कला की परख – सुंदर और सजीव चित्र बनाने वाले चित्रकार की कहानी

कला की परख: किसी नगर में एक चित्रकार रहता था। ब्रश व रंगों की सहायता से वह तरह-तरह के चित्र बनाता था। उसके चित्र इतने सुंदर और सजीव होते कि देखते ही बनते थे। पर अफसोस की बात थी, नगर में उसकी कला की कोई कद्र नहीं करता था। चित्रकार के बनाए हुए चित्र लोग बहुत सस्ते मूल्य पर भी खरीदने को तैयार नहीं होते थे। इसी कारण चित्रकार को रोटियों के लाले पड़े रहते थे।

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कला की परख

कला की परख

चित्रकार ने सोचा-‘ऐसी कला से क्या लाभ, जो पेट भरने के लिए रोटी भी न दे सके! अब मैं चित्र बनाना छोड़कर कोई छोटा-मोटा व्यापार या नौकरी ही कर लूंगा। ‘कम-से-कम दो वक्त की रोटी तो ठीक से नसीब होगी। यह निश्चय करके वह सो गया। उस रात भी उसने कुछ नहीं खाया।

देवदूतों ने स्वर्ग में जाकर कला की देवी को चित्रकार को हालत बताई और उसका निश्चय भी सुनाया। देवी सोचने लगी- ‘अगर ऐसा ही होता रहा, तो धीरे-धीरे दुनिया के सभी कलाकर अपनी कला छोड़कर व्यापार करने लगेंगे। इस तरह दुनिया से कला खत्म ही हो जाएगी। कला नहीं रहेगी, तो मुझे भी कौन पूजेगा! कुछ करना चाहिए। ‘

सुबह हुई। हालांकि रात को चित्रकार ने निश्चय किया था कि वह कोई चित्र नहीं बनाएगा, फिर भी सुबह उठकर उसने एक चित्र बनाना शुरू किया। करीब एक घंटे बाद चित्र पूरा कर लिया। चित्र में एक सुंदर मोर अपने पंख फैलाकर नाच रहा था। यह चित्र अब तक बनाए सभी चित्रों से अधिक सुंदर था।

इस चित्र को अवश्य ही कोई खरीद लेगा, यह सोचकर चित्रकार अपने घर से निकल पड़ा। घूमते-घूमते शाम हो गई, पर चित्र न बिका। भूख के मारे उसका बुरा हाल था। चलते-चलते वह थक भी गया था। मारे भूख और थकान के वह एक दुकान के आगे गिरकर बेहोश हो गया।

दुकानदार ने उसे उठाया। दुकान के अंदर ले गया। थोड़ी देर बाद जब चित्रकार को होश आया, तो वह जाने लगा। दुकानदार ने पूछा “भाई. तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?”

चित्रकार ने सारी बता दी। दुकानदार को उस पर तरस आ गया। उसने तस्वीर खरीद ली।

तस्वीर उसने अपनी दुकान में रख दी। अगले दिन सुबह जब उसने दुकान खोली तो वो हैरान हो गया चित्र के पास एक सोने का मोर पंख पड़ा हुआ था। वह बड़ा खुश हुआ। अगले दिन उसे चित्र के पास फिर वैसा ही पंख मिला। उसने सोचा- ‘जरूर यह पंख तस्वीर में से ही गिरता है। शायद चित्रकार कोई जादूगर है। अगर मेरे पास ऐसी दस तस्वीरें हों, तो रोज मुझे सोने के दस पंख मिल जाएं। ऐसा हुआ, तो मैं शीघ्र ही बेहद धनी बन जाऊंगा। मुझे उस चित्रकार की तलाश करनी चाहिए।

यह सोचकर दुकानदार तुरंत चित्रकार की तलाश में निकल पड़ा। काफी तलाश करने के बाद उसे चित्रकार मिल गया। उसने चित्रकार से कहा- “भैया, मुझे तुम्हारा वह चित्र बहुत पसंद आया । तुम मुझे शीघ्र ही वैसे दस चित्र और बना दो। मैं तुम्हें मुंहमांगा दाम दूंगा। यह सुनकर चित्रकार को तो जैसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। आज पहली बार उससे कोई चित्र खरीदने आया था। उसने कहा- “ठीक है. आपको कल चित्र मिल जाएंगे। “

अगले दिन दुकानदार को चित्र मिल गए। उसने वे चित्र भी अपनी दुकान में रख दिए। वह बेसब्री से सुबह होने की इंतजार करने लगा।

सारी रात उसने करवटें बदल-बदलकर काटी। वह हिसाब लगाता रहा कि दस ग्यारह पंख रोज के हिसाब से मिलने पर एक हफ्ते में, फिर एक महीने में उसके पास कितने पंख इकट्ठे हो जाएंगे?

सुबह होने पर वह जल्दी-जल्दी नहा धोकर दुकान पर पहुंचा। दुकान खोली। आश्चर्य और दुख से उसका मुंह खुला हो रह गया। उसने देखा, आज किसी भी तस्वीर के पास पंख नहीं है। उसने तिजोरी खोली, तो हाथ के तोते उड़ गए। पहले वाले पंख भी गायब हो गए। यह क्या हुआ ! वह गुस्से में चित्रकार को कोसने लगा। अब इन चित्रों का उसके लिए कोई मूल्य नहीं था । उसने सभी चित्र उठाकर दुकान से बाहर फेंक दिए और सिर पकड़कर बैठ गया।

थोड़ी ही देर बाद दुकान के पास से एक घुसवार गुजरा। उसने चित्र पड़े हुए देखे तो उसके मुंह से निकला–“वाह, कितने सुंदर चित्र हैं।” वह सभी चित्र अपने साथ उठाकर ले गया।

वह घुड़सवार कोई और नहीं, उस नगर का राजा था। इस समय वह वेश बदलकर घूम रहा था। राजमहल पहुंचकर राजा ने यह घोषणा करवा दो “जिस किसी चित्रकार ने ये चित्र बनाए हैं, वह शीघ्र आकर उससे मिले।’

चित्रकार ने भी घोषणा सुनी। वह राजा से मिलने गया। राजा ने कहा “मुझे मालूम नहीं था, मेरे राज्य में इतने महान कलाकर भी रहते हैं। मैं आज से तुम्हें अपने दरबार का चित्रकार नियुक्त करता हूँ।’

चित्रकार की खुशी का ठिकाना न था। वह प्रसन्न मन घर लौट आया। अब उसे नह अहसास हो रहा था कि कला अनमोल है। चाहे देर से ही क्यों न हो, कला को कद्र होती ही है।

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