रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन परिचय? रामप्रसाद बिस्मिल की जीवनी?

रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन परिचय: देश की इन कठिन परिस्थितियों और विषाक्त वातावरण में पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म सन् 1897 में बड़े ही साधारण परिवार में हुआ था। बड़े धार्मिक विचारों से ओत-प्रोत माता-पिता के संरक्षण में इनकी बाल्यावस्था स्नेहपूर्ण वातावरण में किशोरावस्था की ओर बढ़ी पिता की इच्छा थी कि उनका पुत्र चरित्रवान, तेजस्वी और बलवान बने जो देश की जनता की और समाज की सेवा करने में सक्षम हो।

रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन परिचय

रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन परिचय

Ram Prasad Bismil Biography in Hindi

सरकार के प्रतिनिधियों ने सार्वजनिक घोषणाएँ की थीं कि प्रथम युद्ध के पश्चात् भारतवासियों को अंग्रेजों की सहायता करने के लिए, कृतज्ञ होकर कुछ राजनैतिक सुविधाएँ अवश्य देंगे। इसी आशा और विश्वास के वशीभूत होकर भारतवर्ष के नागरिकों ने प्रथम महायुद्ध में अंग्रेजों की तन, मन, धन से पूर्णतया सहायता की, सहयोग दिया।

प्रथम युद्ध के बादल छँटते ही आशा के विपरीत देशवासियों को पारितोषिकस्वरूप सहायता एवं सहयोग के बदले प्राप्त हुआ ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘रौलेट ऐक्ट’ । नौकरशाही के ‘रौलेट ऐक्ट’ कानून ने भारतवासियों की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर कुठाराघात कर दिया, पुलिस और अदालतों को अन्धाधुन्ध अधिकार दिये गये।

क्रान्तिकारी गतिविधियों में लिप्त अभियुक्तों को अपील सुविधाओं से वंचित कर दिया गया। शीघ्रातिशीघ्र मुकदमों का नाटक रचाकर तत्काल फैसले कर सामूहिक जुर्माने आदि वसूलने के काले कानून से भोली-भाली जनता को प्रताड़ित करने की व्यूह रचना की गयी जिसके दमन चक्र में जनता पीड़ित हो और क्रूर अंग्रेज अपने स्वार्थों के लिए बर्बरतापूर्वक शासन करने का सरल मार्ग निकाल सकें।

गांधी बाबा ने भारतीयों की पीड़ा को समझा। उन्होंने काले कानून प्रतिवादस्वरूप हड़तालें, उपवास और सभाओं का आयोजन किया। देश में अशान्ति के का वातावरण छा गया जब पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाहियों ने जनता में आतंक पैदा करने का यत्न किया, लाठी चार्ज किया, गोलियों की बौछारों से आन्दोलनकर्त्ताओं के प्राण लिये।

रामप्रसाद बिस्मिल किशोरावस्था

इसी प्रेरणास्वरूप पंडित रामप्रसाद अखाड़े में पहुँच व्यायाम करते, कुश्ती लड़ते और नाना प्रकार के परिश्रमी कार्यों को रुचि लेकर सम्पन्न करते। बचपन की उद्दंडता किशोरावस्था में जब अँगड़ाई लेती तो रामप्रसाद की पिटाई तक हो जाती जिसके फलस्वरूप शारीरिक गठन कठोर ही नहीं सहनशील भी बना जिससे आगे चलकर वे संयमी एवं दृढ़प्रतिज्ञ बनते चले गये।

माँ बड़ी उदार और सती-साध्वी प्रवृत्ति की धार्मिक विचारों वाली कर्तव्यनिष्ठ महिला थीं। इसलिए पंडित रामप्रसाद का प्रारम्भ से ही रुझान आर्यसमाजी साँचे में ढलता गया। देशसेवा के लिए बालक को प्रोत्साहित करने में माता का बहुत बड़ा सहयोग था

जिसकी प्रेरणा से उनके हृदय में समाज सेवा करने के अंकुर प्रस्फुटित होने प्रारम्भ हो गये। चरित्र निर्माण में जहाँ माँ के वरदहस्त की सुखद छाया उन्हें मिली वहीं गुरु स्वामी सोमदेव के प्रेरणादायक उपदेशों से उन्होंने ब्रह्मचर्यव्रत धारण करने की प्रतिज्ञा कर डाली।

पिता को कुछ शत्रुओं ने अपमानित करने की योजना बनायी, परेशान किया तो उनसे यथासम्भव बदला लेने के लिए युवा रामप्रसाद ने स्वयं को हथियारबन्द रखना प्रारम्भ कर दिया। वे किसी अत्याचारी और भ्रष्टाचारी के सम्मुख आत्म-समर्पण करने के प्रबल विरोधी थे।

डटकर संघर्ष करना, शत्रु को अन्तिम क्षण तक लड़कर परास्त करना, उसे धूल चटाना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। स्वामी सोमदेव की प्रेरणा और कृपा से युवा रामप्रसाद का मनोबल इतना दृढ़ और ऊँचा उठता चला गया।

कि वे भविष्य में एक कुशल क्रान्तिकारी बनने के लिए आँखों में सपने सैंजोने लगे। उन्हें साकार करने का अवसर भी सरलता से प्राप्त हो गया। उसने अपने को मैनपुरी संगठन से जोड़ने का निश्चय मन में विकसित कर लिया था। चूँकि अंग्रेजों के अत्याचारों से जनता में त्राहि-त्राहि मची थी।

जलियाँवाले बाग काण्ड

पंजाब भी इन आपदाओं से अछूता न था 13 अप्रैल, 1919 को ‘नव संवत्सर’ के उपलक्ष्य में जलियाँवाले बाग, अमृतसर में एक सभा आयोजित थी। सभास्थल में प्रवेश के लिए केवल एक द्वार था और उसके चारों ओर ऊँचे-ऊँचे मकान बाग के क्षेत्र को घेरे हुए खड़े थे।

इस आयोजन में लगभग 20 हजार व्यक्तियों की भीड़ बैठी उत्सव के आनन्द में मग्न थी। इस उत्सव सभा को भंग करने के लिए जनरल डायर के नेतृत्व में 50 हथियारबन्द गोरे कुछ हिन्दुस्तानी सिपाहियों के साथ बाग में तेजी से घुस गये।

भीड़ को तितर-बितर करने की साधारण सी चेतावनी उसने अंग्रेजी में दी और उस समारोह में मीन-निहत्थी उस भीड़ पर, जो उत्सव के लिए जमा थी, गोली चलाने का निर्मम आदेश दे डाला।

ब्रिटिश गोरों की गोलीबारी से बाग की चहारदीवारी में बैठी जनता में तत्काल भगदड़ मच गयी, अनेकों लोग पुलिस के दौड़ते घोड़ों की टापों तले कुचल गये। लगभग दो हजार भारतीय बुरी तरह लाठी वर्षा से घायल हो वृक्षों की तरह धराशायी हुए और 400 व्यक्तियों को बन्दूकों मशीनगनों की उगलती गोलियों ने मौत के मुँह में उछाल दिया।

यह दृश्य ऐसा वीभत्स एवं भयावह था जैसे एक बाड़ में कैद गउओं को हिंसक पशुओं को छुड़वाकर मौत के घाट उतारने की निर्मम चेष्टा की जाये और वे बेचारी रम्भाती, बिलबिलाती, शोर मचाती, उछल-कूद करती अपने प्राणों की बलि दे रही हों।

यह हत्याकांड यहीं समाप्त नहीं हुआ। पंजाब में मार्शल ला लगा दिया गया। नौकरशाही ने मूक जनता को गलियों में पेट के बल रेंगाया, भेड़-बकरियों के समान उन्हें लाठियों से पिटवाया औरतों को नंगी कर कोड़ों की मार से नचवाया, देहातों में तोपों-गोलों की सहायता से कहर बरसाये और स्थान-स्थान पर गोलियाँ चलाकर निरीह लोगों को भुनवाया।

भारतीयों का स्वप्न टूटा, उनकी आँखें खुल गयीं, उन्होंने यह भलीभाँति समझ लिया कि अंग्रेज़ अपने जीते जी हिन्दुस्तान की जनता को आजादी कभी नहीं देंगे। दमन-चक्र और आतंक के बलबूते देश में फूट डालकर वे अपने शासन की नींव को और मजबूती से पक्का जमाने के लिए तैयारी में जुट गये हैं। अंग्रेज आसानी से भारत छोड़नेवाले नहीं हैं।

असहयोग आन्दोलन असफल हो गया है इसलिए आवश्यक यह है कि जनता संगठित हो, हथियारबन्द हो और संघर्ष के है लिए, क्रान्तिकारियों के सहयोग के लिए आगे बढ़कर उनकी तन, मन और धन से सहायता करे। आजादी की लड़ाई अब अहिंसा से नहीं, हथियारों से लड़ी जानी चाहिए, खून का बदला खून से ही लिया जाना चाहिए।

क्रान्तिकारियों ने सर्वप्रथम एक ऐसे संगठन की स्थापना की जिसका नाम उन्होंने ‘शिवाजी समिति’ रखा। संगठन का नेतृत्व एक गेंदालाल दीक्षित नामक व्यक्ति ने प्रारम्भ किया जिसका उद्देश्य नवयुवकों में स्वदेश के प्रति आस्था, प्रेम तथा भक्ति की भावना की जागृति पैदा करनी थी।

कुछ समय बाद एकत्रित युवकों को संगठित रखने और उनमें आत्मविश्वास को दृढ़ करने के लिए यह अनुभव किया गया कि धनाभाव के कारण आशातीत सफलता नहीं मिल पायेगी।

क्रान्तिकारियों पर मुकदमा

गेंदालाल को भी असन्तोष था चूँकि संगठन शक्ति के लिए ऐसे व्यक्तियों का सहयोग अपेक्षित था जो अस्त्र-शस्त्रों के लिए धन की व्यवस्था भी करें। नौकरशाही को हटाने के लिए हथियार उठाना आवश्यक था और हथियार के लिए पैसा धन प्राप्ति के लिए मात्र सुगम उपाय डकैती समझी गयी इसलिए डाकुओं से भी सम्पर्क स्थापित किया जो देशप्रेम के यज्ञ में उनकी सक्रिय सहायता करें।

इस दिशा में संगठन के ब्रह्मचारी नामक युवक ने गेंदालाल दीक्षित को सक्रिय सहयोग दिया, शिक्षित नवयुवक भी इस ओर आकर्षित हो जुड़ने लगे। पंडित रामप्रसाद जी अपनी पढ़ाई छोड़ दल के सक्रिय सदस्य हो गये। उन्हें लिखने का शौक था और शायरी के प्रति रुझान इसलिए अपनी कविताएँ उर्दू में लिखते।

और अपने नवयुवक सहयोगियों के मनोरंजन के साथ उनमें देशप्रेम और क्रान्तिकारी भावना का संचार करते रहते। कुछ ही दिनों में उन्होंने दल में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। अधिक पढ़े-लिखे न होने के बाद भी उन्होंने जीवन की खुली पुस्तकें पढ़कर व्यावहारिक ज्ञान अर्जित किया था।

इस प्रकार ‘शिवाजी समिति’ का नाम बदलकर ‘मातृवेदी’ संस्था कर दिया गया जिसके द्वारा मैनपुरी मंडल के इर्द-गिर्द अनेकों डाके डाले गये। संगठन ने विस्तृत रूप धारण किया और अपनी शक्तिशाली अभियान के बलबूते अनेक स्रोतों से रिवाल्वर व अन्य अस्त्र-शस्त्रों की आवश्यक खरीददारी करने में सफलता प्राप्त की।

पुलिस ‘मातृवेदी’ संस्था की गन्ध पा चुकी थी। उसने अपनी चतुराई से इस गोपनीय संगठन के एक व्यक्ति को फोड़ लिया। ‘मातृवेदी’ के कार्यकर्ता एक पड़ाव पर एकत्रित हुए। खाने के लिए पूड़ियाँ बनी थीं। पुलिस ने उस मुखबिर की सहायता से पूड़ियों में जहर मिलवा दिया। पूड़ियाँ साथियों ने जब खायीं तो भोजन करनेवाले प्रत्येक व्यक्ति तत्काल मूच्छित होते गये। जिन्होंने पूड़ियों का सेवन नहीं किया वे ही मात्र होश में थे।

ऐसी विकट परिस्थिति का लाभ उठाकर पुलिस ने पड़ाव पर गोलियाँ दागना शुरू कर दिया। दल की ओर से बन्दूकों का जवाब भी गोलियों की बौछार से दिया गया, किन्तु इस मुठभेड़ में कुछ पुलिस के लोग और 35 सदस्य दल के मारे गये।

गेंदालाल को छर्रे लगे, एक आँख चली गयी। दल के अधिकांश सदस्यों सहित पंडित गेंदालाल दीक्षित भी गिरफ्तार कर ग्वालियर की जेल में डाल दिये गये और सरकार ने ‘मैनपुरी षड्यन्त्र केस’ के नाम से क्रान्तिकारियों पर मुकदमा चलाया। लेकिन रामप्रसाद बिस्मिल भूमिगत हो गये।

गेंदालाल दीक्षित ने चाल चली। पुलिस को गुमराह किया कि वह सरकारी गवाह बनने का इच्छुक है और अपने एक साथी के साथ पुलिस की आँखों में धूल झोंककर जेल से भाग निकले। जिस सहयोगी के साथ दीक्षित भागे थे उसने मार्ग में धोखा दिया और सारा धन लेकर चम्पत हो गया। धनाभाव में गेंदालाल को बड़े कष्ट उठाने पड़े।

गेंदालाल दीक्षित भयंकर संकट में फँस गये। धन पास नहीं, सहयोगी जेल में, लोग अपने घर में ठहराने से कतराते, परिचित तो दूर घर के सगे-सम्बन्धियों ने भी साथ छोड़ दिया। इसके फलस्वरूप उस यक्ष्मा (तपेदिक) से पीड़ित क्रान्तिकारी को दारुणावस्था में भरती होना पड़ा।

21 दिसम्बर, 1920 को उसी सरकारी अस्पताल में उनका देहावसान हो गया। इस प्रकार एक कर्मठ क्रान्तिकारी गेंदालाल दीक्षित का दुखद अन्त हो जाने से दल छिन्न-भिन्न हो गया क्योंकि ‘मैनपुरी षड्यन्त्र केस’ में कुछ अभियुक्तों को बड़ी कठोर सजाएँ दी गयी।

इसी केस में पंडित रामप्रसाद बिस्मिल ने पूरे 6 वर्ष फरारी में काटे, वहीं मुकन्दीलाल ने इस अवधि में कारागार की सम्पूर्ण यातनाएँ सहीं। राजकीय घोषणा द्वारा ‘मैनपुरी षड्यन्त्र केस’ के शेष राज्य कैदियों को मुक्ति दी गयी तो दोनों ने मिलकर क्रान्तिकारी दल को पुनः संगठित करने का कार्य प्रारम्भ कर दिया।

इन दोनों के उत्साह, लगन और दृढ़ निश्चय निरुत्साहित नहीं हुआ था। पंडित जी को परमात्मा में अगाध आस्था थी, वे प्रायः कहा करते ‘मालिक तेरी रजा रहे, औ तू ही, तू रहे। बाकी न मैं रहूँ, न मेरी आरजू रहे ॥’

पुस्तकें और रचनाएँ

पंडित रामप्रसाद बिस्मिल ने स्वाध्याय द्वारा अपना ज्ञान बहुत बढ़ा लिया था, वे रचनाएँ उर्दू में लिखते। कई पुस्तकें लिखकर, धनोपार्जन भी उन्होंने किया। उस एकत्रित धन से उन्होंने देशी रियासतों से रिवाल्वर और कारतूस इत्यादि खरीदे।

पंडित जी के जीवन की महत्त्वपूर्ण घटना यह है कि उन्होंने फाँसी घर में बैठकर अपनी आत्मकथा लिखी जो भाव एवं भाषा की दृष्टि से भी एक दुर्लभ ग्रन्थ कहा जाता है। ऐसी ही परिस्थिति में चेकोस्लोवाकिया के शहीद युवक फूचिक ने भी अपनी आत्मकथा लिखी जिसे भविष्य में एक अनमोल ग्रन्थ की श्रेणी में माना गया था।

इस आत्मकथा में पंडित जी के काकोरी के शहीदों के त्याग और बलिदान के वर्णन ने अन्य नवयुवकों को प्रेरणा दी, प्रभावित किया। उनमें क्रान्तिकारी दलों के संगठन और सफलतापूर्वक संचालन की अभूतपूर्व क्षमता थी।

फरारी जीवन से मुक्त होने पर उन्होंने मुकन्दी लाल के सहयोग से बड़ी निडरता से दल का पुनर्गठन करना शुरू कर दिया। संगठन के लिए धन की आवश्यकता थी, अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिए धन की आवश्यकता थी।

दल के सदस्यों के आवागमन के खर्च पैसे के बगैर सम्भव न था। दल के कार्यकर्ताओं की भोजन व्यवस्था उचित समय पर न होगी भूखा पेट कितने समय लड़ेंगे? शरीर की भूख मिटाने के लिए थोड़ा अन्न और ढ़ाँपने को कुछ वस्त्रों की भी आवश्यकता थी-भूखे-नंगा संघर्ष करने खड़े भी हो जायें तो कितने कदम उठाकर चलेंगे?

ये अनबूझ पहेली दल के सम्मुख मुँह बाये खड़ी थी क्योंकि संगठन के पास पैसे बिलकुल न थे। दान कोई देता न था और न महाजन कर्ज देने को तैयार था। रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन परिचय

तमाम समस्याओं का सरल हल मात्र डाका डालकर धन प्राप्त करने से हो सकता था। किन्तु किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति को लूटना या डाका डालना सदस्यों को नापसन्द था। सदस्यों की राय यह बनी कि यदि लूटना ही है तो सरकारी सम्पत्ति ही क्यों न लूटी जाये ?

योजना बनायी गयी। ज्ञात हुआ कि लखनऊ से रेल चलती है जिसमें रेलवे का खजाना हर स्टेशन से जमा कर केन्द्रीय स्टेशन पर पहुँचाया जाता है। निरीक्षण करते समय पूरी जानकारी भी ले ली कि यह खजाना 14 हथियारबन्द लोगों के संरक्षण में जाता है जो बन्दूकों एवं रायफलों से लैस होते हैं। दो अंग्रेज फौजी जवानों के विशेष पहरे में यह खजाना उतारा और चढ़ाया जाता है जो हर पल खजाने की चौकसी में सतर्क रहते हैं।

काकोरी-काण्ड

इसी समय बंगाल के दो प्रसिद्ध क्रान्तिकारी श्री योगेशचन्द्र चटर्जी व श्री शचीन्द्र लाल सान्याल संयुक्त प्रान्त में संगठन को दृढ़ करने में आ जुटे थे जिसका श्रेय रमेश आचार्य को जाता है। पहले दोनों विप्लववादी अलग-अलग कार्यरत थे किन्तु रमेश आचार्य की प्रेरणा से सभी की सहमति से संयुक्त दल का गठन ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोशियेशन’ के नाम से हो गया।

कुछ ही दिनों में दल का दबदबा मैनपुरी, इटावा, आगरा, फतेहगढ़, कानपुर, इलाहाबाद, एटा, शाहजहाँपुर और मेरठ में भी अपना प्रभुत्व जमा बैठा था। दल के नेतृत्व में बिचपुरी, बमरौली, द्वारकापुर आदि में सफल डाके डालकर दक्षता का अभ्यास कर लिया गया।

इसके पश्चात् रेलवे के खजाने को लूटने की योजना को सफल बनाने में दल जुट गया। उन्होंने नौकरशाही के विरुद्ध बड़े धमाके से संघर्ष की चुनौती देने का मन बना लिया था साथ ही दल का आर्थिक संकट भी कम होने की सम्भावना समझी गयी।

ट्रेन-डकैती में 10 व्यक्तियों को चुना गया जिनमें मन्मथनाथ गुप्त, रोशन सिंह, योगेश चटर्जी, सान्याल, अशफाकउल्ला खाँ, शिव वर्मा, राजेन्द्र लाहिड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल और चन्द्रशेखर आजाद के नाम उल्लेखनीय हैं।

उन्होंने योजना के अनुरूप लखनऊ के निकट रेलगाड़ी को काकोरी स्टेशन पर रोक लिया, रेलवे खजाने के सन्दूक को नीचे गिराकर उसको भंयकर घनों के आघात से तोड़कर सारा धन सुरक्षित निकाल चादर में बाँध नौ-दो-ग्यारह हो गये।

दो अंग्रेज फौजी जवानों के नेतृत्व में तैनात 14 व्यक्तियों के सामने बड़े साहस और शौर्य के साथ खजाना लूट लिया गया किन्तु पहरेदार मूकावस्था में बगलें झाँकते इधर-उधर टहल गये, बन्दूकों के भीतर गोलियाँ ठंडी पड़ी रहीं, दल के भीषण आतंक के कारण।

काकोरी ट्रेन डकैती में भाग लेनेवाले सभी 10 व्यक्ति सुरक्षित हथियारबन्द पहरेदारों की आँखों में धूल झोंक दुर्घटनास्थल से बाहर निकल गये, न कोई गोली चली, न कोई खून बहा, न कोई व्यक्ति आहत हुआ। रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन परिचय

धर-पकड़ शुरू हुई। पुलिस की नींद हराम हो गयी। स्थान-स्थान पर छापे डाले गये, मुखबिरों का जाल बिछा दिया गया। भारत में जयचन्दों का अभाव कभी नहीं रहा जिनके सहयोग से काकोरी ट्रेन डकैती के सभी सदस्य धीरे-धीरे पकड़ में आये मात्र चन्द्रशेखर आजाद ही ऐसे चतुर क्रान्तिकारी थे कि वे सरकार के हाथों नहीं पकड़े गये; वे जीवन के अन्तिम समय तक भूमिगत होकर ही ब्रिटिश हुकूमत की जड़ों में तेजाब डालते रहे।

मुकदमा चला, इस केस पर सरकार ने 10 लाख रुपये खर्च किये जिसके परिणामस्वरूप पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फाँसी, शचीन्द्र नाथ सान्याल को आजन्म कालापानी, मन्मथनाथ गुप्त को 14 वर्ष, योगेश चन्द्र चटर्जी को 10 वर्ष और शेष अन्य सदस्यों को सात-सात वर्ष की सजा सुनायी गयी।

भारतवर्ष के शहरों, नगरों, और देहात में बसे नागरिकों ने सभाएँ कर विरोध प्रकट किया। जनमत ने सरकार से सभी की सजाएँ रद्द करने की माँग दोहरायी। कोई हल सामने नहीं आया। जनता की आवाज दबा दी गयी क्रान्तिकारियों का मनोबल ऊँचा था, वे दासता की बेड़ियों को तोड़कर अपनी जान को हथेली पर रखकर संग्राम में कूदे थे।

हर प्रकार के दंड हँसी-खुशी झेलने को तैयार थे, फाँसी का फन्दा चूमने के लिए उन्होंने अपनी कमर कस ली थी। जनता में उनके प्रति स्नेह की लहर उमड़ पड़ी थी, वे जानते थे कि नवयुवक आजादी के लिए संघर्षरत हैं। भारतीयों की आँखें अब खुल गयी थीं। वे भली भाँति जान गये थे कि अंग्रेज अहिंसा से कभी इस देश को छोड़कर भागनेवाले नहीं हैं।

इसलिए जनता दल के हाथ मजबूत करने के लिए उन्हें यथाशक्ति गुप्त रूप से सहयोग करने को तत्पर थी। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को मृत्यु का कतई भय नहीं था क्योंकि वे धार्मिक प्रवृत्ति के सदस्य होने के नाते शरीर का जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त करना स्वाभाविक प्राकृतिक नियम के अनुकूल आस्था रखते थे।

अपनी आत्मकथा’ में उन्होंने स्पष्ट लिखा- ‘यद्यपि यह बात परम ब्रह्म ही जानता है कि किन कर्मों के परिणामस्वरूप कौन-सा शरीर इस आत्मा को ग्रहण करने योग्य होता है। किन्तु अपने लिये तो यह मेरा दृढ़ निश्चय है कि मैं उत्तम शरीर धारण कर नवीन शक्तियों के साथ अतिशीघ्र ही भारतवर्ष में अपने किसी निकटवर्ती सम्बन्धी या इष्टमित्र के घर में जन्म ग्रहण करूँगा।

रामप्रसाद बिस्मिल की फाँसी सजा

उसी आत्मकथा में एक अन्य स्थान पर पुनः अपने विचार प्रकट करते हुए लिखा- ‘परमात्मा की ऐसी इच्छा ही थी कि हम लोगों को फाँसी दी जाये, भारतवासियों के जले हृदय पर नमक पड़े, वे बिलबिला उठें और हमारी आत्मायें उनके कार्य को देखकर सुखी हों।

‘जब हम नवीन शरीर धारण कर देश सेवा में आगे बढ़ योग देने को उद्यत हों, उस समय तो भारतवर्ष की राजनैतिक स्थिति पूर्णतः सुधरी हुई हो, जनसाधारण अधिक सुशिक्षित हो जाये और ग्रामीण लोग भी अपने कर्तव्य समझने लग जायें। फाँसी से पूर्व अपनी ममतामयी माँ को एक पत्र में लिखा-

‘माँ, मुझे विश्वास है कि तुम यह समझकर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता भारत माता की सेवा में अपने तुच्छ जीवन को बलिदेवी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारे कुल को कलंकित नहीं किया- अपनी प्रतिज्ञा पर आमरण दृढ़ रहा।’

दल के सक्रिय सदस्य शिव वर्मा दल के लिए हथियारों और आन्दोलन के विषय में बिस्मिल जी से परामर्श के लिए माँ-बाप से मिलने गये जिन्हें फाँसी से एक दिन पूर्व जेल में बेटे को देखने का समय दिया गया था। एकान्त में माता जी ने गोपनीयता समझ ली और वह उनके साथ भतीजे के रूप में साथ हो लिये।

जब विस्मिल के नेत्र माँ के सजल नेत्रों से टकराये तो वे रो पड़े। माँ ने कठोरता-भरे स्वर में डॉट लगायी- ‘यह क्या कायरता दिखला रहे हो! मैं तो बड़े अभिमान से सिर ऊँचा करके आयी थी कि मेरी कोख में एक ऐसे बहादुर ने जन्म लिया है जो अपने देश की आजादी के लिए लड़ रहा है! ‘मुझे गर्व था कि मेरा बेटा सरकार से भी नहीं डरता जिसके राज्य में सूर्य अस्त नहीं हो सकता।

‘आज तुम रो रहे हो…? यदि तुम्हें फाँसी का ही डर था तो ऐसे मार्ग पर तुमने कदम ही क्यों रखे थे? तुम्हारी आँखों में व्याकुलता-भरे आँसुओं की कतारें क्यों उमड़ी हैं?” पंडित जी ने आँसुओं-भरी आँखों को पोंछते हुए उत्तर दिया- ‘माँ, यह अश्रुधारा जो मेरे नयनों में तुमने देखी वह भय से नहीं बहीं है, ये आँसू तो माँ की ममता और स्नेह के छलके हैं। विश्वास करो, तुम्हारी कोख से कायर पैदा नहीं हो सकता।”

बिस्मिल ने पिता की आँखें पुत्र के विचार सुनकर ज्यों ही द्रवित देखीं उनके कन्धे थपथपाते हुए कहा- ‘आप मर्द होकर रोते हैं? आपसे तो मैं यह आशा करता था कि आप माँ को सान्त्वना देंगे। रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन परिचय

उनकी मृत्यु 19 दिसम्बर, 1927 को ‘वन्देमातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ कहते हुए पं. रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ फाँसी के तख्ते के निकट पहुँच गये। लिए हँसते-हँसते अपने प्राणों की आहुति दे डाली।

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