ऋषि पंचमी व्रत कथा-ऋषि पंचमी क्यों मनाई जाती है जाने इसका कारण?

ऋषि पंचमी व्रत कथा (Rishi Panchmi Vrat Katha), ऋषि पंचमी की व्रत की कथा, ऋषि पंचमी की प्रामाणिक कथा, भाद्र (भादों) शुक्ल पंचमी के व्रत को ऋषि पंचमी व्रत कहते हैं। इसको स्त्री-पुरुष सभी पापों की निवृत्ति के लिए करते हैं। ऋषि पंचमी 01 सितम्बर 2022, गुरुवार को है। ऋषि पंचमी 2022 कब हैं?

ऋषि पंचमी व्रत कथा (Rishi Panchmi Vrat Katha)

ऋषि पंचमी व्रत कथा
ऋषि पंचमी व्रत कथा (Rishi Panchmi Vrat Katha)

ऋषि पंचमी 2022 कब हैं (Rishi Panchmi Vrat 2022)

ऋषि पंचमी व्रतदिनसमय
ऋषि पंचमी प्रारम्भ31 अगस्त 2022, बुधवार15:20 PM
ऋषि पंचमी समापन01 सितम्बर 2022, गुरुवार14:50 PM

ऋषि पंचमी व्रत कथा (Rishi Panchmi Vrat Katha)

नियम पूर्वक व्रत तथा पूजन करने से सर्वमुख, आरोग्यता, समृद्धि, यश, धन धान्य, संतान, वैभव तथा विजय की प्राप्ति होती है और अन्त में मोक्ष मिलता है। व्रत का विधान-व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर किसी नदी या जलाशय में स्नान करें।

जब स्नान करके पवित्र हो जाएं तो रेशमी धोती ( वस्त्र धारण करें। मन में व्रत का निश्चय करके आँगन में बेदी बनाकर शुद्ध मन से पंचामृत तैयार करें। तब अरुन्धति सहित सप्त ऋषियों को उस पंचामृत में स्नान करावे। फिर शुद्ध वस्त्र से उनको सुखाकर उनके आसन पर विराजमान करे।

तब सप्तर्षियों के निमित्त चन्दन, अगर, कपूर आदि की गन्ध देवे, फूल चढ़ाये और उनके सम्मुख दीपक जलाकर हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करे कि आप मुझ पर कृपा करें और मेरे द्वारा निवेदित इस पूजा को स्वीकार करें। भगवान को भोग लगाकर प्रसाद समस्त बन्धु बान्धव तथा कथा सुनने वालों में बांटें।

ऋषि पंचमी की कथा

एक समय राजा सिताश्व धर्म का अर्थ जानने की इच्छा से ब्रह्मा जी के समीप गये और उनके चरणों में शीश नवाकर बोले-हे आदिदेव! आप समस्त धर्मों के प्रवर्तक और गूढ़ धर्मों के जानने वाले हो। आपके मुख से धर्म चर्चा श्रवण कर मन को महान शान्ति मिलती है।

भगवान के चरण कमलों में प्रीति बढ़ती है वैसे तो आपने मुझे नाना प्रकार के व्रतों के विषय में उपदेश दिये हैं। अब मैं आपके मुखारविन्द से उस श्रेष्ठ व्रत को सुनने की अभिलाषा रखता हूँ जिसके करने से प्राणी के समस्त पापों का नाश हो जाता है।

राजा के इन वचनों को सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- हे नृप श्रेष्ठ! तुम्हारा प्रश्न अति उत्तम और धर्म में प्रति उपजाने वाला है। मैं तुमको समस्त पापों को नष्ट करने वाला सर्वोत्तम व्रत सुनाता हूँ। यह व्रत ऋषिपंचमी के नाम से विख्यात है।

इस व्रत को ग्रहण करने वाला प्राणी अपने समस्त पापों से सहज ही छुटकारा पा लेता है। उसे नरक में कदापि नहीं जाना पड़ता है। इस व्रत का एक अति प्राचीन इतिहास और भी है। उस इतिहास को मैं तुम्हारे सम्मुख वर्णन करता हूँ।

एक समय की बात है कि विदर्भ देश में उत्तंक नामक ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ निवास किया करता था। उस ब्राह्मण दम्पत्ति के एक पुत्र और एक पुत्री थी। उसके पुत्र का नाम सुविभूषण था। वह कुशाग्र और तीक्ष्ण बुद्धि वाला था। उसने अल्प काल ही में चारों वेदों को पढ़ लिया।

हे राजन! उत्तंक ने अपनी पत्नी की परामर्श से अपनी पुत्री का विवाह एक सुयोग्य ब्राह्मण कुमार के साथ कर दिया। किन्तु भगवान की गति ही कुछ ऐसी थी कि कन्या विवाह के एक माह पश्चात ही विधवा हो गई। अतः विधवा होने के पश्चात वह कन्या अपने धर्म का पालन करती हुई अपने पिता के यहाँ रहकर ही अपने समय को व्यतीत करने लगी।

विधवा कन्या के दुःख से दुःखी होकर उत्तंक अपने घरबार को अपने पुत्र को सौंप कर अपनी स्त्री और कन्या को लेकर गंगा जी के किनारे चला गया और वहाँ आश्रम बनाकर छेदों का पठन-पाठन करने लगा। उसके पास कुछ ब्राह्मण भी वेद पढ़ने के लिए रहने लगे।

कन्या भी अपने धर्म का पालन करती हुई अपना समय व्यतीत कर रहीं थी। वह नित्य प्रति मन लगाकर माता पिता की सेवा करती थी। एक दिन समस्त कार्यों से थक कर वह एक शिला पर आराम करने के लिए लेट गई। थकान के कारण उसको अपने शरीर की सुधि भी न रहीं। भगवान की गति से अर्द्धरात्रि के समय यकायक उसके शरीर में कीड़े उत्पन्न हो गये।

शिष्यों ने जब उस कन्या के शरीर पर कीड़ों को देखा तो उन्होंने जाकर अपनी गुरु पत्नी को बताया। कन्या के शरीर में कीड़े पड़ जाने की बात सुनकर ब्राह्मणी कातर स्वर से विलाप करती हुई उसी शिला के पास पहुँची जहां उसकी कन्या बेसुध पड़ी थी।

उसके शरीर पर कीड़ो को देखकर बहुत दुःखी हुई और विलाप करते-करते वह ब्राह्मणी अचेत हो गई। जब उसे चेत हुआ तो उसने सोती हुई कन्या को गोदी में उठाया और अपने पति उतंक के सामने ले जाकर रख दिया। कन्या की दशा को देखते हुए ब्राह्मणी ने अपने पति से कहा- हे स्वामी! आप कृपा कर मुझे यह बताये कि मेरी इस साध्वी कन्या की दुर्दशा किस दुष्कर्म के कारण हुई है।

अपनी भार्या की बातों को सुनकर उतंक मुनि थोड़ी देर के लिए शान्त होकर हृदय में भगवान का ध्यान करने लगे। उन्होंने अपनी ज्ञान शक्ति के द्वारा कन्या के पूर्व जन्म के समस्त वृतान्तों को जान लिया। तब वे अपने नेत्रों को खोलकर बोले-हे प्रिये! यह कन्या अपने पहले जन्म में एक ब्राह्मणी थी।

उस समय इसने रजस्वला होते हुए भी एक समय घर के घड़े आदि बर्तनों को छू लिया था। उसी पाप के कारण इसके शरीर में कीड़े पड़ गये हैं। इसने शुद्ध होने के बाद अपनी सखियों के साथ ऋषि पंचमी व्रत को देखकर भी उसका आदर नहीं किया था।

व्रत के दर्शन के प्रभाव से तो इस जन्म में इसको उत्तम ब्राह्मण कुल तो प्राप्त हुआ परन्तु उस व्रत का तिरस्कार करने के कारण इसके शरीर में कीड़े पड़ गये हैं। मुनि के वचनों को सुनकर सुशीला बोली हे स्वामिन!

जिस व्रत के दर्शन मात्र से आपके समान ब्रह्मतेजोमय उत्तम कुल में इसको जन्म प्राप्त हुआ और जिसका तिरस्कार करने से शरीर कीड़ों से भर गया उस महान आश्चर्यजनक व्रत को आप कृपा करके मुझे सुनायें। उत्तंक प्रसन्न होकर बोले-हे सुशीले! वह व्रत समस्त व्रतों में उत्तम है। इसके प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

इस व्रत को धारण करने वाला निश्चय ही दैहिक, भौतिक और दैविक तीनों प्रकार के कष्टों से छूट जाता है। व्रत को धारण करके स्त्रियां सौभाग्य को प्राप्त करती हैं। यह महान व्रत भादों मास के शुक्लपक्ष में पंचमी को होता है। इस व्रत के प्रभाव से उसे अपने पूर्व जन्म का स्मरण रहता है।

॥ भविष्योत्तर पुराण की ऋषिपंचमी कथा ॥

युधिष्ठिर ने प्रश्न किया हे देवेश! मैंने आपके श्रीमुख से अनेकों व्रतों को श्रवण किया है। अब आप कृपा करके पापों को नष्ट करने वाला कोई उत्तम व्रत सुनावें। राजा के ‘इन वचनों को सुनकर श्री कृष्ण जी बोले- हे राजेन्द्र !

अब मैं तुमको ऋषि पंचमी का उत्तम व्रत सुनाता हूँ, जिसको धारण करने से स्त्री समस्त पापों से छुटकारा प्राप्त कर लेती है। हे नृपोत्तम, पूर्व समय में वृत्रासुर का वध करने के कारण इन्द्र के उस पाप को चार स्थानों पर बांट दिया।

पहला अग्नि की ज्वाला में, दूसरा नदियों के बरसाती जल में, तीसरा पर्वतों में और चौथा स्त्री के रज में उस रजस्वला धर्म में जाने अनजाने उससे जो भी पाप हो जाते हैं उनकी शुद्धि के लिए ऋषि पंचमी व्रत करना उत्तम है।

यह व्रत समान रूप से चारों वर्णों की स्त्रियों को करना चाहिए। इसी विषय में एक प्राचीन कथा का वर्णन करता हूँ। सतयुग में विदर्भ नगरी में स्वेनजित नामक राजा हुए। वे प्रजा का पुत्रवत पालन करते थे। उनके आचरण ऋषि के समान थे।

उनके राज्य में समस्त वेदों का ज्ञाता समस्त जीवों का उपकार वाला सुमित्र नामक एक कृषक ब्राह्मण निवास करता था। उनकी स्त्री जयश्री पतिव्रता थी। ब्राह्मण के अनेक नौकर-चाकर भी थे। एक समय वर्षाकाल में जब वह साध्वी खेती के कामों लगी हुई थी तब वह रजस्वला भी हो गई।

हे राजन् उसे अपने रजस्वला होने का भास हो गया किन्तु फिर भी वह घर गृहस्थी के कार्यों में ही लगी रही। कुछ समय के पश्चात दोनों स्त्री पुरुष अपनी-अपनी आयु भोगकर मृत्यु को प्राप्त हुए। जय श्री अपने ऋतु दोष के कारण कुतिया बनी और सुमित को रजस्वला स्त्री के सम्पर्क में रहने के कारण बैल की योनी प्राप्त हुई।

क्योंकि ऋतु दोष के अतिरिक्त इन दोनों का और कोई अपराध नहीं था इस कारण इन दानों को अपने पूर्वजन्म का समस्त विवरण याद रहा। वे दानों कुतिया और बैल के रूप में रहकर अपने पुत्र सुमित के यहाँ पलने लगे। सुमित धर्मात्मा था और अथितियों का पूर्ण सत्कार किया करता था।

अपने पिता के श्राद्ध के दिन उसने अपने घर ब्राह्मण को जिमाने के लिए नाना प्रकार के भोजन बनवाये। उसकी स्त्री किसी काम से बाहर गई हुई थी कि एक सर्प ने आ कर रसोई के बर्तन में विष उडेल दिया।

सुमित की माँ कुतिया के रूप में बैठी हुई यह सब देख रही थी अतः उसने अपने पुत्र को ब्रह्महत्या के पाप से बचाने की इच्छा से उस बर्तन को स्पर्श कर लिया सुमित की पत्नी से कुतिया का यह कृत्य सहा न गया और उसने एक जलती लकड़ी कुतिया के मारी।

वह प्रतिदिन रसोई में जो जूठन आदि शेष रहती थी उस कुतिया के सामने डाल दिया करती थी। किन्तु उस दिन से क्रोध के कारण वह भी उसने नहीं दी। तब रात्रि के समय भूख से व्याकुल होकर वह कुतिया अपने पूर्व पति के पास आकर बोली-हे नाथ! आज मैं भूख से मरी जा रही हूँ वैसे तो रोज ही मेरा पुत्र खाने को देता था मगर आज उसने कुछ नहीं दिया।

मैंने साँप के विष वाले खीर के बर्तन को ब्रह्महत्या के भय से छूकर भ्रष्ट कर दिया था। इस कारण बहू ने मारा और खाने को भी नहीं दिया है। तब बैल ने कहा- हे भद्रे! तेरे ही पापों के कारण मैं भी इस योनि में आ पड़ा हूँ। बोझा ढोते-ढोते मेरी कमर टूट गयी है। आज मैं दिन भर खेत जोतता रहा। मेरे पुत्र ने भी आज मुझे भोजन नहीं दिया और ऊपर से मारा भी खूब है।

मुझे कष्ट देकर श्राद्ध को व्यर्थ ही किया है। अपने माता पिता की इन बातों को उनके पुत्र सुमित ने सुन लिया। उसने उसी समय जाकर उनको भर पेट जन कराया और उनके दुःख से दुखी होकर वन में जाकर उसने ऋषियों से पूछा स्वामी! मेरे माता पिता किन कर्मों के कारण इस योनि को प्राप्त हुए ओर किस प्रकार उससे छुटकारा पा सकते हैं।

सुमित ने उन वचनों को श्रवण कर सर्वतपा नामक महर्षि दया करके बाले-पूर्व जन्म में तुम्हारी माता ने अपने उच्छृंखल स्वभाव के कारण रजस्वला होते हुए भी घर गृहस्थी की समस्त वस्तुओं को स्पर्श किया था और तुम्हारे पिता ने उसको स्पर्श किया था। इसी कारण वे कुतिया और बैल की योनि को प्राप्त हुए हैं। तुम उन की मुक्ति के लिए ऋषिपंचमी का व्रत धारण करो।

श्री कृष्णजी बोले– हे राजन! महर्षि सर्वतपा के इन वचनों को श्रवण करके सुमित अपने घर लौट आया और ऋषिपंचमी का दिन आने पर उसने अपनी स्त्री सहित उस व्रत को धारण किया और उस के पुण्य अपने माता पिता को दे दिया। व्रत के प्रभाव से उसके माता-पिता दोनों ही पशु को योनियों से मुक्त हो गए और स्वर्ग को चले गए। जो स्त्री इस व्रत को धारण करती है वह समस्त सुखों को पाती है।

॥ ऋषि पूजन की आरती ॥

ऋषि पंचमी व्रत कथा

जय जय ऋषिराजा, प्रभु जय जय ऋषिराजा । देव समाजाहृत मुनि, कृत सुरगया काजा॥ टेक॥
जय दध्यगाथर्वण, भरद्व गौतम। जय श्रृंगी, पराशर अगस्त्य मुनि सत्तम॥१॥
वशिष्ठ, विश्वामित्र, गिर, अत्री जय जय कश्यप भृगुप्रभृति जय, जय कृप तप संचय ॥२॥
वेद मन्त्र दृष्टावन, सबका भला किया। सब जनता को तुमने वैदिक ज्ञान दिया ॥३॥
सब ब्राह्मण जनता के मूल पुरुष स्वामी। ऋषि संतति, हमको ज्ञानी हों सत्पथगामी॥४॥
हम में प्रभु आस्तिकता आप शीघ्र भर दो। शिक्षित सारे नर हों, यह हमको वर दो॥५॥
‘धरणीधर’ कृत ऋषिजन की आरती जो गावे। वह नर मुनिजन, कृपया सुख सम्पति पावै॥६॥

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