जरूरी है शिशु के लिए संतुलित आहार क्यों आवश्यक है जाने पूरी जानकारी

जरूरी है शिशु के लिए संतुलित आहार क्यों आवश्यक है जाने पूरी जानकारी, आज का शिशु कल का पूर्ण पुरुष अथवा नारी है, जिसे समाज का बोझ भी ढोना है। यदि उसको आरम्भ से ही अच्छी खुराक नहीं मिलेगी तो उसके शरीर का सही तथा पूर्ण रूपेण विकास नहीं हो पाएगा। ऐसा होने पर वह बड़ा होकर अपने दायित्व ठीक से नहीं निभा सकेगा। माता-पिता, अभिभावक शिशु के आहार पर ज़रूर ध्यान दें।

शिशु के लिए संतुलित आहार क्यों आवश्यक है

शिशु के लिए संतुलित आहार क्यों आवश्यक है

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शिशु के लिए आहार

  • शिशु जब गर्भ में रहता है तो मां अपने भोजन से ही उसका शरीर बनाती है।
  • बच्चा पैदा होने पर भी मुख्य रूप से मां तथा अन्य पर निर्भर रहता है।
  • पहले तो मां के वक्ष से प्राप्त दूध ही उसके लिए पूरी खुराक है। मगर जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है, उसे कुछ तरल, कुछ ठोस आहार भी दिया जाता है। इसी से उसके मन तथा शरीर का विकास भी होता है।
  • यदि दूध पीते बच्चे को मां के दूध से पूरी आपूर्ति न होती हो तो उसे गाय का दूध देकर कमी पूरी कर सकते हैं।
  • यह तथ्य है कि माता के दूध में सभी आवश्यक तत्व रहते हैं।
  • गाय के दूध में शक्कर कम रहती है। वसा भी अधिक होती है। मगर प्रोटीन तीन गुना होती है। अतः गाय के दूध में आधा पानी मिला दें।
  • दो पशुओं का मिला-जुला दूध बच्चे को नहीं देते। दोनों के पोषक तत्व अलग-अलग होते हैं। तासीर भी भिन्न रहती है।
  • बच्चा अब बड़ा होने लगता है तथा उसे विटामिन ‘सी’ तथा ‘डी’ की आवश्यकता रहती है। इसके लिए उसे संतरे का रस, मौसमी का रस या फिर मछली के तेल की बूंदें दी जाती हैं।
  • कोई पांच महीनों तक बच्चे को ठोस आहार नहीं दिया जाता। अब बारी है सूजी की खीर की, मथे हुए केले की, हल्की व पतली खिचड़ी या दलिया की। इनके अतिरिक्त मूंग की दाल का पानी भी देते रहते हैं।
  • जब बच्चे को ये सब भोज्य मिलते रहेंगे तो उसकी दूध पीने की मात्रा स्वतः कम होती जाएगी। शरीर का विकास भी तेजी से होगा।
  • जब रोए, तभी दूध आदि देना ठीक नहीं। रोने का कारण केवल भूख ही नहीं हो सकता। उसे निश्चित समय पर ही दूध आदि दें। बच्चा भी अपने आपको स्वतः उन समयों के अनुरूप ढाल लेगा।
  • हाथ साफ तथा बोतल, चम्मच आदि पूरी तरह स्वच्छ व उबाले जाने चाहिएं।
  • बच्चा समय हो जाने पर भी यदि दूध न पीए तो उसे विवश न करें।
  • न अधिक गर्म, न अधिक ठंडा बस गुनगुना-सा दूध शरीर के लिए उपयुक्त है।
  • बच्चा शौच, मूत्र आदि बिस्तर पर या कपड़ों में न करे, इसका अभिभावक ध्यान रखें, उसे समय-समय पर पेशाब आदि करवाते रहें।
  • जब भी उसे तरल तथा ठोस आहार पर लाएं, यह सुपाच्य, हल्का, बिना मिर्च-मसालों के हो। भोजन की तासीर भी ऋतु के अनुसार ही हो।
  • ऐसे आहार जिनमें खटाई भी हो, शिशु को मत दें। पेट में दर्द, उल्टी, ठंड लगना, गला खराब होना, पेचिश, खांसी आदि न हो पाए, इसीलिए तो आहार का चुनाव सोचकर करें।

मां, आया या अभिभावक ध्यान रखें कि बच्चे का आहार उसके अनुरूप हो तथा इससे उसका विकास सही अनुपात में सम्भव भी हो।

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