राजा महेन्द्र प्रताप का जीवन परिचय? राजा महेन्द्र प्रताप पर निबंध?

राजा महेन्द्र प्रताप का जीवन परिचय (Raja Mahendra Pratap Ka Jeevan Parichay), राजा महेन्द्रप्रताप का जन्म 1886 ई० में अलीगढ़ के मुरसान नामक राज्य में हुआ था। उनके पिता का नाम राजा घनश्याम सिंह था। वे अपने पिता की तीसरी संतान थे। उनके पिता ने उनका नाम खड्गसिंह रखा था। कहा जा सकता है कि उनके पिता ने उनका नाम खड्गसिंह ठीक ही रखा था, क्योंकि वे अत्याचारी गोरों के शासन के लिए खड्ग के ही सदृश थे।

राजा महेन्द्र प्रताप का जीवन परिचय (Raja Mahendra Pratap Ka Jeevan Parichay)

राजा महेन्द्र प्रताप का जीवन परिचय

राजा महेन्द्र प्रताप का जीवन परिचय (Raja Mahendra Pratap Ka Jeevan Parichay)

पूरा नामराजा महेन्द्र प्रताप
जन्म1 दिसम्बर 1886
जन्म स्थानअलीगढ़ के मुरसान नामक राज्य
पिता का नामराजा घनश्याम
मृत्यु29 अप्रैल, 1979

राजा महेन्द्रप्रताप भी एक ऐसे ही महान तपस्वी और साधक थे। वे राजा के घर पैदा हुए थे। राजा की उपाधि से विभूषित थे। घर में सुख था, सम्पदा थी, नौकर-चाकर थे, मर्यादा और प्रतिष्ठा भी थी। किन्तु जब देश-प्रेम हृदय में पैदा हुआ, तो देश की स्वतंत्रता के लिए बिना किसी मोह-ममता के सबको छोड़ दिया सब कुछ त्याग दिया।

वीतरागी संन्यासी की भांति घर से निकल गये, विदेशों में दर-दर भटके और आपदाओं की राह पर चले। उनके त्याग, उनके साहस और उनके कष्ट-सहन की कहानी बड़ी ही प्रेरणादायिनी है।

किन्तु खड्गसिंह नाम स्थायी नहीं रह सका। खड्गसिंह जब कुछ बड़े हुए, तो हाथरस के राजा हरिनारायण सिंह ने उन्हें अपना दत्तक पुत्र बना लिया। हरिनारायण सिंह ने उनका नाम भी बदल कर महेन्द्रप्रताप रख दिया। कहा जा सकता है कि उनका यह नाम भी ठीक ही था, क्योंकि वे इन्द्र की भांति महान तेजस्वी और प्रतापी थे। हाथरस राजा का दत्तक पुत्र होने पर महेन्द्रप्रताप सिंह वृन्दावन में केशी घाट

पर हरिनारायण सिंह के राजभवन में रहने लगे। उनकी शिक्षा-दीक्षा अलीगढ़ और आगग में हुई। विद्यार्थी जीवन में ही उनके हृदय में देशभक्ति का सागर उमड़ने लगा था। वे महान् देशभक्तों और महान पुरुषों का केवल अध्ययन ही नहीं करते थे, उनके सांचे में अपने जीवन को ढालने का प्रयत्न भी किया करते थे।

राजा महेन्द्रप्रताप जब बड़े हुए तो एक ऐसे भारत की कल्पना करने लगे, जो सब प्रकार की सुख-सुविधाओं और शान्ति से परिपूर्ण हो; किन्तु उनकी यह कल्पना अंग्रेजों के रहते हुए साकार नहीं हो सकती थी। अतः उन्होंने अंग्रेजों को भारत से निकालने का निश्चय किया, किन्तु यह काम सरल नहीं था।

उन्होंने अंग्रेजों को निकालने के उद्देश्य से ही शिक्षा के ढांचे को बदलने का निश्चय किया। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा के लिए मथुरा और वृन्दावन की सड़क पर प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की। प्रेम महाविद्यालय के संचालन के लिए उन्होंने तेईस लाख रुपये तो दिये ही, अपनी आधी जमींदारी भी दे दी।

प्रेम महाविद्यालय की स्थापना

प्रेम महाविद्यालय की स्थापना के बाद महेन्द्रप्रताप भारत की स्वतंत्रता के लिए अलख जगाने लगे। उन्होंने उस समय के बड़े-बड़े क्रान्तिकारियों से भी संपर्क स्थापित किया। कहा जाता है, वे रासबिहारी बोस और भाई बालमुकुन्द से भी मिले थे।

वह एक ऐसा युग था, जब भारत में रहकर भारत की स्वतंत्रता के लिए कार्य करना कठिन था, क्योंकि स्वतंत्रता के साधकों के लिए पग-पग पर जेल की सजा और फांसी का फंदा मौजूद रहता था। 1914 ई० में विश्व के प्रथम महायुद्ध की आग प्रज्वलित हुई।

अंग्रेज उस युद्ध में बुरी तरह फंसे हुए थे। अतः कहा जाता है कि वह समय भारत की स्वतंत्रता के लिए बड़ा उपयुक्त था, पर भारत में रहकर स्वतंत्रता के लिए अखंड ज्योति जागृत करना भी अत्यंत कठिन था।

राजा महेन्द्रप्रताप सिंह का मन स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए व्याकुल हो रहा था। वे शीघ्र से शीघ्र भारत को अंग्रेजों के पंजे से मुक्त कराना चाहते थे। अतः वे पत्नी, घर-द्वार और सुख-सम्पदा छोड़कर संन्यासी की तरह घर से निकल गये।

राजा महेन्द्रप्रताप सिंह विदेशों में

राजा महेन्द्रप्रताप सिंह लगभग 30 वर्षों तक विदेशों में रहे। वे भारत की स्वतंत्रता के लिए दर-दर भटके, गली-गली घूमे। उन्होंने कितने ही ऐसे कार्य किये, जो बड़े साहस के थे। वे संकटों से ही नहीं, मृत्यु से भी नहीं डरे। कितनी बार ऐसे भी अवसर आये, जब वे भयानक संकटों के जाल में फंस गये।

किन्तु अपने साहस से संकटों के जाल को छिन्न-भिन्न करके बाहर निकल गये। उन्होंने एक ऐसा कदम भी उठाया था, जो बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों को भी आश्चर्य में डाल देने वाला था। उनका वह कदम था, अस्थायी सरकार स्थापना। यद्यपि उनकी वह सरकार अधिक दिनों तक नहीं चली, किन्तु उससे उनके साहस और उनकी चमत्कारी शक्ति का पता तो चलता ही है।

राजा महेन्द्रप्रताप के विदेश जाने के पूर्व के जीवन पर कुछ प्रकाश डालना उचित ही होगा। उनकी शिक्षा अलीगढ़ गवर्नमेंट हाई स्कूल और एम०एस० कॉलेज में हुई थी।

यही कालेज आगे चलकर अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कुछ लोगों का कथन है कि उन्होंने आगरा में भी कुछ दिनों तक शिक्षा प्राप्त की थी।

हरिनारायण सिंह की मृत्यु के पश्चात् उनका राज्य कोर्ट आफ वार्ड्स के अधीन हो गया था। 1906 ई० में राजा महेन्द्रप्रताप सिंह हरिनारायण के दत्तक पुत्र होने के कारण उनके राज्य के वास्तविक अधिकारी हुए। 1907 ई० में कलकत्ता कांग्रेस में सम्मिलित हुए थे।

राजा महेन्द्रप्रताप सिंह की अद्भुत विचारधारा

कलकत्ता कांग्रेस में ही उनकी भेंट मदनमोहन मालवीय और सुन्दरलाल जी से हुई थी। मालवीय जी के विचारों से वे अधिक प्रभावित हुए। मालवीय जो भी उनका बड़ा आदर करते थे। थे । स्वयं 1909 ई० में राजा महेन्द्रप्रताप सिंह जी के मस्तिष्क में एक अद्भुत विचार उत्पन्न हुआ।

उन्होंने अपने सभी सम्बन्धियों को पत्र भेज कर निमंत्रित किया। उन्होंने निमंत्रण पत्र में लिखा था- अमुक तिथि पर वे अपने पुत्र का जन्मोत्सव मनाएंगे। जन्मोत्सव में सबको भाग लेना चाहिए। सम्बन्धियों के अतिरिक्त मित्रों, हितैषियों और कुछ नेताओं को भी उन्होंने निमंत्रित किया था।

निश्चित तिथि पर सभी लोग एक विशाल पंडाल में एकत्र हुए। उन एकत्र स्त्री में पुरुषों में मालवीय जी एकत्र हुए। सर्वप्रथम विधिपूर्वक यज्ञ संपन्न हुआ। एकत्र जन समुदाय की आंखें महेन्द्रप्रताप जी के पुत्र को देखने के लिए उत्कंठित हो रही थीं। कुछ लोग तो पुत्र को देने के लिए सुन्दर वस्त्रों और खिलौनों का उपहार भी लाये थे।

किन्तु वहां पुत्र कहां था? पुत्र के रूप में था प्रेम महाविद्यालय। राजा महेन्द्रप्रताप जी ने घोषणा करते हुए कहा- “मेरा पुत्र एक राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान है, जिसका नाम प्रेम महाविद्यालय है। में शिक्षा के द्वारा देश के स्वरूप को बदल देना चाहता हूं। मेरा प्रेम महाविद्यालय उसी राष्ट्रीय शिक्षा की एक कड़ी है।”

महेन्द्रप्रताप जी के विचारों को सुनकर एकत्र जन समुदाय आश्चर्य की लहरों में डूब गया। स्वयं मालवीयजी ने भी उनके विचारों की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। महेन्द्रप्रताप जी ने प्रेम महाविद्यालय की केवल स्थापना ही नहीं की, उसे चलाने के लिए अपनी आधी जमींदारी भी उसके नाम लिख दी। उसी तरह लिख दी, जिस तरह कोई पिता अपने पुत्र के नाम अपनी जायदाद लिख देता है।

प्रेम महाविद्यालय 1909 ई० को 24 मई को स्थापित हुआ था। कहा जाता है कि राजा महेन्द्रप्रताप पहले अपने विद्यालय का नाम राष्ट्रीय महाविद्यालय रखना चाहते थे, किन्तु कुछ लोगों ने इस नाम के प्रति अपनी सहमति प्रकट नहीं की। उनका कहना था कि वृन्दावन श्रीकृष्ण की लीला भूमि है।

अतः महाविद्यालय का नाम श्रीकृष्ण की लीला पर ही आधारित होना चाहिए, फलस्वरूप महेन्द्रप्रताप जी ने राष्ट्रीय महाविद्यालय के स्थान पर प्रेम महाविद्यालय कर दिया। यह भी कहा जाता है कि महेन्द्रप्रताप जी अपनी संपूर्ण सम्पत्ति प्रेम महाविद्यालय के नाम लिख देना चाहते थे, किन्तु मालवीय जी ने इसका विरोध किया।

उन्होंने कहा, यदि वे अपनी संपूर्ण सम्पत्ति प्रेम महाविद्यालय को दे देंगे, तो उनके कुटुम्बियों के जीवन का निर्वाह कैसे होगा? फलस्वरूप आधी सम्पत्ति देकर ही उन्होंने संतोष की सांस ली। प्रेम महाविद्यालय की स्थापना के पश्चात राजा महेन्द्रप्रताप यूरोप गये।

उन्होंने यूरोप के कई देशों में भ्रमण किया वे राजनीतिज्ञों और विचारकों से भी मिले। जब यूरोप से लौटकर आये, तो क्रान्तिकारियों के साथ उनका संपर्क हुआ। कहा जाता है, वे रासबिहारी बोस, भाई बालमुकुंद और लाला हरदयालजी के भी संपर्क में आये थे।

1914 ई० में जब विश्व का प्रथम युद्ध छिड़ा तो राजा महेन्द्रप्रताप ने सदा के लिए भारत छोड़ देने का निश्चय किया, क्योंकि वे भारत की स्वतंत्रता के लिए जो कार्य करना चाहते थे, उसे भारत में रहकर नहीं कर सकते थे। उन्होंने अपने राज्य को एक ट्रस्ट के अधीन कर दिया। उन दिनों उनकी पत्नी अपनी पुत्री के साथ देहरादून में रहती थीं।

उन्होंने अपनी पत्नी के पास जाकर उन्हें जब देश को छोड़ने की बात कही तो वे बिलख पड़ीं। उनकी पुत्री की आंखों से भी अब्रुओं की झड़ी लग गई। किन्तु पत्नी और पुत्री की आंखों के आंसू भी उन्हें बांध नहीं सके। वे निर्मम योगी की भांति पत्नी के आंसुओं के सागर को लांघ कर यूरोप के लिए चल दिये।

राजा महेन्द्रप्रताप के पास यूरोप जाने का पास नहीं था। यदि वे पास के लिए लिखा-पढ़ी करते, तो कदाचित् गोरी सरकार उनके यूरोप जाने में विघ्न उत्पन्न करती, क्योंकि वे अपने कार्यों के कारण सरकार की नजरों में आ चुके थे।

अतः उन्होंने बिना पासपोर्ट के ही यूरोप जाने का निश्चय किया। 1918 ई० की 20 दिसम्बर के दिन वे अपनी पत्नी से विदा लेकर बम्बई पहुंचे। बम्बई में टामस कुक एण्ड कम्पनी से इंग्लैंड का टिकट खरीद कर उसके जहाज पर सवार हुए।

उनका जहाज जब फ्रांस के मार्सेल्स बन्दरगाह पर पहुंचा तो वे जहाज से नीचे उतर गये। उन्होंने बन्दरगाह के अंग्रेज अधिकारी से थल मार्ग से इंग्लैंड जाने की अनुमति मांगी। उसने अनुमति दे तो दी, किन्तु वे इंग्लैण्ड न जाकर स्विट्जरलैण्ड चले गये।

श्यामजी कृष्ण वर्मा और लाला हरदयाल उन दिनों स्विट्जरलैण्ड में ही रहते थे। महेन्द्रप्रताप जी पहले श्यामजी से और फिर लाला हरदयाल जो से मिले। हरदयाल जी ने उन्हें जर्मनी जाने की सलाह दी। किन्तु उन्होंने इस शर्त पर जर्मनी जाना स्वीकार किया कि जर्मनी का सम्राट कैसर उनसे मिलेगा।

हरदयालजी ने महेन्द्रप्रताप को जर्मनी के राजदूत से मिलाया। किन्तु राजदूत यह वचन देने में असमर्थ रहा कि सम्राट कैसर उनसे मिलेगा। अतः महेन्द्रप्रताप ने जर्मनी न जाकर अमेरिका में कैलिफोर्निया जाने का विचार किया। उन दिनों कैलिफोर्निया में एक विश्व प्रदर्शनी भी हो रही थी।

फलतः महेन्द्रप्रताप जी कैलिफोर्निया के लिए चल पड़े। यहां यह बता देना आवश्यक है कि महेन्द्रप्रताप जी के साथ स्वामी श्रद्धानन्दजी के पुत्र हरिश्चन्द्र जी भी स्विट्जरलैण्ड गये थे। वे भी उनके साथ ही साथ श्यामजी कृष्ण वर्मा और हरदयाल जी से मिले थे। महेन्द्रप्रताप जी जब कैलिफोर्निया के लिए चले, तो हरिश्चन्द्र स्विट्जरलैण्ड से जिनेवा चले गये।

महेन्द्रप्रताप जी अभी मार्ग में ही थे कि उन्हें जिनेवा से हरिश्चन्द्र जी का एक तार मिला– सब कुछ ठोक है, चले आइये। फलतः महेन्द्रप्रताप कैलिफोर्निया न जाकर जिनेवा चले गये। जिनेवा में उनकी भेंट सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी वीरेन्द्र कुमार चट्टोपाध्याय जी से हुई। चट्टोपाध्याय ने उन्हें वचन दिया कि यदि वे जर्मनी चलें, तो उनकी भेंट जर्मनी के सम्राट कैंसर से हो सकती है। अतः चट्टोपाध्याय जी के आश्वासन पर महेन्द्रप्रताप जर्मनी चले गये।

जर्मनी जाने के पूर्व महेन्द्रप्रताप जी ने कुछ भारतीय नेताओं से भी सम्पर्क स्थापित किया था। उन नेताओं में लाला लाजपतराय, काशी के शिवप्रसाद गुप्त और झालरा पाटन के राजा मुख्य थे। इन नेताओं का मत था कि महेन्द्रप्रताप जी को जर्मनी नहीं जाना चाहिए, और युद्ध में जर्मनी की सहायता भी नहीं करनी चाहिए।

किन्तु महेन्द्रप्रताप जी को इन नेताओं का यह सुझाव अच्छा नहीं लगा। उनका विचार था कि युद्ध में जर्मनी की सहायता करके उसकी सहानुभूति प्राप्त करनी चाहिए और भारत से अंग्रेजों को बाहर निकालने के लिए उससे सहायता भी लेनी चाहिए।

जर्मनी से सहायता प्राप्त करने के उद्देश्य से पहले से ही बर्लिन में एक भारतीय समिति काम कर रही थी। किन्तु उस समिति के प्रति जर्मनी का रवैया अच्छा नहीं था। किन्तु जब महेन्द्रप्रताप बर्लिन गये, तो जर्मनों के रवैये में परिवर्तन हो गया। जर्मन सरकार ने महेन्द्रप्रताप जी को अतिथि के रूप में स्वीकार किया। उन्हें सरकारी निवास में ठहराया गया।

महेन्द्रप्रताप जी जर्मन सरकार के वायुयान द्वारा पोलैण्ड गये। यह पहला अवसर था जब वे वायुयान पर सवार हुए थे। उन्होंने पोलैण्ड जाकर पोलैण्ड के मोर्चे को देखा। जर्मन सेनापतियों से भी उनकी भेंट कराई गई। उनसे कहा गया कि यदि युद्ध में जर्मनी को विजय प्राप्त हो गई, तो वह भारत से अंग्रेजों को बाहर निकालने के लिए 25 हजार सैनिक देगा।

महेन्द्रप्रताप की इच्छानुसार ही सम्राट कैंसर से उनकी भेंट कराई गई। कैसर ने उनका बड़ा आदर-सत्कार किया जर्मन सरकार और महेन्द्रप्रताप जी में एक महत्त्वपूर्ण समझौता हुआ। उस समझौते के अनुसार महेन्द्रप्रताप जी का तुर्किस्तान, अफगानिस्तान और नेपाल जाना तय हुआ। यह भी तय हुआ कि महेन्द्रप्रताप जी भारत के 26 राजाओं को पत्र लिखेंगे।

उन्हें प्रेरित करेंगे वे युद्ध में जर्मनी की सहायता करेंगे और अंग्रेजों की पराजय के लिए प्रयत्न करेंगे। समझौते के ही अनुसार जर्मनी के चांसलर होलबेग ने महेन्द्रप्रताप जी को एक पत्र लिख कर दिया। उसने अपने पत्र में लिखा था- “राजा महेन्द्रप्रताप भारतीय स्वतंत्रता के प्रतिनिधि है।

जर्मनी की सरकार उनके प्रतिनिधित्व को स्वीकार करती है और यह वचन देती है कि यदि जर्मनी युद्ध में विजयी हो गया, तो वह भारत से अंग्रेजों को निकालने के लिए अवश्य भारतीयों की सहायता करेगा।”

प्रतिनिधि मंडल के साथ काबुल के लिए रवाना हो गये। उनके प्रतिनिधि मंडल में कई जर्मन, कुछ अफरीदी और भारतीय क्रान्तिकारी बरकतुल्ला भी थे।

महेन्द्रप्रताप जी अपने प्रतिनिधि मंडल के साथ बुडापेस्ट और वियना होते हुए कुस्तुनतुनियां पहुंचे। कुस्तुनतुनियां में उनकी भेंट तुर्की के शाह से हुई।

शाह ने उनका बड़ा आदर-सत्कार किया। तुर्किस्तान में अपना कार्य पूरा करने के पश्चात महेन्द्रप्रताप जी काबुल के लिए चल पड़े। तुर्किस्तान के युद्ध मंत्री अनवर पाशा ने उन्हें एक परिचय पत्र लिख कर दिया था, जो अफगानिस्तान के शाह के नाम था।

काबुल पहुंचने के प्रयास में राजा महेन्द्रप्रताप जी को बड़े ही संकटों का सामना करना पड़ा था। मार्ग रेगिस्तानी था। भोजन और जल का संकट तो था ही, अंग्रेजों के द्वारा पकड़े जाने का भी डर था। मार्ग में बड़े-बड़े रेत के टीले भी थे। गर्मी के कारण दिन में चलना बड़ा कठिन था। रेत की आंधियां चल-चल कर आंखों में रेत डाल देती थीं।

अतः महेन्द्रप्रताप जी अपने दल के साथ रात में ही यात्रा किया करते थे। संकटों और मृत्यु के थपेड़ों से जूझते हुए वे किसी तरह काबुल जा पहुंचे। मार्ग में यह अवश्य हुआ कि उनके दल के कुछ जर्मन अंग्रेजों के द्वारा गिरफ्तार कर लिये गये थे, जो दल से पृथक् होकर चल रहे थे।

राजा महेन्द्रप्रताप जी जब काबुल पहुंचे, तो उनका बड़ा आदर-सत्कार किया गया। अफगानिस्तान में अमीर हबीबुल्ला ने बड़े प्रेम से उनसे भेंट की और उनका बड़ा आदर-सम्मान किया। महेन्द्रप्रताप जी ने अमीर के सहयोग से काबुल में भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की।

उन्होंने एक बड़ी सभा में घोषणा की भारत की यह अस्थायी सरकार भारत की स्वतंत्रता के लिए युद्ध करेगी। महेन्द्रप्रताप जी ने अस्थायी सरकार के राष्ट्रपति और बरकतुल्ला ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की थी।

उन दिनों काबुल की जेल में सैकड़ों भारतीय बन्दी थे। उन बन्दियों में कुछ ऐसे लोग भी थे जो राजनीतिक थे। राजनीतिक बन्दियों में अब्दुल्ला सिंधी और डॉ० मथुरा सिंह मुख्य थे। महेन्द्रप्रताप जी के प्रयत्नों से वे सभी बन्दी मुक्त कर दिये गये।

अब्दुल्ला और डॉ० मथुरा सिंह जब जेल से बाहर निकले तो उन्हें भी अस्थायी सरकार ने महत्त्वपूर्ण पदों पर प्रतिष्ठित किया और अब्दुल्ला को प्रकाशन मंत्री और मथुरा सिंह को राजदूत बनाया गया था।

1916 में अफगानिस्तान के अमीर ने एक राजनीतिक समारोह में भारत की अस्थायी सरकार के साथ एक संधि की संधिपत्र में अमीर ने अपने हस्ताक्षर से लिखा था- “भारत से अंग्रेजों को हटाने के लिए अफगानिस्तान वचनबद्ध हो रहा है।

वह अंग्रेजों से युद्ध करेगा और सहायता के रूप में भारतीयों को 25 हजार सैनिक भी देगा।” संधि में यह भी कहा गया था कि जब जर्मन सेना अफगानिस्तान पहुंचेगी, तो अफगानिस्तान ब्रिटिश भारत पर आक्रमण कर देगा।

किन्तु संधि को कार्य रूप में परिणत नहीं किया जा सका। इसका कारण यह है कि जर्मन सेनाएं अफगानिस्तान नहीं पहुंच सकों और हबीबुल्ला की हत्या कर दी गई हबीबुल्ला के पश्चात नसीरुल्ला और उनके पश्चात् अमानुल्ला खां अफगानिस्तान के शाह हुए। 1919 ई० में संधि के अनुसार अमानुल्ला ने अंग्रेजों से युद्ध करना प्रारम्भ कर दिया।

उन्होंने संधि के ही अनुसार 9 मई के दिन सारे भारत सशस्त्र क्रान्ति कराने का निश्चय किया। पेशावर के पोस्ट मास्टर के द्वारा सारे भारत में संदेश भी भेज दिया गया। किन्तु 9 मई के पूर्व ही भेद खुल गया, फलस्वरूप सशस्त्र क्रान्ति नहीं हो सकी। भारत में क्रान्ति से सम्बन्धित कई क्रान्तिकारी गिरफ्तार कर लिये गये।

उधर अफगानिस्तान में कुछ ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हुई, जिनके कारण अमानुल्ला को अंग्रेजों से संधि कर लेनी पड़ी। अमानुल्ला ने जब अंग्रेजों से संधि कर ली तो अफगानिस्तान में स्थापित अस्थायी भारत सरकार भंग कर दी गई, पर उस समय भी महेन्द्रप्रताप और उनके मित्रों को काबुल में ही रहने दिया गया। महेन्द्रप्रताप मजार में रहते थे और अब्दुल्ला सरकारी काम-काज देखते थे।

जर्मनी की ओर से कुछ होते न देखकर महेन्द्रप्रताप जी ने रूस की ओर अपना हाथ बढ़ाया। जब वे देहरादून में थे, तो स्वर्गीय पुरुषोत्तमदास टंडन ने उन्हें सलाह दी थी कि उन्हें जर्मनी की ओर हाथ न बढ़ाकर रूस की ओर हाथ बढ़ाना चाहिए, क्योंकि रूस एक खेतिहर देश है।

रूस की सहायता प्राप्त करने के उद्देश्य से महेन्द्रप्रताप जी ने डा० मथुरासिंह के द्वारा जार के पास एक पत्र भेजा। किन्तु मथुरासिंह जार से नहीं मिल सके। ताशकन्द के गवर्नर ने पत्र तो ले लिया, पर उन्हें ताशकन्द से ही वापस लौटा दिया। इसका कारण यह था कि उन दिनों रूस और अंग्रेजों में मित्रता थी।

मथुरासिंह दूसरी बार भी रूस गये, किन्तु वे सीमा पर ही गिरफ्तार कर लिये गये। उन्हें अंग्रेजों के सुपुर्द कर दिया गया। मथुरासिंह की गिरफ्तारी के पश्चात् महेन्द्रप्रताप जी ने स्वयं रूस जाने का प्रयत्न किया, किन्तु उनके मित्रों ने उन्हें सलाह दी थी कि, उनका रूस जाना उनके लिए हितकर नहीं होगा।

फलतः उन्होंने रूस न जाकर चीन जाने का निश्चय किया। वे चीन की सीमा में प्रवेश करने वाले थे कि चीन और जर्मनी में युद्ध छिड़ गया। उधर रूस में भी क्रान्ति हो गई। राजा महेन्द्रप्रताप चीन न जाकर पुनः काबुल लौट गये।

राजा महेन्द्रप्रताप ने काबुल में रहकर सेना संगठित की। उन्होंने ईरान और तुर्किस्तान से भी सैनिक सहायता लेने का प्रयत्न किया, किन्तु उनकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी। अतः वं काबुल से बुखारा चले गये। बुखारा से पेट्रोग्राड पहुंचे। आजकल पेट्रोग्राड को ही लेनिनग्राड कहते हैं। पेट्रोग्राड में उनकी भेंट सुप्रसिद्ध रूसी नेता ट्राटस्की से हुई।

महेन्द्रप्रताप जी ने ट्राटस्की से भारत की सहायता करने के लिए कहा, किन्तु उन्हें ट्राटस्की से भी उचित आश्वासन नहीं मिला, अतः वे निराश होकर पुनः बर्लिन चले गये। बर्लिन में उन्होंने फिर दूसरी बार कैंसर से भेंट की। उन्हें आशा थी।

कि कैंसर भारत की स्वतंत्रता के लिए उचित रूप से सहायता प्रदान करेगा, किन्तु उनकी आशा पूरी नहीं हो सकी। अतः वे चार्लिन से तुर्किस्तान की राजधानी इस्ताम्बूल चले गये। वहां वे तुर्किस्तान के युद्ध मंत्री अनवर पाशा से मिले। किन्तु वहां भी स्थितियां उनके अनुकूल नहीं रहीं। वहां भी उन्हें निराशा का ही मुख देखना पड़ा।

फलतः राजा महेन्द्रप्रताप इस्ताम्बूल से हंगरी, बर्लिन और बर्लिन से म्यूनिक गये। कुछ दिनों तक म्यूनिक में रहकर फिर बर्लिन चले आये। बर्लिन में कैंसर का पतन होने के पश्चात् वे रूस गये। जब वे रूस गये तो उनका साथ देने के लिए बरकतुल्ला भी वहां पहुंच गये थे। रूस में उनकी भेंट लेनिन से हुई। लेनिन ने उन्हें सहायता देने का वचन तो दिया ही, धन देने का भी वचन दिया।

राजा महेन्द्रप्रताप एक प्रतिनिधि मंडल के साथ पुन: अफगानिस्तान गये। कुछ दिनों तक काबुल में रहने के पश्चात् वे पुनः मास्को चले गये। मास्को में उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। उन दिनों बरकतुल्ला वहां उर्दू के अध्यापक के पद पर थे। कई महीनों के पश्चात् जब स्वास्थ्य अच्छा हुआ तो वे पहले वर्लिन और फिर वे स्विट्जरलैण्ड गये। जिनेवा में उनकी भेंट उनके बड़े भाई से हुई।

महेन्द्रप्रताप जी अब तक अंग्रेजों के लिए बड़े भयावह बन चुके थे। अंग्रेज गुप्तचर उनके पीछे लगे रहते थे। अतः वे एक ऐसी जगह जाना चाहते थे जहां अंग्रेज गुप्तचर उनके लिए संकट न खड़ा कर सकें। इसी विचार से उन्होंने जापान जाने का निश्चय किया। जापान जाने के पूर्व वे सेनफ्रांसिस्को गये। सेनफ्रांसिस्को में वे गदर पार्टी के कार्यकर्ताओं से मिले। उन दिनों गदर पार्टी के अध्यक्ष श्री जगत सिंह थे।

महेन्द्रप्रताप जी सेनफ्रांसिस्को से जापान चले गये। उन दिनों याकोहामा में रासबिहारी बोस रहते थे। उन्होंने रासविहारी बोस से भेंट की। वे कुछ दिनों तक याकोहामा में रहने के पश्चात् पेकिंग गये। पेकिंग में उन्होंने चीनी नेताओं से भेंट की।

पेकिंग से रूस और रूस से पुनः अफगानिस्तान गये। काबुल में रहते हुए उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के सम्बन्ध में कई लेख लिखे, जो ‘प्रताप’ और ‘स्वराज्य’ आदि पत्रों में प्रकाशित हुए थे। उन्होंने उसी समय श्री जवाहरलाल नेहरू से पत्र व्यवहार किया था।

1924 ई० में महेन्द्रप्रताप जी पुनः भारत की स्वतंत्रता के सम्बन्ध में प्रचार के लिए निकले। वे हिन्दूकुश पर्वत की दुर्गम चढ़ाइयों को पार करके रूस गए। रूस में जब वे लेनिनग्राद में थे, तो गिरफ्तार कर लिये गये। किन्तु कुछ दिनों के पश्चात् छोड़ दिये गये। छूटने पर बर्लिन चले गये। बर्लिन से पेरिस और पेरिस से अमेरिका गये।

अमेरिका से तिब्बत और तिब्बत से नेपाल जाने का निश्चय किया। उनका विचार था कि वे नेपाल जाकर वहां के राणा से मिलेंगे और उनकी सहायता से भारत को स्वतंत्र कराने का प्रयत्न करेंगे। उन्होंने अपनी योजना की सूचना क्रान्तिकारियों को भी दे दी। फलस्वरूप भारतीय क्रान्तिकारी बड़ी उत्सुकता से उनके आगमन की प्रतीक्षा से करने लगे।

राजा महेन्द्रप्रताप के विचारों का पहले तो उनके मित्रों ने विरोध किया, किन्तु बाद में सहमति प्रगट कर दी। गदर पार्टी ने राजा साहब को 12 हजार डालर और सात स्वयंसेवक भी दिये। वे अमेरिका से पहले जापान और फिर उसके पश्चात् पेकिंग गये। पेकिंग को सरकार ने उन्हें तिब्बत जाने की अनुमति दे दी और उनकी रक्षा के लिए कुछ सशस्त्र सिपाही भी उनके साथ कर दिये।

महेन्द्रप्रताप जी, अगस्त को पेकिंग से तिब्बत के लिए चले। काफी कठिनाइयों के पश्चात् वे 2 अक्तूबर को तिब्बत की सीमा पर पहुंच सके थे। उनकी आगे की यात्रा बड़ी कठिन थी। एक तो भयंकर जाड़ा और दूसरे डाकुओं का भय मार्ग भी पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ था। फिर भी महेन्द्रप्रताप आगे की ओर चल पड़े, क्योंकि वे देश की स्वतंत्रता के लिए मृत्यु का भी वरण करने को उद्यत रहते थे।

महेन्द्रप्रताप जी जब तिब्बत की एक चौकी पर पहुंचे तो उन्हें आगे जाने से रोक दिया गया। उनसे कहा गया, जब तक ल्हासा से अनुमति नहीं आ आयेगी, तब तक उन्हें चौको पर हो रहना पड़ेगा। फलस्वरूप महेन्द्रप्रताप जी वहीं रुक गये।

चार मास की कठिन प्रतीक्षा के पश्चात् दलाई लामा का आदेश-पत्र प्राप्त हुआ जो निराशाजनक था उस पत्र के अनुसार महेन्द्रप्रताप जी तिब्बत के मार्ग से नेपाल नहीं जा सकते थे क्योंकि तिब्बत और अंग्रेजों में मित्रता थी।

अतः महेन्द्रप्रताप जी नेपाल नहीं जा सके। वे वहीं से पेकिंग लौट गये। कुछ दिनों तक पेकिंग में रहने के पश्चात् वे जापान चले गये। जापान में 1926 ई० में उन्होंने एशियाई सम्मेलन में भाग लिया। यह सम्मेलन नागासाकी में अगस्त के महीने हुआ में था।

महेन्द्रप्रताप जी के पास जापान का वीसा नहीं था। अत: जापानी पुलिस ने उन्हें जापान में रहने नहीं दिया। फलतः वे पुनः चीन लौट गये। पेकिंग में चीनी डिक्टेटर से मिले जिसने उन्हें आश्वासन दिया कि वह उनकी तिब्बत यात्रा के लिए सहयोग प्रदान करेगा।

किन्तु महेन्द्रप्रताप जी तिव्बत न जाकर बर्लिन चले गये। उन दिनों पं० जवाहरलाल स्विट्जरलैण्ड में थे। उनके पिता मोतीलाल जी भी उनके साथ में थे। महेन्द्रप्रताप जी स्विट्जरलैण्ड में जवाहरलाल जी से मिले। वे उन्हें रूस ले जाना चाहते थे।

किन्तु उस समय जवाहरलाल जी रूस नहीं जा सके। वे कुछ दिनों बाद रूस गये थे। महेन्द्रप्रताप जी स्विट्जरलैण्ड से सेनफ्रांसिस्को चले गये क्योंकि उन्हें गदर पार्टी को अपनी तिब्बत यात्रा के खर्च का हिसाब देना था। सेनफ्रांसिस्को में बरकतुल्ला भी उनके साथ थे जिनका वहीं निधन हो गया।

महेन्द्रप्रताप जी सेनफ्रांसिस्को से फिर पेकिंग चले गये। पेकिंग में उन्होंने एशियाई सम्मेलन में भाग लिया। सन् 1930 में महेन्द्रप्रताप जी अमेरिका गये। उन्होंने अमेरिका में भाषण करते हुए कहा था, “वे एक ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते हैं, जिसमें प्रत्येक मनुष्य निर्भयता और स्वतंत्रता के साथ रह सके। महेन्द्रप्रताप जी अमेरिका से जापान गये।

जापान से पुनः चीन गये। चीन से मंगोलिया और रूस गये। रूस से पुनः जापान लौट गये और वहीं बस गये। जापान में उन्होंने विश्वसंघ और सर्वधर्म की स्थापना की जब दूसरा महायुद्ध आरंभ हुआ, तो महेन्द्रप्रताप जी पुनः सक्रिय हुए। वे पुनः भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करने लगे; किन्तु जापान सरकार उन पर विश्वास नहीं करती थी अतः वे गिरफ्तार करके जेल में डाल दिये गये।

युद्ध में जब जापान की पराजय हुई, तो महेन्द्रप्रताप जी अमेरिका के राजनीतिक बन्दी हुए। 1947 ई० की 15 अगस्त को भारत स्वतंत्र हुआ। गांधी जी के प्रयत्नों से महेन्द्रप्रताप जी को कारागार से मुक्त कर दिया गया। उन्होंने 1947 ई० के अगस्त मास में भारत पहुंचकर वर्धा में गांधीजी और जवाहरलाल जी से भेंट की। वर्धा से वे वृन्दावन गये, जहां से उन्होंने अपनी यात्रा प्रारंभ की थी।

उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो चुका था। महेन्द्रप्रताप जी प्रथम तो लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे, किन्तु पांच वर्ष की अवधि पूरी होने के पूर्व ही देहरादून में उनका स्वर्गवास हो गया। महेन्द्रप्रताप जी की 31 वर्षों की जीवन-कहानी एक ऐसी कहानी है, जो रोंगटे खड़े कर देती है।

फांसी के तख्ते पर चढ़कर मर जाना सरल है, किन्तु देश की स्वतंत्रता के लिए दर-दर की खाक छानना, कांटों के मार्ग पर चलना, निरन्तर संकटों से जूझना और बारम्बार मृत्यु से लड़ना बड़ा कठिन है।

महेन्द्रप्रताप जी ने कितने दिन और कितनी रातें भूख-प्यास को सहते हुए बिताई, कितनी बार वे बिना बिस्तर के जमीन पर सोये, कितने किलोमीटर वे पैदल चले और कितनी बार शीत के कष्टों और गर्मी के तापों को सहन किया- इन सभी बातों का अनुमान तक नहीं लगाया जा सकता। वे स्वतंत्रता के सच्चे साधक थे। इनकी मृत्यु 29 अप्रैल, 1979 को हुई थी।

यह भी पढ़े –

Leave a Reply

Your email address will not be published.