पीलिया होने का कारण, लक्षण, इलाज, आहार और यौगिक उपचार

पीलिया होने का कारण, लक्षण, इलाज, आहार और यौगिक उपचार क्या है इसके बारे में बिस्तर से बताया गया है। वैज्ञानिक भाषा में यकृत दाह को हिपेटाईटिस पीलिया (Piliya Hone Ka Karan) कहा जाता है जो यकृत (लीवर) में किसी गड़बड़ी के कारण उत्पन्न (Jaundice) होता है। यह गड़बड़ी अनेक प्रकार की औषधियों, विषैले पदार्थों के सेवन से तथा वायरस के संक्रमण के कारण असंख्य जीवकोषों के नष्ट हो जाने से पैदा होती है। किन्हीं कारणों से जब पित्त का स्राव रुक जाता है तो वह सीधे रक्त में मिलकर सारे शरीर को पोला बना देता है। इसीलिये इसे पीलिया या कामला इसे चार भागों में बाँटा जा सकता हतै रोग (जॉण्डिस) कहते हैं।

पीलिया होने का कारण

पीलिया होने का कारण

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पीलिया के प्रकार

1. अवरोधजनित पीलिया

जब पित्त की पथरी, राउण्डवर्म आदि कृमि, जन्मजात स्ट्रिकचर, डिमीडनल अल्सर से उत्पन्न अवरोध पित्त प्रणाली में ट्यूमर, गुर्दे का (किडनी) का ट्यूमर आदि कारणों से पित्ताशय की नली अवरुद्ध हो जाती है तब पित्त ट्यूडिनल में न जाकर सीधे खून में मिल जाता है। फलस्वरूप, इस प्रकार का पीलिया उत्पन्न हो जाता है ।

लक्षण – इस प्रकार के पीलिया में मल सिलेटी, राख या मिट्टी के रंग का हो जाता है । इसके सड़ने की प्रक्रिया बढ़ने लगती है, वसा पच नहीं पाती है, पेशाब का रंग गहरा पीला हो जाता है, रक्त में पित्त बिलीरुबिन, कॉलेस्ट्राल की मात्रा तथा रक्त जमने का समय बढ़ जाता है। शरीर में खुजली उत्पन्न हो जाती है, आँख का कंजक्टाईबा पीले रंग का हो जाता है, खून की कमी होने की संभावना हो सकती है, यकृत (लीवर) बढ़ जाता है।

2. विषयुक्त पीलिया

इस प्रकार की पीलिया विष जीवाणु जैसे न्यूमोनिया, सिफलिस, सेप्टीसीमिया, टाइफाइड, टाइफस, रिलैप्सिंग, मलेरिया, स्पाइरोकीटोसिस लेप्टास्पाइरल जॉण्डिस, पित्तज्वर, गर्भावस्था का विष, रक्त संचय वाला हृदय रोग आदि कारणों से होता है। रासायनिक विष जैसे आर्सेनिक, ट्राइनाइट्रो फास्फोरस, आसीमोंबेंजोल, सिनकोफैन, ईथर, क्लोरोफार्म ट्रेटाक्लाथैन, टाल्यूओल आदि रसायन भी इस रोग को उत्पन्न कर देते हैं ।

लक्षण – विषयुक्त पीलिया में ड्यूडिनल में कुछ न कुछ मात्रा में विष पहुँचता रहता है पर मल के रंग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है अतः संक्रमण या विष का प्रभाव पता नहीं चल पाता है। पीलिया के अन्य लक्षण भी स्पष्ट रूप से नहीं दिखते। जिसके कारण यह रोग पनपता रहता है। इस अवस्था में सिरोसिस या एट्राफी हो सकता है।

3. रक्त की कमी से उत्पन्न पीलिया

स्ट्रेप्टोकोकल संक्रमण, सर्पविष. गलत ग्रुप के रक्त का बढ़ जाना, परनिसश रक्तहीनता अथवा किन्हीं जन्मजात कारणों से जीवाणु काफी मात्रा में टूटकर या नष्ट होकर हिमोलिटिक पीलिया उत्पन्न करते हैं । इसमें हीमोग्लोबिन स्वतंत्र होकर पोलिया पैदा करता है। इसको मेडिकल भाषा में ‘इकटरस’ भी कहते हैं । इसमें यकृत (लीवर) तो बढ़ जाता है पर पाखाना पेशाब का रंग सामान्य ही रहता है ।

4. हिपेटोसेल्युलर पीलिया

इस प्रकार के पीलिया में यकृत (लीवर) की कोशिकाऐं संक्रमित होकर रुग्ण हो जाती हैं जिसके कारण यकृत (लीवर) में सूजन उत्पन्न हो जाती है । यकृत की कोशिकाऐं विलीरुबीन का उपयोग नहीं कर पार्ती जिसके कारण वह खून में जमा हो जाता है। पाखाने का रंग तो सामान्य ही रहता है पर पेशाब गहरे पीले रंग का होने लगता है ।

शरीर में लीवर (यकृत) की स्थिति

लीवर पसली की अंतिम रेखा के नीचे उदर के दाहिने भाग में सबसे ऊपर स्थित रहता है। स्वस्थ्य व्यक्तियों में इसका वजन डेढ़ किलोग्राम से 4 किलोग्राम तक होता है। यह शरीर का सबसे बड़ा अंग होता है जो रसायनों का भण्डार कहा जाता है। लीवर का रंग गहरा लाल होता है। व्यक्ति का लीवर दो प्रमुख भागों में विभक्त होता है। इसका ऊपरी भाग उदर के दाहिने ओर नीचे धंसा होता है।

लीवर (यकृत) का कार्य

चिकित्सकों के अनुसार लीवर शरीर के लिए आवश्यक प्रमुख रसायनों का उत्पादक माना गया है। यह शरीर के लिए आवश्यकतानुसार चयापचय (मेटाबालिज्म) सामग्री एकत्र करने, भोजन को पचाने, चर्बी या प्रोटीन के पाचन का कार्य करता है। यह पित्त रस को आँतों में पहुँचाता है तथा रक्त की शुद्धिकरण भी करता है। रक्त में जमने वाले तत्वों को प्रभावित करता है जिससे रक्त लाल रूप में सदा प्रवाहित होता रहता है।

लीवर (यकृत) की आंतरिक संरचना

जिन कोशिकाओं से लीवर बनता है उन्हें हिपेटोसाइटिस कहते हैं। इनकी संख्या करोड़ों में होती है। एक-एक हिपेटोसाइटिस लीवर की सम्पूर्ण क्रिया विधि को सम्पादित करने की क्षमता रखती है। ऐसी असंख्य कोशिकाएँ (हिपेटोसाइटिस) रक्त की नली में रस्सीनुमा पंक्ति में पड़ी पाई जाती है। यह संरचना अंतड़ियों में लाये पोषक तत्वों और ऑक्सीजन से संतृप्त होती है, क्योंकि ये कोशिकाऐं उन दोनों तत्वों का शोषण कर लेती हैं। उक्त प्रक्रिया से लीवर में पित्त का निर्माण होता है जो पित्त नलिका में प्रवाहित होता है। यहीं से अल्ब्यूमिन नामक प्रोटीन की रचना होती है जो रक्त के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है।

लीवर का प्लीहा (स्प्लीन) एवं किडनी (वृक्क) से गहरा सम्बन्ध होता है। स्प्लीन (प्लीहा) रक्त की टूटी-फूटी कोशिकाओं को छानती हैं, इसके बाद लीवर उन अपशिष्ट पदार्थों को पित्त से उत्सर्जन करता है। जो लौह तत्व शेष बचे रह जाते हैं, उनका पुन: उपयोग हो जाता है। भोजन में प्राप्त अमीनो एसिड को लीवर प्रोटीन एवं एंजाइम में परिवर्तित करता है जो शरीर के चयापचय (मेटाबोलिज्म), स्वास्थ्य-रक्षा एवं सृजन कार्य में अत्यन्त सहायक हैं।

इस प्रक्रिया में नाइट्रोजन अमोनिया में परिवर्तित होता है जो मस्तिष्क के लिए अत्यन्त हानिकारक तत्व है। लीवर इस हानिकारक अमोनिया को यूरिया में बदलता है जो किडनी द्वारा पेशाब के रूप में निकाल दिया जाता है। हिपेटाइटिस (पीलिया) के समय चित्त-भ्रम की स्थिति इसी अमोनिया की रक्त में अधिकता के कारण होती है। अत: शराबी के चित्त में भ्रम का कारण मात्र शराब ही नहीं होती, वरन् लीवर का क्षय भी।

पीलिया (हिपेटाइटिस) के लक्षण

इस रोग की शुरुआत में कोई विशेष लक्षण स्पष्ट नहीं होते। पर, सामान्य रूप से इस रोग की पहचान भूख कम लगने से तथा कमजोरी होने से हो जाती है। कुछ समय बाद उल्टी, बुखार, शरीर एवं सिर में दर्द के रूप में लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इस अवस्था में रोगी का मूत्र गाढ़ा, पीला या नारंगी रंग का हो जाता है। लीवर का साइज बहुत बड़ा हो जाता है, दाहिनी पसलियों के नीचे दर्द होने लगता है।

अतः ये व्यक्ति को पाण्डु रोग (पीलिया) अर्थात् (जाइनडिस) हो आँख का सफेद भाग पीला हो जाता है और रोगी काफी कमजोरी महसूस करता है। यह पाण्डु रोग (पीलिया) इस बात का स्पष्ट संकेत है कि लिवर रक्त में दूषित पदार्थों को साफ करने की क्षमता को खो चुका है। इन पदार्थों की अधिकता हो जाने के कारण सम्पूर्ण शरीर की कोशिकाओं का रंग पीला हो जाता है। पूरा शरीर तनावयुक्त हो जाता है और उसमें खुजली होने लगती है।

पीलिया (हिपेटाइटिस) के कारण

लीवर अपना कार्य कई कारणों से बन्द कर देता है। इसमें प्रमुख कारण वायरस का संक्रमण अर्थात् इन्फेक्शन है। वायरस में हिपेटाइटिस ‘ए’ एवं ‘बी’ होते हैं। दूसरा प्रमुख कारण शराब का सेवन दवाऐं एवं रसायन हैं।

हिपेटाइटिस ‘ए’

इसको इन्फेक्टिव हिपेटाइटिस कहते हैं यह दूषित जल, खाद्य पदार्थ और अन्य रोगी के सम्पर्क में आने से होता है। यह साधारण रूप में स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल और संस्थाओं में पाया जाता है।

हिपेटाइटिस ‘बी’ :

इसको वाइरल हिपेटाइटिस भी कहते हैं। यह वायरस लार, रक्त तथा शरीर के स्रावों में रहता। इसके रक्त में प्रवेश कर जाने के कारण रोग की सम्भावनाऐं प्रबल हो जाती हैं। यह वास्तव में अधिक खतरनाक रोग है। इसके उत्पन्न होने का कारण किसी रोग के उपचार के लिए दवाओं में मादक द्रव्य, स्टीरायड एजेन्ट, गर्भ निरोधक एवं एण्टीबायोटिक दिया जाना। यह चीजें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर देती हैं।

पीलिया (हिपेटाइटिस) रोग का निदान

इस रोग के 95% रोगी छः सप्ताह में ठीक हो जाते हैं। पर, उन्हें अनिवार्य रूप से विषाक्त पदार्थों के सेवन से बचना ही चाहिये। अन्यथा, इस रोग के पलट आने पर लीवर अपना कार्य बिल्कुल बन्द कर देता है। फलस्वरूप, विषाद-द्रव्य रक्त से छन नहीं पाते और रोगी का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है जो हिपेटिक कोमा में ढकेल देता है जो अन्ततोगत्वा रोगी के प्राण ही हर लेता है।

प्रारम्भिक उपचार

इस रोग में उल्टियाँ आने का कारण क्षारीय द्रव्य की अधिकता है जो लीवर एवं आमाशय की ग्रन्थि में बनता है। खट्टे पदार्थ इन क्षारीय द्रव्यों को उदासीन कर देते हैं अत: रोगी को शर्करायुक्त हल्के भोज्य पदार्थ खट्टे फल जैसे नीबू, अनन्नास, नारंगी, पका पपीता एवं गन्ने का सेवन करना चाहिये। साथ ही साथ यदि उपवास एवं पूर्ण आराम भी किया जाये तो शीघ्र लाभ मिल सकता है।

पानी तो अधिक से अधिक पीना चाहिये तथा ऐसा कोई पदार्थ नहीं लेना चाहिये जिससे लीवर पर भारी दबाव पड़े इस अवस्था में कम से कम छः सप्ताह तक कोई आसन एवं प्राणायाम नहीं करना चाहिये। हाँ, योग निद्रा का अभ्यास तो करना चाहिये। मितली अधिक मालूम पड़ने पर मीठे पदार्थ, फल, ग्लूकोज लेना चाहिये। यह लीवर की रक्षा करते हैं।

माध्यमिक उपचार

जब रोगी का बुखार कम हो जाये और वह अपने में कुछ ताकत महसूस करने लगे तो उसे प्रात: टहलना, धूप का सेवन, कुंजल क्रिया एवं योग निद्रा का अभ्यास करना चाहिये।

आहार

जब बुखार बिल्कुल न रहे तो दिन में तीन-चार बार सब्जी का सूप लेना चाहिये। फिर इसके बाद उबला हुआ भोजन लिया जा सकता है। इस अवस्था में दूध एवं फल का सेवन तो आवश्यक है। जब यह सब पचने लग जायें तो अन्न देना शुरू कर देना चाहिये। पर, हल्का एवं सुपाच्य भोजन ही लिया जाये। घी, मसाले, गरिष्ठ भोजन का सेवन तो बिल्कुल न किया जाये। शराब का सेवन तो विष के समान है। यदि रोगी की स्थिति ठीक है तो (अगर हो सके तो) बीच में दवाओं का प्रयोग बन्द करके देखना चाहिये और क्षमतानुसार हल्के काम करना शुरू करा देना चाहिये।

यौगिक उपचार

पूर्ण स्वास्थ्य लाभ होने के बाद रोगी को ‘धूप स्नान’ करना चाहिये तथा ऐसे काम करने शुरू कर देना चाहिये जिससे पसीने के माध्यम से शरीर के विषाक्त द्रव्य निकल जायें।

आसन

  1. हस्त पादासन
  2. जानुशीर्षासन (महामुद्रा )
  3. अर्द्ध मत्स्येन्द्रासन
  4. कूर्मासन
  5. उष्ट्रासन
  6. वज्रासन
  7. उत्तानपादासन
  8. धनुरासन
  9. चक्रासन
  10. शलभासन
  11. भुजंगासन
  12. सर्वांगासन
  13. हलासन
  14. मत्स्यासन

प्राणायाम

1.भस्त्रिका प्राणायाम
2.सूर्य भेदन प्राणायाम
3.नाड़ी शोधन प्राणायाम
पीलिया होने का कारण

उक्त प्राणायामों का अभ्यास रोग के उपचार में सकारात्मक भूमिका निभाता हैं।

आहार सम्बन्धी सुझाव

फल-

लीवर के समस्त रोगों में नीबू, संतरा, मौसम्मी, आम, अंगूर, पपीता, चीकू, आलू बुखारा, लीची, शरीफा, अनन्नास, चकोतरा, आँवला आदि खट्टे, अर्द्ध खट्टे फल लाभदायक सिद्ध होते हैं

सब्जियाँ

मूली का पत्ता, पालक, टमाटर, लौकी, लहसुन, चौलाई, टिण्डा, तोरई, गाजर, गोभी का भी प्रयोग किया जाता है ।

अन्न

हाथ से कुटे चावल का भात, पालक के रस में गुँदी चोकर समेत मोटे आटे की रोटी का प्रयोग करें। प्रोटीनयुक्त मठा तो यकृत (लीवर) के लिए श्रेष्ठतम पथ्य है।

आसन, प्राणायाम आदि का अभ्यास अपनी क्षमतानुसार ही करना चाहिये। अगर किसी में कठिनाई लगे तो जोर-जबरदस्ती नहीं करनी चाहिये। अच्छा हो, यदि सब अभ्यास किसी योग चिकित्सक की देख-रेख में किये जायें। रोगमुक्त होने पर सर्वदा यही प्रयास करना चाहिये कि हम उचित जीवनचर्या द्वारा पाचन शक्ति एवं रक्त की शुद्धता बनाये रखें।

बचाव

  • तले भुने आहार, माँस, मदिरा, तम्बाकू, बाजारू आहार, फास्ट फूड, जंक फूड, कनफेक्शनरी, सिन्थेटिक आहार का प्रयोग हानिकारक होता है।
  • रोग के दौरान वसा वाले आहार घी, मक्खन आदि बंद रखें । लाभ होने पर तिल, मूँगफली, सरसों, सोयाबीन, सूर्यमुखी का तेल का प्रयोग कर सकते हैं।
  • फल, सब्जी आदि बाजार में खरीदने के बाद उनको भली भाँति धोकर ही प्रयोग करें । बाजार का खुली जगह का कोई आहार बिल्कुल न खायें।

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अस्वीकरण – यहां पर दी गई जानकारी एक सामान्य जानकारी है। यहां पर दी गई जानकारी से चिकित्सा कि राय बिल्कुल नहीं दी जाती। यदि आपको कोई भी बीमारी या समस्या है तो आपको डॉक्टर या विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। Candefine.com के द्वारा दी गई जानकारी किसी भी जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

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Mamta Jain

मैं ममता जैन मीडिया क्षेत्र में मैं तीन साल से जुड़ी हुई हूं। मुझे लिखना काफी पसन्द है और अब मैने यही मेरा प्रोफेशन बना लिया है। मैं जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएट हूं। हेल्थ, स्वास्थ्य, मनोरंजन, सरकारी योजना, क्रिकेट, न्यूज़ और ब्यूटी पर लिखने में मेरा स्पेशलाइजेशन है। हेल्थ और ब्यूटी से जुड़ी जानकारी जानने के लिए मुझे फॉलो करें।

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