जवाहरलाल नेहरू का जीवन परिचय? जवाहरलाल नेहरू कौन थे?

जवाहरलाल नेहरू का जीवन परिचय (Jawaharlal Nehru Ka Jeevan Parichay), जवाहरलाल का जन्म 14 नवंबर 1989 ई. में इलाहाबाद में हुआ था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी और स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू विश्व स्तर के राजनेता थे।

जवाहरलाल नेहरू का जीवन परिचय (Jawaharlal Nehru Ka Jeevan Parichay)

जवाहरलाल नेहरू का जीवन परिचय

यह भी पढ़े – सुभाष चन्द्र बोस का जीवन परिचय?

जवाहरलाल नेहरू का जीवन परिचय (Jawaharlal Nehru Ka Jeevan Parichay)

उन्होंने विदेशी शासन शोषित पीड़ित और निराश्रय की दशा देश को स्वावलंबी तथा गौरवशाली बनाने लिए अथक प्रयास भारतीय जनता से उन्हें अपार स्नेह-श्रद्धा प्राप्त हुआ। उन्होंने भारत को आधुनिक वैज्ञानिक संसाधनों संपन्न किया और देश नवनिर्माण को गतिशील किया। उन्होंने नियोजित आर्थिक व्यवस्था लागू किया।

प्रकार के सभी राज्यों विकास संतुलित रूप होने लगा। विश्व शांति के समर्थक थे। इसीलिए उन्होंने विश्व दोनों गुटों-रूस और अमेरिका अलग एक तीसरे गुट निर्माण किया, जिसे निरपेक्ष पक्ष’ रूप मान्यता राजनीतिज्ञ के साथ ही नेहरूजी उच्चकोटि लेखक थे। दो कृतियां ‘पिता पत्र पुत्री नाम’ और ‘भारत खोज’ (डिस्कवरी ऑफ अत्यधिक लोकप्रिय हैं। निस्संदेह जवाहरलाल नेहरू थे।

पं. जवाहरलाल नेहरू का जन्म

जवाहरलाल का जन्म नवंबर 1989 ई. में इलाहाबाद में हुआ। इनके पिता पं. मोतीलाल इलाहाबाद प्रसिद्ध वकील उन्होंने वकालत अकूत कमाया था। पाश्चात्य वेश-भूषा और संस्कृति के पक्षधर संपन्नता विलासिता व्यतीत करते राजनीति उनका संबंध तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल विदेशी सत्ता लाभ प्राप्त करने तक ही था।

परिवार बालक जवाहरलाल का लालन-पालन अत्यधिक लाड-प्यार हुआ। भारतीयों दुःख, दरिद्रता और विपन्नता का इस बालक तक शासन भारत समान और आत्मा का किस सीमा तक दलन कर रहा इसकी गंध जवाहरलाल को नहीं थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर अंग्रेजी में हुई। 15 वर्ष की उम्र में उन्हें उच्च शिक्षा लिए इंग्लैंड भेजा गया।

लंदन के हैरो कैम्ब्रिज ट्रिनिटी कॉलेज उन्होंने अध्ययन किया। सन् 1912 ई. में बैरिस्ट्री की डिग्री लेकर जवाहर लाल भारत लौटे। उस समय वे पूरी तरह अंग्रेजी संस्कृति से प्रभावित थे। जवाहरलाल ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की।

कुछ समय में उनकी वकालत चल निकली। इसी समय अफ्रीका में गांधी जी का सत्याग्रह का अहिंसात्मक आंदोलन शक्तिशाली अंग्रेजों के शासन द्वारा अफ्रीकियों पर किए जा रहे उत्पीड़न को रोकने में सफल हुआ। जवाहरलाल जी पर गांधी जी के इस कार्य का ग्रहरा प्रभाव पड़ा। उन्हें भारत की परतंत्रता खलने लगी।

होम रूल लीग की सदस्यता

उस समय श्रीमती एनी बेसेंट का देश पर गहरा प्रभाव था। जवाहरलाल ने श्रीमती बेसेंट द्वारा स्थापित ‘होम रूल लीग की सदस्यता ग्रहण कर ली। किंतु वे एक ऐसा मंच चाहते थे, जो देश को विदेशी शासन से मुक्त करने में प्रभावी हो। इसी मानसिकता में वे सन् 1916 ई० में गांधीजी के संपर्क में आए। फिर उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन शुरू हुआ।

विदेशी वातावरण और विलासमय जीवन में पले हुए जवाहरलाल जी दूसरे ही व्यक्ति हो गए। उनके पिता पं. मोतीलाल नेहरू अपने एकमात्र पुत्र को विलासिता के बंधन में बांध रखने के लिए उनका विवाह कर दिया। दो वर्ष बाद जवाहरलाल की पत्नी कमला नेहरू ने एक पुत्री को जन्म दिया।

वही पुत्री इंदिरा गांधी के नाम से आगे चलकर भारत की प्रधानमंत्री बनी। जवाहरलाल ने सादगी का जीवन अपनाया फिर उनके पिता पं. मोतीलाल नेहरू ने भी अपनी जीवन शैली में परिवर्तन किया। इसके बाद पिता-पुत्र दोनों स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।

पाश्चात्य रंग-ढंग में डूबा हुआ नेहरू परिवार भारतीय आकांक्षा और भारतीयता का प्रतीक बन गया। सन् 1918 में जवाहरलाल अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य चुने गए। यहीं से उन्होंने अपने जीवन को देश की उत्पीड़ित और दलित जनता के उद्धार में समर्पित कर दिया।

किसान आंदोलन

उत्तर प्रदेश में अवध के किसानों की दुर्दशा की कथा जवाहर लाल के कानों तक पहुंची। उस क्षेत्र में वहां के नवाबों और ताल्लुकेदारों के जुल्म से किसान पशुओं से भी बदतर जीवन बिता रहा था। किसानों ने आंदोलन शुरू किया।

जवाहरलाल ने उस आंदोलन का नेतृत्व संभाला। वे गांव-गांव में रोते-कलपते किसानों की दुःखगाथा सुनते और स्वयं आंसू बहाते हुए आंदोलन को धारदार बनाने में लगे रहे। उन्हें जेल की सजा हुई। कारागार से मुक्त होने पर फिर उन्होंने किसानों को संगठित कर आंदोलन शुरू किया। अंततः किसानों की मांगें स्वीकार की गई। इस सफलता से जवाहरलाल को भारी यश मिला।

स्वतंत्रता संग्राम में जवाहरलाल की सक्रियता दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने गांधी जी द्वारा चलाए गए सभी आंदोलनों में भाग लिया और अनेक बार कारावास का दंड भोगा। उन्होंने सन् 1928 में कलकत्ता कांग्रेस की अध्यक्षता कर रहे अपने पिता पं. मोतीलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत ‘नेहरू कमेटी के सुझाओं का विरोध किया और ‘इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया लीग’ की स्थापना कर पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की।

सन् 1929 ई. में जब जवाहरलाल कांग्रेस के अध्यक्ष हुए, तो उन्हीं की अध्यक्षता में 31 दिसंबर को ब्रिटिश सरकार से संबंध-विच्छेद कर पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया। 1930 में गांधी जी द्वारा चलाए गए नमक सत्याग्रह में नेहरूजी ने सक्रिय भाग लिया और जेल की सजा पाई।

पुनः कलकत्ता में उनके भाषण को राजद्रोहात्मक मानकर उन्हें दो वर्ष की जेल की सजा दी गई। सन् 1942 में ‘भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने पर अन्य नेताओं के साथ नेहरूजी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश सरकार ने 42 के आंदोलन को बुरी तरह कुचल दिया। जनता को अनेक प्रकार से दंडित किया गया। 15 जून 1945 को नेहरूजी जेल से मुक्त हुए। उन्होंने पूरे देश का दौरा किया और जनता में आशा का नव संचार किया।

स्वतंत्रता संग्राम के प्रति समर्पण और गांधी जी के संस्पर्श ने जवाहरलाल को देश के अग्रणी नेता के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। गांधी जी के नेतृत्व में उन्होंने राष्ट्रीय कांग्रेस का योग्यतापूर्वक संचालन किया। वे अंत तक गांधी जी के अनुयायी बने रहे। गांधीजी उन्हें अपना उत्तराधिकारी मानते थे। उन्होंने एक अवसर पर कहा भी था, ‘जवाहरलाल मेरा उत्तराधिकारी होगा। मैं इतना जानता हूं कि जब मैं नहीं रहूंगा, तो वह मेरी भाषा बोलेगा।

गांधी जी के प्रभाव से नेहरूजी में नैतिक मूल्यों के प्रति अटल निष्ठा, ऊंचे आदर्शों के प्रति उन्मुखता, साधन और साध्य की पवित्रता में विश्वास, सत्य और न्याय के पथ पर अडिग भाव से बढ़ने की प्रवृत्ति, अहिंसा में बेबाक आस्था, दीन-दुखियों की सेवा का व्रत आदि गुणों का विकास हुआ। इन्हीं गुणों के कारण नेहरूजी जनता में बेताज बादशाह बन गए।

ब्रिटिश सरकार सत्ता हस्तांतरण वार्ता

सन् 1942 के जनान्दोलन से ब्रिटिश सरकार को बोध हो गया कि भारत को अब गुलाम बनाए रखना संभव नहीं है। अतः उसने सत्ता हस्तांतरण के लिए भारतीय नेताओं से वार्ता शुरू की। 2 सितंबर 1946 को केंद्र में अंतरिम सरकार गठित हुई और जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। ब्रिटिश सरकार ने मुसलिम लीग की मांग को मानकर देश का बंटवारा कर दिया। भारत और पाकिस्तान दो देश बन गए।

15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों द्वारा सत्ता हस्तांतरण किए जाने पर स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री का पद जवाहरलाल नेहरू ने संभाला। तब से मृत्युपर्यन्त वे भारतीय गणतंत्र के प्रधानमंत्री बने रहे। उन्हीं के प्रधानमंत्रित्व काल में भारतीय संविधान का निर्माण हुआ और उसे 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया।

बालिग मताधिकार के आधार पर निर्वाचन होने लगे। सन् 1952, 1957, 1962 के आम निर्वाचनों में कांग्रेस विजयी होती रही और हर बार पं. जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बनते रहे। यह उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद ही बंटवारे से उत्पन्न सांप्रदायिक दंगों ने देश को क्षत-विक्षत कर दिया। यहां तक कि भारत ने अपने राष्ट्रपिता को भी गंवाया। फिर भी जवाहरलाल नेहरू ने अविचल भाव से देश के पुननिर्माण का कार्य आरंभ किया।

उन्हीं के नेतृत्व में सरदार बल्लभ भाई पटेल देशी रियासतों का भारतीय गणतंत्र में विलय संपन्न कर राष्ट्रीय एकता को पुष्ट किया। एक राष्ट्र, एक पताका, एक केंद्रीय शासन पद्धति और एक भाषा का लोकतंत्रात्मक आदर्श लेकर नेहरू जी ने प्रशासन को गतिमान किया। उन्हें गांधी जी की शिक्षा स्मरण थी कि भारत का स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं है।

देश की कोटि-कोटि जनता को आर्थिक और सामाजिक स्वाधीनता भी प्राप्त होनी चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नेहरू जी ने नियोजित आर्थिक और सामाजिक विकास का मार्ग अपनाया। देश में पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ हुआ और देश विकास के सोपानों को पार करता हुआ गतिशील हुआ।

नेहरूजी सतत प्रयत्नशील रहे कि भारत का प्रत्येक नागरिक प्रत्येक दृष्टि से स्वतंत्र, समान अधिकारों का अधिकारी और मातृभूमि की स्वतंत्रता में समान रूप से हिस्सेदार बनकर जीवन यापन करे। भारत की समृद्धि के लिए नेहरू जी वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नई प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल जरूरी मानते थे। इसीलिए उन्होंने बड़े उद्योगों की स्थापना को गति दिया।

उन्होंने विद्युत् उत्पादन के महत्त्व को समझा था, अतः परमाणु विद्युत् गृहों का निर्माण शुरू किया। बड़े-बड़े बांधों का निर्माण कराया और उनसे सिंचाई तथा विद्युत् उत्पादन शुरू कराया। कृषिकार्य में वैज्ञानिक उपकरणों और उर्वरकों का प्रयोग शुरू कराया।

लघु उद्योगों में मशीनों को नियोजित कर उनके उत्पादन में भारी वृद्धि की। नेहरूजी की चिंता भारत को विकसित और आधुनिक बनाने की थी। उस दिशा में वे पर्याप्त सफल रहे और आज उसी मार्ग पर चलकर भारत विकासशील देशों में अग्रणी हो गया है।

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में नेहरूजी शांति, सहयोग और मानवता के समर्थक थे। इसी दृष्टि से उन्होंने 1947 में समस्त एशियाई देशों का सम्मेलन आयोजित किया। सन् 1954 में उन्होंने पंचशील के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसके अंतर्गत अग्रलिखित पांच सूत्र थे-

  1. एक-दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना।
  2. एक-दूसरे के विरुद्ध आक्रामक कार्रवाई न करना।
  3. एक-दूसरे के आंतरिक विषयों में हस्तक्षेप न करना।
  4. समानता और परस्पर लाभ की नीति का पालन करना।
  5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति में विश्वास रखना।

पंचशील पर सन् 1954 में भारत-चीन ने सर्वप्रथम समझौता किया। बाद में हिंदेशिया, युगोस्लाविया, पोलैंड आदि देशों ने भी पंचशील पर हस्ताक्षर किए। सन् 1955 ई. में ऐतिहासिक बान्दुंग सम्मेलन में एशिया और अफ्रीका के 29 देशों ने विश्व शांति के लिए जो 10 सूत्री घोषणा पत्र स्वीकार किया, उसमें पंचशील को भी सम्मिलित किया गया।

इस प्रकार नेहरू जी विश्व शांति के मसीहा के रूप में मान्य हो गए। इसके अतिरिक्त उन्होंने अफ्रीकी देशों के स्वाधीनता आंदोलन को समर्थन प्रदान किया। उन्होंने रूस और अमेरिका के मध्य चल रहे शीतयुद्ध से विकासशील देशों को बचाने के लिए एक संगठन के निर्माण में योगदान किया। इसी का प्रतिफलन तटस्थ राष्ट्रों के संगठन के रूप में हुआ।

विश्व के स्तर पर इस तीसरी शक्ति ने अनेक अवसरों पर विश्व शांति के लिए उल्लेखनीय कार्य किए। उन्होंने राष्ट्रसंघ में विश्व से युद्धास्त्रों की होड़ समाप्त करने और दुनिया को परमाणु बम से मुक्त करने का आह्वान किया।पं. जवाहरलाल नेहरू केवल राजनेता ही नहीं थे। वे सुविचारपूर्ण तेजस्वी वक्ता भी थे।

उनमें जनता के साथ ही बुद्धिवादियों को भी प्रभावित करने की क्षमता थी। सामान्य जनता तो उन्हें इतना अधिक प्यार करती थी कि वह उनको देखने और सुनने को लालायित रहती थी। गांधी युग का कोई अन्य राजनेता उनके समान लोकप्रिय नहीं हुआ। उनको बच्चों से आंतरिक लगाव था। बच्चों के बीच वे अत्यंत लोकप्रिय थे।

बच्चे उन्हें प्यार से ‘चाचा’ कहते थे। उनके बच्चों के प्रति स्नेह के कारण ही उनका जन्मदिन प्रतिवर्ष ‘बालदिवस’ के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने अपने चिंतन को लिपिबद्ध किया है और वे ‘पिता का पत्र पुत्री के नाम’ तथा ‘भारत’ की खोज’ नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित हैं। दोनों ग्रंथों के कई संस्करण छप चुके हैं। आधुनिकता के पक्षधर नेहरू जी ने भारत की खोज में भारत के अतीत को पूरी हार्दिकता के साथ प्रस्तुत किया है। स्पष्टतः पं. नेहरू उच्चकोटि के चिंतक और लेखक थे।

सन् 1954 में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई भारत यात्रा पर आए और उनकी यात्रा की समाप्ति पर जो संयुक्त विज्ञप्ति प्रकाशित हुई, उसमें घोषणा हुई कि दोनों देश पंचशील का पालन करेंगे। इससे नेहरू जी निश्चिंत हो गए कि चीन भारत के प्रति आक्रामक रुख नहीं अपनाएगा।

किंतु चीन ने सन् 1962 में अचानक भारत पर आक्रमण कर दिया और भारत के एक भू-भाग को अपने कब्जे में कर लिया। युद्ध के लिए अप्रस्तुत भारत का मान-मर्दन हुआ। इस युद्ध का पं. नेहरू के मन पर गहरा आघात लगा। वे चीन द्वारा किए गए विश्वासघात से मर्माहत हो उठे।

फलतः उनका स्वास्थ्य गिरने लगा और अंततः 27 मई 1964 को उनका देहांत हो गया। विश्व ने उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दी। भारतीय जन-मानस क्रंदन कर उठा। भारत के नव-निर्माण को गतिशील बनानेवाला, मानवता का सजग प्रहरी, विश्वशांति का शिल्पी और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का उत्तराधिकारी दिवंगत हो गया। फिर भी पं. जवाहरलाल नेहरू अपने श्रेष्ठ विचारों और जनसेवा के कार्यों के माध्यम से इस देश को प्रेरणा देते रहेंगे। जवाहरलाल नेहरू का जीवन परिचय के बारे में जान गए होंगे।

यह भी पढ़े –

Leave a Reply

Your email address will not be published.