स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय | Swami Vivekanand Biography in Hindi

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय (Swami Vivekanand Ka Jeevan Parichay), उन्नीसवीं शताब्दी विदेशी शासन दासता में दुखी, दलित और हो रहे निरुपाय पड़े भारतीय जनता जिन महापुरुषों ने मुक्ति के लिए संघर्ष को संकल्पित किया। स्वामी विवेकानंद का जन्म कब हुआ था? उनमें स्वामी विवेकानंद अग्रगण्य उन्होंने वेद तथा धर्मशास्त्रों और भारतीय दर्शन का गहन अध्ययन किया उन्होंने अपने रामकृष्ण परमहंस नाम पर ‘रामकृष्ण मिशन’ स्थापना कर देश की जनता की सेवा का कार्य आरंभ किया।

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय (Swami Vivekanand Ka Jeevan Parichay)

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय
स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

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स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय (Swami Vivekanand Ka Jeevan Parichay)

आज भी देश भर में संस्था लोक में लगी हुई है। स्वामी जी अत्यंत ओजस्वी वक्ता उनमें चिंतन और सेवा संगम था। उन्होंने भारतीय चिंतन विदेशों भारत सम्मान बढ़ाया। उन्होंने अपना सारा जीवन मानव-सेवा लगाया। सच्चे अर्थों स्वामी विवेकानंद युग थे।

स्वामी विवेकानंद का जन्म

इनका जन्म सन् 1863 कलकत्ता में हुआ उनके पिता विश्वनाथ दत्त वकील थे। स्वामी जी पारिवारिक नाम नरेंद्रनाथ था। संन्यासी पर वे विवेकानंद नाम से विख्यात हुए। नरेंद्रनाथ अत्यंत प्रतिभाशाली उनकी स्मरणशक्ति इतनी प्रबल थी कि जो कुछ एक बार पढ़-सुन लेते थे, वह स्मरण हो जाता था।

विवेकानंद की स्मरण शक्ति

कहा जाता है, अपने पड़ोसी से सुनकर उन्होंने संस्कृत व्याकरण ‘मुक्तबोध’ के सभी सूत्रों को कंठस्थ कर लिया था। उनकी माता नित्य रामायण महाभारत का पाठ करती थीं। इन ग्रंथों का अधिकांश नरेंद्रनाथ सुनकर याद लिया था। उन्होंने अंग्रेजी, बंगला और संस्कृत का गहन अध्ययन किया।

नरेंद्रनाथ ने विश्व के अन्य धर्मों का अध्ययन किया और उनकी हिंदू धर्म दर्शन से तुलना की। उनके मन में बार-बार यह प्रश्न उठता कि जब विश्व के धर्म मानवमात्र को एक ही परम पिता की संतान मानते हैं, संसार विषमता क्यों है और क्या किसी ने ईश्वर का दर्शन किया है?

यह विचार नरेंद्रनाथ के को उद्विग्न कर रहा था। उसी समय अकस्मात् एक पड़ोसी के घर उनकी रामकृष्ण परमहंस से भेंट हुई। रामकृष्ण परमहंस कलकत्ते के समीप दक्षिणेश्वर के काली मन्दिर के पुजारी थे।

वे मोह-माया से विरक्त, सिद्ध हिंदू संत थे। वे सभी धर्मों की समानता का उपदेश देते थे। उस भेंट के समय नरेंद्रनाथ ने सुस्वर में एक गाना गाया, जिसे सुनकर रामकृष्ण परमहंस समाधिस्थ हो गए। बाद में उन्होंने नरेंद्रनाथ को दक्षिणेश्वर आने को कहा।

दक्षिणेश्वर जाने पर नरेंद्रनाथ ने रामकृष्ण जी से बातचीत के क्रम में प्रश्न किया, ‘क्या ईश्वर को देखा जा सकता है?’ रामकृष्णजी ने उत्तर दिया, ‘क्यों नहीं? उन्हें वैसे ही देखा जा सकता है, जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूं। परंतु वैसा करना कौन चाहता है?

स्त्री-पुत्र के लिए लोग घड़ों आंसू बहाते हैं, रुपए-पैसे के लिए रोज रोते हैं, किंतु भगवान् की प्राप्ति न होने से कौन रोता है?’ रामकृष्ण के इस कथन से नरेंद्रनाथ बहुत अधिक प्रभावित हुए और वे दक्षिणेश्वर आने-जाने लगे। मन-ही-मन नरेंद्रनाथ ने रामकृष्ण परमहंस को गुरु मान लिया।

नरेंद्रनाथ अपने भावी गुरु से पृथक् ढंग के व्यक्ति थे। रामकृष्ण में सुकुमारता अधिक थी, किंतु नरेंद्रनाथ में पौरुष और ओज अधिक था। वे हट्टे-कट्टे थे, घूंसेबाजी, घुड़सवारी, कुश्ती और तैराकी में दक्ष थे। रामकृष्ण जी सात्त्विक वृत्ति के थे, तो नरेंद्रनाथ राजसी वृत्ति के रामकृष्ण का कंठ मधुर था, वे लोकगीत और भजन गाते थे,

पर नरेंद्रनाथ ने कंठ तथा वाद्ययंत्र संगीत का विधिवत् प्रशिक्षण लिया था। रामकृष्ण परमहंस अशिक्षित थे। परंतु नरेंद्रनाथ विश्वविद्यालय की शिक्षा प्राप्त कर चुके थे और कॉलेज में उनके अध्यापक तथा सहपाठी उनकी प्रतिभा से प्रभावित थे।

रामकृष्ण जी ने भक्ति और समाधि से सिद्धि प्राप्त की थी। वे आस्थावान संत थे। नरेंद्रनाथ के लिए आस्था अंतिम शब्द नहीं था। वे प्रत्येक विषय को तर्क की कसौटी पर कसना आवश्यक मानते थे। रामकृष्ण जी पूर्णतः प्राच्य मनीषा के प्रतीक थे, परंतु नरेंद्रनाथ पाश्चात्य बौद्धिकता से प्रभावित थे।

इतनी अधिक विभिन्नता होने पर भी नरेंद्रनाथ क्रमशः रामकृष्ण परमहंस की ओर आकृष्ट होते गए। नरेंद्रनाथ को आभास होने लगा कि उनके भीतर कुछ अद्भुत घटित हो रहा है। एक दिन बातचीत के दौरान रामकृष्ण जी ने नरेंद्रनाथ को स्पर्श कर दिया।

नरेंद्रनाथ तत्काल बेहोश हो गए। उन्हें लगा कि वे किसी अन्य लोक में चले गए हैं। उस दिन के अनुभव का वर्णन करते हुए नरेंद्रनाथ ने लिखा है, ‘उस समय मेरी आंखें खुली हुई थीं। मैंने देखा कि दीवारों के साथ कमरे का सारा सामान तेजी से घूमता हुआ कहीं विलीन हो रहा है। मुझे लगा कि सारे ब्रह्मांड के साथ मैं भी एक महाशून्य में लीन हो रहा हूं।

मैं भय से कांप उठा। जब मेरी चेतना लौटी तो मैंने देखा कि ठाकुर रामकृष्णदेव मुस्कुराते हुए मेरी पीठ पर हाथ फेर रहे हैं। इस घटना का नरेंद्रनाथ पर बहुत गहरा असर पड़ा। उन्होंने सोचा कि जिसकी शक्ति के आगे मेरे जैसी दृढ़ इच्छाशक्ति वाला बलिष्ठ युवक भी बच्चा बन गया, वह व्यक्ति निश्चय ही अलौकिक शक्ति से संपन्न है। उनको रामकृष्ण परमहंस पर आंतरिक श्रद्धा हो गई। लगभग पांच वर्ष के घनिष्ठ संपर्क के पश्चात् नरेंद्रनाथ रामकृष्ण जी के शिष्य बन गए।

सन् 1884 में नरेंद्रनाथ के पिता का देहांत हो गया। वह परिवार को गरीबी और कर्ज में छोड़ गए थे। नरेंद्रनाथ के ऊपर परिवार के पालन-पोषण का भार आया। अनेक कार्यालयों में नौकरी के लिए वे दौड़-धूप करने लगे। उन्होंने एक के बाद एक कई नौकरियां कीं, परंतु कोई स्थायी नौकरी नहीं मिली।

सबकुछ छोड़कर वे दक्षिणेश्वर में अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के साथ स्थायी रूप से रहने लगे। रामकृष्ण परमहंस को योग्य उत्तराधिकारी मिल गया। उन्होंने नरेंद्रनाथ को ध्यान-समाधि में पारंगत बना दिया। रामकृष्ण परमहंस के समाधि लेने के पश्चात् नरेंद्रनाथ ने संन्यास ले लिया और तपस्या तथा देश सेवा का व्रत ले लिया।

अब नरेंद्रनाथ स्वामी विवेकानंद हो गए। उन्होंने बदरीनाथ-केदारनाथ से कन्याकुमारी तक देश भ्रमण किया। भारत माता के विराट रूप के प्रति वे नतमस्तक हुए। परंतु भारत की सुप्त आत्मा और बंदिनी भारत माता की दैन्य मूर्ति देखकर उनका मन करुणा से भर गया।

उन्होंने भारतीय जनता के जीवन को निकट से देखा। उन्होंने झोंपड़ियों में दरिद्रता में कराहते लोगों को देखा और साथ ही भव्य भवनों में सुखी-संपन्न लोगों को देखा, जिनके मन में पीड़ितों के लिए उदासीनता देखी। उन्होंने शिक्षितों और उच्च वर्ग के लोगों की भर्त्सना करते हुए कहा, ‘जब तक देश में हजारों लोग भूखे हैं, अज्ञानी हैं, मैं प्रत्येक शिक्षित को धोखेबाज कहूंगा।

गरीबों के पैसे से पढ़कर भी वे उनकी ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते। भारत को केवल जनता से आशा करनी चाहिए। उच्च वर्ग शारीरिक और नैतिक दृष्टि से मर गया है। धर्म वह है जो शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्ति दे, जो आत्मसम्मान और राष्ट्रीय गौरव प्रदान करने में सहायता करे।

धर्मगत ध्यान यदि व्यक्ति को प्रमादी और निष्क्रिय बनाता है, तो उसे त्याग देना चाहिए अगर मैं अपने देशवासियों को कर्मयोग में दीक्षित कर सकूं और उसके लिए मुझे हजारों बार नरक जाना पड़े तो मुझे प्रसन्नता होगी। स्वामी विवेकानंद का मुख्य प्रयोजन रामकृष्ण के उपदेशों का प्रचार करना था, लेकिन उनके मन में मानवता के उद्धार के प्रति गहरी भावना थी।

वे मानवीय समता में विश्वास करते थे। इसी मान्यता के कारण उन्होंने जाति, संप्रदाय, छुआछूत आदि का विरोध किया। गरीबों के प्रति उनकी सहानुभूति प्रगाढ़ थी। उन्होंने लिखा है. ‘पूजा के सभी उपकरणों को फेंक दो। शंख, घंटा घड़ियाल, दीप को प्रतिमा के सम्मुख डाल दो। वैयक्तिक मुक्ति के लिए की गई साधना और शास्त्रों के अध्ययन का अहंकार छोड़ दो। गांव-गांव जाओ और गरीबों की सेवा में अपने को निछावर कर दो।

स्वामी जी ओजस्वी वक्ता थे। वे देश का भ्रमण करते समय स्थान-स्थान पर लोगों को उपदेश भी देते थे। जिससे भी वे बातचीत करते, वह उनसे मुग्ध हो जाता था। अनेक राजा-महाराजा भी उनके शिष्य हुए। वे जन-समूह से कहते, ‘मैं पूरा देश घूमकर तुमसे कह रहा हूं- हम भारतीय पहले हैं,

बंगाली, मराठी, गुजराती और मद्रासी बाद में हम सब मिलकर इस देश के निवासियों की दरिद्रता और अज्ञान को दूर करने की कोशिश करें। मेरे पास सब आओ। रामकृष्ण की संतान, भारत के सब निवासी! मेरे पास सब आओ। मैं एक ऐसा धर्म चाहता हूं, जो जन-जन को अन्न-वस्त्र और शिक्षा देने के साथ उन्हें अपने सभी दुःखों को दूर करने की शक्ति दे।

विश्व धर्मसभा

उपदेश देते हुए स्वामी जी जब गुजरात पहुंचे, तब उन्हें अमेरिका के शिकागो नगर में होने वाले ‘विश्व धर्मसभा’ के आयोजन का समाचार मिला। स्थानीय सज्जनों की सहायता से स्वामी जी उक्त सभा में सम्मिलित होने के लिए 31 मई 1898 ई. को जहाज से चल पड़े।

जहाज के डेक से उन्होंने भारतभूमि की ओर देखा और भाव-विहल होकर बोले, ‘कैसी ज्ञानदायिनी तेजस्वरूपा है यह मेरी मातृभूमि! कैसा सुंदर सलोना है इसका महिमामय हिमालय पर हाय रे मातृभूमि, तू पददलित तिरस्कृत और गुलाम है।

अपने मन की वेदना व्यक्त करते हुए उन्होंने जहाज मद्रास के अपने युवा शिष्यों को लिखा, “भारत माता हजारों युवकों की बलि चाहती है। याद रखो, मनुष्य चाहिए, पशु नहीं। उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि स्वामी जी में राष्ट्रप्रेम कूट-कूटकर भरा हुआ था और उनका प्रयास था कि प्रत्येक भारतवासी में राष्ट्रप्रेम का भाव उद्बुद्ध हो ।

11 सितंबर 1893 को शिकागो में ‘विश्व धर्म महासभा’ का सम्मेलन प्रारंभ हुआ। उस सभा में विश्व के सभी धर्मों के प्रतिनिधि आए थे। सभा कक्ष श्रद्धालु श्रोताओं से भरा हुआ था। एक-एक कर सभी प्रतिनिधि मंच पर आते और अपने धर्म का परिचय देते।

सभी का भाषण लिखित था, किंतु स्वामी जी ने अपना भाषण नहीं लिखा था। जब अंत में स्वामी जी को अपना पक्ष प्रस्तुत करने को कहा गया, तो उन्होंने अपने गुरुदेव का सादर स्मरण किया और गेरुए वस्त्र से ढके तेजस्वी व्यक्तित्व वाले संन्यासी ने उपस्थित जनसमुदाय को आकृष्ट किया।

अन्य वक्ताओं की भांति प्रचलित प्रथा के अनुसार श्रोताओं को संबोधित कर उन्होंने कहा- ‘मेरे अमेरिकावासी बहनो और भाइयो!’ स्वामीजी के इतना कहते ही सभा कक्ष तालियों की ध्वनि से गूंज उठा और श्रोता आत्मविभोर हो गए।

पुनः स्वामी जी ने कहा, ‘जो धर्म अनादि काल से सब मतों को समान रूप से ग्रहण करने की शिक्षा देता आया है, मैं उसी धर्म का प्रतिनिधि हूं। जो धर्म दूसरे धर्मावलंबियों को केवल समान दृष्टि से ही नहीं देखता, वरन् अनेक मतों को सत्य भी मानता है, मैं उसी धर्म का मानने वाला हूं।

जो जाति युग-युग से सभी धर्मों तथा जातियों के भयभीत और अत्याचार पीड़ित मनुष्यों को आश्रय देती रही है, मैं उसी जाति के अंतर्गत होने के कारण अपने को गौरवान्वित समझता हूं

स्वामी जी की वाणी में भारतीय ऋषियों का चिंतन झंकृत हो रहा था। पूरे श्रोता मंत्रमुग्ध होकर वक्ता को सुन रहे थे। अपने भाषण के अंत में स्वामी जी ने कहा- ‘सभी धर्मों का गन्तव्य स्थान एक है। जिस प्रकार विभिन्न मार्गों से बहती हुई नदियां समुद्र में ही जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार सब मत-मतांतर परमात्मा की ओर ही ले जाते हैं। मानव धर्म एक है, मानव जाति एक है।

‘विश्व धर्म महासभा’ के पश्चात् उन्होंने अमेरिका में रामकृष्ण परमहंस और उनके दर्शन पर अनेक भाषण किए। वहां उनके अनेक लोग शिष्य बने। वहां स्वामी जी ने ‘न्यूयार्क वेदांत सोसाइटी’ की स्थापना की। अमेरिका से स्वामी जी इंग्लैंड भी गए। वहां भी भारतीय धर्म और दर्शन पर भाषण दिए।

अपने ओजस्वी भाषणों से स्वामी जी ने अमेरिका और ब्रिटेन में भारत का गौरव बढ़ाया। ‘विश्व धर्म महासभा’ में उनके भाषण पर न्यूयार्क हेरल्ड ट्रिब्यून ने लिखा था, ‘विश्व धर्म संसद में विवेकानंद सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति थे। उनको सुनने के बाद ऐसा लगता है कि उस महान् देश में धार्मिक मिशनों को भेजना कितनी बड़ी मूर्खता थी।’

सन् 1896 में स्वामी जी विदेश से भारत लौटे। ज्योंही भारत का समुद्रतट दिखाई पड़ा, उनकी आंखें डबडबा गई। वे हाथ जोड़कर एकटक समुद्रतट को देखते रहे। जहाज के किनारे लगते ही दौड़कर भारत भूमि को साष्टांग प्रणाम कर वे तट की रेत में इस प्रकार लोटने लगे, जैसे वर्षों बाद माता से मिलने पर कोई बच्चा मां में की गोद में पहुंचा हो।

भारत में देशवासियों की सेवा और अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों के प्रचार के लिए सन् 1897 में ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की। सन् 1902 ई. में स्वामी विवेकानंद की मृत्यु हो गई। स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय के बारे में जान ही गए होंगे।

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Kamlesh Kumar

मेरा नाम कमलेश कुमार है। मैं मास्टर इन कंप्यूटर एप्लीकेशन (Master in Computer Application) में स्नातकोत्तर हूं और CanDefine.com में एडिटर के रूप में कार्य करता हूँ। मुझे इस क्षेत्र में 3 वर्ष का अनुभव है और मुझे हिंदी भाषा में काफी रुचि है। मेरे द्वारा स्वास्थ्य, कंप्यूटर, मनोरंजन, सरकारी योजना, निबंध, जीवनी, क्रिकेट आदि जैसी विभिन्न श्रेणियों पर आर्टिकल लिखता हूँ और आपको आर्टिकल में सारी जानकारी प्रदान करना मेरा उद्देश्य है।

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