ठाकुर महावीर सिंह कौन थे? भारत को आजादी दिलाने में उनकी क्या भूमिका थी?

ठाकुर महावीर सिंह कौन थे (Thakur Mahavir Singh Kaun Tha), क्रान्तिकारी शहीद महावीर सिंह का जन्म संयुक्त प्रान्त के एटा जनपद स्थित एक छोटे से गाँव शाहपुर में 16 सितम्बर, 1904 में हुआ था। वे एक सम्पन्न ताल्लुकेदार के घर में पैदा हुए और बचपन में सभी लोग स्नेहवश कुँवर महावीर सिंह के नाम से उन्हें सम्बोधित करते। ठाकुर महावीर सिंह का जीवन परिचय।

ठाकुर महावीर सिंह कौन थे (Thakur Mahavir Singh Kaun Tha)

ठाकुर महावीर सिंह कौन थे
ठाकुर महावीर सिंह कौन थे (Thakur Mahavir Singh Kaun Tha)

ठाकुर महावीर सिंह कौन थे (Thakur Mahavir Singh Kaun Tha)

सन् 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में एटा जनपद ने मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना रक्त तर्पण करने में कोई कसर उठा न रखी थी। लगभग 64 वर्षों के उपरान्त जब गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन छेड़ा वहाँ के लोगों ने संघर्ष में भाग लिया,

रौलेट ऐक्ट और जलियाँवाले बाग हत्याकांड के विरोध में प्रबुद्ध जनता ने हाथ बँटाया और जब क्रान्तिकारियों ने यहाँ अलख जगाया तो देशभक्तों की भीड़ ने उनके कन्धे-से-कन्धा मिलाकर संघर्ष किया और वे अग्रणी ही रहे।

इसी एटा जनपद की पावन भूमि ने दो क्रान्तिकारियों को जन्म दिया जिनका योगदान इतिहास के पृष्ठों में सर्वदा अंकित रहेगा। उनके नाम हैं शहीद रामचरण लाल शर्मा और ठाकुर महावीर सिंह जो अंग्रेजों के अमानवीय अत्याचारों के विरुद्ध आजन्म कारावास की सजा काटते हुए अपने प्राणों की आहुति देकर . अमर हो गये।

ठाकुर महावीर सिंह शिक्षा-दीक्षा

उनका कद ऊँचा, सीना चौड़ा, आकर्षक झील-सी गहरी आँखें, उन्नत ललाट, सुडौल शरीर और देखने में वे सुन्दर व्यक्तित्व के धनी थे। बचपन बड़े लाड़ प्यार से गुजरा, मेधावी छात्र के रूप में मैट्रिक की परीक्षा राजकीय हाई स्कूल एटा से पास कर ली थी।

1925 में उन्होंने डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर में प्रवेश अध्ययन प्रारम्भ कर दिया। कानपुर जनपद, बिठूर के नाना साहेब, रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे जैसे महान बलिदानियों की नगरी में कुँवर महावीर सिंह के खून में नया जोश उभरा।

गणेश शंकर विद्यार्थी का कानुपर जिसने ‘प्रताप’ नामक पत्र से स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों में जागृति में पैदा की लेखकों, पत्रकारों और देशभक्तों को मातृभूमि पर मर मिटने की प्रेरणा दी, राष्ट्रीयता की लहर पैदा की, राष्ट्रीय एकता के लिए बलिदान तक किया।

ठाकुर महावीर सिंह क्रांतिकारी कैसे बने

1921 में असहयोग आन्दोलनकारियों ने नाना प्रकार की यातनाएँ सही। जहाँ सरोजिनी नायडू भारत कोकिला ने 1925 में अखिल भारतीय कांग्रेस के महत्त्वपूर्ण अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। और इसी कानपुर में युग पुरुष गांधी के चरण सन् 1929 में पड़े।

इसी कानपुर में 1 दिसम्बर, 1930 में भारत को अंग्रेजी शासन से मुक्त देखनेवाले क्रान्तिकारी सालिग राम शुक्ल ने पुलिस कप्तान ने पर गोलियों की बौछार डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर के छात्रावास के निकट कर अनेक पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतारा और शहीद हो गया था।

ऐसे कानपुर में ठाकुर महावीर सिंह कैसे अछूते रह सकते थे। वे अपने छात्र जीवन में ही क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गये। इस सन्दर्भ में बड़ा रोचक प्रसंग है – ‘पिता का पत्र पुत्र के नाम’ में।

सन् 1926 की घटना है। पिता ने पुत्र को सूचित किया कि विवाह की व्यवस्था पूरी हो चुकी है। कुँवर बड़े परेशान थे, शादी करना नहीं चाहते थे। मित्र शिव वर्मा से परामर्श करने पर उन्होंने राय दी कि पिता को साफ स्पष्ट शब्दों में स्थिति प्रकट कर दो, छुपाना अनुचित है।

कुँवर जी ने पिता को लिख दिया कि वह विवाह करने का इच्छुक नहीं है। पिता का उत्तर पुत्र को मिला। मूल पत्र अत्यन्त ही मार्मिक एवं पठनीय है। ‘शादी की बात जहाँ चल रही थी, उन्हें आज उत्तर लिख दिया है।

निश्चित रहो, मैं ऐसा कोई काम नहीं करूँगा जो तुम्हारे मार्ग में कोई बाधक हो। ‘देश की सेवा का जो मार्ग तुमने चुना है वह तपस्या, त्याग और कठिनाइयों भरा मार्ग है। लेकिन, जब उस पर चल ही पड़े हो तो पीछे न मुड़ना, साथियों को धोखा मत देना और अपने बूढ़े पिता के नाम का ख्याल रखना।

तुम जहाँ भी रहोगे मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ रहेगा। पिता के उत्साहवर्धक पत्र ने कुँवर महावीर सिंह का जीवन ही बदल डाला। तुम्हारा पिता’ यह तरुण छात्र तन, मन, धन से क्रान्तिकारी संगठन से पूर्ण रूपेण जुड़ गया।

कानपुर से प्रकाशित होनेवाले ‘प्रताप’ में अमर शहीद भगत सिंह ने बलवन्त सिंह के नाम से कार्य किया तो महावीर सिंह से उनका परिचय होते ही प्रगाढ़ता में बदल गया। कानपुर क्रान्तिकारियों की कर्मस्थली कही जा सकती है जहाँ बटुकेश्वर दत्त का निवास स्थान था।

वे चन्द्रशेखर, बटुकेश्वर दत्त के भी सम्पर्क में जब आये तो गुप्त योजनाओं में सक्रिय भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। आत्मविश्वास, निष्ठा, त्याग और मनोबल के कारण अपने सहयोगियों का पूरा समर्थन और आस्था भी कुछ ही समय पश्चात् अर्जित कर ली।

विदेशी शासकों के विरुद्ध कानपुर के क्राइस्ट चर्च कॉलेज पर जब तिरंगा फहराने के लिए शहीद सालिगराम शुक्ल बढ़े तो महावीर सिंह का हृदय गद्गद हो उठा। उन्हें विश्वास होने लगा था कि अंग्रेज अधिक दिनों तक भारतीयों को गुलाम बनाकर रख नहीं सकते।

क्रान्तिकारी महावीर सिंह ने सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद के साथ ‘सांडर्स वध’ और ‘पंजाब नेशनल बैंक कांड’ में योजनाओं को क्रियान्वित करने में बड़े उत्साह और धैर्यपूर्वक सहयोग दिया।

जब बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह ने असेम्बली हाल में बम फेंका और फणीन्द्र घोष सरकारी गवाह बन गये तो अन्य क्रान्तिकारी सहयोगियों के साथ इन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। कुँवर महावीर सिंह ने जेल प्रवास में कभी समझौता नहीं किया।

मुकदमे के दौरान जेल में क्रान्तिकारियों के साथ दुर्व्यवहार के विरोध में कुँवर महावीर सिंह ने अनशन प्रारम्भ करा दिया। दस दिन जेल अधिकारी मौन नाटक देखते रहे। इसके पश्चात् जेल अधिकारियों ने बलात् कैदियों को दूध पिलाना शुरू किया।

आठ-दस बलवान सिपाही या कैदी एक-एक अनशनकारी को जमीन पर पटककर काबू करता और फिर जेल का डॉक्टर उन्हें नली से दूध पिलाता। अनशनकारी मुँह के रास्ते यदि नली जाने में कठिनाई करता तो उसकी नाक के रास्ते नली उतार दूध दिया जाता जो बड़ा पीड़ाप्रद भी था।

महावीर सिंह ने 62 दिनों तक अनशन रखा मगर इस धींगा-मस्ती का उत्तर मल्ल युद्ध से देते और इन तमाम दिनों में आध घंटे से कम समय में आठ-दस वे मुस्टंडों का गिरोह कभी दूध की नली अन्दर प्रवेश नहीं करा पाता था। महावीर सिंह को काबू करना कठिन जान डॉक्टर परेशान होकर थक जाता। एक ओर अकेले महावीर दूसरी ओर मुस्टंडों की पहलवानी, अच्छी-खासी सीनाजोरी थी।

सजा होने के पश्चात् कुछ दिनों के लिए जेल से इनको बदलकर मद्रास प्रान्त की बेलाही सेंट्रल जेल भिजवाया गया। वहाँ के जेल अधिकारी हथकड़ियाँ-बेड़ियाँ डालकर कैदियों से बलात् नियम पालन कराते थे। यहाँ की घटना भी बड़ी रोचक और उत्साहवर्धक है।

इस जेल का सुपरिटेंडेंट कैदियों को सुधारने के लिए उनके चेहरों पर मुक्केबाजी का नित्य अभ्यास करने का आदी था। एक दिन वह जेल में घूमता हुआ ठाकुर महावीर सिंह की बैरक के निकट से गुजरा।

उसके हाथों में मुक्केबाजी की खुजलाहट हुई तो वार्डरों को आदेश दिया कि वे महावीर सिंह को कोठरी से बाहर निकालें। दो वार्डरों ने महावीर सिंह का एक हाथ पकड़ा और दो ने दूसरा और उन्हें जबरन बाहर घसीटते हुए अंग्रेज सुपरिंटेंडेंट के सम्मुख खड़ा किया। उस समय कोठरी में उनके हाथों में हथकड़ी-पैरों में बेड़ियाँ नहीं थीं।

जेल अधिकारी ने अपनी पूरी ताकत से महावीर सिंह पर मुक्केबाजी का अभ्यास करना शुरू कर दिया। महावीर सिंह ने अपना दायाँ हाथ झटका मार छुड़ा लिया और अपनी भरपूर मुट्ठी का ऐसा भीषण मुक्का उसके मुँह पर मारा कि हाथ-पैर बँधे कैदियों पर मुक्केबाजी का अभ्यासी जेल अधिकारी की आँखों से दिन में तारे नजर आ गये।

वह लड़खड़ाता हुआ दुर्घटनास्थल से पाँच कदम पीछे हट गया। इसके दंडस्वरूप महावीर सिंह को 30 बेतों की सजा हुई मगर जेल अधिकारी का मुक्का अभ्यास समाप्त हो गया। कैदियों को राहत मिली। ठाकुर महावीर सिंह इस जेल में कैदियों के लिए भगवान बनकर गये थे।

जेलों में अंग्रेजों की यातनाएँ देने का तरीका बड़ा ही अमानवीय होता। पशुओं से भी बदतर जिन्दगी जीने पर उन्हें विवश किया जाता। ऐसे ही अधिकारियों के लिए फतेहगढ़ जेल में मणीन्द्र नाथ बनर्जी शहीद हुए। आगरा जेल में योगेशचन्द्र चटर्जी ने पहली बार 141 दिन और दूसरी बार 111 दिनों का उपवास किया तो नौकरशाही कुछ झुकी मगर क्रान्तिकारियों पर बड़े जुल्म करती रही। इसके बाद सन् 1933 में ठाकुर महावीर सिंह को अंडमान भिजवा दिया गया।

अंग्रेजों ने अंडमान द्वीप समूह के पोर्टब्लेयर में एक जेल बनायी थी जहाँ आजन्म कारावास पाये हुए या खतरनाक प्रकार के कैदियों को भेजा जाता। बहुत-से क्रान्तिकारी जब अपनी मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करते तो उनकी मानसिक स्थिति कैसी रहती इसका वर्णन विजय कुमार सिन्हा ने अपने पुस्तक में किया है

अपनी मातृभूमि से विदाई बड़ी कष्टप्रद, दुखदायी एवं विचित्र अनुभव था चूँकि राष्ट्रीयता की भावुकता का इससे कोई सम्बन्ध प्रतीत नहीं होता था। अंडमान आये अन्य सहयोगी भी यहाँ आने को उतना ही कष्टप्रद एवं दुखदायी मानते हैं जब उनसे इस सन्दर्भ में जानकारी चाही।

अनेक सहयोगियों की आँखों में भारतीय समुद्री तटों को छोड़ते हुए भी छलछलाते अश्रुकण थे जब मातृभूमि के उन्होंने अन्तिम दर्शन किये थे। एक कैदी ने बतलाया उसने अपनी मुट्ठी में मिट्टी उठाकर सुरक्षित कैद कर ली जिसे काफी समय जेल में एक शीशी में बन्द कर रखा क्योंकि यह उस मातृभूमि की धूल थी जिसे चूमने का सौभाग्य भी सम्भवतः कभी न मिलेगी।’

अंडमान का जेल ही वस्तुतः कालापानी अर्थात् ‘नरक’ था। निर्दयी जेलर, सिपाही, जमादार कैदी के पहुँचते ही यातनाएँ शुरू कर देते। प्रतिदिन कोल्हू पर 30 पौंड नारियल तेल एक आदमी को निकालना अनिवार्य था।

सभी को कठिन काम करना था बलवान हो या कमजोर आराम करने वालों की माँ-बहिनों की गन्दी गालियाँ, जूतों की ठोकरें पड़तीं। खाने-पीने, नहाने-धोने, मल-मूत्र त्यागने पर पाबन्दी होती। अमानुषिक अत्याचारों से ऊबकर पं. परमानन्द और आशुतोष लाहिड़ी ने जेलर को जमीन पर पटक दिया तो तीस-तीस बेंत लगाये गये।

राजनैतिक कैदियों ने सुविधाओं के लिए अनशन किया। अनेक हड़ताल के दौरान शहीद हो गये। जुल्म यथावत् जारी थे। इन्दुभूषण राय ने आत्महत्या कर ली और उल्लासकर दत्त पागल हो गया यहाँ के अमानुषिक अत्याचारों के कारण। यतीन्द्रनाथ दास भी ऐसे ही शहीद हो गये।

‘छल, कपट, क्रूरता के बल पर भारत पर शासन करनेवाले अंग्रेज सभ्य और ईमानदार थे मगर देश को आजाद कराने के लिए आवाज उठानेवाले चोर, डाकू, आतंकवादी और हिंसक बताकर उन्हें कालेपानी की सजा दे अंडमान भेजा गया है। इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा?’

ठाकुर महावीर सिंह ने अंडमान में 33 क्रान्तिकारियों के साथ अधिकारों के लिए अनशन शुरू किया। जेल अधिकारियों ने छठे दिन से ही बलात् दूध पिलाना शुरू किया। 8-10 पठान कैदियों और दो अनाड़ी डॉक्टरों ने मिलकर भोजन पहुँचाने के लिए बलातू रबड़ की नली नाक में उतारी, महावीर सिंह ने प्रतिरोध किया, रबड़ की नली का दूध आमाशय में न जाकर फेफड़ों में घुस गया

महावीर सिंह जानते रहे मृत्यु निश्चित है, वे चुपचाप पीड़ा सहकर दूध उतरवाते रहे- वे जानते थे कि मृत्यु बगैर अनशन सफल नहीं होगा। डॉक्टरों ने नब्ज पर अंगुली रखी, वह गिरती जा रही थी। स्ट्रेचर पर डाल अस्पताल भेजा गया।

किन्तु ठाकुर महावीर सिंह की आत्मा शरीर रूपी पिंजड़े को छोड़ 17-मई-93 को स्वर्ग की ओर उड़ चली। ठाकुर महावीर सिंह के शव को भारी पत्थरों से बाँध रात के गहन अन्धकार में समुद्र में डुबो दिया गया। क्रान्तिकारियों के इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

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