सरदार करतार सिंह कौन थे? सरदार करतार सिंह का जीवन परिचय बताये?

सरदार करतार सिंह का जीवन परिचय (Sardar Kartar Singh Ka Jivan Parichay), सरदार करतार सिंह का जन्म लुधियाना जिले के सराभा नामक गाँव में 24 मई 1896 ई. में हुआ था। कुछ दिनों के अन्तराल से पिता का आकस्मिक निधन हो में जाने से दादा की देख-रेख में लालन-पालन हुआ।

सरदार करतार सिंह का जीवन परिचय (Sardar Kartar Singh Ka Jivan Parichay)

सरदार करतार सिंह का जीवन परिचय
सरदार करतार सिंह का जीवन परिचय (Sardar Kartar Singh Ka Jivan Parichay)

सरदार करतार सिंह का जीवन परिचय (Sardar Kartar Singh Ka Jivan Parichay)

अंग्रेजों के विरुद्ध जो आवाज उठायी जा रही थी वह मात्र भारत में ही नहीं संसार में बसे अन्य देशों के प्रवासी भारतीय भी इस मुहिम में कहीं पीछे नहीं रहे। दासता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए प्रवासी भारतीयों का भी विशेष

योगदान रहा। विदेश में जाकर अनेक भारतीयों ने वहाँ प्रचार साधनों से विदेशियों के अत्याचारों और अनाचारों का पर्दाफाश किया, निकट के शहरों, प्रान्तों में बसे युवकों ने आजादी की लड़ाई में सहयोग एवं प्रोत्साहन करने का बीड़ा उठा लिया था।

कई हजार प्रवासी भारतीय अमेरिका, कनाडा में निवास करते थे। इनमें सिक्खों की संख्या कुछ अधिक थी क्योंकि वे अपनी प्रगति के लिए हर समय हर स्थान पर जाने और कार्य करने के इच्छुक रहते। लाला हरदयाल अमेरिका पहुँचकर क्रान्ति की मशाल लिये सक्रियता से जुटे युवकों को संघर्ष के लिए संगठित करने में प्रयत्नशील थे।

सान फैंसिस्को से ‘गदर’ नामक पत्र प्रकाशित किया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत से ब्रिटिश गोरी सरकार को समूल नष्ट करने के लिए हर भारतीय का कर्तव्य है कि वह अपना तन, मन, धन से इस कार्य में सहयोग दें जब तक उन्हें भारतवर्ष से खदेड़ नहीं दिया जाता।

इस प्रचार कार्य में लाला हरदयाल के विश्वसनीय सहयोगी बरकतउल्ला एवं रामचन्द्र का नाम उल्लेखनीय है जिन्होंने उनके साथ प्रत्येक स्थान पर घूम-घूमकर लोगों के सामने क्रान्ति की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्हें संगठित किया, प्रेरित किया कि वे अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठायें। इसी के परिणामस्वरूप आन्दोलन से जुड़े सरदार बलवन्त सिंह, मेवा सिंह, भाई वतन सिंह आदि विदेश में ही शहीद हो गये।

गुप्त बैठकें आयोजित कर लोगों को समझाते। गुप्त बैठकों में उन्होंने बतलाया कि झाँसी के कमिश्नर को बम से उड़ाने के अपराध में लक्ष्मीकान्त शुक्ल को आजन्म कालापानी का दंड दिया गया और मोतीहारी जिले की डकैती के अभियोग में योगेन्द्र शुक्ल को 22 वर्ष की जेल हुई है।

सरदार करतार सिंह का बचपन

बचपन से ही करतार सिंह एक निर्भीक और दृढ़प्रतिज्ञ छात्र था। एंट्रेंस की परीक्षा पास करते ही वह अन्य पंजाबियों के समान अमेरिका पहुँचकर प्रगति के लिए परिश्रम करता रहा। सफलता, साहस और धैर्य ने करतार को बड़ी शीघ्रता से साधन-सम्पन्न लोगों की कतार में ला खड़ा किया था।

गदर दल का गठन

प्रवासी भारतीयों की एक गुप्त बैठक स्टाकटन नामक नगर में हुई जिसमें क्रान्तिकारी संगठन के प्रारूप पर विचार किया गया और फरवरी 1914 को निर्णय लिया कि लोग संगठित हो अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए आवश्यक कदम उठायें। संगठन का नाम रखा गया ‘गदर दल’। रासबिहारी बोस का पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ।

अचानक 16 मार्च, 1914 को अमेरिका की सरकार को ऐसे गुप्त गदर दल के सन्दर्भ में जानकारी मिली। खुफिया तन्त्र सक्रिय हुआ और लाला हरदयाल को बन्दी बना लिया गया। सावधानी से जमानत करा दल के निर्णय के अनुरूप अमेरिका छोड़ स्विटजरलैंड भाग गये।

अब गदर दल का कार्य रामचन्द्र ने निपुणता से संचालित किया क्योंकि प्रवासी भारतीय अमेरिका में लाला हरदयाल के विशेष अनुरागी थे। उनका हृदय क्रान्तिकारी दल से पूर्णतया जुड़ चुका था। उन्होंने संकल्प ले लिया था कि वे भारत से अंग्रेजों को खदेड़े बगैर चैन से नहीं बैठेंगे।

अगर इसके लिये हथियार भी उठाने पड़े तो हम जीवन रहते विदेशियों का मुकाबला करेंगे, पीछे नहीं हटेंगे। अमेरिका छोड़ने से पूर्व प्रवासी भारतीयों को लाला हरदयाल ने बड़े अनुशासित ढंग से गदर दल का सक्रिय सदस्य बना डाला था। इन्हीं में एक नाम था सरदार करतार सिंह का।

कनाडा में गदर दल के कार्य को विशेष सफलता मिली चूँकि यहाँ लगभग 4000 प्रवासी भारतीय थे। मगर कनाडा सरकार भारतीयों से घृणा करती थी, उनका रखना अरुचिकर था। नाना प्रकार के कानून बना भारतीयों का प्रवेश निषेध था। जिस व्यक्ति के पास 200 डालर नगद हों मात्र वही कनाडा में रह सकता था।

लेकिन काफी संख्या में भारतीय अमेरिका होकर कनाडा में आसानी से पहुँच सकते थे इसलिए क्रान्तिकारी संगठन के लोगों ने इससे पूरा लाभ उठाने का प्रयास किया जो अमेरिका पहुँचा वह सरलता से कनाडा में पहुँच जाता। बगावत की आवाज वहाँ बुलन्द हुई।

कनाडा के सरदार गुरुदत्त सिंह सम्पन्न व्यक्ति थे। उन्होंने भाड़े पर हांगकांग से जहाज मँगवाया 351 भारतीयों का एक दल ‘कामांगातामारू’ नामक जहाज में बैठ 23 मई, 1914 को बैंकूवर पहुँचा जो याकोहामा के रास्ते से गुजरता हुआ गया था।

इसके बाद प्रवासी भारतीयों का यह जत्था उत्साह और शौर्य से ओत-प्रोत कुछ कर गुजरने के संकल्प के साथ 24 जुलाई, 1914 को भारतवर्ष की ओर रवाना हो गया।

इस प्रयास की सूचना गोरी सरकार को जब मिली तो वह थोड़ा घबरायी और निबटने के लिए योजना बनी। ब्रिटिश हुक्मरान जानते थे कि इस गदर दल के सिक्खों के प्रवेश को यदि प्रतिबन्धित न किया तो वे धीमे-धीमे विप्लव केन्द्र कलकत्ता में एकत्रित हो नये-नये गुल खिलाने लगेंगे। इसलिए योजनाबद्ध तरीके से सरकार ने स्पेशल ट्रेन खड़ी करवा दी। जहाज के बन्दरगाह पर लगते ही पुलिस ने लोगों से सम्पर्क कर प्रचारित

किया कि, ‘वे गाड़ी में सवार हो जायें। टिकट लेने की आवश्यकता नहीं है, ट्रेन में चढ़िये, सभी को उनके स्थानों पर पहुंचा दिया जायेगा।’ सिक्ख प्रवासी भारतीयों ने असहमति प्रकट करते हुए उत्तर दिया-हम लोग पहले कलकत्ते जायेंगे।

पुलिस के कान खड़े हुए। सिपाहियों ने आपत्ति प्रकट की। सरदार गुरुदत्त सिंह ने विरोध किया- ‘पुलिस को यात्रियों के मामले में दखल नहीं देना चाहिए। जो जहाँ जाना चाहेगा इच्छा से जायेगा, उन पर प्रतिबन्ध की तलवार क्यों लटकायी जा रही है ? “

पुलिस ने बल प्रयोग की धमकी दी। सिक्खों ने निडरता से प्रतिरोध जताया, संगठित हो आवाज उठायी कि वे अपमान न सहेंगे, अपनी इच्छानुसार हर स्थान पर जाने के लिए स्वतन्त्र हैं क्योंकि प्रवासी भारतीय रिवाल्वरों से लैस भी थे।

बात की बात में बात बढ़ती गयी। कोई समझौता होने से पूर्व पुलिस और दल के लोगों के बीच की झड़पें गोलीबारी में बदल गयीं। 18 सिक्ख और अनेकों सिपाही इस युद्ध में मारे गये। 31 सिख लापता थे शेष बचे व्यक्तियों को बलात् में नजरबन्द कर उन्हें पंजाब प्रान्त में पहुँचाकर चौकसी में छोड़ा गया। सरदार गुरुदत्त सिंह पुलिस के हाथ न आया।

वह इस जंग में पुलिस की आँखों में धूल झोंक निकल भागा। ऐसे ही जुझारू सिक्खों में एक नवयुवक सरदार करतार सिंह भी था जिसने अपनी वीरता का अनूठा परिचय दिया था करतार सिंह सच्चा देशभक्त था जिसके रग-रग में नया खून हिलोरें ले रहा था।

सरदार करतार सिंह के क्रान्तिकारी कदम

भाई परमानन्द के सम्पर्क में आने के पश्चात् उसमें देशभक्ति की भावना और त्याग निशिदिन बढ़ता ही गया सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी के सम्पर्क में आने पर उसके कद में अभूतपूर्व परिवर्तन आने लगा। परिस्थितियों के अनुकूल व्यक्ति का चरित्र विकसित तो होता ही है परन्तु कुछ व्यक्तियों के जीवन में विशेष गुणों का चमत्कार जन्मजात होता है।

उनका लगन, साहस, शौर्य एवं विलक्षण प्रतिभा का दिग्दर्शन लोगों को अपनी ओर बलात् आकर्षित करने लगता है। इन्हीं गुणों का स्वामी था करतार सिंह जो गदर नाम से प्रकाशित होनेवाली लाला हरदयाल की पत्रिका के सम्पादक मंडल में प्रवेश पा गया था।

अमेरिका में भारतवासियों की दुर्दशा करतार सिंह के गले के नीचे नहीं उतर रही थी। गुलामी की हीनभावना और अपमान सहना नियति बन गया था। वे विदेशियों की दृष्टि में तुच्छ और घृणा के पात्र भी थे। कदम-कदम पर नाना प्रकार की बाधाएँ, आने-जाने में कठिनाइयों की कतारें मजदूरी प्राप्त करने के लिए संघर्ष, कहीं उतरने पर लगी पाबन्दियाँ, कहीं उनके प्रवेश के द्वार बन्द ।

यह स्पष्ट होने लगा था कि इन तमाम संकटों के मूल में भारत की विदेशी दासता है उसकी बेड़ियों से मुक्त जब तक भारतीय जनता नहीं हो पाती पग-पग पर इन विपदाओं के पहाड़ मार्ग में खड़े होकर बाधक तो बनेंगे ही; इसलिए आजादी आवश्यक है।

संसार इसी दौरान महायुद्ध की चपेट में आ गया। इस समय सरदार करतार सिंह की उम्र केवल 18 वर्ष की थी। ब्रिटिश साम्राज्यवाद की मजबूत जड़ों को उखाड़ फेंकने का इससे उत्तम समय क्रान्तिकारियों को और कौन-सा हो सकता था? शत्रु पर आघात आपातकाल में ही करने का सरल उपाय समझ पुलिस की आँखों में धूल झोंक सरदार करतार सिंह अमेरिका से भारत लौटे।

पूना की एक विशाल सभा को विनायक दामोदर सावरकर ने सम्बोधित करते हुए कहा था- ‘वीर छत्रपति शिवाजी के सपूतो, जैसे शिवाजी ने मुगल साम्राज्य को विध्वंस कर डाला, उसी प्रकार तुम्हें भी अंग्रेजी गोरी सरकार की दासता की जंजीरें तोड़कर अत्याचारी शासन के दम्भ को चकनाचूर करना है, भारत माँ को पराधीनता से बन्धन मुक्त कराना है। हमें स्वाधीन हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करनी है चाहे इसके लिये सशस्त्र क्रान्ति का सहारा ही क्यों न लेना पड़े।

सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस की इच्छानुसार सरदार करतार सिंह पंजाब पहुँचे और क्रान्तिकारी संगठन के सक्रिय कार्य में जुट गये। शस्त्रों के लिए धन की व्यवस्था कर संगठन में अस्त्र-शस्त्र एकत्रित करना एक मात्र लक्ष्य रखकर युवकों ने तन, मन, धन से कार्य सम्पन्न किया। साथ ही उन्होंने लाहौर की छावनी के मैगजीन पर आक्रमण करने की योजना तैयार की मगर सम्बन्धित एक सिपाही के स्थानान्तरण के कारण प्रयास विफल हो गया।

सरदार करतार सिंह विफलता से हारकर मौन होकर बैठना न सीखा था करो या मरो। उसने अपने अभिन्न मित्र पिंगले के साथ अन्य सैनिक छावनियों में गुप्त दौरे करने शुरू किये। कमेटियाँ बनीं, प्रचार कार्य हुआ, प्रेरणा दी गयी कि अंग्रेजों के विरुद्ध सेना को भी हथियार उठाने के लिए तत्पर रहने की आवश्यकता है। योजना के प्रारूप पर सारी तैयारियाँ विधिवत् होने लगीं। इस प्रकार 21 फरवरी, 1915 को विद्रोह का श्रीगणेश करने की तिथि निश्चित कर ली गयी।

दुर्भाग्यवश अपने ही दल के कृपाल सिंह नामक व्यक्ति ने पुलिस के कान भर दिये। इसी जयचन्द ने समय से पूर्व ही सारे रहस्य का भंडाफोड़ कर सरकार को नींद से उठाकर खड़ा कर दिया। तेजी से दमन चक्र चल पड़ा, धर-पकड़ प्रारम्भ हो गयी, सेनाओं में तबादले हुए, गिरफ्तारियाँ हुईं, सन्देहास्पद छावनियों के सैनिकों से अस्त्र-शस्त्र छीन लिये गये ।

इसी बीच तोशा मारू नामक जहाज से आये अनेक प्रवासियों को सन्देह में पकड़कर जेल भेजा गया, कुछ नजरबन्द किये गये और नाना प्रकार की बातनाएँ दे उन पर मुकदमे कायम किये गये। कुल 9 षड्यन्त्रों के मुकदमे चलाकर 28 व्यक्तियों को फाँसी पर लटका दिया गया। सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी एवं संगठनकर्त्ता रासबिहारी बोस को भारत छोड़कर जापान में शरण लेने को बाध्य होना पड़ा। सेना में विद्रोह कराने की योजना अचानक असफल हो गयी।

पहले सरदार करतार सिंह कुछ दिन भूमिगत रहे। सहयोगियों की सलाह पर वे ब्रिटिश भारत छोड़ने पर राजी हो गये किन्तु इस आचरण को अपनी कायरता समझ, मुसीबत में फँसे साथियों को छोड़ विदेश जाना विश्वासघात मानकर वापिस लौट आये। भारत में रहकर ही संघर्ष करने की आस्था ले स्वाधीनता के समर में डटे रहे।

सरदार करतार सिंह मृत्यु को हथेली पर रख क्रान्ति का अलख पंजाब में जगाते रहे। वे निर्भीकता, निडरता और साहस के बल पर संगठन के कार्य में जुटे रहे जबकि पुलिस पकड़ने के लिए रात-दिन भाग-दौड़ करती रही। सरदार करतार सिंह पुलिस की आँखों के काँटे बने रहे।

एक दिन साइकिल पर सवार सरदार करतार सिंह गाँव में घुसा। उस समय लुधियाने का सब-इंस्पेक्टर उसी के मकान की तलाशी ले रहा था। करतार ने अपनी साइकिल घबराकर नहीं रोकी, निडरता से साइकिल सहित उसी मकान में घुसा, पानी माँगकर पिया और वापिस निर्भीकता से निकल बाहर चला गया।

अगर पुलिस के डर से मुड़कर सोचता तो निश्चित ही पकड़ा जाता। बाद में इंस्पेक्टर हैरान था जब ज्ञात हुआ कि करतार उसकी आँख में धूल झोंक भाग गया। वह हाथ मलता रह गया। सरदार करतार सिंह का जीवन परिचय दीजिये।

अपने घनिष्ठ मित्र से मिलने एक दिन सरदार करतार सिंह उसके निवास पर गया। मित्र ने चालाकी से उस सन्दर्भ में अंग्रेज डी. एस. पी. टामकिंग को सूचित कर धोखे से गिरफ्तार करवा दिया। सिपाहियों की टोली ने उसके हाथ पैरों में हथकड़ियाँ-बेड़ियाँ डालकर पूरी तरह जकड़ लिया।

सरदार करतार सिंह अनहोनी को घटते देख किंकर्तव्यविमूढ़ मुद्रा में मौन खड़ा मित्र की आँखों के विश्वासघाती दृश्य देख आश्चर्यचकित था। बड़ी लापरवाही से व्यंग-भरी शैली में अंग्रेज डी.एस.पी. से बोला- ‘मिस्टर टामकिंग! मेरे मित्र ने तुम्हें कामयाब कर दिखाया। दोस्त ने दोस्ती निबाह दी, उसी के साथ तुम भी बड़ा इनाम पाओगे। मगर मुझ शेर को भूखा क्यों मारते हो? कुछ खाना तो खिला दो, बड़ी सख्त भूख लगी है।’

मुकदमा चलने पर जज के समक्ष अपना संक्षिप्त बयान देते हुए सरदार करतार सिंह ने कहा- ‘ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जो कुछ मैंने किया उसके लिये मुझे गर्व है, किसी प्रकार का दुख नहीं है। मैंने जो कुछ किया काफी सोच-समझकर किया है।

मैं समझता हूँ मेरी सजा कालापानी या फाँसी से कम नहीं होगी आपके कानून में। मैं अपने लिये फाँसी की सजा पाना ही श्रेयष्कर समझता हूँ क्योंकि पुनर्जन्म में परमेश्वर से मैंने यदि पुरुष शरीर पाया तो देशसेवा करूँगा।

यदि यह सम्भव नहीं हुआ, मैंने एक स्त्री रूप में जन्म लिया तो ऐसी विद्रोही सन्तान उत्पन्न करूंगा जो अन्तिम क्षण तक अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध लड़ता-लड़ता मर मिटने के लिए तैयार रहे।’ फाँसी की सजा सुन जज के सामने मुस्कराकर आगे बोला- ‘मैं मृत्यु को एक नाटक समझता हूँ।

वह तो सिर्फ एक खेल है। सबको ही एक दिन मरना पड़ता है और मैं भी मरने की राह पर जा रहा हूँ इसमें अस्वाभाविकता क्या है, नयी बात क्या है, क्यों किसी को परेशानी होनी चाहिए? जज साहेब आपका शुक्रिया!’

सरदार करतार सिंह की मृत्यु 16 नवम्बर 1915 में हुई। अल्पायु में ही सरदार करतार सिंह ने हँसते-हँसते भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के रणक्षेत्र में फाँसी की सजा को अंगीकार कर अपना बलिदान देकर इतिहास के अधूरे पृष्ठों पर अपना अमर नाम अंकित कर दिया।

आश्चर्यजनक सत्य तो यह कि फाँसी की सजा सुनने के पश्चात् फाँसी के तख्ते पर झूलने से पूर्व करतार सिंह सराभा का वजन 18 पौंड अधिक बढ़ गया था। फाँसी का फन्दा चूमने से पूर्व वे मुस्करा रहे थे, उनका मौन कह रहा था ‘बारह बरस तक कूकुर जीये और तेरह तक जिये सियार, बरस अठारह क्षत्री जीये आगे जियला ही धिक्कार।

FAQ

Q1 : करतार सिंह सराभा का जन्म कब हुआ था?

Ans : करतार सिंह सराभा का जन्म 24 मई 1896 ई. हुआ था।

Q2 : करतार सिंह सराभा को फांसी कब दी गई?

Ans : करतार सिंह सराभा को फांसी 16 नवम्बर 1915 दी गई।

यह भी पढ़े –

Leave a Reply

Your email address will not be published.