निबंध लिखने का सही तरीका क्या है? निबंध लेखन की परिभाषा?

निबंध लिखने का सही तरीका क्या है (Nibandh Likhne Ka Sahi Tarika Kya Hai), निबंध लिखते समय इसकी शैलियों का प्रयोग करना बहुत ही जरूरी है निबंध लिखते समय आपको यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि निबंध के अंग कौन से हैं और कौन से नहीं। निबंध के कई प्रकार होते हैं। एक अच्छा निबंध लिखने के लिए आपको कई सारी बातों का ध्यान अवश्य रखना होगा आपको इन सभी के बारे में नीचे विस्तार से बताया गया है।

निबंध लिखने का सही तरीका क्या है (Nibandh Likhne Ka Sahi Tarika Kya Hai)

निबंध लिखने का सही तरीका क्या है

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निबन्ध की परिभाषा

निबन्ध शब्द की दो व्युत्पत्तियाँ मिलती हैं। (1) (“नि+बन्ध्+ ल्युट्”) अर्थात् जिस रचना में भावों को भली प्रकार बाँधा जाए वह निबन्ध है। (2) (“नि+बन्ध्+घञ्”) अर्थात् किसी विषय को निश्चित लक्ष्य के लिए विचारों में बाँधना निबन्ध होता है। निबन्ध शब्द की इन दोनों व्युत्पत्तियों का अभिप्राय है-किसी निश्चित विषय के बारे में श्रृंखलाबद्ध (परस्पर सम्बन्ध रखने वाले) विचार व्यक्त करना। एक विद्वान् ने निबन्ध को यह परिभाषा दी है-“निबन्ध उस गद्य रचना को कहते हैं, जिनमें किसी विषय या विचार-सूत्र को केन्द्र बना कर लेखक ने पाठकों से आत्मीयता स्थापित करने की चेष्टा करते हुए एक विशेष निजीपन और सजीवतापूर्वक उस विषय पर प्रकाश डाला हो।” कहानी, उपन्यास, नाटक आदि साहित्य के अन्य विधाओं के समान निबन्ध लिखने की भी एक पृथक् कला है, जिसमें सतत अभ्यास से ही सफलता मिलती है।

निबन्ध के प्रकार

सभी प्रकार के निबन्धों को स्थूल रूप से तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

  1. विचारात्मक
  2. भावात्मक
  3. वर्णनात्मक या विवरणात्मक।

निबंध को तीन भागो में बाटा गया है

  1. भूमिका निबन्ध की भूमिका या प्रस्तावना उसका प्रारम्भिक परिचय है। उसका आरम्भ बड़े आकर्षक ढंग से करना चाहिए। यदि सम्भव हो तो किसी उद्धरण से निबन्ध का प्रारम्भ किया जाए या अलंकृत भाषा का प्रयोग करना चाहिए, अर्थात् जो बात कहनी है, उसे कौतूहलपूर्ण ढंग से कहना चाहिए, जिससे उसमें आकर्षण उत्पन्न हो जाए। भूमिका में विषय की सामान्य, किन्तु अत्यन्त संक्षिप्त जानकारी हो जानी चाहिए।
  2. मध्य भाग (विस्तार) – निबन्ध के मध्य भाग (विस्तार में) पृथक्-पृथक् अनुच्छेदों में उस विषय का प्रतिपादन करते हुए उसके लाभ और हानियों आदि का वर्णन करना चाहिए। इसमें विचारों की बहुलता का समावेश करके उन्हें पृथक्-पृथक् अनुच्छेदों में बाँट कर लिखना चाहिए। कुछ विषय ऐसे भी होते हैं, जिनमें लाभ-हानि दिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, अपितु किसी दृश्य या घटना का सुन्दर शैली में वर्णन करना पड़ता है। अतः निबन्ध के विषय के अनुसार हो उसके मध्य भाग में हानि-लाभ अथवा दृश्य या घटना का सुन्दर शैली में वर्णन करना चाहिए। इसी भाग में विभिन्न उदाहरणों से अपने मत की पुष्टि की जाती है।
  3. उपसंहार या अन्त-जिस प्रकार निबन्ध की भूमिका का आकर्षक होना अत्यावश्यक है, उसी प्रकार निबन्ध का उपसंहार भी आकर्षक होना चाहिए। इस भाग में विद्यार्थियों को उन बातों का संक्षिप्त सार देना चाहिए, जिन्हें वे इससे पूर्व लिख चुके हैं। यदि निबन्ध का अन्त किसी उद्धरण से किया जाए तो वह अधिक प्रभावशाली रहता है।

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निबन्ध के चार मुख्य तत्त्व

  1. आत्माभिव्यक्ति
  2. पाठकों से आत्मीयता स्थापित करना
  3. एकान्विति
  4. सजीव एवं आकर्षक शैली

आत्माभिव्यक्ति

यह निबन्ध का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व होता है। इसका अभिप्राय यह है कि निबन्ध का लेखक किसी विषय के सम्बन्ध में दूसरों के ही मतों को न देता रहे, अपितु अपने निजी विचारों को प्रकट करते हुए यह दिखाए कि उसके बारे में लेखक की निजी मान्यताएं और विचार क्या हैं?

पाठकों से आत्मीयता स्थापित करना

पाठकों से आत्मीयता स्थापित करना इसका अभिप्राय यह है कि निबन्धकार निबन्ध में वाक्यों की योजना इस प्रकार करे, जिससे पाठकों को ऐसा प्रतीत हो, मानो लेखक हमसे बातचीत-सी कर रहा है और अपने विचार को हमसे छिपा नहीं रहा, अपितु उनको वास्तविक रूप में प्रगट कर रहा है।

एकान्विति

इसका अभिप्राय यह है कि किसी निबन्ध के विभिन्न अनुच्छेदों में जो विचार व्यक्त किये हैं, वे बिखरे-बिखरे और असम्बद्ध न हों, वरन् उनमें तारतम्य हो। उसके सभी विचार और उदाहरण आदि मूल विषय से अवश्य सम्बन्ध रखते हों।

सजीव एवं आकर्षक शैली

निबन्ध की शैली का सजीव और सरस होना परमावश्यक होता है; क्योंकि सरस-सजीव शैली ही निबन्ध का प्राण होती है। निबन्ध में यदि किसी कहानी या घटना का वर्णना करना हो, तब भी उस घटना या कहानी के स्थान पर उस निबन्ध की शैली पर ही विशेष बल देना चाहिए।

विचारात्मक निबन्ध

विचारात्मक निबन्धों में किसी विषय का प्रतिपादन विभिन्न प्रकार के प्रमाण और तर्क देते हुए किया जाता है। इनकी शैली भी प्राय: गम्भीर हुआ करती है। नाना प्रकार के प्रमाण, तर्क और दृष्टांत देकर किसी विषय का स्पष्टीकरण और प्रतिपादन करने की प्राय: दो शैलियां अपनाई जाती हैं (क) आगमन शैली-इसमें निबन्ध लेखक किसी निश्चित सिद्धान्त के स्पष्टीकरण के लिए अनेक प्रकार के उदाहरण और प्रमाण दिया करता है। (ख) निर्गमन शैली-इसमें निबन्ध लेखक विविध प्रकार के प्रमाणों के आधार पर कोई सिद्धान्त स्थापित किया करता है।

भावात्मक निबन्ध

जिन निबन्धों में विचारों के स्थान पर भावों की प्रधानता रहती है, उन्हें भावात्मक निबन्ध कहते हैं। इन निबन्धों में लेखक किसी विषय का तर्क और प्रमाणों के आधार पर विवेचन नहीं करता, अपितु अपनी अनुभूतियों और भावों को व्यक्त करने पर बल दिया करता है। इन निबन्धों में भावुकता का पुट है। अधिक रहता है।

वर्णनात्मक या विवरणात्मक निबन्ध

इस प्रकार के निबन्धों में प्रकृति, नगर, ग्राम, युद्ध, खेल, यात्रा आदि का वर्णन किया जाता है। ये निबन्ध मुख्यतया सूचनात्मक हुआ करते हैं। इनमें लेखक वर्ण्य-विषय का अधिक से अधिक स्पष्ट और पूर्ण विवरण देने की चेष्टा करता है। निबन्ध लेखन के लिए कुछ उपयोगी परामर्श

  • निबन्ध की भूमिका आकर्षक और सरस शैली में देनी चाहिए। उसका प्रत्येक वाक्य एक-दूसरे से भली प्रकार जुड़ा हो तथा भूमिका या अंतिम वाक्य में विषय की ओर संकेत किया जाए।
  • निबन्ध के एक अनुच्छेद में किसी एक ही भाव की अभिव्यक्ति करनी चाहिए।
  • इन अनुच्छेदों का एक-दूसरे से सम्बन्ध रहना चाहिए।
  • किसी भाव या विचार को निबन्ध में बार-बार नहीं दुहराना चाहिए।
  • इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि विषय से सम्बन्धित बातें तो छूटने न पायें और अनावश्यक बातें कही न जायें।
  • अपने मत के समर्थन के लिए यथासम्भव संस्कृत, अंग्रेजी और हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकारों को उक्तियां उद्धृत करनी चाहिएँ।
  • निबन्ध की भाषा सरल, रोचक और स्पष्ट हो तथा उसकी शैली बड़ी आकर्षक हो।
  • उसमें अपनी निजी मान्यताएँ देने पर विशेष बल देना चाहिए।
  • निबन्ध का उपसंहार भी अत्यधिक आकर्षक और प्रभावी होना चाहिए।
  • आविष्कार सम्बन्धी निबन्धों में उस आविष्कार की तिथि, आविष्कार करने वाले का नाम, उसके लाभ तथा हानियों का वर्णन करना चाहिए।
  • महापुरुषों की जीवनी से सम्बन्धित निबन्धों में उनको जन्म तिथि, उनके माता-पिता का नाम, तत्कालीन परिस्थिति, उनकी शिक्षा-दीक्षा, किसी क्षेत्र विशेष में उनके योगदान का उल्लेख करना चाहिए। अन्त में उनके जीवन से मिलने वाली शिक्षा का तथा यदि वह महापुरुष जीवित हो तो भगवान से उनकी दीर्घायु की कामना करनी चाहिए।
  • उत्सव या पर्व सम्बन्धी निबन्धों से उनके मानने की तिथि, उन्हें मनाने के कारण, मनाने की विधि, उनसे सम्बन्धित कथाओं और लाभ का वर्णन तथा कुरीतियों की निन्दा करनी चाहिए।
  • आत्म-कथात्मक निबन्धों में उत्तम पुरुष का प्रयोग करना ही उचित रहता है। जैसे-यदि रुपये की आत्मकथा लिखनी हो तो वह रुपया बताए कि मेरा जन्म कैसे हुआ था? मैं किस-किस के पास घूमता-फिरता हूँ? आदि।
  • निबन्ध का समापन करते हुए अन्तिम अनुच्छेद के उस निबन्ध में आई बातों का सार देना चाहिए।
  • यदि निबन्धों की’ शब्द-संख्या ‘ दी गई है तो यह चेष्टा करनी चाहिए कि दस-बीस शब्दों के हेर-फेर से निबन्ध उतना ही बड़ा हो।

निबंध लिखने का सही तरीका क्या है इनके बारे में आपको पूरी जानकारी दी गई है।

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Kamlesh Kumar

मेरा नाम कमलेश कुमार है। मैं मास्टर इन कंप्यूटर एप्लीकेशन (Master in Computer Application) में स्नातकोत्तर हूं और CanDefine.com में एडिटर के रूप में कार्य करता हूँ। मुझे इस क्षेत्र में 3 वर्ष का अनुभव है और मुझे हिंदी भाषा में काफी रुचि है। मेरे द्वारा स्वास्थ्य, कंप्यूटर, मनोरंजन, सरकारी योजना, निबंध, जीवनी, क्रिकेट आदि जैसी विभिन्न श्रेणियों पर आर्टिकल लिखता हूँ और आपको आर्टिकल में सारी जानकारी प्रदान करना मेरा उद्देश्य है।

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