राजा राममोहन राय का जीवन परिचय? राजा राममोहन राय का इतिहास?

राजा राममोहन राय का जीवन परिचय (Raja Ram Mohan Roy Ka Jeevan Parichay), राजा राममोहन राय श्रेष्ठ मानव, व्यावहारिक राजनेता, धार्मिक-सामाजिक सुधारक, महान् देशभक्त, स्वतंत्रता के रक्षक और मानवता के प्रेमी थे। भारत देश में चल रही सती प्रथा जैसी कुप्रथा को समाप्त करने में राजा राममोहन राय ने एक अहम भूमिका निभाई। हमारे देश में हिंदू धर्म में फैली महिलाओं के लिए और समाज में कई प्रकार की कुप्रथा को समाप्त करने में एक अहम भूमिका निभाई। राजा राममोहन राय पर निबंध?

राजा राममोहन राय का जीवन परिचय (Raja Ram Mohan Roy Ka Jeevan Parichay)

राजा राममोहन राय का जीवन परिचय
Raja Ram Mohan Roy Ka Jeevan Parichay

राजा राममोहन राय का जीवन परिचय (Raja Ram Mohan Roy Ka Jeevan Parichay)

उन्नीसवीं शताब्दी में व्याप्त समस्त सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध उन्होंने एक सच्चे देशभक्त और सत्यनिष्ठ सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में संघर्ष किया। भारत में समस्त आधुनिक शैक्षणिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक सुधार आंदोलन उन्होंने ही आरंभ किए।

समकालीन परिस्थितियों में आवश्यक सुधारों के पक्षधर होने पर भी वे भारत की महान् परंपराओं के प्रति निष्ठावान परंपरावादी थे। वे एक साथ ही सुलेखक, विविध भाषाओं के गहन अध्येता, महान् चिंतक और नवीन तथा पुरातन के समन्वयक थे। मैकनिकोल ने उन्हें ‘सत्य के नए महाद्वीप के अन्वेषण में भारत का कोलम्बस कहा है। निश्चय ही, राजा राममोहन राय भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत थे।

राजा राममोहन राय का जन्म

राममोहन राय का जन्म 22 मई सन् 1774 ई. में हुगली जिले के एक गांव राम नगर में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता रमाकांत राय श्रद्धालु हिंदू थे और वे बर्दवान की महारानी के यहां राजस्व अधिकारी थे।

राममोहन राय की प्राथमिक शिक्षा एक मुसलिम मकतब में हुई। बारह वर्ष की अवस्था में पटना जाकर उन्होंने अरबी और फारसी का अध्ययन किया तथा थोड़े समय में ही अरबी-फारसी में दक्षता प्राप्त कर ली। फिर उन्होंने कुरान के साथ ही सादी, हाफिज और रूमी जैसे फारसी कवियों का अध्ययन किया।

शीघ्र ही उन्होंने कुरान तथा अन्य फारसी काव्यों का बंगला में अनुवाद किया। अरब वैज्ञानिकों तथा दार्शनिकों के साथ ही उन्होंने प्लेटो, अरस्तू और प्लाटिनस का पहले अरबी अनुवाद पढ़ा और बाद में मूल यूनानी भाषा में अध्ययन किया। इसके बाद वे काशी गए और वहां वेद-उपनिषद् का अध्ययन किया।

इस प्रकार उनके आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि हुई। सन् 1802 ई. में उन्होंने इस्लामी संस्कृति के केंद्र मुर्शिदाबाद जाकर अरबी विद्या का गहन अध्ययन किया। वहीं उन्होंने ‘तुहफत उल-मुवाहिद्दीन’ अर्थात् ‘एकेश्वरवादियों को उपहार’ की रचना की। इससे उनपर इस्लाम के गहरे प्रभाव का पता चलता है। इस ग्रंथ से उनके तत्त्वमीमांसक और देवविद्यात्मक ज्ञान का प्रकाशन होता है।

धर्म के प्रति नए दृष्टिकोण का उदय

विभिन्न धर्मों के अध्ययन से उनमें धर्म के प्रति नए दृष्टिकोण का उदय हुआ। उन्होंने स्पष्ट कहा कि धर्म का सार संस्कारों, कर्मकांडों के अज्ञान भरे अनुष्ठान में नहीं है, न धर्ममतों और अंधविश्वासों का आंख मूंदकर पालन करना ही धर्म का वास्तविक सार है।

उन्होंने तर्कपूर्ण रूप में सिद्ध किया कि निराकार ब्रह्म का ध्यान करना तथा उसकी उपासना ही धर्म का सारतत्त्व है। राममोहन राय एकेश्वरवाद की उन्मुख होने के कारण मूर्तिपूजा और धार्मिक अनुष्ठानों के विरोधी थे।

सोलह ओर वर्ष की अवस्था में ही मूर्तिपूजा के विरुद्ध लेख लिखने के कारण उनका पिता से कुछ समय के लिए संबंध विच्छेद हो गया। वे घर छोड़कर इधर-उधर भटकते रहे। कुछ समय बाद वे तिब्बत चले गए।

वहां उन्होंने बौद्ध धर्म और दर्शन का अध्ययन किया, किंतु बौद्ध धर्म में उत्पन्न विकृतियों तथा लामाओं की आलोचना के कारण उन्हें लामाओं का कोपभाजन बनना पड़ा। एक दयालु महिला की सहायता से उनकी प्राण रक्षा हो सकी। कहा जाता है कि उसी समय उन्हें स्त्रियों के लिए कार्य करने की प्रेरणा मिली।

सन् 1803 ई. में राजा राममोहन राय के पिता का देहांत हो गया। उसी वर्ष राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी कर ली। नौकरी के दौरान वे डिग्बी और बुडफोर्ड नाम के दो अंग्रेजों के संपर्क में आए और आधुनिक पाश्चात्य विचार धाराओं से परिचित हुए।

इसी समय राममोहन राय बौद्ध, जैन, वैष्णव आदि धर्मों के विद्वानों के संपर्क में भी आए और उन्होंने सभी धर्मों के संबंध में गहरी जानकारी प्राप्त की। बंगाल के प्रसिद्ध तांत्रिक हरिहरानंद तीर्थस्वामी से उन्होंने तंत्र विद्या सीखी। इसके साथ ही अंग्रेजी भाषा, यूरोपीय राजनीति और फ्रांसीसी क्रांति का भी उन्होंने अध्ययन किया।

राममोहन राय का व्यक्तित्व बहुआयामी था। उन्होंने अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, अरबी, फारसी, हिब्रू, लैटिन, ग्रीक, संस्कृत आदि भाषाओं के अध्ययन के साथ ही उपनिषदों, तंत्रों, सूफी संतों की रचनाओं, ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ और ‘न्यूटेस्टामेंट’ का मूल रूप में अध्ययन किया था।

उनके मित्रों में प्रमुख थे- जेम्स यंग नामक व्यापारी, जो जेरेमी बेन्थम का अनुयायी था; मानवोपकारी डेविड हेयर, ‘कलकत्ता जर्नल’ के संपादक जे. के. बकिंघम राममोहन राय पर आधुनिक विचारकों-लाक, ह्यूम, बेंथम तथा ईसाई उदारवादियों का व्यापक प्रभाव था। सन् 1814 ई. में राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और कलकत्ता में बस गए।

आत्मीय सभा की स्थापना

उसी वर्ष उन्होंने एकेश्वरवाद के प्रचार-प्रसार के लिए ‘आत्मीय सभा’ की स्थापना की। यह संस्था एक ऐसी गोष्ठी थी, जिसमें धर्म और दर्शन के विद्वान् भाग लेते थे। यह संस्था सामाजिक कुरीतियों के निराकारण की ओर भी ध्यान देती थी। राय महोदय ने वेद-वेदांत और उपनिषदों के अनुवाद का कार्य शुरू किया।

उन्होंने ‘वेदांतसार का प्रकाशन किया। इस ग्रंथ में उन्होंने बहुदेववाद और कर्मकांड का खंडन कर यह प्रतिपादित किया कि उपनिषद् में वर्णित एकेश्वरवाद अधिक सुगम और संगत है। तत्पश्चात् उन्होंने उपनिषदों का अनुवाद बंगला, हिंदी और अंग्रेजी में किया तथा उनका निःशुल्क वितरण किया। शिक्षानीति संबंधी अनेक लेख भी उन्होंने लिखे। वे शिक्षा में परिवर्तन कर कर्मकांड और अंधविश्वासों से संघर्ष की तैयारी करने लगे।

अपने गहन अध्ययन के आधार पर राममोहन राय मानते थे कि सभी धर्मों में आधारभूत सत्य है। अपने मूल रूप में सभी धर्म विकारों से मुक्त हैं। विकास क्रम की शताब्दियों में इनमें भ्रष्ट एवं बुद्धि-असंगत प्रथाएं उत्पन्न हुई हैं।

इन्हीं विकारों के कारण पुरोहितवाद, असंगत अनुष्ठान और चमत्कार का जन्म हुआ है। राममोहन राय मानते थे कि जाति या मत का भेदभाव किए बिना अज्ञेय ब्रह्म की उपासना की जानी चाहिए। इसीलिए उन्होंने सन् 1828 ई. में ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की।

इस ब्रह्म समाज में सभी लोग सम्मिलित हो सकते थे। इस संस्था का उद्देश्य था एक सहिष्णु संस्था का निर्माण, जो सभी धर्माविलंबियों के मध्य एकता के सूत्र को सुदृढ़ करे और धार्मिक, सामाजिक सुधार आंदोलनों का केंद्रीकृत पथ-प्रदर्शन करे। राममोहन राय मानते थे कि ‘ब्रह्म समाज’ के सिद्धांतों का पालन करने पर एक हिंदू सच्चा हिंदी, एक मुसलमान सच्चा मुसलमान और एक ईसाई सच्चा ईसाई बनेगा।

‘ब्रह्म समाज’ का उद्देश्य जाति-पांति का उन्मूलन कर मनुष्य में ईश्वर की सिद्धि था। ‘ब्रह्म समाज’ का वातावरण सद्भाव और सहिष्णुता से परिपूर्ण होता था। पं. विश्वनाथ शास्त्री ने उसका वर्णन करते हुए लिखा है, ‘दो तेलगु ब्राह्मण वेद-पाठ करते थे, बंगाल के एक पंडित उत्सवानंद उपनिषद् सुनाते थे। कभी यूरोपीय धर्म प्रचारक ईश भजन सुनाते थे और धर्म परायण संगीतकार गुलाम अब्बास अनिवार्य रूप से वाद्य संगत करते थे।

राममोहन राय की कुप्रथा के विरुद्ध आवाज

राममोहन राय ने मूर्तिपूजा, बलात् वैधव्य, सती प्रथा, कन्या-वध, कुलीन विवाह आदि के विरुद्ध आवाज उठाई। उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया। सती प्रथा के विरुद्ध उन्होंने पैम्फ्लेट प्रकाशित कर जनमत जागृत किया। परंपरावादियों ने इसका घोर विरोध किया।

किंतु 1929 ई. में लार्ड विलियम बैंटिक के सहयोग से राय महोदय ने सती प्रथा को अवैध घोषित कराया। यह एक ही कार्य राय महोदय को भारत के इतिहास में अमरता प्रदान करने के लिए पर्याप्त था। वे मानते थे कि हिंदुओं में जातिप्रथा ने भारी विभेद उत्पन्न किया है। इसी प्रथा ने हिंदुओं के मध्य देश-प्रेम की भावना का लोप किया है।

इसलिए समाज को जाति प्रथा से मुक्त करना आवश्यक है। उन्होंने बंगाल में प्रचलित बहु विवाह और कुलीन विवाह का जमकर विरोध किया। कुलीन वंशों के एक एक पुरुष के सैकड़ों विवाह होते थे और उस एक पुरुष के मरने पर उसकी सैकड़ों पत्नियां विधवा हो जाती थीं। उनमें से अधिकांश को बलपूर्वक सती भी होना पड़ता था। राममोहन राय ने अन्य सहयोगियों सहित इस कुप्रथा पर अंकुश लगवाया। धर्म और समाज संबंधी सुधारों में उनका दृष्टिकोण मानवीय था।

हिंदू धर्म के घनिष्ठ रूप से संबंधित मानी जाने वाली कुप्रथाओं की निंदा करने पर भी राममोहन राय ने बार-बार घोषित किया कि उनका उद्देश्य धर्म से संबंध-विच्छेद करना नहीं था, बल्कि धर्म को मूल शुद्ध रूप में प्रतिष्ठित करना था। उन्होंने ‘ब्रह्म ‘समाज’ की स्थापना उपनिषदों के आधार पर की थी।

इसीलिए ‘ब्रह्म समाज’ की साधना पद्धति में गायत्री मंत्र और उपनिषदों के आधार पर ईश्वर का ध्यान किया जाता था। राय महोदय ने हिंदू धर्म में आमूल परिवर्तन नहीं किया। उन्होंने उसमें आई विकृतियों का निवारण किया।

उनकी आकांक्षा थी कि भारतीय प्राचीन भारतीय विद्या का अध्ययन करें। इसी उद्देश्य से उन्होंने सन् 1826 ई. में वेदांत कॉलेज की स्थापना की। इस कॉलेज में वेदांत दर्शन और संस्कृत साहित्य के अध्ययन के साथ ही यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान को भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया था।

बंगाल में अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में भी राममोहन राय का महत्त्वपूर्ण योगदान था। इस क्षेत्र में पहल करने वाले वे पहले भारतीय थे। उन्होंने सन् 1817 ई. हिंदू कॉलेज (प्रेसीडेंसी कॉलेज) की स्थापना की।

उन्होंने पत्र लिखकर गवर्नर जनरल एमहर्स्ट से आग्रह किया कि शिक्षा के लिए निर्धारित धनराशि का उपयोग भारतीयों को गणित, प्राकृतिक दर्शन, रसायन विज्ञान, नक्षत्र विद्या तथा अन्य उपयोगी विज्ञानों की शिक्षा प्रदान करने के लिए किया जाए।

प्राच्य विद्या की अपेक्षा भारतीयों में वह हेतुवादी क्षमता उत्पन्न होगी, जो उन्हें अपने साहित्य में निहित सत्यों के श्रेष्ठतर उपयोग में समर्थ बना देगी। उन्होंने नए विज्ञानों की शिक्षा प्रदान करने के लिए विद्यालयों की स्थापना पर जोर दिया और उन्हें आवश्यक पुस्तकों, उपकरणों और अन्य साधनों से संपन्न किया। उन्होंने स्वयं अनेक शिक्षा संस्थाएं स्थापित कीं।

राममोहन राय समाज-सुधारक होने के साथ ही सफल पत्रकार भी थे। उन्होंने जन-जागरण के लिए कई पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। ‘संवाद कौमुदी’ के अतिरिक्त ईसाई मिशनरियों द्वारा हिंदू धर्म पर किए जाने वाले आक्षेपों का उत्तर देने के लिए उन्होंने द्विभाषी ‘ब्रह्मनिकल मैगजीन’ का प्रकाशन किया। साहित्यिक एवं वैज्ञानिक प्रगति संबंधी ज्ञान के प्रसार के लिए फारसी साप्ताहिक ‘मीरत उल अखबार का प्रकाशन किया।

उन्होंने ‘बंगदूत’ पत्र का भी प्रकाशन किया। इसके अतिरिक्त विभिन्न पत्रों में भी वे लेख लिखते रहे। राममोहन राय प्रेस की स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर थे। सन् 1828 ई. में जब अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाया गया, तो राममोहन राय ने उसके विरुद्ध संवैधानिक आंदोलन चलाया। उन्होंने इस प्रश्न को प्रीवी कौंसिल के समक्ष प्रस्तुत किया। अंततः सरकार ने प्रेस पर लगा प्रतिबंध उठा लिया।

राजा राममोहन राय ने भारतीयों में एकता स्थापित करने का जीवन पर्यंत प्रयास किया। वे सबके लिए स्वतंत्रता और प्रसन्नता की खोज में लगे रहे। वे भारत की स्वतंत्रता के साथ ही विश्व के सभी देशों की स्वतंत्रता के पक्षधर थे। उन्हें अपार कष्ट हुआ, जब उन्होंने सुना कि नेपल्स के नागरिक पुनः आस्ट्रिया के स्वेच्छाचारी शासन के अधीन हो गए हैं।

फिर जब स्पेन में संवैधानिक शासन की स्थापना का समाचार आया, तो उन्होंने सार्वजनिक भोज का आयोजन किया। उनकी तीव्र अकांक्षा थी कि भारतीयों में भी स्वतंत्रता के लिए प्रबल इच्छा उत्पन्न हो और देश स्वतंत्र बने।

राजा राममोहन राय के संबंध में प्रो. वी. ए. नारायण ने लिखा है कि उन्नीसवीं शताब्दी में व्याप्त समस्त सामाजिक तथा नैतिक प्रवृत्तियों के विरुद्ध राम मोहन राय ने एक देशभक्त तथा सत्यनिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में संघर्ष किया।

वैयक्तिक स्वातंत्र्य, समाचार पत्रों की स्वतंत्रता, राज्य का कल्याणकारी रूप तथा शासन के प्रति उपयोगितावादी दृष्टिकोण से संबंधित उनके विचार भारत में राजनीतिक नवजागरण में सहायक थे। इसी को ध्यान में रखकर डॉ. विपिन चंद्र पाल ने राजा राममोहन राय को भारतीय राष्ट्रवाद का पिता कहा है।

गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने राममोहन राय को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा था, ‘अपने देशवासियों को मानव के सार्वभौमिक अधिकारों का ज्ञान प्रदान करने के प्रयत्न में उन्होंने उनके आक्रोश का साहस पूर्वक सामना किया। उन्होंने हमें सिखाया कि सत्य सब मनुष्यों का है और हम भारतीय सारी दुनिया के हैं। राममोहन राय ने भारत की चेतना का देश और काल में प्रसार किया।

राममोहन राय ने दिल्ली के मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के प्रतिनिधि के रूप में ब्रिटिश सम्राट के समक्ष लंदन में प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। दिल्ली सम्राट ने ही उन्हें राजा की पदवी प्रदान की थी। इंग्लैंड में राय महोदय का भव्य स्वागत हुआ। वहां के प्रमुख व्यक्ति उनसे मिलने आए। उनकी भेंट सम्राट से भी कराई गई।

इंग्लैंड से भारत लौटे और पुनः इंग्लैंड गए और वहीं 27 सितंबर सन् 1833 ई. में उनका देहांत हो गया। हिंदू धर्म के प्रति उनकी निष्ठा का प्रमाण यह है कि वे अंत तक यज्ञोपवीत धारण किए रहे और निधन के समय ‘ॐ’ का उच्चारण किया।

यह भी पढ़े –

Leave a Reply

Your email address will not be published.