मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जीवन परिचय? मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की खोज?

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जीवन परिचय: उनका जन्म 25 सितम्बर सन् 1861 को मैसूर राज्य के कोलार जिले के चिकबल्लपुर तालुका के एक छोटे से गाँव मदनहल्ली में हुआ। पिता का नाम था श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम था वेकचंपा। माता-पिता आर्थिक रूप से तो अधिक दृढ़ नहीं थे परंतु पुत्र को भारतीय सभ्यता व संस्कृति की महानता व गरिमा का परिचय देने में उन्होंने कोई कसर नहीं रख छोड़ी।

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जीवन परिचय

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Dr. Mokshagundam Visvesvaraya Biography in Hindi

आगंतुक ने भीतर प्रवेश किया व अपने आने की सूचना भिजवाई। भीतर से जो सज्जन बाहर निकले उन्होंने अपनी घड़ी में समय देखा व भवें सिकोड़ कर बोले “महानुभाव ! आपने अपने निर्धारित समय से एक मिनट पहले आ कर मेरा अमूल्य समय नष्ट कर दिया। मैं इस मिनट में अपना कोई महत्त्वपूर्ण कार्य पूरा कर लेता।”

डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के द्वारा किये गये आविष्कार एवं खोजें

S. No आविष्कार एवं खोजें
1.ब्लाक प्रणाली का आविष्कार
2.कावेरी नदी पर कृष्णराज सागर बांध का निर्माण तथा ‘जल शक्ति’ से विद्युत उत्पादन

नियत समय पर कार्य करने के आग्रही सज्जन थे “डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया”। जिन्हें हम आधुनिक मैसूर के निर्माता के रूप में याद करते हैं। अनुशासन, कठोर परिश्रम व समय की पाबंदी का उपदेश तो प्रायः सभी दिया ही करते हैं परंतु विश्वेश्वरैया जी ने इन शब्दों में ही अपनी जीवनचर्या को ढाल लिया था। देश के औद्योगिक विकास में उनका अमूल्य योगदान रहा।

विश्वेश्वरैया बाल्यकाल से ही मेधावी थे अतः आर्थिक कठिनाई भी उनके मार्ग का अवरोधक नहीं बन सकी। उन्होंने एक मेहनती छात्र के रूप में गाँव की पाठशाला में प्रथम स्थान पाया। अधिकांश बालकों ने गाँव की पाठशाला से पढ़ने के पश्चात् खेती-बाड़ी में मन रमा लिया परंतु वे हाई स्कूल की शिक्षा के लिए बंगलौर चले गए।

बड़ी कठिनाई से एक रिश्तेदार के यहाँ रात बिताने को स्थान मिला तथा दूसरे रिश्तेदार ने दिन में बैठने की इजाजत दे दी। शीघ्र ही उन्होंने पढ़ाई के खर्च का जुगाड़ भी बैठा लिया। वे अपने से छोटे छात्रों की ट्यूशन लेने लगे। इस तरह अपनी लगन के बल पर उन्होंने उन्नीस वर्ष की आयु में बंगलौर के सेंट्रल कॉलेज से बी०ए० की डिग्री प्राप्त कर ली।

विशाल हृदय व्यक्ति किसी भी प्रतिभा को कुंठित होते नहीं देख सकते। महाविद्यालय के प्रधानाचार्य इस परिश्रमी छात्र के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचान गए थे। उन्होंने कहा “मैं तुम्हें पूना के विज्ञान महाविद्यालय में प्रवेश दिलवाऊँगा।

विश्वेश्वरैया ने सकुचा कर उत्तर दिया “सर ! मैं इतने बड़े महाविद्यालय में चाहने पर भी शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकता। मेरी मासिक आय इतनी नहीं कि मैं प्रवेश शुल्क भर पाऊँ ।” प्रधानाचार्य उस समय तो चुप हो रहे परंतु उन्होंने शीघ्र ही अपने प्रिय छात्र के लिए छात्रवृत्ति का प्रबंध करवा दिया। विश्वेश्वरैया की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा।

उन्होंने ‘यंत्रशास्त्र’ को अध्ययन का विषय चुना और कठिन अध्यवसाय में जुट गए। छात्रवृत्ति मिलने के कारण समय भी बचने लगा और उन्होंने 1883 ई. में बंबई विश्वविद्यालय की यंत्रशास्त्र परीक्षा में प्रथम स्थान पाया।

अगले ही वर्ष उन्हें सहायक अभियंता के पद पर नियुक्त कर दिया गया। नियुक्ति के कुछ ही माह पश्चात् अंग्रेज अधिकारी भी उनकी मौलिक सूझ-बूझ का लोहा मान गए। प्रायः उन्हें ऐसे स्थानों की व्यवस्था का भार सौंपा जाता जो उच्चाधिकारियों के लिए समस्या का कारण बन जाते थे। उदाहरण के लिए सिंध प्रांत को ही लें।

वह उन दिनों बंबई का ही एक भाग था। सन् 1894 में विश्वेश्वरैया जी ने उस रेगिस्तानी भाग की जल व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए सक्खर बांध का निर्माण किया। सक्खर बांध की सफलता से उत्साहित होकर उन्हें अन्य अनेक प्रांतों की जल-कल व्यवस्था का भार सौंप दिया गया। वाटर वर्क्स व नालियों के निर्माण के कारण विश्वेश्वरैया जी की गिनती नामी इंजीनियरों में होने लगी। उन्हें अधीक्षक अभियंता का पद भी सौंपा गया।

वे अपने पद से पूर्णतया संतुष्ट थे तथा इस माध्यम से देश सेवा का व्रत भी पूरा कर पा रहे थे परंतु ईष्र्ष्यालु सहकर्मियों की ईर्ष्या का दाह सहना कठिन था। उनकी पदोन्नति दूसरों के लिए आँख का काँटा बन गई थी। फलतः सैंतालीस वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। सरकार ने नियम न होने पर भी उनकी पूरी पेंशन देने का वादा निभाया।

कुछ समय पश्चात् वे यूरोप चले गए। हैदराबाद रियासत में उन दिनों निज़ाम का राज्य था। हुआ यूँ कि हैदराबाद नगर की मूसी नदी में बाढ़ आ गई। इस भयंकर बाढ़ से पूरे नगर की सुरक्षा खतरे में पड़ गई। ऐसे में विश्वेश्वरैया सरीखे इंजीनियर का स्मरण हो आना स्वभाविक ही था। वे भी निजाम का बुलावा आते ही तुरंत भारत लौट आए और आते ही समस्या का माधान खोज निकाला।

हैदराबाद में आने वाली बाढ़ का स्थायी हल होते ही उन्हें मैसूर के महाराज कृष्णराज वाडियार ने अपने राज्य में मुख्य अभियंता का पद सौंपने की पेशकश की जिसे उन्होंने स्वीकार लिया। मैसूर के नौ वर्षीय कार्यकाल में उन्होंने अपनी जो सेवाएँ राज्य को दीं, वे आज भी स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य हैं।

उन दिनों जल-शक्ति से विद्युत उत्पादन नहीं होता था अतः उनके द्वारा कावेरी नदी पर बना कृष्णराज सागर बाँध सारे देश के लिए आश्चर्य का विषय बन गया। इस बाँध द्वारा उन्होंने सिंचाई के लिए जल की व्यवस्था की तथा उद्योग-धंधों के लिए बिजली की व्यवस्था की गई।

स्वयं मैसूर महाराज भी अपने इस मुख्य अभियंता की लगन व परिश्रम के कायल थे। बात उन दिनों की है जब कृष्णराज सागर बाँध का निर्माण कार्य चल रहा था। विश्वेश्वरैया स्वयं निर्माण स्थल पर सारा दिन रह कर अपने निरीक्षण में कार्य करवाते। अचानक तीव्रतर वर्षा के वेग ने काम को ठप्प कर दिया।

इतनी वर्षा हुई कि गाँवों में पानी भर गया। अस्थायी मजदूर भी काम छोड़ कर भाग गए। एक तो वर्षा का जोर, दूसरे उचित साधनों का अभाव, मैसूर महाराज ने उन्हें संदेश भिजवाया “जब तक वर्षा ऋतु है तब तक आप बाँध का निर्माण कार्य रोक दें।” महाराज को प्रत्युत्तर मिला “कोई भी बाधा अथवा संकट, बाँध के निर्माण कार्य को रोक नहीं सकता।

आप निश्चित रहें, ठीक नियत समय पर बाँध का काम पूरा हो जाएगा।” विश्वेश्वरैया जी ने जो कहा था, उसे कर दिखाया। नियत तिथि को बाँध व उससे बनने वाली बिजली का काम पूरा हुआ। मैसूर के महाराज व प्रजा इस अद्भुत कल्याणकारी बाँध को पाकर फूले न समाए ।

लगभग तीन वर्ष पश्चात् महाराज ने विश्वेश्वरैया जी की प्रतिभा का समुचित आकलन करते हुए उन्हें दीवान पद सौंप दिया। मैसूर दीवान के रूप में विश्वेश्वरैया ने अपनी प्रशासन क्षमता का उत्तम परिचय दिया।

उन्होंने गाँवों में रहने वाली जनता को शासन व्यवस्था का भागीदार बनाया। पंचायत व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक योजनाएँ क्रियान्वित कीं। इस सुधार व्यवस्था से गाँवों के विकास में आश्चर्यजनक प्रगति हुई।

दीवान के रूप में भी उन्होंने कभी अपने पद का दुरुपयोग नहीं किया। यहाँ तक कि वे अपने किसी परिचित को भी अपने पद से लाभ नहीं उठाने देते थे। मैसूर में रेशम उद्योग के विकास को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने जापान के रेशम विशेषज्ञों को आमंत्रित किया ।

चंदन, तेल व साबुन के कारखाने, इस्पात कारखाना व हिन्दुस्तान एयरक्राफ्ट फैक्ट्री की स्थापना में उन्हीं का अमूल्य योगदान रहा। मैसूर राज्य रेलवे का निर्माण भी उन्हीं के सुझाव पर किया गया।

कृष्णराज सागर बाँध के अलावा उनके ब्लाक प्रणाली के आविष्कार को भी सर्वत्र सराहना मिली। भारत के बाहर अन्य देशों के इंजीनियरों ने भी उनकी प्रतिभा को पहचाना जिससे उनके यश में उत्तरोत्तर वृद्धि विश्वेश्वरैया जी की प्रकृति स्वभाव से ही जिज्ञासु व अध्ययनशील थी। किसी भी नई वस्तु को देखते ही वे उसके विषय में जानने का प्रयास करते व रुचि अनुरूप होने पर उसे नोटबुक में उतार लेते।

उन्होंने देश में नियोजित अर्थव्यवस्था के अनुसार कार्य करने पर बल दिया। इसी विषय पर उनकी एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई। मैसूर छोड़ने के पश्चात् वे पुनः विदेश चले गए। इन विदेश यात्राओं में उन्होंने विदेशों की प्रगति के मूल में छिपे कारणों का पता लगाने की चेष्टा की और उन्हें अपने प्रयास में सफलता भी मिली।

जब वे दो वर्ष बाद भारत लौटे तो उन्हें भारत सरकार ने अनेक समितियों की सदस्यता सौंपी ताकि उनके उन्नत विचारों से देश को लाभ हो । भद्रावती कारखाने के निदेशक के रूप में उन्होंने उसका आपादमस्तक रूप परिवर्तन कर उसे लाभकारी संस्था के रूप में बदल दिया। यहीं उनकी भेंट टाटा से हुई। उनके कार्य, लगन व उत्साह से प्रभावित होकर टाटा ने उन्हें जमशेदपुर इस्पात कारखाने का डायरेक्टर पद सौंप दिया।

विश्वेश्वरैया जी के जीवन में अनुशासन का बहुत महत्त्व था। उनके अनेक कार्यों के लिए समय-समय पर सम्मान व पुरस्कार दिए गए। सर्वप्रथम बंबई विश्वविद्यालय ने उन्हें डायरेक्टर की उपाधि दी फिर अनेक विश्वविद्यालयों ने यही सम्मान दिया।

जब भारत में अंग्रेजी सरकार का राज था तो उन्हें ‘सर’ की उपाधि से विभूषित किया गया। भारत सरकार ने भी उनकी प्रतिभा का मोल कम नहीं आंका। उन्हें भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा ‘भारतरत्न’ से विभूषित किया गया।

डॉ. विश्वेश्वरैया जी को एक वैज्ञानिक, इंजीनियर व निर्माता के रूप में सादर स्मरण किया जाता है। उन्होंने अपने संयत व सदाचारी जीवन में सौ वर्ष पूर्ण किए। इतनी लंबी आयु का रहस्य वे स्वयं ही कहते थे।

“सब काम समय पर करना चाहिए। मैं समय पर काम करता हूँ। समय पर खाना खाता हूँ, समय पर सोता हूँ, समय पर नियमित सैर और कसरत करता हूँ व गुस्से से कोसों दूर रहता हूँ।”

डॉ. विश्वेश्वरैया आजीवन शक्ति, पद, धन व सम्मान के लोभ से दूर रहे। केवल अपने कार्य को ही जीवन का लक्ष्य माना। संभवतः यही उनकी सफलता का मूल रहस्य था ।

बंगलौर में 14 अप्रैल, सन् 1962 को उनका देहांत हो गया। भारत सरकार ने उनको स्मृति में डाक टिकट जारी किए और देश के कोने-कोने से उन्हें श्रद्धांजलियाँ अर्पित की गईं।

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