कि सभी जीव व वनस्पतियों में मल रूप से कोई अंतर नहीं है। हम सृष्टि व प्रकृति के इन गूढ़ तत्वों को समझ नहीं पाते। यदि इस ओर बारीकी से ध्यान दिया जाए तो पता लगेगा कि जीवित व निर्जीव के मध्य सीमा रेखा बहुत अधिक नहीं है।

सन् 1900 में पेरिस में हुए अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन में बसु के विचारों को वैज्ञानिक चकित हो उठे। लंदन के वैज्ञानिकों ने उन्हें अपने साथ काम करने को कहा।

बसु ने गुरुदेव टैगोर को इस विषय में बताया और त्रिपुरा नरेश आर्थिक सहायता देने को तैयार हो गए। उसी सहायता के बल पर उन्होंने लंदन में अपना अनुसंधान कार्य किया। सन् 1902 में उन्होंने एक यंत्र का आविष्कार किया जिसे क्रेस्कोग्राफ (crescograph) के नाम से जाना गया।

यह उपकरण किसी पौधे की वृद्धि की दर को एक करोड़ गुना तीव्र करके दिखाता था। इस यंत्र की सहायता से पौधों के भीतर की वृद्धि को नापना संभव हो गया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मनुष्य की भाँति पौधों में भी भावनाओं के कारण अनेक परिवर्तन आते हैं।

इसके पश्चात् बसु ने बैलेंस्ड क्रैस्कोग्राफ बनाया। अनेक वैज्ञानिकों का मानना था कि बसु अपना समय व्यर्थ कर रहे थे। यदि वह इतना समय भौतिकी के अनुसंधान को देते तो अधिक बेहतर होता परंतु बसु अपने प्रयोगों से विमुख नहीं हुए। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वनस्पतियों व प्राणियों के स्नायविक जीवन में कोई अंतर नहीं होता।

उन्हें भी हमारी तरह सुख-दुख की अनुभूति होती है। वे भी हमारी तरह सोते-जागते हैं। उनके इस अनुसंधान ने विज्ञान को एक नवीन दिशा दी। इससे विज्ञान की एक नई शाखा ‘जैव भौतिकी’ का विकास हुआ। इसमें भौतिक शास्त्र के नियमों के आधार पर जीव जगत का अध्ययन किया जाता है।

विदेश में अनेक स्थानों पर उन्होंने अपने यंत्र का प्रदर्शन किया। कुछ वैज्ञानिक ऐसे भी थे जिन्होंने आचार्य बसु के सिद्धांतों को निर्मूल घोषित करना चाहा परंतु आचार्य बसु ने अपने सिद्धांतों को प्रयोगों द्वारा स्पष्ट कर दिखाया।

सन् 1902 में उन्हें रॉयल सोसायटी ने अपना सम्मानित सदस्य चुना। आचार्य बसु जीवनपर्यंत अनुसंधान कार्यों में जुटे रहे। वैज्ञानिक अनुसंधानों के अलावा भी उनकी रुचि का दायरा बहुत ही विस्तृत था। साहित्य से भी उन्हें गहरा लगाव रहा। उनके अनेक लेख विज्ञान की विख्यात पत्रिकाओं में छपे। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं जिसमें से

Response in the living and the non-living (द रेस्पोंस इन द लिविंग एंड नान-लिविंग), The Nervous Mechanism of plants (द नर्वस मैकेनिज्म ऑफ प्लांटस), द फिजियोलॉजी ऑफ फोटो सिंथेसिस, द फिजियोलॉजी ऑफ द एसेंट ऑफ सैब तथा प्लांट रेस्पौंस (Plant response) आदि प्रमुख हैं।

आचार्य जगदीश चंद्र बसु को नए-नए स्थानों की यात्रा व उनके विषय में ऐतिहासिक जानकारी एकत्र करने का विशेष शौक था। भारत के अधिकांश पर्यटन स्थलों पर वे गए और भारतीय सभ्यता के विषय में अनेक अभिज्ञताएं बटोरीं।

वे सच्चे अर्थों में राष्ट्र प्रेमी थे। कई बार विदेश में उच्च पद का प्रलोभन दिया गया परंतु वे भारत को ही अपनी कर्मस्थली बनाना चाहते थे। देश से बाहर जाकर अपने बल पर देश का नाम ऊँचा कर पाना सरल नहीं होता। एक बार वे पौधे पर विष के प्रभाव का प्रदर्शन कर रहे थे। भरी सभा में उन्होंने कहा

“यदि मुझे पोटाशियम साइनाइड प्रयोगार्थ दिया जाए तो मैं प्रयोग को सिद्ध कर सकता हूँ।” अपने उसी समय दवा विक्रेता से पोटाशियम मंगवाया गया। जाने असावधानीवश अथवा किसी कुमंत्रणा के वशीभूत होकर दवा विक्रेता ने विष के स्थान पर चीनी भिजवा दी। उसके प्रभाव से पौधा मुरझाने के स्थान पर और भी चुस्त-दुरुस्त दिखने लगा। बसु एक पल में सारी घटना को भाँप गए। उन्हें अपने सिद्धांतों पर पूर्ण विश्वास था।

विदेशी वैज्ञानिकों को भारत को हीन कहने का सुअवसर मिल गया था परंतु आचार्य बसु ने दृढ़ शब्दों में कहा “यदि चीनी के स्थान पर विष दिया जाता तो अवश्य ही पौधे पर उसका प्रभाव पड़ता।”

यह सुनकर सभा पहले तो शांत हो रही फिर सबने एक स्वर में बसु की प्रशंसा की। स्वयं भारत सरकार ने उन्हें कई बार विदेश भेजा ताकि वे अपने अनुसंधानों को विज्ञान जगत से परिचित करवा सकें । पद मुक्ति के पश्चात् भी उन्हें सरकार द्वारा पूरा वेतन मिलता रहा।

पदनिवृत्ति के पश्चात् सन् 1917 में ‘बसु अनुसंधान संस्थान की स्थापना की। यह संस्थान त्रिपुरा, बड़ौदा, पटियाला नरेशों द्वारा दी गई आर्थिक सहायता के बल पर बन कर तैयार हुआ। इस भवन में एक स्थान पर अंकित है

“यह मंदिर भारत के लिए गौरव प्राप्त करने तथा संसार को सुख प्रदान करने हेतु परमेश्वर के चरणों में समर्पित है।” लगभग ग्यारह लाख की लागत से बने इस भवन में विशाल पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं व भाषण कक्ष आदि बनाए गए। आचार्य बसु को इसका संस्थापक-निदेशक चुना गया। उनके नेतृत्व में संस्थान ने बहुत प्रगति की।

उन्होंने अपने जीवन के अंतिम भाग में निजी संपत्ति का अधिकांश भाग सार्वजनिक कार्यों के लिए लगा दिया। उनके द्वारा स्थापित प्रयोगशालाओं से अनेक बहुमुखी प्रतिभा के छात्र लाभान्वित हुए और देश की सेवा में तत्पर हो सके।

अपनी जीवित अवस्था में बसु को अनेक उच्चतम सम्मानों द्वारा सम्मानित किया गया। 23 नवम्बर, सन् 1837 में उनका देहांत हो गया। आज भी उनकी वैज्ञानिक गवेषणाएं वैज्ञानिकों के लिए पथ-प्रदर्शन करती जा रही हैं।

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