सांप्रदायिक एकता पर निबंध? साम्प्रदायिक सौहार्द पर निबंध?

सांप्रदायिक एकता पर निबंध (Sampradayik Etika Par Nibandh):- उर्दू भाषा के प्रसिद्ध तथा लोकप्रिय कवि स्वर्गीय मुहम्मद इकबाल का यह गीत कभी हर बच्चे, जवान और बूढ़े की जिह्वा पर था। यह वह समय था जब अविभाजित भारत में अंग्रेजों की कूटनीति ने हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता को हवा दी थी। खालसा पंथ को हिन्दुओं से अलग कर देने की चालें चली गई और मुसलमानों को हिन्दू-काफिर तथा फिरकापरस्त दिखाई देने लगे थे तथा हिन्दू-मुसलमानों को म्लेच्छ कहकर पुकारने लगे थे। मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ।। हिन्दी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्तां हमारा ॥

सांप्रदायिक एकता पर निबंध (Sampradayik Etika Par Nibandh)

सांप्रदायिक एकता पर निबंध
Sampradayik Etika Par Nibandh

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इस कविता से प्रेरणा

‘इकबाल’ की उक्त पंक्तियों ने साम्प्रदायिकता की आग पर ठंडा पानी डालने की चेष्टा की। मदान्ध स्वार्थी नेताओं को और जनसाधारण को धर्म की वास्तविकता का दिग्दर्शन कराया और उनको समझाया कि संसार को कोई भी धर्म या सम्प्रदाय दुर्भावना तथा घृणा नहीं सिखाता। किसी भी धर्म में दूसरे धर्म के प्रति द्वेष भावना नहीं। संसार का प्रत्येक धर्म सत्य, अहिंसा, प्रेम, और भ्रातृभाव की नींव पर खड़ा है।

प्रत्येक धर्म चाहे वह हिन्दू धर्म हो, मुस्लिम धर्म हो अथवा ईसाई धर्म या अन्य कोई धर्म हो। महर्षि दयानन्द, गुरु नानक, मुहम्मद साहब किसी ने भी दूसरे धर्मों की या पंथों की निन्दा नहीं की। उन्होंने सभी प्राणियों में एक ही आत्मा और एक ही ज्योति के दर्शन किए तथा प्राणी मात्र की समता का उपदेश दिया। इन महापुरुषों ने सच्चाई तथा परोपकार के लिए ही तो अपना सर्वस्व होम कर डाला था, फिर उनके अनुयायियों में परस्पर बैर और घृणा भावना क्यों?

सभी एक देश के वासी

हम सभी हिन्दू, मुसलमान और ईसाई इस महान् देश के निवासी हैं। शताब्दियों से हम इसी देश में रहते आ रहे हैं। यह हमारी फुलवाड़ी है और हम इसमें स्वतन्त्रता पूर्वक विचारने वाले पंछी हैं, इसमें चहचाने वाली बुलबुलें हैं, हम सबको एकत्र रूप से मिलकर, गाकर, हँसकर, खेलकर यहीं रहना है।

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तों हमारा।
हम बुलबुलें हैं इसकी,
यह गुलिस्ताँ हमारा ।।

हम सभी हिन्दुस्तानी अर्थात् भारतीय हैं, यह हिन्दुस्तान हम सबका है। यह भारत की माँ अस्सी करोड़ सन्तानों की जननी है। न यह केवल हिन्दुओं की है, न मुसलमानों की और न ही ईसाइयों की, अपितु सबकी माँ है। हम सब भी-

हिन्दी हैं हम वतन हैं,
हिन्दोस्ताँ हमारा ।।

यह हमारा देश हमारा सुन्दर बगीचा है। इसी कारण, भारत में धर्म निरपेक्ष राज्य के आदर्श को अपनाया गया है। हमारे देश में जनता का राज्य है, न हिन्दू राज्य, न खालसा राज्य, न यवन शासन और न ही अंग्रेजी आधिपत्य है। यहाँ सभी समान हैं, सभी एक हैं, सभी भाई-भाई हैं, सभी भारत माँ के लाल हैं।

संविधान की दृष्टि में सभी एक समान हैं। सभी का अधिकार समान है, सभी को धार्मिक स्वतन्त्रता है, सभी को विचार स्वातन्त्र्य है, सभी को अपने-अपने इष्टदेव की आराधना का अधिकार है। अगर इस विचार को हम गाँठ बांध लें तो देश में आज जो साम्प्रदायिक दंगे हो रहे हैं, वे कभी न होंगे। पूजा के मार्ग भिन्न होते हुए भी सबसे साम्प्रदायिक एकता और भ्रातृभाव की वृद्धि होगी। सभी एक ही ईश्वर की सन्तानें है। नाम उनके भिन्न-भिन्न हैं? फिर झगड़े का क्या काम है?

आज दुर्भाग्य से देश के उत्तर-पूर्वी सीमान्त राज्यों में ईसाई साम्प्रदायिकता सिर उठा रही है, उत्तर भारत और दक्षिण भारत में भी मुस्लिम साम्प्रदायिकता की विभीषिका बढ़ती जा रही है। काश्मीर में तो साम्प्रदायिक भावना का नग्न तांडव देखने को मिला है। वहाँ के मुसलमानों ने हिन्दू पंडितों को वहाँ से पलायन करने को मजबूर कर दिया है। सैकड़ों मंदिर तोड़ दिये हैं। बहू-बेटियों को अपमानित किया है। तो पंजाब में हिन्दू समाज के ही अभिन्न अंग खालसापंथ के अनुयायी साम्प्रदायिकता से अंधे होकर उत्पात मचा रहे हैं और क्रूरतापूर्ण हत्याओं तथा तोड़-फोड़ में संलग्न हैं। यह देश की एकता, अखंडता और सुव्यवस्था के लिए बहुत संकट है। इस समय तो ‘हम सब एक ही ईश्वर के की सन्तान है’, यह भावना और भी दृढ़ता से अपनायी जानी चाहिए।

सभी सम्प्रदाय अच्छे

संसार के प्रत्येक धर्म में अच्छाइयां विद्यमान हैं। प्रत्येक सम्प्रदाय में समान रूप से कल्याण की भावनाएँ हैं। प्रत्येक धर्म या सम्प्रदाय प्रेम, देश भक्ति, साहस, वीरता, बलिदान, सत्य, त्याग, मानव-मानव की एकता में एक ही ईश्वर की उपस्थिति और अहिंसा का पाठ पढ़ाता है। प्रत्येक धर्म फले-फूले, प्रत्येक धर्म की उन्नति हो, प्रत्येक धर्म आगे बढ़े। उसकी जड़ें कभी साम्प्रदायिकता के विष से सिंचित न हों, प्रत्येक धर्म दूसरे का सहयोगी बने, प्रतियोगी नहीं, एक-दूसरे का पूरक बने, प्रतिद्वन्द्वी नहीं, एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु बने, असहिष्णु नहीं। तभी समाज और राष्ट्र का कल्याण हो सकता है, क्योंकि मजहब नहीं सिखाता आपस में पैर रखना। हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा।

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