मेघनाद साहा का जीवन परिचय? मेघनाद साहा की खोज?

मेघनाद साहा का जीवन परिचय (Dr. Meghnad Saha Ka Jeevan Parichay), डॉ. मेघनाद साहा जन्म 6 अक्टूबर, 1893 ई. को पूर्वी बंगाल (वर्तमान बंगला देश) में ढाका जिले के सेढडातली नामक छोटे से गाँव में हुआ। उनके पिता जगन्नाथ साहा एक पंसारी की दुकान चलाते थे। इस दुकान की आय से ही परिवार में आठ बच्चों व माता-पिता का भरण-पोषण होता था।

मेघनाद साहा का जीवन परिचय (Dr. Meghnad Saha Ka Jeevan Parichay)

मेघनाद साहा का जीवन परिचय
मेघनाद साहा का जीवन परिचय (Meghnad Saha Ka Jeevan Parichay)

मेघनाद साहा का जीवन परिचय (Dr. Meghnad Saha Ka Jeevan Parichay)

वैज्ञानिकों की चर्चा होने पर श्री “मेघनाद साहा” का नाम न लिया जाए ऐसा तो हो ही नहीं सकता। उनकी गिनती विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की जाती है। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत व लगन से देश के सामने एक उदहारण प्रस्तुत किया कि प्रतिभा व योग्यता किसी भी रूप में सबके सामने अवश्य आती है, चाहे लाख कठिनाईयाँ क्यों न आएं।

मेघनाद साहा के द्वारा किये गये आविष्कार एवं खोजें

S. No आविष्कार एवं खोजें
1.साहा समीकरण व तापायन का सिद्धांत
2.परमाणु की रचना, डाइरेक का ऋणालु सिद्धांत
3.भौतिक विज्ञान के अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना
4.विशिष्ट अनुसंधान कार्य में विशेष रुचि

माता भुवनेश्वरी देवी एक सहिष्णु महिला थीं। परिवार की आर्थिक तंगी को उन्होंने कभी भी किसी पर प्रकट नहीं होने दिया तथा अभावों के बावजूद सयन अपनी संतानों का पालन करती रहीं।

मेघनाद ने पिता-सा ही परिश्रमी स्वभाव पाया था। प्राथमिक पाठशाला से अवकाश पाते ही नन्हा बालक पिता की दुकान पर सहायता करने जा पहुँचता। अन्य बालकों की भाँति कंचे खेलना, नदी में तैरना अथवा हुल्लड़बाजी उसे नहीं सुहाता था। उसका मस्तिष्क तो सदैव कल्पनालोक में नित नई उड़ानें भरा करता ।

पाठशाला के शिक्षक अपने इस होनहार छात्र की प्रगति से पूर्णतया संतुष्ट थे। मेघनाद ने परीक्षा में पूरे जिले में प्रथम स्थान पाया। तत्पश्चात् उन्हें गाँव से करीब सात मील दूर सिमुलिया गाँव के मिडिल स्कूल में भरती कराया गया। प्रतिदिन इतनी दूरी पैदल तय करना बहुत कठिन था परंतु मेघनाद किसी भी कीमत पर स्कूल जाना चाहते थे।

ऐसे में उनके बड़े भाई जयनाथ ने एक उपाय खोज निकाला। श्री अनंत कुमार दास नामक डॉक्टर उनके परिचित थे। उन्होंने उनसे मिलकर अपने भाई की समस्या पर चर्चा की। डॉक्टर अनंत ने गाँव में ही मेघनाद के ठहरने का प्रबंध कर दिया ताकि प्रतिदिन पैदल न आना पड़े। समय मिलते ही उनके घर जा पहुँचते तथा घर के कामों में मदद देते।

सिमुलिया गाँव में भी शीघ्र ही अध्यापकों ने उनकी तीव्र बुद्धि का अनुमान लगा लिया। अध्यापकों के प्रोत्साहन से मेघनाद अपने सभी कष्ट भुला कर अध्ययन में जुट गए। परिणामस्वरूप मिडिल की परीक्षा में वे ढाका जिले में प्रथम रहे। आय के स्रोत इतने कम थे कि आगे की पढ़ाई करना असंभव सा था परंतु मेघनाद जो ठान लेते थे, उसे कर दिखाते थे।

सन् 1905 में उन्होंने ढाका के कॉलेजिस्ट स्कूल में प्रवेश लिया। छात्रवृत्ति ने पढ़ाई का खर्च स्वयं ही निकाल दिया। बंग-भंग के विरुद्ध असहयोग का दौर चल रहा था। लोग खुलेआम अपने विचार प्रकट कर रहे थे।

बंगाल के गवर्नर सर बेंपफील्ड फुलर स्कूल के दौरे पर आए। अनेक छात्रों ने उनके स्वागत समारोह में भाग लेने से इंकार कर दिया व हड़ताल कर दी। इन्हीं छात्रों में मेघनाद भी थे। गवर्नर ने इस अपमान से क्षुब्ध होकर हड़ताली छात्रों को स्कूल से निकाल दिया व छात्रवृत्ति भी रुकवा दी।

इस प्रकार मेघनाद की शिक्षा में अवरोध आ गया परंतु उन्होंने जल्द ही शिक्षा प्राप्ति का दूसरा रास्ता खोज निकाला। कोई भी बाधा उनकी ज्ञान प्राप्ति की अभिलाषा को रोक नहीं पाई। सन् 1909 में उन्होंने एंट्रेंस की परीक्षा में प्रथम स्थान पाया। सन् 1911 में वे ढाका विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट की परीक्षा में प्रथम रहे।

उन्हें अनेक विख्यात प्रोफेसरों से शिक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अनेक सहपाठी छात्र भी आगे चल कर नामी वैज्ञानिक बने। कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में सर जगदीश चंद्र बसु व प्रफुल्लचंद्र आदि उनके प्रमुख अध्यापक रहे। सन् 1915 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से गणित में एम.एस.सी. की परीक्षा में प्रथम स्थान पाया।

इस दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस व यतींद्र नाथ मुखर्जी आदि अनेक क्रांतिकारियों से उनका निकट संपर्क रहा। परिवार जन चाहते थे कि इतनी शिक्षा ग्रहण कर लेने के बाद मेघनाद को किसी अच्छी नौकरी की तलाश कर लेनी चाहिए ताकि परिवार का आर्थिक संकट हल हो सके।

मेघनाद ने भारतीय वित्त सेवा परीक्षा में बैठना चाहा परंतु उन्हें इस परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी गई। अंग्रेज सरकार को संदेह था कि वे भी किसी क्रांतिकारी दल की गतिविधियों में लिप्त थे।

कठिन संघर्षों से भरा समय था। प्राइवेट ट्यूशन द्वारा मेघनाद कुछ रोजगार कमाने लगे। यूँ तो सरकारी नौकरी का न मिल पाना उनके लिए वरदान ही सिद्ध हुआ क्योंकि सरकारी पद पर कार्यरत होने के पश्चात् वे कदाचित् अपने वैज्ञानिक अनुसंधानों पर पूर्णतया ध्यान न दे पाते और उनका प्रतिभा कुसुम असमय ही मुरझा जाता।

सन् 1916 में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रवक्ता नियुक्त किए गए तथा कुछ समय बाद ही उन्हें भौतिकी विभाग में भेज दिया गया । यहाँ हम मेघनाद साहा को एक कुशल अध्यापक के रूप में पाते हैं। स्वयं भौतिकी में स्नातक होने पर भी उन्होंने भौतिकी के स्नातकोत्तर छात्रों को कुशलतापूर्वक पढ़ाया।

इसी बीच वे अपने अध्यवसाय को भी नहीं भूले । विदेशी वैज्ञानिकों के मूल व्याख्यानों को पढ़ने के लोभ से उन्होंने जर्मन भाषा का बखूबी अध्ययन किया। उन्होंने आइंस्टाइन के लेख का अंग्रेजी अनुवाद किया जिसमें सत्येंद्रनाथ बोस उनके सहायक रहे। इस लेख को कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा सन् 1919 में प्रकाशित किया गया। इससे पूर्व उनका एक शोधपूर्ण लेख, फिलॉसॉफिकल मैगजीन में भी प्रकाशित हो चुका था।

उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा डी.एस.सी. की उपाधि से भी सम्मानित किया गया। अपनी योग्यता के बल पर वे ज्ञान-वर्द्धन हेतु यूरोप भी गए। वहाँ उन्हें विख्यात वैज्ञानिक फाउलर से भेंट का सुअवसर प्राप्त हुआ। अनेक वैज्ञानिकों से विचार-विमर्श करने के उपरांत मेघनाद साहा को विज्ञान क्षेत्र की असीम संभावनाओं के द्वार खुलते नजर आए।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति सर आशुतोष मुकर्जी के आग्रह का मान रखते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय की अनुसंधान व्यवस्था की जिम्मेवारी संभाल ली।

उन्हीं दिनों उन्हें भारतीय मौसम विभाग के तत्कालीन निदेशक सर गिलबर्ट वाकर का संदेश प्राप्त हुआ। वे साहा को अच्छा वेतन व सभी सुविधाएं देने के इच्छुक थे परंतु उन्होंने इस सरकारी पद को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया।

सन् 1923 में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग के अध्यक्ष चुने गए। अध्यापन कार्य के साथ-साथ प्रयोगशाला में उनके अनुसंधान भी चलते रहे। इस प्रकार उनकी प्रसिद्धि फैलते देर न लगी। सन् 1927 में उन्हें रॉयल सोसायटी द्वारा फैलो चुन लिया गया। इसी उपाधि के पश्चात् उन्हें उत्तर प्रदेश के गवर्नर सर विलियम ऑरिस द्वारा पाँच हजार रुपए का वार्षिक अनुदान प्राप्त हुआ।

इस पर वे तापीय आयनन पर अपने प्रयोगों में जुट गए। इलाहाबाद में पंद्रह वर्ष तक कार्य करने के पश्चात् उनकी नियुक्ति कलकत्ता विश्वविद्यालय भौतिकी के प्रोफेसर रूप में हुई। तब वे नाभिकीय भौतिकी (परमाणु विज्ञान) के अनुसंधानों की ओर प्रेरिन हुए। इस विषय में अनुसंधान हेतु उन्हें पंडित नेहरू व कुछ उद्योगपतियों द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त हुई।

गवेषणाओं के दौरान ही इलैक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता पड़ी। यह भारत में अनुपलब्ध था। तब सरकार व अन्य उद्योगपतियों ने इस यंत्र की व्यवस्था का दायित्व लिया और उसे पूर्ण किया। डॉ. साहा के प्रयत्नों से ही ‘इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स’ की स्थापना हो सकी।

इसका उद्घाटन करने के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता मैडम क्यूरी की पुत्री व वैज्ञानिक आइरीन को बुलवाया गया था। बाद में इस संस्थान का नाम ‘साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स’ रख दिया गया। इस संस्थान में अनेक महत्त्वपूर्ण अनुसंधान हुए।

सन् 1920 में डॉ. साहा ने ज्योतिष शास्त्र के लिए एक महान खोज की। यह अनुसंधान स्टेलर स्पैक्ट्रम से संबंधित था। उनका यह सिद्धांत साहा समीकरण के नाम से जाना गया। इस सिद्धांत से उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई।

डॉ. साहा के तापायन सिद्धांत के अलावा परमाणु की रचना, वर्णपट विज्ञान, डाइरेक का ऋणाणु सिद्धांत, सक्रिय नोष जन व धातु लवणों के रंग आदि कार्य भी उल्लेखनीय हैं।

उन्हें अनेक वैज्ञानिक कार्यों के लिए अनेक सम्मानों से विभूषित किया गया। इटली के वोल्टा शताब्दी उत्सव में उन्होंने सक्रिय सदस्य के रूप में भाग लिया। पूर्ण सूर्यग्रहण की जांच के लिए उन्हें दल के साथ नार्वे भी भेजा गया।

सन् 1926 में उन्हें कांग्रेस के भौतिक व गणित विज्ञान का अध्यक्ष बनाया गया। उन्हें अनेक देशों में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिकों की प्रयोगशाला में जाने का अवसर प्राप्त हुआ।

उन्होंने भौतिक विज्ञान पर अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। इन ग्रंथों को पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया। इन ग्रंथों में Modern Physics व Theory of Heat का नाम विशेष रूप से लिया जा सकता है। उन्हें एक सर्वश्रेष्ठ ज्योति भौतिक विज्ञान विशारद माना जाता था। वे प्रायः मौलिक अनुसंधान करने वाले छात्रों को प्रोत्साहित किया करते। उनके द्वारा पढ़ाए गए अनेक छात्रों ने अपने-अपने क्षेत्र में दक्षता प्राप्त की।

डॉ. मेघनाद साहा अन्य वैज्ञानिकों द्वारा किए जा रहे अनुसंधानों के विषय में भी पूरी रुचि लेते थे। जर्मन, फ्रेंच व अनेक विदेशी भाषाओं की जानकारी से उन्हें इस विषय में सहायता मिलती। वे सभी नवीन शोध पत्रों को उनकी मूल भाषा में पढ़ते व अपने छात्रों को भी उनके विषय में सूचित करते ।

भारत में विज्ञान साधना के नए सोपान बनाने के लिए उन्होंने अनेक वैज्ञानिक संस्थाओं के निर्माण व स्थापना में भाग लिया। जिनमें इंडियन फिजिकल सोसायटी, नेशनल एकेडमी ऑफ सांइसेज़ व नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सांइसेज़ ऑफ इंडिया का नाम प्रमुख है। विज्ञान प्रेमी ‘सांइस एंड कल्चर’ नामक पत्रिका से अपरिचित नहीं हैं। यह पत्रिका उन्हीं के द्वारा संपादित की जाती थी। इस पत्रिका में राष्ट्रहित की सभी समस्याओं पर विचार-विमर्श किया जाता।

यद्यपि डॉ. साहा मूल रूप से एक वैज्ञानिक थे परंतु उन्होंने प्रयोगशाला की बंद दीवारों में ही अपना लक्ष्य पूर्ण करने का प्रयास नहीं किया। राष्ट्र से जुड़ी प्रत्येक समस्या उनकी अपनी थी। वे चाहते थे कि इन समस्याओं के प्रति आम जनता में भी जागरूकता उत्पन्न होनी चाहिए ताकि सभी देशवासी एकजुट हो कर देश को प्रगति ही राह पर ले जा सकें।

वे देश के लिए एक ऐसी औद्योगिक व्यवस्था चाहते थे जिसमें समाज के प्रत्येक वर्ग को लाभ हो सके। आधुनिक विज्ञान व तकनीक के बल पर ऐसा होना संभव था। वे स्वयं एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से थे अतः उन्हें भली-भांति अनुभव था कि निर्धन छात्रों को कितनी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। जिस प्रकार उन्हें एक सहृदय सज्जन ने सहारा दिया, उस प्रकार सभी छात्रों को सहारा नहीं मिल पाता।

उनका मानना था कि किसी भी जाति की स्वतंत्र अस्मिता को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है कि वह उद्योग-धंधों की स्थापना करते समय उन्नत व नवीनतम साधनों का प्रयोग करें।

उन्होंने भारत की नदियों की समस्या पर भी गंभीरतापूर्वक विचार किया व उस पानी के सदुपयोग की योजना पर भी कार्य किया। उन्होंने ही नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्सेज ऑफ इंडिया के माध्यम से नदी अन्वेषण शाला की आवश्यकता पर बल दिया था।

उनका मानना था कि औद्योगीकरण की सफलता के लिए सस्ती विद्युत का होना भी बहुत जरूरी है। डॉ. साहा मानवीय भावों से ओत-प्रोत थे। सन् 1913 में दामोदर नदी की बाढ़ व सन् 1923 में उत्तर बंगाल में आई बाढ़ के समय उन्होंने जी जान से बचाव कार्य में योगदान दिया। अनेक स्थानों पर सहायता शिविरों का आयोजन तो किया ही साथ ही बाढ़ पीड़ितों के लिए चंदा भी एकत्र किया ताकि उन्हें पुनः नए सिरे से बसाया जा सके।

उन्हीं के प्रयत्नों से बंगाल में नदी अनुसंधान संस्थान की स्थापना हुई। दामोदर घाटी के लिए बनाई गई बहुमुखी योजना में भी उन्हीं का हाथ था। मेघनाद साहा का जीवन परिचय

विज्ञान के अतिरिक्त प्राचीन भारतीय इतिहास व संस्कृति के विषय में भी उनकी जानकारी अद्वितीय थी। उन्होंने अन्य देशों के इतिहास का भी विशद अध्ययन किया था। अध्ययनशीलता उनका बहुत बड़ा गुण थी। प्रत्येक नई बात को जानने अथवा सीखने का उनका विशेष आग्रह रहता।

साइंस एंड कल्चर में पुरातत्व, शिक्षा व पंचांग सुधार आदि लेखों से उनकी विद्वत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है। डॉ. मेघनाद साहा भारतीय ज्योतिष में भी अभिरुचि रखते थे। उनके विषय में एक प्रसिद्ध ज्योतिषी ने कहा था “ज्योतिषशास्त्र में गैलिलियो के समय से अब तक जो खोजें हुई

हैं उनमें भारत के महान वैज्ञानिक डॉ. मेघनाद साहा की खोज भी एक डॉ. मेघनाद साहा के उल्लेखनीय योगदान का स्मरण करते हुए विशिष्ट अनुसंधान करने वालों को मेघनाद साहा स्मारक पुरस्कार भी दिए जाते हैं।

सन् 1956 में 16 फरवरी को डॉ. साहा किसी आवश्यक कार्य से राष्ट्रपति भवन की ओर जा रहे थे कि अचानक उन्हें मूर्च्छा आ गई और वे गिर पड़े परंतु जब तक उन्हें अस्पताल पहुँचाया जाता, उनके प्राण पखेरू उड़ चुके थे।

यह भी पढ़े –

Leave a Reply

Your email address will not be published.