सच्चा मित्र पर निबंध हिंदी में? सच्चा मित्र किसे कहते हैं?

सच्चा मित्र पर निबंध (Saccha Mitra Par Nibandh), जान-पहचान वालों में से ही कुछ उसके मित्र बन जाते हैं। इनमें से कुछ सच्चे मित्र होते हैं और कुछ छली-कपटी। साथी और सहपाठी तो बहुत हो सकते हैं, परन्तु सच्चा मित्र मिलना कठिन होता है। सच्चा मित्र वह होता है जो विपत्ति के समय हमारी सहायता करता है। सच्चे मित्र पर निबंध।

सच्चा मित्र पर निबंध (Saccha Mitra Par Nibandh)

सच्चा मित्र पर निबंध

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सच्चा मित्र पर निबंध (Saccha Mitra Par Nibandh)

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह समाज में लोगों से मिलता-जुलता है। वह अपनी बात कहता है, दूसरों की बात सुनता है। वह किसी से लेता है, किसी को देता है। यह मेल-जोल ही धीरे-धीरे जान-पहचान में बदल जाता है।

मित्रों का चुनाव

यदि आज हमारे पास धन, सम्पत्ति और मिलनसारी है। तो हमारे मित्रों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ने लगेगी। हमें कुछ सावधानी से काम लेना होगा। हमें यह पहचानना होगा कि इन मित्रों में सच्चे मित्र कितने हैं और स्वार्थी तथा छली-कपटी कितने हैं? मित्रों के चुनाव पर ही मनुष्य के जीवन की सफलता और असफलता निर्भर रहती है। राजर्षि भर्तृहरि ने सच्चे मित्र के लक्षण इस प्रकार बताये हैं।

“सच्चा मित्र हमको बुराइयों से हटाता है, हितकारी और लाभकारी कामों में लगाता है, हमारे दोषों को छिपाता है और हमारे गुणों का प्रचार करता है। वह आपत्ति में पड़े हुए मित्र का साथ नहीं छोड़ता है और समय पर उसकी हर प्रकार से सहायता करता है।”

इन्हीं लक्षणों को ध्यान में रखकर हमको मित्रों का चुनाव करना चाहिए। हमें देखना चाहिए कि हमारे पास जो मित्र-मण्डली जमा हो गई है, इनमें से सच्चे कितने हैं और छली-कपटी कितने हैं? कितने ऐसे हैं जो हमें कुसंग से हटाकर सुसंग में ले जायेंगे? कितने हमारी विपत्ति में साथ देंगे और कितने विपत्ति में हमारा साथ छोड़ देंगे? महाकवि रहीम ने विपत्ति को सच्चे मित्र की पहचान की कसौटी बताया है। रहीम ने कहा है

“कहि रहीम सम्पति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
विपति-कसौटी जो कसे, तेई साँचे मीत ॥”

सच्चे मित्रों से लाभ

नीति-ग्रन्थ में सच्चे मित्रों के लाभ बताये हैं। कौए, कछुए, चूहे और मृग की कहानी के द्वारा हमें बताया गया है कि सच्चे मित्र विपत्ति में एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते हैं और मित्र को विपत्ति से बचाने के लिए अपने प्राणों को भी संकट में डाल देते हैं।

हिरन जब जाल में फँस गया तो चूहे ने अपने प्राणों को संकट में डालकर हिरन के प्राण बचाये। चूहे ने उसका जाल काटा और कौए ने उसे बताया कि अब जाल कट गया है, तुम तेजी से भाग जाओ। मृग कौए के शब्द सुनकर भाग गया। इस प्रकार वह पकड़े जाने से बच गया।

जहाँ उन्होंने सच्चे मित्रों से मित्रता की शिक्षा दी है, वहीं कपटी गीदड़ का भी उदाहरण देकर हमको कपटी मित्रों से बचने की शिक्षा दी है। एक गीदड़ ने मोटे-ताजे मृग को देखकर सोचा कि किसी तरह इसको जाल में फँसवा दूँ। इसके फँस जाने पर मुझे यदि इसका माँस खाने को नहीं मिलेगा तो कम-से-कम माँस और खून से सनी हड्डियाँ तो मिलेंगी ही।

वह मृग के पास आया और बोला-“मित्र मैं वंशहीन और मित्रहीन हूँ। मेरा जीवन नीरस है, तुमसे मित्रता चाहता हूँ।” हिरन उसकी बातों में आ गया और उसे मित्र बना लिया। एक दिन हिरन बहेलिए के जाल में फँस गया। उसके सच्चे मित्र चूहे और कौए ने उसे बचाया।

छली कपटी मित्र हमारे पास आकर बड़ी-बड़ी, मीठी-मीठी बातें करते हैं। वे हमें तरह-तरह के लालच दिखाते हैं और हमारे बड़े हितैषी बनते हैं, किन्तु हमें विवेक से काम लेकर इन कपटी मित्रों से बचना चाहिए और सच्चों को अपना मित्र बनाना चाहिए।

उपसंहार

नीतिकारों ने जीवन को बिना मित्रों के नीरस बताया है। संसार में दो प्रकार के भाई होते हैं। एक वह जो माता के गर्भ से जन्म लेता है, दूसरा वह जो बोल-चाल और साथ रहने के लिए मिलता है। इनमें दूसरा ही मित्र कहलाता है। मित्र के लिए यह आवश्यक है-‘ययो रेव वित्तम् ययो रेव समं कुलम्’ अर्थात् जो प्रत्येक स्थिति में समान हो, वही सच्चा मित्र है।

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