काकोरी कांड कब और कहां हुआ? काकोरी कांड में कौन कौन से क्रांतिकारी शामिल थे?


काकोरी कांड कब और कहां हुआ (Kakori Kand Kab Or Kaha Hua), काकोरी की ट्रेन डकैती की घटना, स्वतंत्रता के क्रान्तिकारी आंदोलन के इतिहास में कुछ घटनाएं अपना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। उन घटनाओं में काकोरी की ट्रेन डकैती सदा स्मरण की जायेगी। जब भी क्रान्तिकारी आन्दोलनों का इतिहास लिखा जायेगा, उस घटना का वर्णन बड़ी ही रुचि और तन्मयता के साथ किया जायेगा; क्योंकि उस घटना में क्रान्तिकारियों के अपूर्व त्याग और साहस का चित्र देखने को मिलता है। काकोरी कांड की घटना 1925 ई० की 9 अगस्त के दिन घटी थी।

काकोरी कांड कब और कहां हुआ (Kakori Kand Kab Or Kaha Hua)

काकोरी कांड कब और कहां हुआ

काकोरी कांड कब और कहां हुआ (Kakori Kand Kab Or Kaha Hua)

काकोरी की ट्रेन डकैती की घटना 1925 ई० की 9 अगस्त के दिन घटी थी। ट्रेन डकैती के अभियोग में पचासों क्रान्तिकारी बन्दी बनाये गये थे। उनमें से कुछ को फांसी की, कुछ को कालेपानी की और कुछ को जेल की सजा दी गई थीं। प्रमाण न मिलने के कारण कुछ छोड़ भी दिये गये थे। यहां हम दो ऐसे वीर और साहसी क्रान्तिकारियों के जीवन पर प्रकाश डालेंगे,

जिन्होंने काकोरी की ट्रेन डकैती में बड़ी साहसिकता दिखाई थी और जिन्हें कारागार की सजाएं सुनाई गई थीं। उन वीर और साहसी क्रान्तिकारियों में एक तो थे सुरेश भट्टाचार्य और दूसरे थे रामदुलारे त्रिवेदी। वे दोनों ही क्रान्तिकारी कानपुर के निवासी थे। सुरेश भट्टाचार्य क्रान्ति के पुजारी थे। उन्होंने आजीवन स्वतंत्रता के लिए ही साधना की।

उनका घर क्रान्तिकारियों का अड्डा था। शचीन्द्रनाथ सान्याल, शचीन्द्रनाथ बख्शी, बटुकेश्वर दत्त और योगेश चटर्जी आदि क्रान्तिकारी उनके घर पर इकट्ठे होते थे और क्रान्ति के लिए योजनाएं बनाया करते थे। स्वर्गीय महान देशभक्त गणेशशंकर विद्यार्थी उनका बड़ा सम्मान करते थे और उनकी सहायता भी करते थे।

सुरेश भट्टाचार्य का जन्म 1897 ई० की। अगस्त को काशी में हुआ था। उनके पिता का नाम ईश्वरचन्द्र भट्टाचार्य था। उनकी शिक्षा-दीक्षा काशी में ही हुई थी। उन्होंने बंगाली टोला के हाई स्कूल और हिन्दू कालेज में शिक्षा प्राप्त की थी।

सुरेश भट्टाचार्य जिन दिनों हाई स्कूल में पढ़ते थे, उन्हीं दिनों वे क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आये। क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आने पर वे गुप्त रूप से ऐसे काम करने लगे, जो सरकार की दृष्टि में शासन के विरुद्ध थे।

कहा जाता है कि उन्होंने उन्हीं दिनों छोटी-मोटी कई डकैतियों में भी भाग लिया था। फलस्वरूप सुरेश भट्टाचार्य 1915 ई० में गिरफ्तार कर लिये गये। उन्हें बिना सजा दिये उरई के कारागार में बन्द कर दिया गया। कारागार में उन्हें बड़ी-बड़ी यंत्रणाएं दी गईं। उन्होंने बड़े साहस के साथ उन यंत्रणाओं को सहन किया।

यद्यपि उनकी अवस्था कम थी, किन्तु उनमें साहस अपूर्व था। चार वर्ष की नजरबन्दी के पश्चात् सुरेश भट्टाचार्य जब कारागार से निकले तो पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रविष्ट हुए। उन्होंने सर्वप्रथम ‘उत्साह’ का सम्पादन किया। उसके पश्चात् उन्होंने कानपुर के ‘प्रताप’ और ‘वर्तमान में सहायक सम्पादक के रूप में काम किया।

कानपुर में सुरेश जी को स्वर्गीय गणेशशंकर विद्यार्थी से बड़ी प्रेरणा मिली। कानपुर में उनका घर क्रान्तिकारियों का अड्डा बना रहता था। राजेन्द्रनाथ सान्याल, रामदुलारे त्रिवेदी, बटुकेश्वर दत्त और विजयकुमार सिन्हा आदि क्रान्तिकारी उनके घर पर ही इकट्ठे होते थे, आपस में एक-दूसरे से मिलते थे और ब्रिटिश शासन को नष्ट करने के लिए योजनाएं बनाया करते थे।

1925 ई० में काकोरी ट्रेन डकैती में सुरेश जी ने भी भाग लिया था। कहा जाता है कि बिस्मिल जी जब सूची बनाने लगे थे, तो उन्होंने बड़े प्रेम से सुरेश जी का नाम अपनी सूची में सम्मिलित किया था। अपने अन्यान्य साथियों के साथ सुरेश जी भी गिरफ्तार किये गये। दो वर्ष तक मामला विचाराधीन रहा। जब मुकद्दमा चला, उन्हें 10 वर्ष की कठोर सजा दी गई।

इस प्रकार सुरेश जी 12 वर्ष तक लगातार जेल में ही रहे। 1937 ई० में जब जेल से बाहर निकले, तो पुनः ‘प्रताप’ में काम करने लगे। ‘प्रताप’ में काम करते भी वे बराबर देश-सेवा के कार्यों में लगे रहते थे। वे साहित्य और कला-प्रेमी भी थे। संगीत के प्रति भी उनकी रुचि थी।

सुरेश भट्टाचार्य जीवन के अन्तिम दिनों में अत्यधिक शान्तिमय जीवन के पक्षपाती हो गये। कानपुर की धरती की गोद में ही उन्होंने अपनी सांसें तोड़ दीं। उनका अन्तिम जीवन कष्ट का जीवन था किन्तु वे एक वीर की तरह सदा चलते रहे।

रामदुलारे त्रिवेदी भी वीर और साहसी क्रान्तिकारी थे। उत्तर प्रदेश के क्रान्तिकारियों में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान था। जब भी उत्तरप्रदेश के क्रान्तिकारियों की चर्चा की जायेगी, त्रिवेदी जी का नाम बड़े गौरव के साथ लिया जायेगा।

त्रिवेदी जी का जन्म 1902 ई० में हुआ था। वे 17 वर्षों तक बम्बई में रहे। बम्बई में ही उनका बाल्यकाल व्यतीत हुआ और बम्बई में ही उनकी शिक्षा-दीक्षा भी हुई। त्रिवेदी जी 1919 ई० में कानपुर में जाकर रहने लगे। सर्वप्रथम उन्होंने सेवा समिति के सदस्य के रूप में जनता की सेवा की।

1921 ई० में जब असहयोग आन्दोलन चला, तो उन्होंने भी उसमें भाग लिया था। उन्हें जेल की सजा भी मिली। जेल में ही त्रिवेदी जी का परिचय ऐसे देश-भक्तों से हुआ, जो अहिंसा में नहीं, हिंसा में विश्वास करते थे।

उनमें दुबलिश जी मुख्य थे। त्रिवेदी जी जब जेल से छूटे, तो शचीन्द्रनाथ सान्याल की प्रेरणा से क्रान्तिकारी दल में सम्मिलित हो गये। सान्याल उन दिनों उत्तर प्रदेश में क्रान्तिकारियों को संगठित कर रहे थे।

1925 ई० की काकोरी की ट्रेन डकैती में त्रिवेदी जी ने भाग लिया था। वे भी गिरफ्तार किये गये थे और उन पर भी मुकद्दमा चलाया गया था। उन्हें पांच वर्ष की कठोर कैद की सजा दी गई थी। त्रिवेदी जी जब जेल से निकले, तो गांधीजी के आन्दोलनों में भाग लेने लगे। 1947 ई० तक वे पांच-छ: बार जेल गये। स्वतंत्रता के पश्चात् वे मजदूरों के संगठन में लग गये थे। उनका अन्तिम जीवन इसी कार्य में व्यतीत हुआ। वे महान् साहसी, महान् त्यागी और महान् देशप्रेमी थे। उनकी सेवाओं ने उन्हें अमर बना दिया है।

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