तुलसीदास का जीवन परिचय? तुलसीदास जी का जन्म कहा हुआ था?

तुलसीदास का जीवन परिचय (Tulsidas Ka Jeevan Parichay), विश्रुत राम भक्त, महाकवि, समन्वयी, समाज सुधारक और लोक-नायक गोस्वामी तुलसीदास भारत के महापुरुषों में अग्रगण्य हैं। उन्होंने राजा राम को लोक में ब्रह्मराम के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने हनुमान को लोक देवता के रूप में पूज्य बनाया। तुलसीदास जी का जन्म कहा हुआ था के बारे में जानेंगे।

तुलसीदास का जीवन परिचय (Tulsidas Ka Jeevan Parichay)

तुलसीदास का जीवन परिचय
तुलसीदास का जीवन परिचय (Tulsidas Ka Jeevan Parichay)

तुलसीदास का जीवन परिचय (Tulsidas Ka Jeevan Parichay)

उनके द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ हिंदी का सर्वोत्तम महाकाव्य है। यह महाकाव्य न केवल काव्य के रूप में, अपितु धर्मग्रंथ के रूप में भी लोकप्रिय है। तुलसीदास हिंदी के प्रथम कवि हैं, जिसने विद्वानों के साथ ही जन सामान्य को भी पूरी तरह प्रभावित किया है।

इसीलिए उन्हें महाकवि ही नहीं, विश्वकवि माना जाता है। उन्होंने राम राज्य की ऐसी कल्पना की, जिसे आदर्श राज्य माना । सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि तुलसी दास का जीवन यह तथ्य उजागर करता है कि किस प्रकार एक उपेक्षित और आश्रयहीन बालक अपनी प्रतिभा से लोक पूज्य बनता है। तुलसीदास की राम-भक्ति और लोकाराधना सर्वथा स्तुत्य है।

तुलसीदास का जन्म

तुलसीदास के जन्म स्थान और समय के संबंध में विद्वानों में अत्यधिक मतभेद है। किंतु सभी मान्यताओं का परिहार कर बांदा जिले के राजापुर को तुलसीदास का जन्म स्थान मान लिया गया है। वहीं तुलसी-स्मारक का निर्माण हुआ है।

उनकी जन्मतिथि का समय सं. 1554 से सं. 1600 तक विवादित रहा है। अब उसे भी सं. 1589 माना गया है। उनकी जन्मतिथि श्रावण शुक्ल सप्तमी और निधन तिथि श्रावण कृष्ण तीज शनिवार सं. 1680 मान्य है। इसी तिथि को तुलसीदास के मित्र टोडर राय का परिवार महाकवि के नाम पर अन्नदान करता है। महाकवि के निधन के संबंध में एक दोहा प्रसिद्ध है-

संवत सोरह सौ असी, असी गंग के तीर ।
श्रावण कृष्णा तीज शनि, तुलसी तज्यौ शरीर ।।

जनश्रुति है कि तुलसीदास का जन्म अभुक्त मूल नक्षत्र में हुआ था। इसे माता-पिता के लिए अमंगलकारी माना गया। फलतः पिता ने बालक को त्याग दिया। तुलसीदास को उनकी माता ने अपनी दासी मुनिया को पालने के लिए दे दिया।

पांच वर्ष के पश्चात् मुनिया का देहांत हो गया। बालक को पिता ने आश्रय नहीं दिया। बालक दर-दर ठोकरें खाने लगा। भिक्षाटन कर वह अपनी उदरपूर्ति करने लगा। तुलसीदास ने अपनी इस स्थिति का वर्णन किया है- ‘तनुजन्यो कुटिल कीट ज्यों, तज्यो मातु पिता हूं।’

‘बारे ते ललात, बिललात द्वार-द्वार दीन ज्यों, जानत हौं चारि फल चार ही चनक को। इसी निराश्रित अवस्था में बालक तुलसी की भेंट स्वामी नरहरिदास से हुई। उन्होंने तुलसी को शिक्षा-दीक्षा दी। तुलसी ने स्वामी से ही राम कथा सुनी।

कुछ समय पश्चात् तुलसीदास काशी आए और उस समय के प्रसिद्ध महात्मा शेषसनातन जी से पंद्रह वर्षों तक वेद, वेदांग पुराण, दर्शन आदि का अध्ययन किया। अध्ययन के पश्चात् तुलसीदास अपने जन्म स्थान राजापुर आए।

उनके परिवार में कोई जीवित नहीं बचा था। घर भी गिर गया था। इसी बीच यमुना पार के एक ब्राह्मण की दृष्टि तुलसीदास पर पड़ी। वे तुलसीदास की विद्या और शील से प्रभावित हुए। उन्होंने अपनी कन्या रत्नावली से तुलसीदास का विवाह कर दिया। तुलसीदास रत्नावली के प्रेम में रम गए।

रत्नावली के मैके की घटना

एक बार रत्नावली अपने मैके गई। उसके वियोग में बेचैन तुलसीदास बाढ़ से उफनाई नदी को पार कर रत्नावली के मैके पहुंचे। रत्नावली ने तुलसीदास को इस कार्य के लिए फटकारा। उसने कहा कि जितना प्रेम मेरे अस्थि-चर्म के शरीर से है, यदि उतना ईश्वर के प्रति होता, तो आपको मुक्ति मिल जाती-

लाज न आए आपको, दौरे आएहु साथ ।
धिक-धिक ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ ।।
अस्थि चर्ममय देह मम, तामै जैसी प्रीति ।
तैसी जौ श्रीराम महं होति न तौ भवभीति ।।

पत्नी का यह कथन तुलसीदास को ऐसा लगा कि वे काशी आकर विरक्त हो गए। काशी से तीर्थाटन पर चारों धामों की यात्रा से लौटकर वे चित्रकूट आए। वहां से अयोध्या आकर सं. 1631 वि. में ‘रामचरितमानस’ की रचना में प्रवृत्त हुए। इस ग्रंथ की पूर्णाहुति दो वर्ष सात महीनों में हुई। इसके पश्चात् तुलसीदास अधिकांश समय काशी में ही रहे।

तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों के संबंध में भी विवाद है, किंतु अधिकांश विद्वान् अग्रलिखित ग्रंथों को तुलसीदास की प्रामाणिक रचनाएं मानते हैं-

  1. वैराग्य संदीपनी
  2. राम लला नहछू
  3. जानकी-मंगल
  4. पार्वती मंगल
  5. गीतावली
  6. कृष्ण गीतावली
  7. रामचरितमानस
  8. कवितावली
  9. रामाज्ञा प्रश्न
  10. विनय पत्रिका
  11. दोहावली
  12. बरवै रामायण

ध्यातव्य है कि तुलसीदास विरचित सभी बारह ग्रंथों में राम कथा और राम-यश का ही निबद्धन हुआ है। तुलसीदास एक मात्र कवि हैं, जिसने राम कथा को विभिन्न काव्य रूपों और छंदों में रचा है। ‘रामलला नहछू’, ‘जानकी मंगल और ‘पार्वती मंगल’ की रचना लोक छंदों में मांगलिक अवसरों पर स्त्रियों द्वारा गाए जाने के लिए हैं।

‘गीतावली’ और ‘विनयपत्रिका’ की रचना गेय पदों में राग-रागिनियों में गाने के लिए की गई है। ‘बरवै रामायण’ रीतिकाव्य के प्रेमियों के लिए है। ‘कवितावली’ चारण-भाटों को ध्यान में रखकर कवित्त छंद में की गई है। शकुन विचारने वालों के लिए ‘रामाज्ञा प्रश्न और नीति विशारदों के लिए ‘दोहावली की रचना हुई है।

इन सबसे अलग रामभक्ति और लोक-कल्याण के लिए ‘रामचरितमानस’ की रचना हुई है। इस प्रकार विभिन्न रुचियों के लोगों को तुलसीदास रचित काव्य परितोष देने में सक्षम है। यही कारण है कि विभिन्न रुचियों के लोगों को तुलसीदास रचित काव्य परितोष देने में सक्षम है।

यही कारण है कि पांच सौ वर्षों के अंतराल के पश्चात् भी तुलसी के काव्य की लोकप्रियता अक्षुण्ण है। तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ भारतीय मनीषा का मानक है। यद्यपि इसका प्रतिपाद्य रामभक्ति और राम का ब्रह्मत्व है, तथापि इसमें लोक-कल्याण के सभी महत्त्वपूर्ण तत्त्व निहित हैं। तुलसीदास ने स्पष्ट कहा है-

एहि महं सुभग सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पन्थाना ।
जेहि महं आदि मध्य अवसाना प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना।

(‘मानस’ में सात सोपान या कांड हैं। ये राम-भक्ति के मार्ग हैं। ‘मानस’ के आदि, मध्य और अंत में सर्वत्र राम के ब्रह्मत्व का प्रतिपादन है।) किंतु विभिन्न प्रसंगों और पात्रों के माध्यम से तुलसीदास ने लोक-कल्याण के विभिन्न उपयोगी तत्त्वों का विवेचन किया है। इसी का संकेत उन्होंने देते हुए। कहा है- ‘कहब लोकमत, वेदमत, नृपनय, निगम निचोर।

जन सामान्य के लिए बोधगम्य बनाने के विचार से ही उन्होंने ‘मानस’ की रचना लोकभाषा अवधी में दोहा-चौपाई पद्धति में की है। तुलसीदास ने ‘रामचरित मानस’ की कथा मूलरूप में संस्कृत रचित वाल्मीकीय ‘रामायण’ ली है। किंतु उन्होंने जन्म, वनवास, रावण वध चौदह बाद अयोध्या राज्य स्थापना तक उदात्त प्रसंगों को ‘मानस’ निबद्ध किया।

उन्होंने सीता-निर्वासन, सीता का पृथ्वी प्रवेश, लक्ष्मण का परित्याग और शंबूक वध जैसे प्रसंगों को इस में नहीं दिया, क्योंकि इन प्रसंगों राम के ब्रह्मत्व के संबंध में जन सामान्य भ्रमित होता। ‘मानस’ राम दिव्य चरित्र हैं। वे भक्ति के योग्य हैं।

किंतु तुलसीदास अनेक ऐसे को उपस्थित किया जो लोक के आदर्श हैं, जैसे चरित्रों में लक्ष्मण, भरत, हनुमान नारी चरित्रों कौसल्या, उर्मिला सीता मन्दोदरी ये चरित्र जीवन की विभिन्न स्थितियों सर्वोत्तम आदर्श हैं। लक्ष्मण और भरत भ्रातृत्व के मानक हनुमान स्वामिभक्ति, कौसल्या मातृत्व और सीता पत्नीत्व के आदर्श हैं।

गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरित मानस’ भक्ति को मनुष्य सहज धर्म बताया है और यही कहा है कि भक्ति के लिए गृहत्याग करने अनिवार्यता नहीं है। घर रहकर राम की भक्ति की सकती है। अनासक्त भाव से का नाम-स्मरण करना चाहिए।

राम नाम का बताते हुए वे कहते कि ‘नाम जपत मंगल दिसि दसहू।’ इस संबंध उन्होंने ‘नवधा भक्ति’ का विस्तार से वर्णन किया है। राम का सेवक मानकर भक्ति करने ही मुक्ति प्राप्त होती यही बात काकभुशुण्डी ने गरुड़ कही है, ‘सेवक सेव्य भाव बिनु भव तरिय उदगारि।’ उन्होंने विभिन्न प्रसंगों भक्ति और के का वर्णन किया है। लोक में समादृत ‘रामचरित मानस’ का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राम राज्य का वर्णन उसमें आदर्श राजा और आदर्श राज व्यवस्था का वर्णन हुए गोस्वामी कहते हैं

‘रामचरित मानस’ लोकप्रियता का बड़ा कारण उसमें निहित समन्वय प्रयास तुलसीदास जिस समय काव्य-रचना कर थे, उस समय भारतीय बाह्य और आंतरिक कारणों से अव्यवस्थित हो गया था।

मुगलों हिंदुओं को प्रकार से पीड़ित रखा था। दूसरी ओर विभिन्न हिंदू और पंथों मतभेद था। तुलसीदास ने समाज व्यवस्थित करने का निश्चय को समन्वय का मार्ग अपनाया। यहां तुलसीदास विभिन्न में किए समन्वय विवेचन किया रहा है-

निर्गुण सगुण में समन्वय

तुलसीदास के पूर्व नाथ-पंथियों और कबीर ब्रह्म निर्गुण-निराकार घोषित किया था। उन्होंने अवतारवाद का खंडन और मूर्तिपूजा तथा तीर्थव्रत का उपहास किया। बाद कृष्णभक्त कवि सूरदास निर्गुण को नकार दिया। उन्होंने कहा- ‘निर्गुन कवन देस बासी’ तक कि के उपासक उद्धव गोपियों समझाने पर सगुण बनवा दिया। तुलसीदास निर्गुण और सगुण में अभेद की स्थापना की।

इस प्रकार तुलसीदास निर्गुण और सगुण ब्रह्म विवाद सुलझाया। और वैष्णव मतों में समन्वय-शिव-पूजक शैव और विष्णु-पूजक कहलाते हैं। समय में दोनों संप्रदायों अत्यधिक विद्वेष था। एक-दूसरे को अपने से मानते थे। गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरित में शैव और वैष्णवों के इस उपासक किया। सेतु बंध अवसर पर पूजा करते है-

लिंग थापि विधिवत करि पूजा।

ज्ञान, कर्म और भक्ति में समन्वय

युगों से मुक्ति के लिए तीन उपासना पद्धतियां प्रचलित थीं। तीनों अपनी पद्धति को श्रेष्ठ और सुविचारित घोषित करती थीं। ये तीनों पद्धतियां हैं-ज्ञान, कर्म और भक्ति। तुलसीदास ने इस विवाद को सुलझाने के लिए ‘रामचरित मानस’ में तीन संवादों की योजना की-

शिव-पार्वती संवाद-ज्ञान पथ
याज्ञवल्क्य भरद्वाज संवाद-कर्म पथ
काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद – भक्ति पथ

ज्ञानी, कर्मकांडी और भक्त तीनों राम की कथा रसपूर्वक कहते-सुनते हैं। राम-भक्ति में तीनों पद्धतियों का पर्यवसान हो जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने त्रिवेणी के रूपक में अपनी मान्यता को पुष्ट किया है।

उनका कहना है कि जिस प्रकार त्रिवेणी में सरस्वती, यमुना और गंगा का संगम होता है और आगे केवल गंगा ही रह जाती है। वही समुद्र में विलीन होती है। उसी तरह सरस्वती के रूप में ज्ञान-वैराग्य और यमुना के रूप में कर्मकांड गंगा रूपी भक्ति में विलीन हो जाते हैं। और यह भक्ति रूपी गंगा आराधक को समुद्र सदृश राम तक पहुंचाती है। तुलसीदास का रूपक देखिए-

रामभगति जहं सुरसरि धारा। सरसैं ब्रह्म विचार प्रचारा।।
विधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रविनंदनि बरनी।।

इस प्रकार तुलसीदास ने ज्ञान, कर्म और भक्ति- तीनों को भक्ति मार्ग के रूप में निरूपित कर उपासना के पर्यवसान को भक्ति के रूप में स्थापित किया और एक बड़े विवाद का शमन किया।

लोकमत और वेदमत में समन्वय

शास्त्रज्ञों द्वारा लोक-मान्यता की उपेक्षा कर विधि-विधान करने से लोकशास्त्र की अवज्ञा कर अपने मान्य आचारों का पालन करता था। इस अवस्था के कारण शास्त्र की महिमा धूमिल हो रही थी। तुलसीदास ने इस स्थिति लोकमत समन्वय स्थापित किया। उन्होंने ‘रामचरितमानस’ के भूमिका अंश ही घोषित किया कि उनकी कविता नदी की तरह कूलों मध्य प्रवाहित होगी। ये दोनों किनारे लोकमत और वेदमत है

तुलसीदास का लोकनायकत्व

लोकनायक का अर्थ है, लोक का नेतृत्व करने वाला वह महापुरुष जिसमें लोक का विश्वास पूर्णतया अभिव्यक्त हो। लोकनायक विवश और निराश समाज को उत्थान की ओर प्रेरित करे। इस संबंध में तुलसीदास के समय के समाज पर दृष्टिपात करते हैं, तो पाते हैं कि उस समय का समाज अव्यवस्थित और राजनीतिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से पतनशील हो गया था।

वह एक मुक्तिदाता की प्रतीक्षा में था। तुलसी ने अपने काव्य से समाज को प्रत्येक क्षेत्र में नेतृत्व प्रदान किया। समाज व्यवस्था की ओर लौटा। सभी ने तुलसीदास को लोकनायक माना। तुलसीदास द्वारा लोकनायक के रूप में किए गए कार्यों की सूची लंबी है, अतः उनमें से कुछ का ही उल्लेख किया जा रहा है।

राजनीतिक क्षेत्र में तुलसी का अवदान

तुलसीदास का अधिकांश जीवन काल अकबर के शासन काल में व्यतीत हुआ। संवत् 1662 में अकबर की मृत्यु के पश्चात् तुलसीदास ने अठारह वर्षों तक जहांगीर का शासन भी देखा। ये मुगल शासक हिंदुओं को राजनीतिक रूप में आतंकित रखते थे। ये किसी भी अपढ़ अनाड़ी को अपना सूबेदार बना देते थे और सूबेदार केवल दंड से शासन करते थे। इस स्थिति को तुलसीदास ने देखा-

गोंड़, गंवार नृपाल महि, यवन महा महिपाल ।
साम न दाम न भेद कछु केवल दंड कराल ।।

तुलसीदास अधिकांश समय काशी में ही रहे। यहीं गंगा के अस्सी घाट पर सं. 1680 वि. में वे परलोक सिधारे। तुलसीदास का जीवन परिचय

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Kamlesh Kumar

मेरा नाम कमलेश कुमार है। मैं मास्टर इन कंप्यूटर एप्लीकेशन (Master in Computer Application) में स्नातकोत्तर हूं और CanDefine.com में एडिटर के रूप में कार्य करता हूँ। मुझे इस क्षेत्र में 3 वर्ष का अनुभव है और मुझे हिंदी भाषा में काफी रुचि है। मेरे द्वारा स्वास्थ्य, कंप्यूटर, मनोरंजन, सरकारी योजना, निबंध, जीवनी, क्रिकेट आदि जैसी विभिन्न श्रेणियों पर आर्टिकल लिखता हूँ और आपको आर्टिकल में सारी जानकारी प्रदान करना मेरा उद्देश्य है।

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