प्रात: कालीन भ्रमण पर निबंध? प्रात: कालीन भ्रमण का आनंद पर निबंध?

प्रात: कालीन भ्रमण पर निबंध (Pratah Kalin Bhraman Par Nibandh), “पहला सुख नीरोगी काया”, इस उक्ति के अनुसार शरीर का नीरोग व के स्वस्थ रहना ही मनुष्य के लिए सबसे बड़ा सुख है, क्योंकि स्वस्थ शरीर से ही व्यक्ति सभी प्रकार के कर्त्तव्यों का निर्वाह कर सकता है और आनन्द भी पा सकता है। जो व्यक्ति स्वस्थ और नीरोग रहते हैं, वे स्वभाव से प्रसन्न देखे जाते हैं और उनका मन भी उद्यम करने में लगता है। इसके विपरीत जो रोगी या अस्वस्थ रहते हैं। प्रातः काल का समय बहुत सुहावना होता है। अन्धकार दूर हो जाता है। पक्षी कलरव करने लगते हैं। शीतल मन्द सुगन्ध समीर बहने लगती है। ओस की बूँदें मोतियों की तरह चमकती प्रतीत होती हैं। प्रकृति में नई चेतना आ जाती है।

प्रात: कालीन भ्रमण पर निबंध (Pratah Kalin Bhraman Par Nibandh)

प्रातः कालीन भ्रमण पर निबंध
Pratah Kalin Bhraman Par Nibandh

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प्रात: कालीन भ्रमण पर निबंध

प्रकृति-नटी का श्रेष्ठतम रहस्य उषा काल में ही प्रकट होता है। उस रहस्य का आनन्द पाने का सौभाग्य प्रातः भ्रमण के व्यसनियों को ही मिल सकता है। देर तक सोते रहने वाले क्या जान सकते हैं कि प्रातः उषा अपने सुनहरे आंचल से आकाश के ओर-छोर को कैसे स्वर्णाभ बना देती है? मलयानिल किस प्रकार अद्भुत आनन्द प्रदान करता है और कैसे फूलों में, पत्तों में सिहरन उत्पन्न कर देता है?

प्रातःकाल के ऐसे मनोहर समय को निद्रा में पड़े रहकर गुजारना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है। शीघ्र उठने से मनुष्य स्वस्थ रहता है। स्वस्थ पुरुष धनोपार्जन कर सकता है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क की परिकल्पना काफी प्राचीन है।

प्रातः काल का महत्व

प्रातःकाल अत्यन्त श्रेष्ठ काल है। इसीलिए तो ऋषि मुनियों ने रात्रि के अन्तिम प्रहर में शैया त्याग करने का अमूल्य उपदेश दिया है। सभी मनुष्यों को सूर्योदय से पूर्व ही उठना चाहिए और प्रातःकाल भ्रमण करके प्रकृति की सुन्दरता का अवलोकन करना चाहिए।

प्रातः कालीन भ्रमण की आवश्यकता

जो व्यक्ति प्रातःकाल की बेला में प्रकृति के खुले वातावरण में कार्य करते हैं, उन्हें प्रातःकालीन भ्रमण की शायद आवश्यकता न हो, परन्तु विशाल नगरों की तंग गलियों में निवास करने वाले नागरिकों के लिए प्रातःकालीन भ्रमण अत्यन्त आवश्यक है।

नगरों में दिन का वातावरण बहुत कोलाहलपूर्ण होता है। कल-कारखानों के धुएँ से वातावरण विषाक्त हो जाता है। ऐसे वातावरण में रहने से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अतः प्रातःकाल के समय यदि भ्रमण न किया जाये तो स्वास्थ्य चौपट हो जायेगा।

भ्रमण करते समय हमें अपनी गति को बहुत तीव्र या मन्द नहीं रखना चाहिए। भ्रमण प्रतिदिन नियमित रूप से करना चाहिए तभी उसका यथेष्ठ लाभ मिल सकेगा। प्रातःकाल का भ्रमण यदि किसी साथी के साथ किया जाय तो अधिक उपयुक्त रहता है। क्योंकि उससे मन बहला रहता है। अकेला होने पर मनुष्य शीघ्र ऊब जाता है और वापस लौट आता है।

प्रातः कालीन भ्रमण से लाभ

प्रातःकालीन भ्रमण से अनेक लाभ हैं। यह प्रकृति प्रदत्त एवं निःशुल्क औषधि है, जिसका निर्धन और धनवान, सभी समान रूप से प्रयोग करने में स्वतन्त्र हैं। प्रातःकाल की वायु स्वास्थ्यवर्द्धक होती है। अतः ऐसे समय भ्रमण करने से मनुष्य के अनेक रोग स्वतः ही दूर हो जाते हैं।

शरीर बलिष्ठ और सुन्दर बनता है। नई स्फूर्ति प्राप्त होती है और आलस्य दूर हो जाता है। मस्तिष्क को शान्ति और शक्ति मिलती है। परिणामस्वरूप स्मरणशक्ति का विकास होता है। प्रातःकाल भ्रमण करते समय अनेक व्यक्ति खुली हवा में व्यायाम करते मिलते हैं, जिन्हें देखकर व्यायाम करने की प्रेरणा मिलती है।

धर्मात्मा पुरुष मन्दिरों की ओर जाते दिखाई पड़ते हैं जिससे भ्रमणार्थी के मन में भी धार्मिक भावनाओं का उदय होता है। प्रातःकालीन भ्रमण प्रत्येक आयु के स्त्री-पुरुष और बालक के लिए समान रूप से लाभ पहुँचाता है।

आनन्द का वायुमण्डल

प्रातःकालीन भ्रमण वास्तव में उपयोगी और आनन्ददायक होता है। प्रातः मन्द-मन्द शीतल वायु चलती है; उषा का उदय हो रहा होता है; पक्षी कलवर करते हैं, फूल खिल उठते हैं, उन पर भौंरे गूंजने लगते हैं। इस बातावरण में भ्रमण से शरीर को स्फूर्ति, शान्ति और आनन्द मिलता है। गर्मियों में लगभग चार-पाँच बजे और सर्दियों में पाँच-छह बजे का समय प्रातःकालीन भ्रमण के लिए सर्वाधिक है उपयुक्त है।

प्रातः भ्रमण कैसे करें?

प्रातः भ्रमण सदा किसी रमणीय स्थान पर करना चाहिए, ताकि चित्त प्रसन्न रहे। पहाड़ी स्थान की ओर घूमने जाना, सुन्दर बगीचे में घूमना, जहाँ रंग-बिरंगे खिल रहे हों या किसी नदी या झील के किनारे घूमना श्रेष्ठ रहता फूल है, क्योंकि जितनी स्वच्छ और मस्त हवा इन स्थानों पर मिलती है, अन्यत्र उसका मिलना दुर्लभ है। आजकल बड़े-बड़े नगरों में हरियाली, नदी व झील का मिलना कठिन है, वहाँ खुली चौड़ी सड़क पर, जिसके दोनों ओर पेड़ लगे हों, घूमना उत्तम है। प्रातः भ्रमण के समय वस्त्र एकदम चुस्त न पहनें। अत्यधिक चुस्त कपड़े नुकसान देते हैं। अब सैर करने निकल पड़िए, परन्तु आपका मन किसी प्रकार की चिन्ता में न उलझा हो, वरना सब व्यर्थ है। चिंता चिता से बढ़कर होती है। आतंक था। अनुशासन अच्छी वस्तु है, वह डंडे के जोर से नहीं, अपितु हृदय के अन्दर से आना चाहिए। आत्मानुशासन ही अनुशासन का श्रेष्ठ रूप है।

उपसंहार

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि प्रातःकाल का समय बड़ा सुहावना होता है। पक्षी अपने कलरव से इस वातावरण को और भी मधुर बना देते हैं। रस, के प्रेमी भँवरे एवं तितलियाँ नया राग अलापते हैं। प्राकृतिक वैभव सर्वत्र बिखरा रहता है, अतः हमें ऐसे समय का सदुपयोग करना ही चाहिए। प्रातःकाल का भ्रमण • शारीरिक दृष्टि से ही नहीं मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी लाभप्रद है।

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