मेरा देश भारत पर निबंध? हमारा प्यारा भारतवर्ष पर निबंध?

मेरा देश भारत पर निबंध (Mera Desh Bharat Par Nibandh) :- जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान् हैं। जननी की कोख से हम उत्पन्न होते हैं, इसकी गोद में पलते हैं और खेल-कूदकर बड़े होते हैं। जन्मभूमि तो जननी से भी बढ़कर है। मरने पर जननी त्याग देती है, किन्तु जन्मभूमि हमें अपनी मिट्टी में एकाकार कर लेती है।

मेरा देश भारत पर निबंध (Mera Desh Bharat Par Nibandh)

मेरा देश भारत पर निबंध

यह भी पढ़े – छुआछूत की समस्या पर निबंध? अस्पृश्यता पर निबंध?

मेरा देश भारत पर निबंध

हमारी प्यारी जन्मभूमि ‘भारतवर्ष’ है, यह भरतजन का देश है और वैदिक संस्कृति का उद्गम स्थल है। आर्यों का मूल निवास होने के कारण यह देश आर्यावर्त कहलाया। गंगा, यमुना, इरावती, बितस्ता, सिन्धु आदि पवित्र नदियों से सिंचित होने के कारण ‘सप्तसिन्धु’ कहलाया और हिन्दुओं की भूमि होने के कारण ‘हिन्दुस्थान’ नाम से भी जाना जाता है। यह भोग भूमि नहीं अपितु कर्म भूमि और त्याग भूमि है। इसके इसी महत्त्व के कारण देवता भी इसमें जन्म लेने को उत्सुक रहते हैं-

गायन्ति देवा किल गीतकानि
धन्यास्तु ते भारत भूमि भागे ।
स्वर्गापवर्गास्पद हेतु भूते,
भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥

भौगोलिक स्वरूप

हमारा यह पवित्र देश उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पूर्व में असम से लेकर पश्चिम से गुजरात तक विस्तृत है। विष्णु पुराण लिखा है-

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्ष तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।।

उत्तर दिशा में हिमालय पर्वत इसके सर पर रजत मुकुट-सा शोभित हो रहा है और दक्षिण में सागर का विमल जल निरन्तर इसके चरण धो रहा है।

प्राकृतिक दृष्टि से भारत

हिमालय का पर्वतीय क्षेत्र, गंगा-सिन्धु का मैदान और दक्षिण पठार-इन तीन भागों में विभक्त है। भारतर्ष प्रकृति रूपी नटी का रम्य क्रीडास्थल है। यहाँ के पर्वत, निर्झर, नदियाँ, वन-उपवन और हरे-भरे मैदान प्राकृतिक शोभा के आगार हैं। इसका शीतल, मन्द व सुगन्धित वायु श्रम को हर लेता है। भारत की विशेषता बताते हुए कवि ने कहा है-

भूलोक का गौरव प्रकृति का लीलास्थल कहाँ?
फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगा जल जहाँ।
सम्पूर्ण देशों से अधिक किसका अधिक उत्कर्ष है।
उसका कि ऋषि भूमि है जो वह कौन? भारतवर्ष है।

भारत की विशेषता

भारत भगवान् को भी प्रिय है। यह उनका कर्म-क्षेत्र ओर लीला-क्षेत्र रहा है। अन्य देशों में भगवान् के दूत जन्म लेते हैं, किन्तु भारत में भूमि में वे स्वयं ही अवतार धारण करके आते हैं। हमारे श्री राम जन-जन के मन में रमे हुए हैं और श्री कृष्ण ने सबके मन को आकृष्ट कर लिया है। मानव मात्र को अहिंसा, भूतदया तथा प्रेम का पाठ पढ़ाने वाले भगवान् बुद्ध और भगवान् बर्धमान महावीर की लीला भूमि भी यह भारत-भूमि ही है। ज्ञान के सूर्य का उदय सर्वप्रथम भारत में ही हुआ है। कवीन्द्र रवीन्द्र के शब्दों में-“प्रथम प्रभात उदय तव गगने, प्रथम सामरव तब तपोवने।” यहीं से ज्ञान की किरणें अन्य देशों में फैलीं। वेद, वेदांग, ब्राह्मण-ग्रंथ, उपनिषद् और दर्शनों में उसी ज्ञान-ज्योति के दर्शन होते हैं। कवि ‘प्रसाद’ के शब्दों में

‘जगे हम लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक।
व्योम-तम-पुंज हुआ तब नष्ट, अखिल संसृति हो उठी अशोक ।।

भारत के महापुरुष

धर्मराज युधिष्ठिर, सत्यवादी हरिश्चन्द्र, अनुपम वीर भीम और अर्जुन, विक्रमादित्य, प्रताप और शिवाजी आदि न्यायप्रिय व विक्रमशाली वीर इसी देश में हुए हैं। बाल्मीकि, व्यास जैसे मुनियों और वशिष्ठ, विश्वामित्र जैसे ऋषियों की जन्म भूमि यही है। संस्कृत के महाकवि कालिदास, हिन्दी के महाकवि सूर व तुलसी, तमिल के कवि सुब्रह्मण्यम् ‘भारती’, उड़िया के प्रसिद्ध कवि गोपबन्धुदास तथा बंगला के प्रसिद्ध कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के द्वारा इस देश के गौरव की वृद्धि हुई है। आर्य भट्ट, वराह मिहिर जैसे ज्योतिर्विद् और चरक तथा सुश्रुत जैसे आयुर्वेदशास्त्र के कर्ता यहीं उत्पन्न हुए हैं। भूतकाल में अपने अतुल वैभव और ऐश्वर्य के कारण ही देश ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता था।

हमारा देश भारत अनेक दिव्य गुणों का निधान है। शील, सदाचार, प्रेम बन्धुत्व गुण है। श्री रामधारी सिहं ‘दिनकर’ के शब्दों में इसके भारत नहीं स्थान का वाचक गुण विशेष नर का है, एक देश का नहीं यह शील भूमंडल भर का है। जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है, देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्वर है।

नदियाँ और पुरियाँ

गंगा, यमुना, सिन्धु, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी आदि नदियाँ भारत को सस्य-स्यामल और हरा-भरा तो रखती हैं, साथ ही ये पुण्यदायिनी व पाप-नाशिनी भी हैं। इन्हीं के तटों पर भारत के अनेक श्रेष्ठ तीर्थ विद्यमान हैं। यहाँ की अयोध्या, मथुरा, मायापुरी, काशी, काँची, अवन्तिका आदि सप्त पुरियाँ मोक्षदायिनी तो है ही, भारत की साँस्कृतिक एकता का भी प्रतीक हैं। यूनान, मिश्र व रोम की प्राचीन संस्कृतियाँ नामशेष-सी हो गई हैं, किन्तु भारतीय संस्कृति आज भी अपने पुरातन रूप में जीवित है।

उपसंहार

आज भारत स्वतंत्र है। यह भूतकाल में समृद्ध और गौरवशाली रहा है, वर्तमान इसका संघर्षमय है पर भविष्य इसका उज्ज्वल है। यद्यपि देश में विकास के कार्य चल रहे हैं तो भी यह आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा है। हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि हम जाति-भेद, प्रान्त-भेद, भाषा-भेद और वर्ग भेदों को भूलकर अपनी और अपने देश की समृद्धि के लिए अपनी करोड़ों भुजाओं से कार्य करें, जिससे कि यह विश्व के अन्य राष्ट्रों के समकक्ष हो जाए।

आज देश में जो चारित्रिक ह्रास हो रहा है, नैतिक पतन हो रहा है, उसकी ओर भी हमें ध्यान देना है, ताकि देश का पुरातन गौरव क्षीण न हो जाए। ‘मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्’ तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की हमारी भावना जीवित रहनी चाहिए। हमारा यह सौभाग्य है कि हम इस भूमि में जन्में है। हमें इसे समृद्ध बनाना है और इसके पुरातन गौरव को अक्षुण्ण रखना है। इसे पुनः विश्व गुरु के पद पर प्रतिष्ठित करना है तथा ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ के अनुसार समस्त विश्व को आर्य (श्रेष्ठ) बनाना है। हम इस पर अपना सर्वस्व समर्पित कर दें। क्योंकि यह भारत हमें प्राणों से भी प्रिय है।

यह भी पढ़े – मेरी प्रिय पुस्तक पर निबंध? मेरी प्रिय पुस्तक रामचरितमानस पर निबंध?

Leave a Reply

Your email address will not be published.