दौड़ के प्रकार, दौड़ने की क्रिया एवं विधि

दौड़ एक खेल है। दौड़ के प्रकार बहुत सरे है। जो भारत में काफी लोकप्रिय है। दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन भारत के लगभग सभी राज्यों में किया जाता है। दौड़ प्रतियोगिता प्रमुख रूप से तीन प्रकार की होती है- 1. तेज दौड़, 2. मध्यम दूरी की दौड़ एवं 3. लम्बी दूरी की दौड़ तेज दौड़ में 100 मीटर से 400 मीटर तक की सभी दौड़ें आती हैं, 4×100 मीटर से 4×400 मीटर रिले दौड़ भी आती है। मध्यम दूरी की दौड़ में 800 मीटर से 1500 मीटर की दौड़ आती है। लम्बी दौड़ में 3000 मीटर, 5000 मी., 10000 मी. तथा मैराथन (Marathon) 42195 मीटर की दौड़ आती है।

दौड़ के प्रकार, दौड़ने की क्रिया एवं विधि

दौड़ के प्रकार

यह भी पढ़े – वेटलिफ्टिंग के नियम (भारोत्तोलन), श्रेणियाँ, तरीका और इससे जुड़ी जानकारी

दौड़ने की विधि

मध्यम दूरी की दौड़ में पैर के पंजे का बाहर तथा अगला भाग ज़मीन पर पहले सम्पर्क करेगा। मैराथन में पंजे के बीच का बाहरी भाग सम्पर्क करेगा। इन दोनों में घुटना ज़मीन से अधिक ऊपर नहीं उठेगा। इन दौड़ों (दौड़ के प्रकार) में अधिक तकनीक की आवश्यकता नहीं होती है। इनमें आवश्यकता होती है। कि किस प्रकार से दौड़ को दौड़ा जाए तथा दौड़ को जीतने के लिए किस प्रकार से अभ्यास किया जाए। कम दूरी की दौड़ में कम टेक्टिक्स (Tactics) की आवश्यकता होती है। अधिक दूरी की दौड़ में अधिक टेक्टिक्स (Tactics) की आवश्यकता होती है।

किसी दौड़ में अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए अथवा उसे जीतने के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखने की आवश्यकता है :-

  1. दौड़ को जीतने के लिए आपको शारीरिक रूप से स्वस्थ तथा किस प्रकार से दौड़ को पूरा किया जाए, इसका पूरा ज्ञान होना चाहिए।
  2. प्रतियोगिता के समय अपने प्रतिद्वन्द्वी को आंकने की क्षमता तथा नई उत्पन्न होने वाली स्थिति को आँकने की क्षमता अथवा उसका मूल्यांकन करने की क्षमता।
  3. अपनी योजना को कार्यान्वित करने की क्षमता।
  4. गति अच्छी होना, इंडोरेंस (Endurance) अच्छी होना, यदि दोनों में अच्छे नहीं हैं, इस दिशा में जीतना सम्भव न होगा।

किसी भी ओलम्पिक में अच्छे परिणाम की अपेक्षा दीड़ में विजय प्राप्त करना अधिक आवश्यक होता है। इसके लिए धावक को दौड़ प्रारम्भ होने से पूर्व ही योजना बनानी होती है।

छोटी दूरी की दौड़ें

ये दौड़ें कम दूरी की दौड़ें होती हैं, जैसे- 100 मी., 200 मी., 400 मी. , 4 x 100 मी. रिले दौड़ व 4 x 400 मी. रिले दौड़। इस प्रकार की दौड़ों को बैठकर स्टार्ट किया जाता है जिसे Sitting Start या Crouch Start भी कहा जाता है। ऐसी दौड़ों में स्टार्टिंग ब्लॉक (Starting Block) का प्रयोग किया जाता है। जिससे एथलीट को अच्छा स्टार्ट लेने में काफी मदद मिलती है। क्राउच स्टार्ट लेते समय Starter तीन संकेत देता है, जैसे- On your marks, Set और Gun Shot। यह तीन प्रकार का होता है : मीडियम स्टार्ट (Medium Start) तथा एलोंगेटिड स्टार्ट (Elongated Start ) ।

1. मीडियम स्टार्ट

मीडियम स्टार्ट में Starting Blocks की आपस की दूरी 16 से 21 इंच होती है। अधिकतर एलीट इस प्रकार के स्टार्ट लेते हैं। बाकी वही स्थिति (Position) होती है, जो बंच स्टार्ट (Bunch start) में होती है। इस प्रकार का स्टार्ट मध्यम कद के एथलीट लेते हैं।

2. एलोंगेटिड स्टार्ट

एलोगेटिड स्टार्ट में दोनों ब्लॉकों के बीच की दूरी 22 से 26 इंच होती है अर्थात् पिछले पैर का घुटना अगले पैर की एड़ी की लाइन में होता है। Elongated Start मुख्यतया ऊँचाई वाले एथलीट लेते हैं जिनकी टाँगें मजबूत तथा हाथ कुछ कमजोर होते हैं।

3. बंच स्टार्ट

बंच स्टार्ट में ब्लॉकों के बीच की दूरी 6 से 12 इंच पीछे होनी चाहिए। एथलीट अपने दोनों हाथों को कप के आकार में या Bridge की तरह Starting Line से पीछ रखता है। दोनों हाथ कंधों की चौड़ाई के अनुसार खुले होने चाहिए। Starter के ‘On your marks’ के संकेत पर एथलीट इस अवस्था में आ जाता है। ‘Set’ के संकेत पर नितम्बों (Hips) को थोड़ा ऊपर उठाकर, शरीर के भार को थोड़ा आगे लाता है तथा ‘Gun Shot’ के संकेत पर वह पूरी शक्ति Thrust के साथ आगे की ओर दौड़ना शुरू कर देता है। इस प्रकार का Start केवल उन्हीं एथलीट के लिए अच्छा होता है जिनकी संरचना छोटी होती हैं, हाथ शक्तिशाली व टाँगें छोटी होती हैं।

दौड़ने की क्रिया

Gun Shot’ के संकेत पर एथलीट Starting Block से Thrust लेकर कम-से-कम में अधिक-से-अधिक Speed प्राप्त करता है। ऐसा करने के लिये एथलीट को दौड़ते हुए शरीर का झुकाव आगे की ओर रखना चाहिए। उसके Strides नीचे, तेज व अधिक लम्बे नहीं होने चाहिए। उसकी कोहनियाँ लगभग 90° के कोण पर मुड़ी होनी चाहिए। हाथों की क्रिया का टाँगों की क्रिया के साथ सामंजस्य अच्छा होना चाहिए। शरीर के मध्य का भाग अधिक नहीं हिलना चाहिए। एथलीट को अपनी गति बनाए रखनी चाहिए। इसे कम नहीं होने देना चाहिए।

दौड़ समाप्ति के तरीके

1. वेगपूर्ण समाप्ति (Run Through )

इस तकनीक को प्रायः नौसिखिए एथलीट (Novice Athletes) अपनाते हैं, क्योंकि इस तकनीक में पूरे वेग से समाप्ति रेखा को पार किया जाता है और यह आसान तथा सुरक्षित भी है।

2. सीने द्वारा समाप्ति

इस तकनीक में एथलीट अन्तिम Stride में अपने ‘Torso’ को आगे झुकाता है तथा ऊपर की काल्पनिक लाइन को छूता (Touch) है। इस प्रकार की तकनीक को अनुभवी खिलाड़ी ही प्रयोग में लाते हैं।

3. कन्धे द्वारा समाप्ति

इस तकनीक में एथलीट या धावक को अपने एक कन्धे को मोड़ना पड़ता है, ताकि समाप्ति रेखा के पास उसके Torso का कोण 90 डिग्री का हो जाए। यह कार्य समाप्ति रेखा के पास अन्तिम Stride में किया जाता है। यह तकनीक केवल उच्चकोटि के अनुभवी धावक ही प्रयोग में लाते हैं।

मध्यम दूरी की दौड़ें

मध्यम दूरी की दौड़ों में 800 मी. व 1500 मी. की दौड़ें आती हैं।

1.खड़े हुए स्टार्ट लेना

मध्यम दूरी की दौड़ों में खड़े हुए स्टार्ट लेना चाहिए क्योंकि इन दौड़ों में Sitting Start का कोई लाभ नहीं होता। इसीलिये इन दौड़ों में Starter द्वारा ‘Set’ का संकेत नहीं दिया जाता। वह केवल ‘On your marks’ का संकेत देता है। इस संकेत पर सभी धावक का अगला पैर थोड़ा Bend होना चाहिए व शरीर का झुकाव आगे की ओर होना चाहिए। कोहनियाँ मुड़ी हुई तथा दोनों हाथ Relax होने चाहिए। ऐसे समय पर धावकों का ध्यान Gun Shot पर केन्द्रित होना चाहिए।

2.दौड़ का आरम्भ

आरम्भ में कुछ Strides तेजी से लेने चाहिए।

3.दौड़ की तकनीक

धावक को अपनी दौड़ अपने अभ्यास के अनुसार ही दीड़नी चाहिए। अपनी गति को संतुलित रखना चाहिए। हाथों को आगे व पीछे ले जाने की क्रिया भी संतुलित रखनी चाहिए। शरीर को पूरी दौड़ में थोड़ा relax रखना चाहिए।

4.दौड़ की समाप्ति

दौड़ के अन्त वाले भाग में पूरी शक्ति के साथ Run Through के द्वारा रेस को समाप्त करना चाहिए।

लम्बी दूरी की दौड़ें

3000 मी. स्टीपल चेज दौड़, 5000 मी., 10.000 मी., मैराथन दौड़ आदि लम्बी दूरी की दौड़ों में शामिल की जाती हैं। इन दौड़ों में प्रायः वही तकनीक प्रयोग में लाई जाती है जो मध्यम दूरी की दौड़ों में प्रयोग होती है।

बाधा दौड़

बाधा दौड़ों में 110 मी. व 400 मी. (पुरुष) तथा 100 मी. व 400 मी. (महिला) की दौड़ें शामिल की जाती हैं।

1. 100 मी. महिला बाधा दौड़

सामान्यतया धाविका 13 मी. दूर स्थित प्रथम बाधा तक की दूरी 8 Strides में पूरी कर लेती है। बाधा दौड़ में भी पहले तीन Striodes Sprinting की तरह ही होते हैं। Hurdle के पास वाला Stride छोटा लेना चाहिए जिससे Hurdle के ऊपर उछाल ठीक आता है जिनकी ऊँचाई कम हो, उन्हें Hurdle के पास वाले Stride को छोटा नहीं लेना चाहिए।

2. 110 मी. पुरुष बाधा दौड़

इस दौड़ (दौड़ के प्रकार) में पहली बाधा 13.72 मी. पर होती है एवं बीच की बाधाओं की दूरी 9.14 मी. होती है तथा अन्तिम बाधा समाप्ति रेखा से 14.2 मी. पहले होती है। इस दौड़ में धावक पहली बाधा तक 8 कदमों में पहुँच जाता है। Starting Block पर बैठते समय अधिक शक्ति वाले पैर को आगे रखा जाता है। दौड़ते हुए कदमों के बीच का अन्तर बढ़ता जाता है, परन्तु अन्तिम कदम उछाल से लगभग 10 से. मी. छोटा होना चाहिए। दौड़ने वाले धावक को आम दौड़ों की अपेक्षा अपना पूरा पैर जमीन पर न रखकर केवल पैर का पंजा ही जमीन पर रखना होता है और दौड़ते समय घुटने अपेक्षाकृत अधिक ऊपर हो जाते हैं।

जब बाधा को पार किया जाए उस समय उछाल पैर को सीधा अगले पैर के घुटने से ऊपर उठाना चाहिए। पैर का पंजा नीचे की ओर और शरीर का हिस्सा आगे की ओर झुका रहना चाहिए। बाधा पार करने के पश्चात् पहला कदम 1.60 मी., दूसरा 2.10 मी., तीसरा 2.20 मी. के अंतर पर पड़ना चाहिए।

3. 400 मी. की पुरुष व महिला दौड़

100 मीटर की बाधा दौड़ (दौड़ के प्रकार) में दौड़ने वाले को अपने कदमों के बीच तालमेल बिठाने में बड़ी कठिनाई आती है। शुरू करने से पहले बाधा के बीच की दूरी को दौड़ने वाला या वाली 21 से 23 कदमों में पूरा कर लेते हैं और बाधा के मध्य में 13, 15, 17 कदम रखते हैं। कुछ दौड़ने वाले शुरू में 14 और बाद में 16 कदमों में उस दूरी को पूरा करते हैं। यदि उछाल दाहिने पैर से लिया जाए तो लाभ अधिक होगा। आमतौर पर उछाल 2 मी. से लिया जाता है और जब पहला कदम बाधा को पार करके जमीन पर पड़ता है, तो वह 1.20 मी. का होता है। इसमें प्रयोग की जाने वाली बाकी सब तकनीकें 100 मी. या 110 मी. बाधा दौड़ वाली होती हैं।

दौड़ की समाप्ति

दौड़ के आरम्भ की तरह दौड़ का अन्त भी महत्वपूर्ण है। आमतौर पर धावक दौड़ इस प्रकार से समाप्त करते हैं-

1.सीने द्वारा समाप्ति

यह उस स्थिति में किया जाता है, जब Finish Line लगभग एक कदम रह गई हो। तब वह अपनी बाजुओं को नीचे तथा पीछे करके छाती को आगे बढ़ाते हुए Finish Line पर लगी हुई Tape को छूने का प्रयत्न करता है।

2.कंधे द्वारा समाप्ति

इसमें धावक एक कन्धे को आगे की ओर झुकाता हुआ उसी तरफ हाथ भी आगे बढ़ाता है तथा दूसरा कन्धा इसके विपरीत पीछे की तरफ, बढ़े हुए कन्धे से टेप को छूकर दौड़ का अन्तर है।

3.वेगपूर्ण समाप्ति

इसमें धावक का लक्ष्य, वास्तविक लक्ष्य से 8-10 मी. की दूरी पर बनता है तथा वह अपनी पूरी शक्ति से दौड़ता हुआ बिना अन्तिम लक्ष्य पर ध्यान दिये हुए सीधा आगे निकल जाता है।

रिले दौड़ (4×100 मी.)

रिले दौड़ (दौड़ के प्रकार) का अर्थ है एक स्थान से दूसरे स्थान पर दौड़ते हुए समाचार पहुँचाना। इसमें कौन धावक कितनी दूरी तय करेगा, निर्धारित नहीं होता। दौड़-कूद में एक टीम का आइटम (Item) होता है।

  • 1908 में लन्दन ओलम्पिक खेलों में मिडले रिले (Medley Relay) का प्रारम्भ हुआ था। इसमें 400 मी., 200 मी. पृथक्-पृथक् दूरियाँ धावकों को तय करनी होती थीं।
  • 1922 में पुरुष वर्ग हेतु 4×100 मी. व 4×100 मी. की दूरियों की रिले रेस हेतु दूरियाँ निर्धारित की गई।
  • 1928 में महिलाओं ने 4×100 मी. रिले दौड़ में भाग लेना प्रारम्भ किया।
  • 1972 में म्यूनिख खेलों से महिलाओं की 400 x 100 मी. की रिले दौड़ का प्रारम्भ हुआ।

प्रारम्भ में एक स्थान पर खड़े होकर बेटन को प्राप्त किया जाता था । बाद में रोचक बनाने के लिए 20 मी. की दूरी दी गई जिसमें 10 मी. आगे ब 10 मी. पीछे दी गई 4×100 मी. में 10 मी. पीछे से दौड़ा जा सकता है। परन्तु 20 मी. के अन्दर ही बदला जा सकता है।

निशाना लगाना

बेटन को प्रारम्भ से अन्त तक तेज़ी के साथ लाने के समय की बचत के लिए चेक मार्क का प्रयोग करते हैं-

1. पहला निशान

पहला निशान अतिरिक्त 10 मी. पीछे, पुरुष वर्ग के लिए 8 से 10 मी. एवं महिलाओं के लिए 9 से 10 मी. पर उस दशा में लगायेंगे जिस दशा में बाहर से दौड़ता हुआ धावक आ रहा है। यदि धावक चाप पर दौड़ता आ रहा है तो गली के अन्दर की रेखा पर और सीधी रेखा में दौड़ता आ रहा है तो बाहर की रेखा पर लगायेंगे परन्तु खड़े इसके विपरीत होंगे। अन्दर की ओर दौड़कर आने वाले से बेटन प्राप्त करने के लिए बाहर की ओर रिले दौड़ खड़े होंगे जिससे कि आप उसके पुट्ठे को जैसे ही वह निशान के ऊपर से पास करता है, देख सकें तथा उसको तेज़ी से दौड़कर जाने को स्थान भी मिल सके।

2. दूसरा निशान

दूसरे निशान का उद्देश्य यह होता है कि उस स्थान पर अपना हाथ बाहर बेटन प्राप्त करने हेतु निकालना होगा। यह स्थान अन्तिम रेखा पर होता है, जहाँ तक कि बेटन बदला जा सकता है। इससे 4 से 6 मी. पीछे पुरुष वर्ग में तथा महिलायें अधिक सुरक्षा के लिए 6 से 8 मी. पीछे बेटन प्राप्त करने हेतु निशान लगाते हैं।

दौड़ के समय खड़े होने की स्थिति –

पहला धावक बैठकर प्रारम्भ करेगा (Start लेगा। अन्य धावक दोनों पैरों को पास में रखते हुए पंजे सामने को रखेंगे। शरीर का भार पंजों पर रहेगा। दोनों एड़ियाँ ज़मीन से ऊपर उठीं होंगी। शरीर आगे को झुकी हुई दशा में कमर से मुड़ा हुआ, शरीर से कूल्हा ऊँचा होगा। केवल सिर एक ओर को मुड़ा हुआ पुट्ठे के ऊपर से पीछे से आने वाले धावक को देखेगा। जैसे ही आने वाले धावक का कूल्हा निशान के ऊपर से पास करेगा। यह धावक तेज़ी से आगे को दौड़ना प्रारम्भ कर देगा।

बेटन पास करने की विधि

  1. नीचे से ऊपर को देना (Downward sweep)
  2. ऊपर से लाकर नीचे को देना आइए, (Upward sweep) इन दोनों प्रक्रियाओं का वर्णन करें।

1. नीचे से ऊपर को बेटन देना

पहली प्रक्रिया में आगे वाला धावक अपने पुट्ठे के पास लगभग 15 से 20 से. मी. को हाथ को पीछे लाकर जिसमें अँगूठा एक ओर तथा अन्य अंगुलियां एक साथ रहेंगी, हाथ खोलेगा और आने वाला धावक बेटन को पूरा हाथ में नीचे से लाता हुआ ऊपर देगा।

2. ऊपर से ला कर नीचे का बेटन देना

दूसरी प्रक्रिया में आगे वाला धावक अपने हाथ को एक साथ पुट्ठे के पीछे से ला कर सीधा करेगा जिसमें हथेली ऊपर को रहेगी। पहली प्रक्रिया में हथेली नीचे की दशा में होगी। पीछे से दौड़कर आने वाले धावक के बीच की लगभग 1.30 मी. की दूरी इस प्रकार से तय की जाती है। इस दूरी पर टीम की विजय निर्भर करती है। अतः यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण विधि (Technique) है।

दौड़ने वाले पहले धावक के कर्तव्य

  1. पहले स्थान पर उस धावक को रखेंगे जो कि मोड़ पर अच्छा दौड़ने वाला हो तथा प्रारम्भ (Start ) में बहुत अच्छा हो तथा गलत प्रारम्भ (Foul start) न करता हो, अन्यथा दो गलतियाँ (Foul) लेने पर पूरी टीम को एक व्यक्ति की गलती से बाहर जाना होगा। प्रारम्भिक स्थान (Starting Block) को लगाते समय यह ध्यान रहे कि प्रारम्भिक स्थान के पीछे का भाग अन्दर की रेखा से मिला हुआ हो। आगे का भाग दायीं ओर को ही जिस से दौड़ के प्रारम्भ में कुछ कदम सीधी रेखा में लिये जा सकें।

बेटन को पकड़ने के लिए अँगूठा तथा आगे की उँगली या अँगूठा तथा अन्य पीछे की दो अँगुलियों से दायें हाथ में एकदम अन्तिम भाग को पकड़ेंगे।

पहले धावक को केवल तेज़ी के साथ भागना तथा अपनी गली (Lane) के अतिरिक्त दूसरे व्यक्ति क्या कर रहे हैं, नहीं देखना है। अपने अगले धावक के पास पहुँचते ही इसको निम्नलिखित दो कार्य करने होते हैं-

  1. आगे के धावक का हाथ पीछे आने पर अपना हाथ आगे बढ़ाकर अधिकतम बेटन का उसके हाथ में दे देना । (i) अपनी गति को अन्तिम 30 मी. में कम न करके उसी गति को बनाये रखना। पहला धावक मोड़ पर अन्दर दौड़ेगा तथा दूसरा धावक सीधी रेखा में बाहर से प्रारम्भ करेगा जिससे बेटन लेकर आने वाले धावक को स्थान मिल सके, वह तेज़ी में आगे वाले धावक के ऊपर जाने से बच सके। दूसरा धावक अपने हाथ को बाहर निकाल कर बेटन लेगा।
  2. दूसरे स्थान पर अधिकतम लम्बे धावक को या जो 130 मी. की दूरी में सबसे अच्छा हो, सबसे अनुभवी धावक को रखेंगे क्योंकि इस धावक को बेटन प्राप्त करना तथा आगे वाले धावक को देना दोनों कार्य करने होते हैं और यही स्थान है जहाँ पर सबसे अधिक दूरी को तय करना होता है।

बाहर जाने वाले धावक के कर्तव्य

  • (i) बेटन बदलने के स्थान एवं कहाँ से दौड़ प्रारम्भ करना है, सभी का निरीक्षण करना।
  • (ii) बाहर से आने वाले धावक द्वारा निशान (Check mark ) पार करते ही एक साथ तेज़ गति से भागना। दोनों निशान जहाँ पर आने वाले धावक के पुट्ठे को पार करते ही दौड़ प्रारम्भ करना तथा दूसरा वह स्थान जहाँ पर जा कर दायें हाथ को बाहर बेटन लेने के लिए निकाला जाता है, निशान लगाना ।
  • (iii) हाथ बाहर निकालते समय हाथ को हिलने न देना जिससे कि आने वाला धावक दो या तीन कदम के अन्दर ही बेटन हाथ में उपलब्ध करा दे।
  • (iv) किसी भी दशा में अपने लेन के बाहर न जाना। बाहर से आने वाला धावक भी जब तक सभी धावक बेटन लेकर पास नहीं हो जाते हैं, अपनी लेन में ही रहेगा।
  1. तीसरे धावक का चयन करते समय भी 130 मी. मोड़ पर दौड़कर समय लेंगे। जिसका समय सबसे अच्छा होगा उसको तीसरे स्थान पर रखेंगे। अधिकतम कम ऊँचाई के धावकों को मोड़ पर तेज़ी से मुड़ने में सुविधा रहती है। दूसरे वे तीसरे स्थान के धावकों को बेटन लेने एवं देने का बहुत ही अनुभव होना चाहिए। इन पर सबसे अधिक उत्तरदायित्व होता है। तीसरा धावक मोड़ पर अन्दर दौड़ेगा तथा दायें हाथ में बेटन लेगा।
  2. अन्तिम चौथे स्थान पर उस धावक को रखेंगे जो कि लगभग 125 मी. की दूरी को पूरा करने में सबसे अच्छा साहसी तथा बेटन पीछे मिलने पर भी दूरी को बराबर करके आगे निकलने का साहस रखता हो। यह धावक गली के बाहर वाले भाग पर भागेगा जिससे तीसरा धावक जो मोड़ पर अन्दर की ओर से आ रहा है उसको स्थान मिल सके। यह अपना निशान भी अन्दर की रेखा पर लगायेगा। बेटन अपने बायें हाथ में लेगा।

4×400 मी. दौड़

इस दौड़ में बेटन को देखकर हाथ में आगे बढ़ाकर ऊपर को हथेली करते हैं। आने वाला धावक बेटन को हाथ में देता है, परन्तु वास्तविक स्थिति यह होती है कि आने वाला धावक बहुत थका हुआ होता है, विशेषकर अन्तिम 50 मी. में। इसलिए जाने वाले धावक का कर्तव्य होता है कि वह दौड़ पूरी होते ही उसके दायें हाथ से अपने बायें हाथ में बेटन लेकर अगले कदम में दायें हाथ में लेकर दौड़ प्रारम्भ करें।

इस दौड़ में केवल 10 मी. आगे तथा 10 मी. पीछे बेटन बदलने का स्थान होता है। इसमें 10 मी. पीछे से दौड़ने की सुविधा प्राप्त नहीं होती हैं। पहले धावक को 600 मी. का स्टेगर (Stagger) अर्थात् डेढ़ स्टेगर (Stagger) प्राप्त होता है। दूसरा धावक 400 मी. के प्रारम्भ से अपनी लेन में 10 मी. पीछे व 10 मी. आगे बेटन प्राप्त करके पहले 200 मी. अपनी लेन में भागेगा। तीसरा धावक 400 मी. समाप्ति की रेखा से 10 मीटर पीछे से बेटन ले सकता है।

बेटन लेते समय यह ध्यान रहे कि बायें हाथ में बेटन लिया जाये और पुट्ठों को बाहर रखा जाये जिससे कि धक्का लगने पर बचाव हो सके। यदि दायें हाथ में बेटन लिया जाता है तब कभी-कभी धक्का लगने पर अन्दर की लेन में आने की सम्भावना रहती है, जिससे दौड़ से बाहर निकाला जा सकता है।

यह भी पढ़े – Cricket New Rules: क्रिकेट के नए नियम और क्रिकेट का इतिहास

Follow us on Google News:

Kamlesh Kumar

मेरा नाम कमलेश कुमार है। मैं मास्टर इन कंप्यूटर एप्लीकेशन (Master in Computer Application) में स्नातकोत्तर हूं और CanDefine.com में एडिटर के रूप में कार्य करता हूँ। मुझे इस क्षेत्र में 3 वर्ष का अनुभव है और मुझे हिंदी भाषा में काफी रुचि है। मेरे द्वारा स्वास्थ्य, कंप्यूटर, मनोरंजन, सरकारी योजना, निबंध, जीवनी, क्रिकेट आदि जैसी विभिन्न श्रेणियों पर आर्टिकल लिखता हूँ और आपको आर्टिकल में सारी जानकारी प्रदान करना मेरा उद्देश्य है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *