स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय? स्वामी दयानंद सरस्वती के धार्मिक विचार?

स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय (Swami Dayanand Saraswati Ka Jeevan Parichay), उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय पुनर्जागरण आंदोलन को गति प्रदान करने में स्वामी दयानंद सरस्वती का योगदान अत्यंत प्रभावी और बहुआयामी था। वैदिक धर्म के प्रचार के साथ ही उनका उद्देश्य राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना भी था। स्वामी दयानंद सरस्वती कौन थे?

स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय (Swami Dayanand Saraswati Ka Jeevan Parichay)

स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय
स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय (Swami Dayanand Saraswati Ka Jeevan Parichay)

स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय (Swami Dayanand Saraswati Ka Jeevan Parichay)

ये प्रथम व्यक्ति थे, जिसने ‘स्वराज्य’ शब्द का प्रयोग किया ये ही प्रथम व्यक्ति थे, जिसने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना तथा स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करना सिखाया। उन्होंने ही प्रथम बार हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया। उनके द्वारा स्थापित आर्यसमाज प्रारंभ से ही उग्र मतवादी संगठन था और उसका मुख्य स्रोत तीव्र राष्ट्रीयता थीं।

इसी का प्रभाव कालांतर में तिलक, लाजपत राय और गोखले पर पड़ा। कांग्रेस में राष्ट्रीयता के उदय में आर्य समाज की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। स्वामी जी संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान, वाग्मी और मेधावी व्यक्ति थे। उनका व्यक्तित्व अत्यंत दृढ़ और असमझौतावादी था। उनके विचारों में कहीं भी अस्पष्टता और रहस्यवादिता नहीं थी।

विवेकानंद जी को छोड़कर इतना अटूट आत्मविश्वास अन्यत्र नहीं दिखाई देता। स्वामी जी ने छुआछूत पर जितना प्रबल आघात किया, उतना और किसी ने नहीं किया। उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज आज भी सामाजिक कल्याण में अग्रणी संस्था है। अपने सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यों के कारण ही स्वामी जी को महर्षि कहा जाता हैं।

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म

स्वामी दयानंद जी का जन्म सन् 1824 ई. में काठियावाड़ के मोरबी राज्य के टंकारा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम कर्षण जी तथा माता का नाम यशोदा था। बचपन में दयानंद जी का नाम मूल शंकर था। कुछ लोग उन्हें दयाल जी भी कहते थे। पांच वर्ष की अवस्था में उन्हें विद्यारंभ कराया गया।

वे बहुत अधिक कुशाग्र थे। 14 वर्ष की अवस्था में उन्होंने सारा यजुर्वेद और दूसरे वेदों के अनेक अंश कंठाग्र कर लिया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने व्याकरण भी पढ़ लिया था । मूलशंकर के पिता शैव थे। वे शिवरात्रि को व्रत रखा करते थे। एक बार शिवरात्रि पर उन्होंने 14 वर्षीय मूलशंकर को भी व्रत रखने को विवश किया।

मंदिर में भक्तगण आधी रात तक शिव भक्ति के गीत गाते रहे। परंतु आधी रात के बाद सभी सो गए। मूलशंकर जाग रहे थे। उन्होंने देखा कि एक चुहिया शिवजी की मूर्ति पर चढ़कर नैवेद्य खा रही है। मूलशंकर को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने अपने ‘आत्म चरित’ में इस संबंध में लिखा है, ‘एक के बाद एक प्रश्न मेरे मन में उठने लगे।

दयानंद सरस्वती मूर्तिपूजा से विरत

मैंने अपने मन से पूछा, ‘क्या यह संभव है कि यह मनुष्य आकृति, जिसमें मैं एक व्यक्तिगत ईश्वर की मूर्ति देखता हूं जो मेरे सामने बैल पर सवार है, जो धार्मिक विचारानुसार भ्रमण करता है, सोता है तथा खाता-पीता है, जो अपने हाथ में त्रिशूल लिये है और डमरू बजाता है तथा मनुष्यों को शाप देता है। क्या में यह संभव है कि वह महादेव हो सकता है?

इस घटना में उत्पन्न शंका के समाधान हेतु उन्होंने अपने पिता को जगाकर पूछा, किंतु समाधान न होने पर उन्होंने व्रत भंग कर दिया और उसी दिन से मूर्तिपूजा में उनकी आस्था समाप्त हो गई। मूर्तिपूजा से विरत होकर उन्होंने अपना मन अध्ययन में लगाया।

उन्हें संसार की नश्वरता का बोध कराने वाली एक और घटना घटी। उनकी छोटी बहन का देहांत हो गया। इस घटना के संबंध में उन्होंने लिखा है, ‘मेरे मन में दृढ़ विश्वास हो गया कि संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, कुछ भी रहने वाला नहीं है।

सांसारिक जीवन में सभी कुछ नष्ट होने के लिए है। संसार की नश्वरता का ज्ञान होने पर मूलशंकर ने मोक्ष प्राप्त करने का निश्चय किया। 20 वर्ष की आयु में उनके पिता ने उनका विवाह करने का निश्चय किया। इस बंधन से बचने के लिए उन्होंने गृह त्याग कर दिया।

आर्य समाज की स्थापना

मूलशंकर ज्ञान और सच्चे शिव की प्राप्ति के लिए अनेक विद्वानों के पास गए। किंतु उन्हें संतोष नहीं हुआ। अंततः वे सन् 1860 ई. में मथुरा के स्वामी बिरजानंद से मिले। बिरजानंद ने मूलशंकर को आर्ष ग्रंथों का अध्ययन करने को कहा और अनार्ष ग्रंथों को यमुना नदी में प्रवाहित कराया।

मूलशंकर ने स्वामी बिरजानंद के सान्निध्य में रहकर अष्टाध्यायी, महाभाष्य आदि व्याकरण ग्रंथों के अतिरिक्त सभी आर्ष ग्रंथों का अध्ययन किया। अध्ययन समाप्त करने के बाद मूलशंकर ने गुरु से गुरुदक्षिणा लेने का प्रस्ताव किया। बिरजानंद ने कहा, ‘मेरे सामने प्रतिज्ञा करो कि देश का उपकार करोगे।

जीवन भर तुम आर्ष विद्या और वेदों के सत्य गान के प्रसार के प्रयत्न में निरंतर लगे रहोगे और उनके ग्रंथों का खंडन करोगे, जो झूठे मत-मतांतरों और सिद्धांतों की शिक्षा देते हैं और यह कि वैदिक धर्म की पुनः प्रतिष्ठा हेतु यदि आवश्यक हो, तो तुम अपना जीवन उत्सर्ग कर दोगे। यही मेरी गुरु दक्षिणा है।

मूलशंकर ने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य किया। गुरु ने मूलशंकर को दयानंद सरस्वती नाम दिया। दीक्षा प्राप्त स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने वक्तव्यों, स्वरचित ग्रंथों और अन्य धर्मावलंबियों के साथ वाद-विवादों से वैदिक धर्म का समर्थन किया और अनार्ष ग्रंथों तथा अन्य धर्मों का खंडन किया।

वैदिक धर्म की पुनः प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की, जिसने उनके विचारों को साकार कर देश को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक अधःपतन के गर्त से निकालने का महान कार्य किया।

वैदिक धर्म का प्रचार करते हुए स्वामी दयानंद जी सन् 1869 ई. में बनारस पहुंचे। यहां सनातन धर्मावलंबियों से उनका ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ। स्वामी जी विभिन्न धर्मों के आडंबरों का खंडन करते हुए सन् 1875 ई. में बंबई पहुंचे और वहीं आर्य समाज की स्थापना की। प्रारंभ में इसके 28 नियम थे, जिन्हें संशोधित कर 10 नियम स्थिर किए गए। वे निम्नलिखित हैं-

  1. सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदि मूल परमेश्वर है।
  2. ईश्वर, सच्चिदानंद स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अमर, अज, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता हैं, उसी की उपासना करने योग्य है।
  3. वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है, वेद पढ़ना, पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।
  4. सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।
  5. सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।
  6. समाज का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
  7. सबसे प्रीतिपूर्वक यथायोग्य वर्तना चाहिए।
  8. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए।
  9. प्रत्येक को अपनी उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिए, किंतु उसकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।
  10. सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र रहें।

उपर्युक्त नियमों से स्पष्ट है कि आर्य समाज का उद्देश्य देशवासियों को धार्मिक रूढ़ियों और अंधविश्वासों मुक्त करना तथा वैदिक धर्मावलंबी बनाकर प्रगति ओर अग्रसर करना था। स्वामी देश की पराधीनता और पराभव का प्रमुख कारण धार्मिक मतमतांतरों, रूढ़ियों और अंधविश्वासों को मानते थे और उन्होंने इनसे मुक्ति मार्ग वेदों प्राप्त किया।

स्वामी जी अपूर्व वक्ता थे। उन्होंने ईसाई और इस्लाम धर्मों ढोंगों की विस्तार युक्तिसंगत आलोचना की। साथ उन्होंने मूर्तिपूजा और पौराणिक मान्यताओं का भी खंडन किया। उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नामक ग्रंथ की रचना कर अपने वैदिक धर्म की सर्वोच्चता सिद्ध की तथा अन्य मतों और संप्रदायों का खंडन किया।

महर्षि अरविंद ने स्वामी दयानंद के वेदवाद की प्रशंसा करते हुए लिखा कि स्वामी दयानंद ठीक ही वेदों को भारत के युगों की चट्टान समझकर पकड़ लिया और उसमें उन्होंने तारुण्य की समग्र, शिक्षा, एक समग्र, पुरुषत्व तथा एक समग्र राष्ट्रीयता का जो दर्शन किया, उसके ऊपर निर्णय करने का साहस दिखलाया, उसमें राष्ट्रीय भावना विद्यमान थी।

स्वामी दयानंद धर्म के क्षेत्र में मार्टिन लूथर जैसा ही कार्य किया। लूथर ने पोपशा का विरोध करने हेतु ‘बाइबिल की ओर वापस जाओ’ का नारा दिया। उसी प्रकार स्वामी दयानंद भारतीयों को धार्मिक अंधविश्वासों से मुक्ति हेतु ‘वेदों की ओर वापस जाओ’ का नारा दिया।

वेदों के आधार पर उन्होंने बहुवेदवाद, मूर्ति पूजा तथा अन्य अंधविश्वासों की आलोचना की और वैदिक धर्म की निराकार ईश्वरोपासना का समर्थन किया। उन्होंने वेदों को अपौरुषेय सिद्ध किया। स्वामी दयानंद ने देशी-विदेशी सभी धर्मों से वैदिक धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध कर हिंदुओं में स्वधर्म के प्रति गौरव का भाव उत्पन्न किया।

उन्होंने भारतीयों से कहा, ‘तुम्हारा धर्म पौराणिक संस्कारों की धूल में छिप गया है। इन संस्कारों के गंदे पत्तों को तोड़ फेंको। तुम्हारा सच्चा धर्म वैदिक धर्म है, जिस पर आरूढ़ होने से तुम फिर से विश्व विजयी हो सकते हो।’

स्वामी जी ने सामाजिक सुधार का भी व्यापक कार्य किया। वे इस देश की पराधीनता का प्रमुख कारण सामाजिक कुरीतियों को मानते थे। स्वामी जी ने जातिवादी कट्टरता, छुआछूत, बाल-विवाह, विधवा-विवाह के निषेध को वेद-विरुद्ध सिद्ध किया।

उन्होंने इन कुरीतियों उन्मूलन के कार्य में आर्य समाज को लगाया। के आर्य समाज ने अन्तर्जातीय और विधवा विवाह संपन्न कराने के कार्य में प्रशंसनीय कार्य कया। स्त्रियों को शिक्षित करने का कार्य भी आर्य समाज ने शुरू किया। कालांतर में इसी का प्रभाव हुआ कि अनेक महिलाएं शिक्षित होकर राष्ट्रीय आंदोलन में सम्मिलित हुई। इसी तरह स्वामी जी ने छुआछूत के विरुद्ध भी अभियान चलाया।

ये इस कुप्रथा को अमानवीय मानते थे। स्वामी दयानंद राष्ट्रीय जागरण के लिए शिक्षा को अनिवार्य मानते थे। उनके पूर्व ब्रह्म समाज और प्रार्थना समाज पाश्चात्य शिक्षा और अंग्रेजी के समर्थक थे। स्वामी जी ने भारतीयों को पाश्चात्य शिक्षा के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए धर्म और नैतिकता से युक्त वैदिक शिक्षा का समर्थन किया और अंग्रेजी के स्थान में संस्कृत तथा हिंदी के अध्ययन को आवश्यक माना।

आर्य समाज ने डी.ए.वी. विद्यालयों और महाविद्यालयों तथा गुरुकुलों की स्थापना कर राष्ट्रीय शिक्षा को वास्तविक रूप प्रदान किया। इन शिक्षा संस्थाओं ने भेदभाव रहित शिक्षा प्रदान कर समस्त भारतीयों की उन्नति में योगदान किया तथा भारतीयों में राष्ट्रवादी भावना का प्रसार किया। इन संस्थाओं ने संस्कृत और हिंदी की उन्नति में योगदान किया।

स्वामी जी के पूर्व के नेताओं के प्रेरणास्त्रोत यूरोप और इंग्लैंड के उदारवादी विचारक बर्क, बैंथम, मैजिनी, मिल, स्पेंसर आदि थे। उनका राष्ट्रवाद मातृभावना से शून्य था। अतः वे पश्चिम की तुलना में भारतीय श्रेष्ठता को प्रमाणित करने में असमर्थ थे।

स्वामी दयानंद राष्ट्रवादी महापुरुष थे। उन्होंने वेदों के आधार पर भारतीयों में राष्ट्रवादी भावना का प्रसार किया। उन्होंने भारतीयों को अनुभव कराया कि वे सुंदर विरासत के उत्तराधिकारी हैं। स्वामी जी ही प्रथम व्यक्ति थे, जिसने भारतीयों को अपने धर्म, संस्कृति और भाषा पर गर्व करना सिखाया।

स्वामी जी की जीवनी में उल्लेख है, ‘दयानंद का एक मुख्य उद्देश्य राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना था। वस्तुतः वे प्रथम व्यक्ति थे, जिसने ‘स्वराज्य’ का प्रयोग किया। वह प्रथम व्यक्ति थे, जिसने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करना सिखाया। वह प्रथम व्यक्ति थे, जिसने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया।

राष्ट्रीय जागरण के क्षेत्र में अन्य सभी आंदोलनों की तुलना में आर्यसमाज का अत्यंत महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली योगदान रहा। स्वामी दयानंद का स्थान राष्ट्रीय जागरण के क्षेत्र में अप्रतिम है। जहां अन्य नेता पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित थे और अंग्रेजी शिक्षा के पक्षधर थे, वहीं स्वामी दयानंदजी भारतीय सभ्यता और संस्कृति के पक्षधर थे तथा राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रबल पक्षधर थे।

वे ब्रिटिश शासन के कटु आलोचक और भारतीय स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। अन्य नेताओं की तुलना में स्वामी जी की संवेदना, क्षमता, विवेक और बुद्धि अत्यंत प्रखर थी। उन्होंने अनुभव किया कि जब तक मध्ययुगीन मूल्यों, मान्यताओं, परंपराओं और जीवन पद्धति का खुला विरोध नहीं किया जाएगा तथा भारतीय समाज को उसकी जड़ता एवं स्वार्थपरता से पूर्णतः मुक्त नहीं किया जाएगा,

तब तक इस समाज के पुनर्जीवित और गतिशील होने का प्रश्न ही नहीं उठता। स्वामी जी ने इस देश की दासता का मूल कारण धार्मिक और सामाजिक अंधविश्वासों और कुरीतियों को माना तथा उन्हें दूर करने का पूरी शक्ति से प्रयास किया।

यद्यपि सन् 1883 ई. में स्वामी जी का निधन हो गया, किंतु उनके और उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज के राष्ट्रीय मुक्ति के क्षेत्र में किए कार्यों का महत्त्व सर्वदा बना रहेगा। स्वामी जी ने उन्नीसवीं शताब्दी में स्वस्थ समाज और प्रखर राष्ट्रवाद की वह आधारशिला रखी, जिस पर स्वतंत्र भारत का निर्माण हुआ।

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