सूर्य सेन का जीवन परिचय? महान क्रांतिकारी संग्रामी सूर्य सेन के बारे में जाने।

सूर्य सेन का जीवन परिचय (Surya Sen Ka Jivan Parichay) :- महान क्रान्तिकारी सूर्य सेन का जन्म 22 मार्च 1894 हुआ था। वे नेशनल हाईस्कूल में सीनियर ग्रेजुएट शिक्षक के रूप में कार्यरत थे और लोग प्यार से उन्हें “मास्टर दा” कहकर सम्बोधित करते थे। सूर्य सेन बायोग्राफी।

सूर्य सेन का जीवन परिचय (Surya Sen Ka Jivan Parichay)

सूर्य सेन का जीवन परिचय
सूर्य सेन का जीवन परिचय (Surya Sen Ka Jivan Parichay)

सूर्य सेन का जीवन परिचय (Surya Sen Ka Jivan Parichay)

मेदिनीपुर का स्थान क्रान्तिकारी इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण गाथा से परिपूर्ण है जहाँ के विप्लववाद और सत्याग्रह दोनों का स्तर अपनी बुलन्दियों के शिखर को छूता नजर आता है। दोनों में मेदिनीपुर को दक्षता प्राप्त थी।

1921 में कांथी महकमे में वीरेन्द्र नाथ शासमल के नेतृत्व में सफल करबन्दी आन्दोलन चलाया गया था। लोकइच्छा के विरुद्ध इस आन्दोलन में अंग्रेजी सरकार को करबन्द करनेवाले किसानों से कुर्क सामान को ले जाने के लिए न गाड़ियाँ मिलीं न गाड़ीवान और न बैल प्राप्त हुए थे। वसूली सामान पुलिस सिपाहियों द्वारा खींचकर मेदिनीपुर से बाहर ले जाया गया था। यहाँ एक ओर सत्याग्रह था तो दूसरी ओर प्रबलता से विप्लवी आन्दोलन भी ऊँचाइओं पर था।

क्रान्तिकारियों की गिरफ्तारी

सन् 1929 के दिसम्बर में कलकत्ते स्थित मछुआ बाजार के एक घर पर छापा मारकर सोये हुए क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार किया गया। ढेर से कागजात, पते-ठिकाने, बम निर्माण के फार्मूलों के साथ सतीश पाकडासी, सतीश सेन, रमेश विश्वास एवं अनायास वहाँ पहुँचे सुधांशु गुप्त बम और रिवाल्वर सहित पकड़ में आ गये। क्या किया जाये? कैसे किया जाये? क्रान्तिकारी उधेड़-बुन में थे।

क्रान्तिकारियों ने घोषित कर दिया था कि मेदिनीपुर में अंग्रेज जिला मजिस्ट्रेट रहने नहीं देंगे। सरकारी पिठुओं ने मात्र धमकी समझकर अवहेलना की किन्तु कालेजियेट स्कूल प्रदर्शनी में जिला मजिस्ट्रेट पैडी पर गोलियों की बौछार की गयी।

घटनास्थल पर वे मार डाले गये। क्रान्तिकारी विमल दासगुप्त और यतिजीवन घोष अपना काम आसानी से सम्पन्न कर साइकिलों से भाग निकले। बिमल दासगुप्त ने 24 परगना के जज की भी गोली मारकर हत्या कर डाली। काफी अर्से बाद यतिजीवन घोष बन्दी बने जबकि विमल दासगुप्त बंगाल कॉमर्स चेम्बर के प्रेसीडेंट विलियर्स को गोली दागते समय पकड़े गये। पुलिस ने फाँसी की सजा के लिए विमल दासगुप्त पर प्रमाण एकत्रित किये मगर उस समय कानून में हत्या की चेष्टा के लिए किसी व्यक्ति को फाँसी असम्भव थी अतः काले पानी भेजा गया।

विमल दासगुप्त पर 24 परगना के जज गारीलक को गोली मारकर हत्या करने का अपराध पुलिस प्रमाणित नहीं कर सकी थी। अंग्रेजों ने कानून बदल डाला कि हत्या के प्रयास के लिए भी मृत्यु दंड दिया जा सकेगा। पैडी की हत्या के पश्चात् जिला मजिस्ट्रेट बनाये गये मिस्टर डगलस क्रान्तिकारियों के दल ने उन्हें चेतावनी देते हुए अपना नोटिस भिजवाया मगर सरकार झुकी नहीं। नौकरशाही अपने गर्व में मस्त थी, अल्टीमेटम की परवाह न की।

अप्रैल महीने में डगलस जैसे ही जिला बोर्ड की मीटिंग में भाग लेने पहुँचे उन पर गोलियों की बौछार हुई, शरीर कटे वृक्ष की भाँति गिर पड़ा। प्रभाशु पाल आक्रमण के पश्चात् निकल भागे मगर दूसरा क्रान्तिकारी प्रद्योत भट्टाचार्य पिस्तौल ही दागते समय फँस जाने के कारण गिरफ्तार हो गये।

पुलिस प्रद्योत भट्टाचार्य पर हत्या का आरोप तो प्रमाणित न कर पायी मगर उसने डगलस की हत्या करने की चेष्टा के लिए नये कानून के तहत फाँसी पर लटकाकर ही दम लिया। वह कानून जो विमल दासगुप्त के लिए बनाया गया था उसका उपयोग अंग्रेजों ने प्रद्योत भट्टाचार्य को फाँसी पर लटकाने में क्रियान्वित कर दिखाया।

इन दुर्घटनाओं से अंग्रेज नाराज ही नहीं बड़े चिन्तित भी थे। वे नौजवानों को सन्देह की दृष्टि से देखने लगे थे। इसी आक्रोश से प्रभावित क्रोधित अंग्रेज अफसर हिजली कैम्प जेल में प्रविष्ट हुए और निहत्थे नजरबन्दियों पर अकारण ही गोलियाँ-ही-गोलियाँ चला दीं। दो क्रान्तिकारी सन्तोष कुमार और तारकेश्वर सेन दुर्घटना स्थल पर मार डाले गये और 18 बन्दी इस अचानक गोलाबारी में बुरी तरह घायल हो गये।

क्रान्तिकारी ईंट का जवाब पत्थर मारकर देना जानते थे। अपना समय सोचने में व्यर्थ गँवाना उन्होंने सीखा ही नहीं था। उनकी भाषा में खून का बदला खून से कम न था। उपर्युक्त दुर्घटना का उत्तर उन्होंने आतंकवाद से तुरन्त चुका डाला। ढाका के कमिश्नर मिस्टर एलेक्जेंडर कैंसल, वहीं के मजिस्ट्रेट मिस्टर एल. जी. डुन और यूरोपियन एसोसियेशन के सभापति मिस्टर विलियर्स को गोली मारी गयी।

कुमारी शान्ति घोष और कुमारी चौधरी ने ढाका के अन्य मजिस्ट्रेट वी. जी. स्टीवेन्स को अपनी गोलियों से भून डाला और निकल भाग बंगाल के गवर्नर स्टैनले जैक्शन पर दीक्षान्त भाषण के दौरान स्नातिका वीणा दास ने 65 गोलियाँ चलायीं मगर वह बच भागी। भवानी भट्टाचार्य को फाँसी दे दी गयी।

बंगाल के गवर्नर सर जान एंडर्सन को भी दो क्रान्तिकारियों ने अपनी गोलियों का निशाना बनाया किन्तु सौभाग्यवश वे बाल-बाल बच गये। इन्हीं गवर्नर की हत्या की चेष्टा करने के अपराध में भवानी भट्टाचार्य को फाँसी दी गयी थी।

देश में सर्वत्र ही आतंक फैला हुआ था। कहीं भी अंग्रेज अफसर, पुलिस अफसर, उनके पिट्ठू और मुखबिर अपने को सुरक्षित नहीं पा रहे थे। हर समय एक ही खटका कदम-कदम पर उनका खून सुखाता, किसी क्रान्तिकारी की दनदनाती गोली न मालूम कहाँ किस ओर से आकर उनके सुख-सुविधाओं में आग न लगा दे।

रात को आँखों की नींद दरवाजे की चौखटों के बज पड़ने पर अनायास टूट जाती। भारत की अनेक जेलों में अन्तर्देशीय क्रान्तिकारी षड्यन्त्र चलाने के अपराध में देश के निर्दोष नवयुवकों को पुलिस चुन-चुनकर बन्द कर देती। क्रान्तिकारियों के प्रबल शत्रु सरकारी पुलिस, कचहरी, फौज, जेल और कर्मचारी तो थे ही आम जनता में मुखबिरों का जाल भी था जो इनाम पाने के लोभ में उन्हें बन्दी बनवा देते।

रिवोल्टिंग ग्रुप का गठन

बंगाल में सुभाषचन्द्र बोस की गिरफ्तारी, उनकी बीमारी और वर्मा निर्वासन के कारण नवयुवक क्रान्तिकारियों में अंग्रेजों के विरुद्ध घृणा फैली, क्रोध जाग्रत हुआ और इस प्रकार वहाँ रिवोल्टिंग ग्रुप बना जिसमें 10 से 20 वर्ष के नवयुवकों के संगठन ने मर-मिटने का संकल्प लिया। इसके नेता बने सूर्य सेन जिसे सहयोगी स्नेहवश मास्टर दा सम्बोधित करते।

नया खून ने देखा-गांधी जी द्वारा छेड़ा गया सविनय कानून भंग आन्दोलन के माध्यम से 12 अप्रैल को वे समुद्र तट पर नमक बनाने निकल पड़े थे। अग्रवर्ती दल मौन अपनी शक्ति सन्तुलन के संचयन में लगा था।

चटगाँव में अग्रवर्ती दल के नेता सूर्य सेन अपने नये खून की नयी योजना पर कार्यरत थे। उनका निश्चय था कि केवल मामूली डकैती और खून के बदले खून से समस्या का समाधान सम्भव नहीं। इस समस्या का हल केवल सशस्त्र क्रान्ति का खुला संघर्ष होना आवश्यक है।

उन्होंने नये खून के अग्रवर्ती दस्ते को चार दलों में विभाजित कर दिया। योजना थी-चटगाँव शस्त्रागार की लूट। क्रान्तिकारियों के लगभग 70 सदस्य मरने-मारने के संकल्प ले पूरी तरह सजग थे। सूर्य सेन और अनन्त सिंह का निर्णय सर्वमान्य घोषित होने पर 18 अप्रैल, 1930 की रात निश्चित हो गयी।

एक दल का नेतृत्व लोकनाथ बल और निर्मल सेन कर रहे थे। सदस्यों ने टैक्सी द्वारा रेलवे अस्त्रागार में पहुँचकर एक सन्तरी को, जो पहरे पर तैनात था, गोली से उड़ा दिया। सावधानी से सार्जेंट फारेल (Farrel) को घेर लिया।

अन्य सदस्यों ने अस्त्रागार के शस्त्रादि सतर्कता से लूटकर वाहन में लादे और फारेल को मौत के घाट उतार वहाँ से खिसक गये। दूसरे दल के मुखिया थे अनन्त सिंह और गणेश घोष जिन्होंने बड़ी वीरता से पुलिस अस्त्रागार को पूरी तरह लूटने में सफलता प्राप्त की।

वहाँ के रक्षक अपनी जान बचाकर भाग निकले अतः क्रान्तिकारियों ने उसी अस्त्रागार को अपना मुख्य कार्यालय बना डाला। तीसरे दल का नेतृत्व करनेवाले अम्बिका चक्रवर्ती ने टेलीग्राफ एवं टेलीफोन कार्यालय को लूटकर अपना नियन्त्रण कर लिया।

चौथे दल के सदस्यों ने बड़ी तत्परता से रेलवे लाइन काट दी, पटरियाँ उखाड़ डालीं जिससे सेना का आवागमन अवरुद्ध हो गया। सारा काम एक साथ 10 बजे रात तक सम्पन्न हो गया, रेलवे अस्त्रागार, पुलिस अस्त्रागार लुटे, टेलीग्राफ टेलीफोन केन्द्र पर नियन्त्रण कर लिया और रेलवे आवागमन के साधनों पर पूर्ण नियन्त्रण हो गया था।

चटगाँव की जनता ने प्रसन्नता की साँस ली। पराधीनता की बेड़ियाँ तोड़कर उन्हें स्वाधीनता का स्वर्णिम सपना आँखों में साकार-सा लगा। क्रान्तिकारियों ने जलालाबाद की पहाड़ी पर सुरक्षा की दृष्टि से शरण ले ली। सदस्यों की संख्या लगभग 70 के ऊपर थी। अत्यन्त सीमित साधनों की व्यवस्था ऊपर से पानी का अभाव। 3 दिन बड़ी परेशानी के साथ गुजर गये।

22 अप्रैल को सूर्य सेन ने अनुभव किया, एक सेना पहाड़ी पर चढ़ने का प्रयास कर रही है। क्रान्तिकारी रिवाल्वर, पिस्तौल और बन्दूकों से लैस तैयार थे। जब सैनिकों का काफिला बन्दूकों की मार के दायरे में प्रवेश पाने लगा तो सूर्यसेन ने आक्रमण में गोलियाँ दागनी शुरू कर दीं। यहाँ सैनिकों ने मशीनगनों का प्रयोग भी किया किन्तु उनके 50 से ऊपर सैनिक हताहत हुए जबकि केवल युद्ध में 12 क्रान्तिकारी शहीद हुए।

अंग्रेजों के हौसले पस्त हुए, सैनिकों की कमी के कारण युद्ध रोक दिया गया। दूसरे दिन प्रातःकाल ही अंग्रेजों की नयी कुमुक ने फिर चढ़ाई कर दी। दोनों ओर से घमासान युद्ध में 30 सैनिक मारे गये और 8 क्रान्तिकारियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

जलालाबाद के भीषण युद्ध ने प्रमाणित कर दिया कि भारतीय बहादुर हैं, क्रान्तिकारी फौज के जवानों से किसी समय भी लोहा लेने में सक्षम हैं, विदेशी साज-सज्जा और गोले-बारूद से लैस सेना को दिन में तारे दिखला सकते हैं।

सूर्य सेन की नेतृत्व कुशलता, वीरता और अभूतपूर्व दूरदर्शिता से सेना को पीछे हटना पड़ा और काफी सैनिक हताहत होने के परिणामस्वरूप उनका मनोबल टूटा। क्रान्तिकारी ज्यों ही शहीद होते आकाश में ‘वन्दे मातरम्’ का स्वर पहाड़ियों में गूँजने लगता-वे निडरता से प्राणों की बाजी लगाते जा रहे थे।

मरने की चिन्ता न थी। मृत सहकर्मियों की जेब से कागजात और कमर से रिवाल्वर सूर्य सेन पहुँचकर तत्काल निकाल लेते जिससे प्रतिपक्षी अंग्रेज लाभ न उठा लें। इस बीच अचानक क्रान्तिकारी अम्बिका चक्रवर्ती को एक गोली का निशाना बना दिया गया। सिर में लगी गोली से वे घायल हो गिर पड़े। सभी ने उन्हें मृत समझकर छोड़ दिया और आगे बढ़े। मगर अम्बिका चक्रवर्ती ने घायलावस्था में भी सामने के सैनिक को मरने से पूर्व मार गिराया।

क्रान्तिकारियों के मन में अपने सहयोगियों के प्रति अपार श्रद्धा, आस्था और प्रेम था मगर रणक्षेत्र में हताहतों को चुपचाप पूर्ण निष्ठा और सम्मान सहित दाह-क्रिया कर अगले आक्रमण की तैयारी में जुट पड़ते।

एक-एक क्षण मूल्यवान था रणक्षेत्र में, सोचने का समय अपनी विजय को आशंकित करना था। जो जहाँ फँसे वे अपने शेष साथियों के साथ मोर्चे पर डटकर मुकाबले में अड़े रहे। सूर्य सेन के बहादुर क्रान्तिकारियों की कर्मनीति ने मृत्यु-आलिंगन को सहज और सरल बना डाला था।

शहीद होना अनहोनी तो न थी, सोच-समझकर मृत्यु के दरवाजे खटखटाने वालों को भय किसका था? मौत जितनी शीघ्रता से निकट आये अच्छा, किन्तु इस क्षणिक सुख से पूर्व दुश्मन को मौत के घाट उतारना ही तो संकल्प था।

जलालाबाद के युद्ध से अपने बचे शेष साथी क्रान्तिकारियों को सुरक्षित बचाकर सूर्य सेन ने कर्णफूली नदी पार कर चटगाँव में गोरे के मोहल्ले पर आक्रमण करने की ठान ली। अंग्रेजों में भारी-भरकम फौजी तैयारियों के साथ ही सामरिक शक्ति बड़ी थी मगर क्रान्तिकारी मुट्ठी भर होने के बावजूद उन पर आक्रमण करने को आमादा थे।

उनके प्रिय साथी जहाँ शहीद हो गये, वहीं उन्होंने अपने प्राणों को बचाने की अपेक्षा युद्ध में मरना बेहतर मानकर सिंह गर्जना की- ‘आगे बढ़ो, शत्रु को मारो।’ गांधी जी के आन्दोलन को विशेष झटका लगा था। चटगाँव शस्त्रागार लूट के पश्चात् अंग्रेजों को प्राणरक्षा के लिए समुद्री जहाज पर शरण लेने पर विवश कर दिया गया था। कांग्रेस को इसके लिये निन्दा करनी पड़ी। क्रान्तिकारी अपनी धुन में थे।

अहिंसा की नीति विदेशी शत्रु से समझौता करने का बहाना बन रही है, जब कि क्रान्तिकारी 25 वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं। हम सुधारों के लिए नयी व्यवस्था बदलने की माँग करते हैं। गांधी जी क्रान्तिकारियों को ‘कायर’ और उनके साहस को ‘जघन्य’ करार देते हैं। वे देश के शत्रु विदेशियों को अपना मित्र और आत्म-बलिदानियों को गद्दार करार दे देशवासियों की दृष्टि में गिराना चाहते हैं, उन्हें गालियाँ देते हैं।

कालारपोल में मोर्चेबन्दी

सशस्त्र क्रान्ति की रूपरेखा ऐसे मोड़ पर पहुँच चुकी थी कि सूर्य सेन पीछे मुड़कर देखना न समझते थे। चारों ओर अंग्रेज सिपाहियों के सतर्क कदमों की चाप तीव्रता से कानों में भय के स्थान पर साहस को बढ़ाती थी।

5 मई को सूर्य सेन ने कालारपोल में मोर्चेबन्दी कर खंड युद्ध का सफल नेतृत्व किया जिसमें 4 नवयुवक युद्ध में आहत होते ही अपनी पिस्तौलों से गोली दाग स्वयं आत्महत्या कर शहीद हो गये। उनका कोई साथी मुखबिर न बना।

जो सहयोगी शेष बचे सूर्य सेन वहाँ से उन्हें साथ ले निकल भागे। उन्होंने पुनः अगले मोर्चे की तैयारी प्रारम्भ कर दी। थकना और आराम करना सूर्य सेन के जीवन का लक्ष्य कभी नहीं बना था। वहाँ से पलायन के पश्चात् सूर्य सेन ने जेल में बन्दी क्रान्तिकारियों से भी सम्पर्क साधने की चेष्टा कर डाली।

चाँदपुर का इंस्पेक्टर तारिणी मुखर्जी को, जिसके कारण रामकृष्ण विश्वास को फाँसी हुई और कालीपद को काला पानी का दंड मिला, मारकर शहीदों का बदला चुका लिया गया। अब क्रान्तिकारियों ने डाइनामाइट का प्रयोग करना भी अपनी योजनाओं की सफलता के लिए शुरू कर दिया।

चटगाँव के धलघाट नामक गाँव की घटना

सन् 1932 जून मास में एक दिन चटगाँव के धलघाट नामक गाँव में अपने कुछ क्रान्तिकारियों सहित ब्राह्मण परिवार के घर वे छुपकर निवास कर रहे थे। किसी भेदिये ने सुराग दे दिया। पुलिस ने तत्काल उस घर को घेर लिया।

क्रान्तिकारी अपनी रिवाल्वर से ही पुलिस की मशीनगनों का मुँहतोड़ जवाब देते रहे। इस मुठभेड़ में पुलिस कप्तान कैमरेन मार गिराया गया जब कि सूर्य सेन के दो क्रान्तिकारी अपूर्व सेन और निर्मल सेन ने अन्तिम क्षणों तक लड़ते-लड़ते वीरगति पायी।

प्रद्योत भट्टाचार्य को जब फाँसी की सजा सुनाने का समय आया तो उस समय तीसरे अंग्रेज जिला मजिस्ट्रेट मेदिनीपुर में नियुक्त हुए। नाम था जार्ज क्रान्तिकारियों के सामने अपनी इज्जत बचाने की बारी थी इसलिए जार्ज को भी चेतावनी नोटिस दिया गया।

उस दम्भी ने एक कान से सुना दूसरे से अल्टीमेटम बाहर निकाल दिया। उसने सोचा, अंग्रेजों के पास असंख्य फौज, आधुनिक हथियारों से पूर्ण लैस सेना फिर सारे विश्व में शक्तिशाली राष्ट्र की विश्वशनीयता के सामने मुट्ठी भर आतंकवादी किस खेत की मूली हैं।

एक दिन प्रद्योत मट्टाचार्य को जार्ज के सम्मुख जब पेश किया तो गर्व से सीना फुलाकर अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने प्रश्न किया- प्रद्योत टुमारा नाम तैयार हो न? सूर्य सेन का जीवन परिचय

प्रद्योत भट्टाचार्य ने उसी लहजे में उत्तर दिया ‘तैयार तो मैं बहुत दिनों से हूँ। जिस दिन मैंने भारत माँ के चरणों में आत्मोत्सर्ग किया, संकल्प लिया, देश से अंग्रेजों को मिटाने के लिए, उसी क्षण से मैं तो तैयार ही तैयार हूँ। तुम्हारे भी दिन निकट हैं जार्ज! तुम भी तैयार तो हो न?”

जार्ज का चेहरा तमतमा गया उसकी आँखों में खून उतर आया, अपन सम्मुख उस नवयुवक क्रान्तिकारी के धैर्य और साहस के सामने क्या इस छोकर की घुड़की से वह दब जाये, अगर वह चाहे तो क्षण में मच्छर के समान उसे मसलकर हवा में उड़ा सकने की शक्ति उसमें है। पुलिस प्रद्योत भट्टाचार्य को घसीटकर मजिस्ट्रेट कक्ष से बाहर निकाल ले गयी।

फुटबॉल मैच की घटना

सशस्त्र पुलिस बैरक के बड़े मैदान में फुटबॉल मैच के विशाल आयोजन में जिला मजिस्ट्रेट जार्ज बैठे खिलाड़ियों की बाल का तन्मयता से आनन्द ले रहे थे। क्रान्तिकारी अपने सर पर कफन बाँधे जब घर से निकल ही पड़े तो भय किस चिड़िया का नाम है उन्हें क्या पता?

मैदान में अंगरक्षकों के अतिरिक्त पुलिस का जाल चप्पे-चप्पे पर बिछा था। चारों ओर से फौज जैसी मोर्चाबन्दी थी, मगर जिला मजिस्ट्रेट के अंगरक्षकों की ऐसी नाकेबन्दी को तोड़ डालना क्रान्तिकारियों के लिए तुच्छ था।

कुछ देर बाद ही रिवाल्वर गरजा, जार्ज को गोली लगते ही धराशायी हो गया। पुलिस फायरिंग में अनाथनाथ पंजा और मृगेन्द्रनाथ दत्त शहीद हुए मुकदमा चला तो ब्रजकिशोर चक्रवर्ती, रामकृष्ण राय और निर्मल जीवन घोष हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे को चूम शहीद हो गये।

इस दौरान सूर्य सेन के दल में दो महिला क्रान्तिकारी जुड़ गयी थीं, पहली का नाम था प्रीतिलता और दूसरी साहसी बाला कल्पना दत्त थी। पुलिस के सिपाहियों की नजर चटगाँव ही नहीं इर्द-गिर्द के देहातों और कस्बों पर भी गड़ी थी। दोनों ही कार्यकर्त्ता बड़ी निर्भीकता से चटगाँव के पूरे इलाके को अपने सूत्र में रखती जिससे सूर्य सेन योजना को सुचारू रूप से संचालित कर पाते थे।

सूर्य सेन ने योजना तैयार की कि रेलवे क्लबवाली पहाड़ी पर इस बार आक्रमण सरल होगा यदि नेतृत्व प्रीतिलता द्वारा संचालित हो। प्रीतिलता की सहायता के लिए आठ तरुण दिये गये। यह आक्रमण इतना दुःसाहसिक था।

कि दोनों तरफ से घमासान गोलियों की बौछारों का आदान-प्रदान हुआ जिसमें एक अंग्रेज महिला मौत के घाट उतार दी गयी, लगभग 12 सैनिक बुरी तरह घायल हो मैदान छोड़ भागे प्रीतिलता इस आक्रमण में इतनी घायल हो चुकी थी।

कि रेलवे क्लब से 100 गज की दूरी तय करते-करते वह भूमि पर गिर पड़ी। असहाय प्रीतिलता ने पोटाशियम साइनाइड निकाल अपनी इहलीला समाप्त कर शहीद हो गयी क्योंकि जीवित वह शत्रुओं के हाथ आना अपमान समझती थी।

अचानक दूसरी क्रान्तिकारिणी कल्पना दत्त भी पुरुष वेश कार्यरत एक सिपाही के सन्देह का शिकार बन गिरफ्तार कर ली गयी। दो मास बाद वह जमानत पर छूटते ही सूर्य सेन द्वारा भूमिगत रहकर कार्य करने के लिए तैयार हो गयी। सूर्य सेन यहाँ से भी पुलिस की आँखों में धूल झोंककर निकल भागे।

क्रान्तिकारियों की गुप्त रणस्थली

सूर्य सेन ने गैरला गाँव के ब्रजेन्द्र सेन के मकान को अपना कार्यालय बना क्रान्तिकारियों की गुप्त रणस्थली के रूप में विकसित कर लिया। 15 फरवरी, 1993 को रात लगभग 10 बजे पुलिस ने अचानक सूर्य सेन को घेर लिया। दोनों तरफ से गोलियों का घमासान संचालन हुआ।

पहले मकान से साथी उत्तर भागे इसके पश्चात् घर से सूर्य सेन भी नौ दो ग्यारह हो गये। सभी साथी सम्पर्क स्थल पर सुरक्षित पहुँच गये किन्तु ज्यों ही सूर्य सेन ने घर में प्रवेश किया, वहाँ पहले से छुपे गोरखों ने उन्हें बन्दी बना लिया। साथी दुर्घटना स्थल से भागने में सफल हुए केवल मकान मालिक ब्रजेन्द्र सेन को पुलिस ने पकड़कर गिरफ्तार कर लिया।

उस दिन सूर्य सेन और ब्रजेन्द्र सेन पर तमाम रात पुलिस अमानुषिक अत्याचारों द्वारा दारुण दुख देती रही। जब सुबह हुई तो दोनों के हाथों में हथकड़ियाँ और कमर में सीकड़ डाल दिये गये। सर्वप्रथम कैम्प में हाजिरी दिखाकर दोनों ही चटगाँव लाये गये।

रास्ते में एक पड़ाव पर गोरे सार्जेंट सहित पुलिस के उच्चाधिकारियों ने सूर्य सेन के पकड़े जाने की खुशी में जश्न मनाया, खाया-पीया, मौज-मस्ती की। गोरा सार्जेंट इतना मस्त हुआ कि उसने सूर्य सेन के मुँह पर अपने मुक्के से भरपूर वार किया आघात के कारण मुँह और नाक से खून की धार बह निकली ये मूर्च्छितः मुद्रा में जमीन पर गिर पड़े।

ऐसी नीचता एवं भीरुतापूर्ण वीरता का प्रदर्शन केवल अंग्रेज बनिये ही कर सकते थे। काश, शेर जंगल में होता या बन्धन मुक्त होता। मुँहतोड़ उत्तर सूर्य सेन अवश्य देने में सक्षम थे परन्तु विवशता थी, क्या करते। सूर्य सेन का जीवन परिचय

सूर्य सेन को मृत्यु दंड की सजा

केवल तीन महीने के अन्तराल में पुलिस कल्पना दत्त और तारकेश्वर दस्तिदकर को भी गिरफ्तार करने में सफल हो गयी। तीनों पर स्पेशल ट्रिब्यूनल में मुकदमा चलाया गया कल्पना दत्त को आजीवन कालापानी का दंड मिला और सूर्य सेन एवं तारकेश्वर दस्तिदकर को मृत्यु दंड की सजा 14 अगस्त, 1933 को सुनायी दी।

12 फरवरी 1934 को अंग्रेजी सेना और पुलिस कर्मियों ने क्रान्तिकारी सूर्य सेन को काल कोठरी से निकाला और अज्ञात स्थल की ओर ले जाते समय साहसी विप्लवकारी ने अपने कंठ से ‘वन्दे मातरम्’ का सिंहनाद प्रारम्भ कर दिया। समस्त जेलखाने के कैदियों की नींद टूटी और उन्होंने भी ‘वन्दे मातरम्’ का अमूल्य मन्त्र ऊँचे कंठ से बोल-बोलकर आकाश मंडल में गुंजायमान कर दिया।

गोरे पिशाचों ने चटगाँव कारागार में उस रात को असहनीय बर्बरतापूर्ण यातनाओं से सूर्य सेन के समस्त शरीर को लहू-लुहान कर डाला जिसके कारण वे मूर्च्छित हो भूमि पर बिखर गये। अन्तिम क्षण तक उनके मुँह से ‘वन्देमातरम्’ ही निकलता रहा। प्रातःकाल अचेतावस्था में ही सूर्य सेन को फाँसी के फंदे पर लटकाकर नरपिशाचों ने प्रतिहिंसा की धधकती आग को शान्त कर दिया। शहीद सूर्य सेन 2 फरवरी 1934 मरकर भी जन्म-जन्मान्तर के लिए अमर हो गये। सूर्य सेन का जीवन परिचय

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