सल्तनत काल की शुरुआत कब हुई? सल्तनत काल हिस्ट्री इन हिंदी?

सल्तनत काल की शुरुआत कब हुई

सल्तनत काल की शुरुआत कब हुई (Saltanat Kaal Ki Shuruaat Kab Hui), सल्तनत काल हिस्ट्री इन हिंदी, तचइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के पश्चात दिल्ली में तुर्क शासकों का राज्य स्थापित हो गया।

सल्तनत काल की शुरुआत कब हुई (Saltanat Kaal Ki Shuruaat Kab Hui)

सल्तनत काल की शुरुआत कब हुई
सल्तनत काल की शुरुआत कब हुई (Saltanat Kaal Ki Shuruaat Kab Hui)

सल्तनत काल की शुरुआत कब हुई (Saltanat Kaal Ki Shuruaat Kab Hui)

इन तुर्क शासकों का रहन-सहन, भाषा, धर्म तथा शासन करने का तरीका भारतीय शासकों से अलग था तुर्क शासक सुल्तान की उपाधि धारण करते थे। इन्होंने दिल्ली को शासन का केन्द्र बनाया और लगभग 200 साल तक शासन किया।

मोहम्मद गोरी की मृत्यु 1206 ई० में हो गई। उसक मृत्यु के समय तक लगभग पूरा उत्तर भारत उसके अधीन हो चुका था। उसने भारत में शासन चलाने के लिए गुलाम अधिकारी नियुक्त कर रखे थे. इन्हीं में एक योग्य गुलाम अधिकारी कुतुबुद्दीन ऐबक था।

गोरी की मृत्यु का समाचार मिलने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने स्वयं को भारत में तुर्क राज्य का शासक घोषित कर दिया। यह तुर्क राज्य अब तुर्क सल्तनत कहलाया। अगले शासक इल्तुतमिश ने 1210 ई० में सत्ता संभालने के साथ दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया। तब यह दिल्ली सल्तनत के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

आपको इस बात से हैरानी हो सकती है पर उन दिनों गुलाम रखने की प्रथा थी। तुर्किस्तान के | युवकों को खरीद कर उन्हें युद्ध और प्रशासन के काम में प्रशिक्षण देकर सुल्तानों को बेचा जाता था। इसलिए ये गुलाम कहलाते थे।

सुल्तान की सेवा में आने पर योग्य और होनहार गुलामों को ऊँचे और जिम्मेदारी के पद भी सौंपे जाते थे। सुल्तान मोहम्मद गोरी की सेवा में भी ऐसे कई गुलाम थे और भारत में उसके राज्य का शासन चलाते थे।

सल्तनत (सुल्तनत) के सामने चुनौतियाँ

सरदार जिन्हें अमीर कहा जाता था, तुर्क और अफगान कबीलों के होते थे। इनमें जातीय श्रेष्ठता तथा सल्तनत में ऊँचा स्थान पाने की भी होड़ रहती थी। इन्हीं अमीर सरदार में से ही सुल्तान होता था। सुल्तान होने के लिए सैनिक योग्यता एवं शासकीय क्षमता का होना आवश्यक था।

इन क्षमताओं के प्रभाव से वह सुल्तान बन सकता था और तभी तुर्क अमीरों का समर्थन प्राप्त करना भी सम्भव था। सुल्तान के लिए अमीर सरदारों का समर्थन और विश्वास जरूरी था। उसे हमेशा भय रहता था कि कहीं ये अमीर सरदार आपस में मिलकर कोई षड्यंत्र न करें।

अत: सुल्तान का अधिकांश समय इन गुप्त षड्यंत्रों से बचने के उपायों में बीतता था। सुल्तानों को इन अमीर सरदारों में संतुलन भी बनाए रखना पड़ता था। तुल्तान इस्लाम धर्मावलम्बी थे तथा बाहरी देशों से आए थे।

इसलिए भारतीय जनता पर शासन करने के लिए तुर्क अमीरों, उलेमा (धार्मिक वर्ग) आदि को खुश करने के साथ ही हिन्दुस्तानी जनता से भी सतर्क रहते क्योंकि सल्तनत में विद्रोहों का भय हमेशा बना रहता था।

सल्तनत कालीन शासकों ने आन्तरिक शान्ति बनाए रखने के लिए शासकीय प्रबन्ध तंत्र तथा राज्य विस्तार एवं आक्रमणों से रक्षा के लिए मजबूत सैन्य संगठन भी बनाए इसमें प्रारंभिक तुर्क खिलजी वंश तुगलक वंश सैयद वंश एवं लोधी वंश प्रमुख थे।

कुतुबुद्दीन ऐबक वंश (1206 40 1290 ई०)

1206 ई. में मुहम्मद गोरी की मृत्यु के पश्चात उसका कुतुबुद्दीन ऐबक उत्तर भारत का पहला तुर्की शासक बना कुतुबुद्दीन ऐबक ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया। उसकी उदारता के कारण ही उसे लाखबख्श कहा जाता था, अर्थात वह लाखों का दान करने वाला दानप्रिय व्यक्ति था।

भारतवर्ष में उसके जीवन का अधिकांश समय सैनिक गतिविधियों में ही बीता। कुतुबुद्दीन ऐबक को भवन निर्माण में भी रुचि थी। उसने दिल्ली में क़ुतुब मीनार कुवत उल इस्लाम मस्जिद और अजमेर में अढाई दिन का झोपड़ा का निर्माण कराया।

कुतुबमीनार की शुरुआत ऐबक ने की थी परन्तु इसको पूर्ण इल्तुतमिश ने कराया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में एक नये राज्य की नींव अवश्य डाली. पर उस राज्य को सुद्ध बनाने का अवसर उसे नहीं मिल पाया। कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु 1210 ई० में चौगान खेलते हुए घोडे से गिर कर हो गई।

इल्तुतमिश (1210 ई० 1236 ई०)

1210 ई० मे कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के पश्चात दिल्ली के अमीरों ने इल्तुतमिश को गददी पर बैठाया उसे ही उत्तरी भारत में तुर्की के राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। गददी पर बैठने के बाद उसे आन्तरिक और बाहरी समस्याओं से जूझना पड़ा इल्तुतमिश ने चालीस गुलाम सरदारों का संगठन अर्थात तुर्कान-ए-चेहलगानी का निर्माण किया।

शासन व्यवस्था

इल्तुतमिश ने देश में एक राजधानी एक स्वतंत्र राज्य राजतंत्रीय प्रशासनिक व्यवस्था और अफसरशाही व्यवस्था की स्थापना की। उसने दिल्ली को भारत वर्ष में तुर्क साम्राज्य का राजनैतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक केन्द्र बनाया। उसने इतना व्यवस्था के द्वारा केन्द्र को प्रान्तीय और स्थानीय शासन से जोड़ने की नींव डाली।

सुल्तान ने अपनी सल्तनत (राज्य) को कुछ प्रांतों में बाँटा। प्रांतों को इक्ता कहते थे। हर इक्ते में सुल्तान अपने एक जिम्मेदार सेनापति को नियुक्त करता था जिसे कहा जाता था। जिसे इक्तादार या अक्तादार कहा जाता था।

इक्तादार के पास अपनी सेना होती थी और प्रशासन चलाने के लिए अधिकारी होते थे। इक्तादार इनकी सहायता से राज्य की रक्षा करते थे और अपने नियंत्रण क्षेत्रों से कर वसूल करते थे। अपने इक्ते से इकट्ठे किए गए कर से ही वे अपना अपने अधिकारियों का और अपने सैनिको का खर्चा चलाते थे।

इल्तुतमिश ने मुद्रा व्यवस्था में सुधार करते हुए चाँदी का टका और तौबे का जीतल चलाया। 1236 ई० में इल्तुतमिश की मृत्यु हो गई उसने अपने जीवन काल में ही अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था।

रजिया सुल्तान प्रथम मुस्लिम महिला शासिका (1236ई0-1240ई0)

इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी बना दिया था, परन्तु सरदारों तथा उलेमा के विरोध के चलते इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद उसका पुत्र रुद्दीन फिरोज गददी पर बैठ गया लेकिन दुर्बल शासक होने के कारण 1236 ई० में रजिया दिल्ली की गद्दी पर बैठी और सुल्तान कही जाने लगी।

रजिया से पूर्व प्राचीन मिस्र और ईरान में महिलाओं ने रानियों के रूप में शासन किया था परन्तु मध्यकालीन विश्व में पहली मुस्लिम महिला शासक थी।

रजिया ने लगभग तीन वर्ष आठ माह शासन किया। रजिया ने स्त्रियों का पहनावा छोड़ दिया और बिना पर्दे के दरबार में बैठने लगी। वह युद्ध में सेना का नेतृत्व भी करती। अमीरों को शीघ्र ही पता लग गया कि स्त्री होने पर भी रजिया उनके हाथों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं थी।

तुर्क सरदार भी किसी महिला के आधीन कार्य करने को तैयार नहीं थे। उन्होंने एक षड़यंत्र के द्वारा उसे गददी से हटा दिया। रजिया के बाद उसका एक भाई एवं दो भतीज बारी-बारी से सुल्तान बने जो अयोग्य थे। अतः इल्तुतमिश के छोटे पीत्र नासिरुद्दीन महमूद को दिल्ली का सुल्तान बनाया गया।

नासिरुद्दीन महमूद (12460-1265ई0)

“चालीस की सरदारों का दल” इस समय अत्यधिक क्तिशाली हो गया था। वे जिसे चाहते गददी से उतार देते थे और जिसे चाहते गद्दी पर बैठा देते थे। 1246 ई० में इस दल ने इल्तुतमिश के पत्र नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बना दिया।

महमूद ने एक अमीर जिसका नाम बलबन था को अपना नायक बनाया। बलबन ने धीरे-धीरे अपनी स्थिति सुदृढ कर ली और वह एक शक्तिशाली सरदार बन गया। 1265 ई० में नासिरूद़दीन महमूद के बाद बलवन गद्दी पर बैठा।

बलबन (1265ई0 12870)

बलबन एक योग्य और अनुभवी शासक था। उसने अपने शासन काल में कई महत्वपूर्ण कार्य किए। उसने दिल्ली को सुरक्षित बनाने के लिए आस-पास के जंगलों को कटवाया तथा साफ करवाकर वहाँ पुलिस चौकियों का निर्माण कराया। इस प्रकार वह दिल्ली के आसपास रहने वाले मेवातियों के विद्रोह को रोकने में सफल रहा। मेवातियों के अलावा उसने अन्य विद्रोहों का भी दमन किया।

बलबन ने कानून को लागू करने में कठोरता बरती। उसने राजा के पद को प्रतिष्ठित बनाया। वह राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानता था। बलबन का मानना था कि राजा को ईश्वर से शक्ति प्राप्त होती है। इसलिए उसके कार्यों की सार्वजनिक जाँच नहीं की जा सकती। इससे उसकी निरंकुशता सुरक्षित होती थी।

इसलिए वह दरबार में अत्यंत गम्भीर मुद्रा में बैठता था। वह न तो कभी मजाक करता था और न ही हँसता था। उसने दरबार में निर्धारित ढंग से वस्त्र पहनकर आने बैठने आदि के बारे में नियम बनाए जिनका कठोरता से पालन किया जाता था। बलबन ने दरबार में सिजदा एवं पायबोस परम्परा प्रारम्भ कराई।

उसने सुदृढ गुप्तचर व्यवस्था बनाई जिससे राज्य की पूरी खबरें गुप्तचर सुल्तान को देते थे। बलबन की प्रमुख विशेषता थी कि. उसने सदैव न्याय को सुल्तान का प्रमुख कार्य समझा। उसने शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना पर भी ध्यान दिया। सैनिकों को संतुष्ट रखने के लिये उसने उनका वेतन सदैव समय पर दिया। उन्हें सक्रिय रखने के लिए निरन्तर अभ्यास पर बल दिया।

बलवन में राज्य को बाहरी आक्रमणों से बचाने एवं मंगोलो की शक्ति को रोकने का प्रयास किया। तेरहवी शताब्दी के प्रारम्भ में एशिया और यूरोप में आक्रान्ताओं की नई लहर आई।

यह नए आक्रमणकारी मंगोल थे, जिन्हें उस महान साम्राज्य के लिए सबसे अधिक जाना जाता है जिसका गठन उन्होंने गेज खी के नेतृत्व में किया। तेरहवी सदी का अत होते-होते मंगोल साम्राज्य ज्ञात दुनिया के बड़े भाग तक फैल चुका था के नेतृत्व में उनकी शक्ति बहुत बढ़ गई थी।

मंगोल आक्रमण की भयंकरता को बलबने भलीभाँति अनुभव करता था। इसलिए उन्हें रोकने के लिए उसने मंगोलों के मार्ग में पढ़ने वाले पुराने दुर्गा की मरम्मत करवाई तथा नये दुर्गा का निर्माण करवाया। वहाँ पर हृष्टपुष्ट सैनिकों एवं विश्वसनीय और अनुभवी अधिकारियों को नियुक्त किया शस्त्र तथा भोजन आपूर्ति की पूर्ण व्यवस्था भी वहीं पर की गई।

फारसी शब्द ‘मुगल’ का उद्भव मंगोल शब्द से हुआ है। उसकी मृत्यु के बाद दिल्ली की गद्दी पर उसके वंश का शासन अधिक दिन तक न रह पाया, परन्तु दिल्ली को जो शक्ति बलबन ने प्रदान की उसी के परिणामस्वरूप खिलजी सुल्तान अलाउद्दीन अपने साम्राज्य का विस्तार करने में सफल रहा।

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