सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय? आजादी की लड़ाई में भगत सिंह का योगदान।

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय (Sardar Bhagat Singh Ka Jivan Parichay), सरदार भगत सिंह का जन्म 24 सितंबर 1906 पंजाब के लायलपुर स्थित बंगा नामक ग्राम में सरदार किशन सिंह के यहाँ हुआ था। सरदार भगत सिंह कौन थे? भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह था। भगत सिंह की माता का नाम विद्यावती कौर था। भगत सिंह ने देश को आजाद करने के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिए था।

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय (Sardar Bhagat Singh Ka Jivan Parichay)

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय
सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय (Sardar Bhagat Singh Ka Jivan Parichay)

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय (Sardar Bhagat Singh Ka Jivan Parichay)

जन्म समय28 सितंबर 1907
मृत्यु समय23 मार्च 1931
जन्मस्थानपंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गाँव में
मृत्यु स्थललाहौर, पंजाब (अब पाकिस्तान में)
मृत्यु का कारणफांसी
मृत्यु के समय आयु23 वर्ष
बचपन का नामभगोवाला
पिता का नामसरदार किशन सिंह
माता का नामविद्यावती कौर
दादा का नामअजीत सिंह
दादी का नामजयकौर
चाचा का नामअजीत सिंह, स्वर्ण सिंह
भाई का नामकुलतार सिंह, कुलबीर सिंह, राजिंदर सिंह, जगत सिंह, रणबीर सिंह
बहन का नामबीबी प्रकाश कौर, बीबी अमर कौर, बीबी शकुंतला कौर

उन्होंने असहयोग आन्दोलन से प्रेरित होकर अपना नाम नेशनल कॉलेज, लाहौर में लिखा लिया जहाँ उनकी मित्रता भगवतीचरण वोहरा, यशपाल, सुखदेव से हुई और क्रान्तिकारी गतिविधियों के प्रणेता सर्वप्रथम बने जयचन्द्र विद्यालंकार जो प्रोफेसर के पद पर कॉलेज में कार्यरत थे।

नये खून ने वहाँ एकत्रित होकर ”नौजवान भारत सभा’ की नींव डालकर उसे क्रान्तिकारियों का एक गुप्त केन्द्र बना डाला जहाँ भारत से अंग्रेजों को भगाने के कार्यक्रम पर विचार किया जाता। इसी प्रयत्न में भगत ने आगरा, कानपुर, पटना और कलकत्ते के कई चक्कर दल के लिए लगाते रहे।

भारतीय जनसाधारण में ब्रिटिश राजभक्ति की भावना जाग्रत करने की व्यर्थ आशा में ब्रिटिश सरकार प्रिन्स ऑफ वेल्स (ब्रिटिश सम्राट के ज्येष्ठ पुत्र) को भारत लायी। लेकिन बम्बई की धरती पर वे जैसे ही उतरे वहाँ हड़ताल हुई तो अन्य प्रान्तों में भी इस विचारधारा का विरोध किया गया। यह स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में सीमा चिह्न कहा जा सकता है।

महात्मा गांधी ने कांग्रेस द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व सँभाला और जनता को अहिंसात्मक असहयोग के लिए उत्साहित किया। जलियाँवाला बाग की घटना भारतीय जनता की आँखों में चलचित्र की तरह नाचने लगी। अंग्रेजों के विरुद्ध लोग एकत्रित हो संघर्ष करने की तैयारी करने लगे।

देश में स्वतन्त्रता संग्राम का बिगुल बजने लगा। नवयुवक संघर्ष की तैयारी में जुट गये। पंजाब की आग बुझाने के लिए सरकार ने दफा 144 लगाकर लोगों का दमन प्रारम्भ कर दिया। आजादी के दीवानों ने परवाह नहीं की।

सरकारी आदेश की अवहेलना कर वे सड़कों पर निकल आये। सभा हुई, जुलूस निकाले गये। भगत सिंह ने सहयोगियों के साथ बढ़-बढ़कर क्रान्तिकारी गतिविधियों को हवा दी। अग्रणी रहकर आग से खेलना आदत जो बन गयी थी।

भगत सिंह का बचपन

घर के वातावरण से प्रभावित था भगत सिंह का बचपन क्योंकि इनके चाचा उस समय के एक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी अजीत सिंह थे। ब्रिटिश हुकूमत के कट्टर विरोधी होने के कारण सरकार उनके पीछे-पीछे घूमती रहती।

रूढ़िवाद से मुक्त पारिवारिक वातावरण के कारण सिक्ख होते हुए भी सरदार भगत सिंह केशधारी न बने चूँकि तर्क, विद्रोह और साहस की किरण अन्तःस्तल में चमक रही थी। साम्प्रदायिक भावना से दूर रहा।

बचपन जब किशोर हुआ तो धीमे-धीमे भगत सिंह के सिर के केश और पगड़ी अपने-आप उतर गयी। सम्भवतः वे जन्म-जात क्रान्तिकारी थे, क्रान्तिकारी कुल में जन्मे थे और क्रान्तिकारी को जीवन में नाना प्रकार के रूप बदलने पड़ते हैं, उसे हर स्थान पर समय के अनुकूल अपनी पहचान बनानी पड़ती है।

दयानन्द एंग्लो वैदिक स्कूल की शिक्षा-दीक्षा से अपना प्रारम्भिक जीवन शुरू कर दिया। मेधावी छात्र होने के नाते अध्ययनशीलता से उन्हें इच्छानुकूल सफलताएँ भी मिलीं मगर गांधी बाबा के असहयोग आन्दोलन से हृदय में विद्रोह की भावना जाग्रत हो गयी जो भविष्य में ज्वालामुखी के रूप में उभरकर विदेशी सरकार के लिए सिरदर्द बन गयी।

साइमन कमीशन के विरोध में भगत सिंह

लाला लाजपतराय ने साइमन कमीशन के विरोध में एक विशाल जुलूस का नेतृत्व किया। क्रान्तिकारी उनकी व्यक्तिगत विचारों से सहमत हुए बगैर भी अपना विरोध प्रकट करने में साझेदारी का निर्वाह करना अपना कर्तव्य समझते थे।

मित्र का दुश्मन मेरा दुश्मन रहे तभी संगठन की शक्ति और एकता सुरक्षित बच सकती है। संसार में सभी लोग एकमत हों ऐसी न सम्भावना है न ऐसी विचारधारा लाभकारी सिद्ध हो सकती है।

कदम से कदम मिलाकर एकता के लिए मर मिटनेवाला व्यक्ति साहसी, निर्भय, उत्साही और त्यागी होता है और उन तमाम गुणों की खान सरदार भगत सिंह एक बार जो सोच लिया, निर्णय ले लिया उसका सम्पन्न होना अनिवार्य है।

यह लगन कूट-कूटकर भगत सिंह के चरित्र का अंग बन चुकी थी। लाला जी के विशाल जुलूस पर अंग्रेजों ने लाठियों की वर्षा की। भीड़ में भगदड़ हुई, पुलिस लाठी से सिर आहत हो गया, घायल हो गिर गये। उनके मुँह से निकला- ‘अंग्रेजो, याद रखना, मेरी अर्थी की एक कील से ब्रिटिश साम्राज्य का सर्वनाश होकर रहेगा।’

सांडर्स की हत्या

क्रान्तिकारियों की गुप्त बैठक में निर्णय लिया गया कि लाला जी के हत्यारे को मौत के घाट उतारने के अलावा अपने विरोध का अन्य कोई मार्ग नहीं है। खून का बदला खून चाहिए-दल का सर्वसम्मत निर्णय था। भगत सिंह अग्रणी थे।

चन्द्रशेखर का समर्थन, सहयोगी सुखदेव और भगवतीचरण वोहरा ‘सांडर्स की हत्या’ की योजना पर कार्य हुआ निश्चित समय, तिथि और स्थानों की हर प्रकार छानबीन कर ली गयी।

योजना के अनुरूप भगत सिंह और राजगुरु पुलिस दफ्तर के सामने एक पेड़ की आड़ ले खड़े हो गये। चन्द्रशेखर आजाद ने डी. ए. वी. कॉलेज की चारदीवारी पर निगरानी रखी।

सांडर्स ने अपने कार्यालय से निकल मोटर साइकिल स्टार्ट की। पेड़ की आड़ से राजगुरु ने अपना अचूक निशाना साधकर उसकी कनपटी पर गोली दागी सरदार भगत सिंह के कदम आगे बढ़े उन्होंने भी अपनी आटोमेटिक पिस्तौल से आठ गोलियाँ सांडर्स पर चलायीं।

जिससे हत्यारे की हत्या में प्राण शेष बचने का कोई सन्देह न रहे। सांडर्स के गिरते ही ट्रैफिक इंस्पेक्टर फर्न राजगुरु और भगत सिंह के पीछे भागा। उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगा हवलदार चन्दन सिंह दो सिपाहियों के साथ ज्यों ही छात्रावास की ओर चन्दन ने पीछा किया चन्द्रशेखर आजाद ने चेतावनी दी।

खबरदार, पीछा मत करो, मारे जाओगे।’ चन्दन सिंह को रुकना न था, मौत उसे बुला रही थी दौड़ते कदम तभी रुके जब वह आजाद की पहली गोली से पैर घायल कर बैठा उठकर फिर पीछा किया। आजाद की दूसरी गोली ने उसे कटे पेड़ के समान धरती पर गिरा दिया। वह मर गया। सभी साथी भाग गये।

दूसरे दिन सभी ने पौ फटते ही दीवारों पर चिपके पर्चे पढ़े- ‘सांडर्स को मारकर हमने अपने राष्ट्रीय नेता के अपमान और हत्या का बदला ले लिया है।’ पुलिस की भाग-दौड़ में उनकी नींद हराम हो गयी। क्रान्तिकारी शीघ्रातिशीघ्र लाहौर छोड़ने पर विवश थे। राजगुरु, भगत सिंह, जयगोपाल और चन्द्रशेखर आजाद पुलिस की आँखों में धूल डालकर दुर्घटना स्थल से सुरक्षित भाग निकले थे। सभी भूमिगत हुए।

लाहौर स्टेशन पर भगवतीचरण वोहरा की पत्नी दुर्गा देवी अपने शिशु को लिये भगत सिंह और राजगुरु के साथ अंग्रेज, मेम साहब एवं वफादार नौकर के भेस में ट्रेन द्वारा लखनऊ पहुँचे। राजगुरु लखनऊ उतर गया।

भगत सिंह-दुर्गा भाभी शिशु के साथ कलकत्ते स्टेशन तक बड़ी निर्भीकता और साहस से निकल गये। काकोरी केस के योगेश चन्द्र चटर्जी के जेल से भगाने की योजना सफल हो गयी थी। पुलिस डी. एस. पी. सांडर्स की हत्या अखबारों में मुख्य आकर्षण केन्द्र में थी। आगरे में दो मकान किराये पर ले बम बनाने का कार्य चलने लगा।

क्रान्तिकारी अधिक दिन मौन न बैठना चाहते थे। उन्होंने अंग्रेजों के लिए इससे बढ़कर दूसरा धमाका करने का निश्चय किया। असेम्बली में भारतीयों के अधिकारों के हनन के लिए सरकार दो कानून लाना चाहती थी।

जनता ने विरोध किया मगर सरकार जनमत के विरोध के बावजूद सार्वजनिक सुरक्षा और औद्योगिक विवाद बिलों पर वायसराय की स्वीकृति लेने की चेष्टा में थी।

बम विस्फोट

वायसराय की विशेष स्वीकृति से कानून बनाने की घोषणा ज्यों ही हाल में हुई असेम्बली में दो भयंकर बम विस्फोट का स्वर गूँज उठा। बम फेंकने के पश्चात् सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने हाल में आगे बढ़ते हुए क्रान्तिकारी नारे लगाये और पर्चे बाँटे।

लिखा था- ‘बहरों को सुनाने के लिए विस्फोट से भी ऊँचे शब्दों की आवश्यकता होती है।’ बटुकेश्वर दत्त और सरदार भगत सिंह को हाल से भागना नहीं था इसलिए दुर्घटनास्थल पर ही अपनी गिरफ्तारियाँ दे दीं। ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ और ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारों से हाल गूँजने लगा।

पुलिस की धर-पकड़ में कुछ क्रान्तिकारी और पकड़े गये। पुलिस ने सुराग लगाने के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय षड्यन्त्र की गन्ध में मुखबिरों का जाल फैलाना प्रारम्भ किया। जयगोपाल, हंसराज वोहरा और फणीन्द्र घोष सरकारी गवाह बन बैठे। चन्द्रशेखर ने इन लोगों के मुँह बन्द करने के लिए चेष्टाएँ तेज कर दीं। इन्हें गोली का निशाना बना दिया।

ब्रिटिश शासन को दोनों की गिरफ्तारी ने यह संकेत दे दिया था कि हाथ में पिस्तौल और जेब में गोली रखते हुए भी बन्दी बनानेवाले गोरे सार्जेंट को अपनी गोली का निशाना नहीं बनाया। ये क्रान्तिकारी मात्र भावुक नवयुवक ही नहीं बड़े साहसी और सूझ-बूझ से कार्य करनेवाले हैं।

उन्होंने क्रान्ति की परिभाषा करते हुए स्पष्ट किया था- ‘क्रान्ति का विरोध करनेवाले लोग केवल पिस्तौल, बम, तलवार और रक्तपात को ही क्रान्ति का नाम दे देते हैं। परन्तु क्रान्ति इन चीजों में ही सीमित नहीं है। ये चीजें क्रान्ति का उपकरण हो सकती हैं।

किन्तु इन उपकरणों के उपयोग के पीछे क्रान्ति की वास्तविक शक्ति-जनता द्वारा समाज की आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था करने की इच्छा ही होती है। ‘हमारी आधुनिक परिस्थितियों में क्रान्ति का उद्देश्य कुछ व्यक्तियों का रक्तपात करना नहीं मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण की कुत्सित प्रथा को समाप्त करके इस देश के लिए आत्मनिर्णय का अधिकार प्राप्त करना है।

8 अप्रैल, 1929 को तो साहसी सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अपनी जेबों में पिस्तौल और बम छुपाये पहले ही असेम्बली हॉल में बैठ गये थे। गृह मन्त्री सर जान शुस्टर ने ज्यों ही खड़े हो घोषणा की कि ‘सार्वजनिक सुरक्षा और औद्योगिक विवाद बिल विधान सभा में अस्वीकृत हो जाने के कारण वायसराय की विशेष स्वीकृति से कानून बना दिये गये हैं।

भगत सिंह ने एक बम सर शुस्टर के पास दीवार के पीछे फेंक दिया। इसके तत्काल बाद ही दूसरा बम बटुकेश्वर दत्त ने भी ठीक उसी स्थान पर फेंका। सभा भवन में विस्फोट के साथ धुआँ ही धुआँ जब गहराने लगा दर्शकों में भगदड़ मचनी स्वाभाविक थी। सभी के चेहरे भय में डूबे हुए सन्त्रस्त थे।

सरदार भगत सिंह ने सर जान शुस्टर पर दो गोलियाँ चलाकर वार किया पर वे उनके शरीर पर न लगकर डेस्क में लगीं चूँकि जॉन शुस्टर भयभीत हो डेस्क के नीचे आत्म-रक्षा में दुबक गये थे। इसके बाद भी सरदार भगत सिंह की पिस्तौल में 6 गोलियाँ और जेब में 8 गोलियाँ और शेष बची थीं

मगर उन्होंने अन्य किसी को निशाना नहीं बनाया और न भागती भीड़ के साथ भागे। यहाँ तक कि गिरफ्तार करनेवाले अंग्रेज सार्जेंट को सरलता से बन्दी बनाने का अवसर दिया। उन्होंने प्रमाणित कर दिखाया कि क्रान्तिकारी दल आदर्शवादी नैतिक दल है, उनकी लड़ाई अंग्रेज व्यक्तियों से नहीं अंग्रेजी साम्राज्यवाद से है। अन्तिम क्षण तक वे अपना संघर्ष जारी रखेंगे।

सरदार भगत सिंह जानते थे कि ‘सांडर्स हत्याकांड’ में पुलिस को उनकी तलाश है मगर अपनी जान की बाजी लगाकर युवक विद्रोही ने दूसरा बड़ा साहसी धमाका किया और गिरफ्तारी करायी जिसे अनूठा और अभूतपूर्व त्याग कहा जा सकता है। यही कारण है कि उनकी शहादत को वर्षों बीत गये पर आज भी देश की जनता श्रद्धा से अपना मस्तक झुकाकर उन्हें नमन करती है।

पंजाब में किशन सिंह, गडगज्ज, करम सिंह और उदय सिंह के गुप्त दल ने अनेकों देशद्रोहियों को मौत की नींद सुलाकर अपनी धाक जमा ली। मुखबिर बड़ी सावधानी से पुलिस थाने से घर वापिस लौट पाते थे। सी.आई.डी. के महाशय जे. बनर्जी प्रलोभन से कमजोर हृदय के सदस्यों को मीठी-चुपड़ी बातों में फंसाते।

उन्हें मणीन्द्र बनर्जी नामक नवयुवक ने बनारस के बाजार में दिन-दहाड़े गोली से उड़ा दिया। क्योंकि पिस्तौल बरामद न हो सकी युवक से, इसलिए 10 वर्ष की सजा दी गयी। मगर कुछ दिनों के उपरान्त ही मणीन्द्र ने जेल में ही दम तोड़ दिया। भारतीय जनता ने जुलूस निकाले, मृत्यु को लेकर प्रदर्शन किये।

1928 में बनी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी जिसका कुशल नेतृत्व चन्द्रशेखर आजाद कर रहे थे, अपना वर्चस्व अभी भी बनाये हुए थे। वे आजीवन पकड़े नहीं गये। भगवतीचरण वोहरा ने भगत सिंह, राजगुरु को जेल से बाहर निकालने के सभी प्रयास धूमिल होने पर एक विशेष योजना की स्वीकृति आजाद से ले ली।

निश्चय हुआ कि उन्हें जेल से मुक्त कराने का एक प्रयास किया जाये। इस उत्सुकता और प्रयास से बम परीक्षण के लिए बोहरा रावी किनारे पहुँचे, वहाँ बम हाथ में ही फट जाने के कारण दुर्घटना स्थल पर ही मृत्यु के मुँह में चले गये। योजना विफल हो गयी।

उत्तर प्रदेश में दल का कार्य क्रान्तिकारी शिव वर्मा, विजयकुमार सिंह और सुरेन्द्र पांडे देख रहे थे और बिहार का कार्य संचालन फणीन्द्रनाथ घोष के हाथों चल रहा था। लाहौर षड्यन्त्र केस का मुकदमा चला तो सरकार ने उपर्युक्त क्रान्तिकारी भी गिरफ्तार कर लिये।

7 अक्तूबर, 1930 को जज ने अपना फैसला सुनाते हुए सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सजा दी। विजय कुमार सिंह, महावीर सिंह, किशोरीलाल, शिव वर्मा, गयाप्रसाद, जयदेव और कमलनाथ तिवारी को आजन्म कैद, कालापानी और कुन्दन लाल को केवल सात वर्ष और प्रेमदत्त को तीन वर्ष की सजा दी गयी।

सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी की सजा को रद्द कराने के लिए सारे भारतवर्ष में स्थान-स्थान पर आन्दोलन हुए, जुलूस निकले, प्रदर्शन हुए। कहते हैं कि स्वयं महात्मा गांधी ने भी वायसराय से इस सन्दर्भ में विचार-विमर्श किया। सरकार दमन द्वारा अपने फैसले पर अटल रही।

सभी प्रयत्न विफल हो गये। 23 मार्च, 1931 को लाहौर जेल में सरदार भगत सिंह को अभिन्न सहयोगी राजगुरु और सुखदेव के साथ सायंकाल फाँसी के तख्ते पर चढ़ा दिया गया। फाँसी के तख्ते पर पहुँचने से पूर्व वे मार्ग में गीत गा रहे थे ‘मेरा रंग दे बसन्ती चोला इसी रंग में रंग के शिवा ने माँ का बन्धन खोला मेरा रंग दे बसन्ती चोला।

जल्लाद द्वारा फाँसी का फन्दा गले में फँसाने से पूर्व तख्ते पर चढ़कर तीनों अमर शहीदों ने सिंह गर्जना के स्वर में आकाशभेदी नारे लगाये- ‘इंकलाब जिन्दाबाद’, ‘साम्राज्यशाही का नाश हो।’

सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के नामों से ब्रिटिश सरकार इतनी आतंकित थी कि उसने तीनों को फाँसी पर 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट लटकाने के पश्चात् पुलिस द्वारा चुपचाप उनके शवों की सामूहिक दाहक्रिया स्वयं करा डाली, लाश परिजनों को सुपुर्द नहीं की गयी।

अमर शहीद सरदार भगत सिंह का बलिदान देश के नवयुवकों और नर-नारियों हृदय में बड़ी गहराइयों तक उतर गया है, सभी उनकी स्मृति में श्रद्धा सुमन चढ़ाते हैं। सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय

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