निमोनिया क्या होता है? क्या आप जानते है निमोनिया रोग किस वायरस से होता है?

निमोनिया क्या होता है (Nimoniya Kya Hota Hai), निमोनिया रोग हिब वायरस की वजह से हो सकता है। हिब क्या है इससे कौन से रोग उत्पन्न होते हैं। हिमोफिलस इंफ्लुएंजा टाइप-बी का संक्षिप्त नाम है हिब। यह एक बैक्टीरिया है जो निम्नलिखित सहित अन्य गंभीर संक्रमण उत्पन्न करता है:

निमोनिया क्या होता है (Nimoniya Kya Hota Hai)

निमोनिया क्या होता है
Nimoniya Kya Hota Hai

हिब क्या है

  • बैक्टीरियल मैनिजाइटिस रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क को ढकने और उनकी रक्षा करने वाली झिल्ली की सूजन यह एक गंभीर संक्रमण है।
  • निमोनिया फेफड़ों की सूजन।
  • सेप्टिसेमिया खून में रोगजनक बैक्टीरिया की उपस्थिति।
  • सेप्टिक आर्थाइटिस जोड़ों की सूजन।
  • एपिग्लोटाइटिस वाक् तंत्र क्षेत्र के आसपास की सूजन नली में रुकावट। यह ध्यान में रखना चाहिए कि हिब रोग और हेपेटाइटिस-बी रोग अलग-अलग और सांस की है जोकि जिगर की सूजन का एक वायरस जनित रोग है।

हिब रोग एक जन स्वास्थ्य समस्या क्यों है?

इस बैक्टीरिया से निमोनिया (कम आयु में बच्चों की मृत्यु का एक प्रमुख कारण) और मैनिंजाइटिस सहित गंभीर रोग उत्पन्न होते हैं जिनके कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ सकता है और मृत्यु भी हो सकती है। ये तथ्य हिब रोग को एक जन स्वास्थ्य समस्या बनाते हैं।

हिब संक्रमण कैसे फैलता है?

जब एक संक्रमित बच्चा खांसता या छींकता है तो उसकी लार की बूंदों से अन्य बच्चों में यह संक्रमण फैलता है। जिन खिलौनों या अन्य चीजों को बच्चे अपने मुँह में डाल लेते हैं, उनसे साथ-साथ खेलने वाले अन्य बच्चों को भी हिब संक्रमण प्रभावित करता है।

हिब संक्रमण किसको हो सकता है? किन बच्चों को संक्रमण का सबसे ज्यादा ख़तरा है?

5 वर्ष से कम आयु के बच्चों को हिब अधिकतर प्रभावित करता है, 4 से 18 माह की आयु के बच्चे सबसे अधिक जोखिम में होते हैं। पाँच वर्ष की अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते अधिकांश बच्चे इस रोग से प्रतिरक्षण के लिए पर्याप्त एंटीबॉडीज विकसित कर लेते हैं, जिससे बड़े बच्चों और वयस्कों में हिब के कारण होने वाली गंभीर बीमारियों का प्रकोप कम देखा जाता है।

क्या एंटीबायोटिक दवाएँ हिब संक्रमण की रोकथाम करती हैं?

इसके उपचार के लिए एंटीबायोटिक दवाएँ हमेशा ही प्रभावी नहीं होतीं। यहाँ तक कि एंटीबायोटिक दवाओं और सबसे अच्छी चिकित्सकीय देखभाल के बावजूद 3 से 5 प्रतिशत मैनिंजाइटिस रोगियों की मृत्यु हो जाती है।

इसके के कुछ खास बैक्टीरियाओं में अब एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोध की क्षमता विकसित हो गई है, जिससे इसका उपचार अब और भी मुश्किल हो गया है।

हिब से होने वाले संक्रमण की रोकथाम कैसे की जा सकती है?

इससे होने वाले अधिकांश संक्रमण की रोकथाम हिब टीके से की जा सकती है। जिन बच्चों को संक्रमण हुआ है, उनके परिवारजनों को एंटीबायोटिक देकर कुछ मामलों को तो रोका जा सकता है परंतु यह अधिकतम 1% से 2% मामले तक हो सकते हैं।

हिब टीकाकरण कितना प्रभावी है?

यह केवल हिब बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमणों से बचाव करता है। हिब टीकाकरण के बाद भी किसी अन्य वायरस या बैक्टीरिया से बच्चे को निमोनिया, मैनिंजाइटिस या फ्लू हो सकता है।

हिब टीके से किसको प्रतिरक्षित किया जाना चाहिए?

आमतौर पर नियमित टीकाकरण कार्यक्रम के अंतर्गत एक वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों (शिशुओं) को हिब टीका लगना चाहिए। यह पेंटावैलेंट टीके के रूप में नियमित टीकाकरण कायक्रम में दिया जाता है।

हिब टीके की कितनी खुराकों की आवश्यकता है? इन्हें कब दिया जाना चाहिए?

हिब टीके की तीन खुराकें आवश्यक हैं। 6 सप्ताह पूरे होने पर बच्चे को पहली खुराक दी जाती है। पेंटावैलेंट टीके की दूसरी और तीसरी खुराक 10वें और 14वें सप्ताहों पर दी जाती है। UIP में हिब के बूस्टर खुराक की कोई सलाह नहीं दी गई है।

हिब को पेंटावैलेंट टीके के रूप में ही क्यों दिया जाता है, अलग से क्यों नहीं?

6, 10 और 14 सप्ताहों में डी.पी.टी., हेपेटाइटिस-बी, हिब रोग के टीके देने की समय सारणी एक ही है। इस प्रकार, यदि ये टीके अलग-अलग लगाए जाएँ, तो बच्चे को ज्यादा सुइयाँ लगेंगी (3 बार में कुल मिलाकर 9 सुइयाँ) | पेंटावैलेंट टीका सुइयों की संख्या को घटा कर तीन करता है।

हिब के बारे में प्रमुख संदेश

  • हर वर्ष, विश्व भर में हिब रोग 5 वर्ष से कम आयु के 3,70,000 बच्चों की मृत्यु का कारण बनता है। इनमें से लगभग 20% बच्चे भारत के होते हैं।
  • हिब रोग के पश्चात् जीवित बचे अधिकतर बच्चों में दीर्घकालिक प्रभाव रह जाते हैं, जैसे स्थायी लकवापन, बहरा हो जाना या मस्तिष्क क्षतिग्रस्त हो जाना।
  • हिब टीके से निमोनिया के एक तिहाई मामलों की और हिब मैनिंजाइटिस के 90% मामलों की रोकथाम हो सकती है।
  • पेंटावैलेंट टीका पाँच संभावित मृत्युकारक रोगों से बचाता है गलघोंटू टिटनेस, काली खांसी, हिब और हेपेटाइटिस बी।
  • पेंटावैलेंट टीका लगाने से बच्चे को लगने वाली सुइयों की संख्या कम हो जाएगी।

भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित भारत के अन्य राज्यों में 5 घातक रोगों गलघोंटू, काली खांसी, टिटनेस, हेपेटाइटिस बी और हिमोफिलस इफ्लुएंजा टाइप-बी से बचाव के लिए हेपेटाइटिस बी के साथ पेंटावैलेंट टीके को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया है।

इससे पूर्व शिशुओं को इन घातक बीमारियों से बचाव के लिए 3 बार में कुल मिलाकर 9 सुइयाँ लगती थीं। अब 6,10,14 सप्ताह में शिशु को केवल 1 पेंटावैलेंट टीका, सुइयों की संख्या को घटा कर 3 कर देगा। उपरोक्त जानलेवा रोगों के साथ-साथ हिमोफिलस इंफ्लुएंजा टाइप-बी से होने वाले गंभीर रोगों, जैसे- निमोनिया, मैनिंजाइटिस, सेप्टिसेमिया, एपिग्लोटाइटिस और सेप्टिक आर्थ्रोइटिस आदि की रोकथाम भी होगी। निमोनिया क्या होता है

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