त्वचा रोग कितने प्रकार के होते हैं, कारण, लक्षण, आहार और यौगिक चिकित्सा

त्वचा रोग कितने प्रकार के होते हैं, कारण, लक्षण, आहार और यौगिक चिकित्सा। मानव देह पर मढ़ी हुई यही त्वचा (Skin Diseases) मानवीय संवेदनाओं एवं आकर्षणों का आधार होने के साथ-साथ प्रकृति की एक अनूठी एवं जटिल संरचना है। ऐसा कहा जाता है कि ‘सुन्दरता सिर्फ चमड़ी जितनी गहरी होती है। हमारी भौतिक भिन्नतायें एवं व्यक्तित्व की विशेषताऐं सभी त्वचा के गुण-धर्म हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति एवं योगी की त्वचा चमक लिये होती है, जबकि बीमार व्यक्ति की पीली एवं प्राणहीन मालूम होती है।

त्वचा रोग कितने प्रकार के होते हैं

त्वचा रोग कितने प्रकार के होते हैं

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विभिन्न अंगों की तरह यह त्वचा भी विशेष प्रकार की कोशिकाओं के संगठन से बना एक महत्वपूर्ण अंग है जो भौतिक एवं चयापचयी प्रक्रियाओं में सक्रिय योगदान करती है।

त्वचा की संरचना

यदि सूक्ष्मदर्शी यंत्र के द्वारा देखा जाये तो त्वचा (त्वचा रोग कितने प्रकार के होते हैं) एक के ऊपर एक जमी हुई कोशिकाओं की तहों के रूप में दिखती है इन विभिन्न तहों का औषधि विज्ञान के ‘अनुसार विभिन्न नाम एवं कार्य होता है। ऊपर वाली तहों में लगातार घिसती एवं मृतप्रायः होकर झड़ती रहती है।

इनके स्थान पर नीचे वाली तह ऊपर आकर विस्थापित होती जाती है, इन झड़ने वाली कोशिकाओं के माध्यम से अवांछित तत्वों का निष्कासन होता रहता है। इस प्रकार सतत् क्रियाशील तह के नीचे एक और मजबूत एवं निष्क्रिय तह रहती है जिसे ‘डर्मिस’ कहा जाता है। इस तह में सूक्ष्म रक्त संवाहिनियाँ, संवेदी तंत्रिकाऐं तथा तन्तु अवस्थित रहते हैं।

त्वचा के कार्य

जैसा कि पहले बताया गया है कि त्वचा भी अन्य अंगों की तरह हमारे शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है। अतः इस नाते इसके विभिन्न कार्यों के विषय में जान लेना आवश्यक है-

1. सुरक्षा

त्वचा हमारे शरीर के लिए एक उपयोगी दीवार की तरह सुरक्षा का कार्य करती है। यह बाहर के कीटाणुओं एवं विषाणुओं को अन्दर प्रवेश करने से रोकती है। त्वचा की तैलीय तह शरीर से जल के वाष्पीकरण को रोकती है। शरीर के जिस स्थान पर घर्षण एवं वजन अधिक पड़ता है तो वहाँ की त्वचा मोटी होकर एक सुरक्षा कवच का कार्य करती है।

2. तापमान का नियंत्रण

त्वचा शरीर को ठंड में गर्म तथा गर्मी में ठण्डा रखती है। त्वचा के नीचे की चर्बी शरीर के तापमान को ठंड में सुरक्षित रखती है तथा रक्त वाहिनियाँ संकुचित होकर ताप के ह्रास से बचाती हैं। इसी प्रकार जब गर्मी के दिनों में शरीर से पसीना निकलने के कारण शरीर का तापमान कम हो जाता है तो इस समय रक्त वाहिनियाँ फैल जाती हैं जिसके कारण अधिक रक्त सतह पर आ जाता है ताकि वह जल्दी ठण्डा हो सके।

3. उत्सर्जन

जिस प्रकार आँतें, गुर्दे (किडनी), फेफड़े, अवांछित तत्वों का निष्कासन करते हैं, उसी प्रकार हमारी त्वचा भी अनेक विषाक्त पदार्थ, पानी, लवण का उत्सर्जन करती रहती है।

4. अवशोषण

सूर्य की किरणों को त्वचा अवशोषित कर विटामिन ‘डी’ का निर्माण करती है जो शरीर के लिए उपयोगी है। अनेक प्रकार की औषधियाँ त्वचा पर मल देने से वह उन्हें सोख (अवशोषण) करके शरीर के आन्तरिक अंगों को लाभ पहुँचाती है।

5. चयापचय

हमारी सतत् क्रियाशील त्वचा में कार्बोहाईड्रेट, प्रोटीन, वसा तथा हार्मोन्स का चयापचय अनवरत रूप से चलता रहता है।

6. संवेदनाऐं

हमारी त्वचा की भित्तियाँ संवेदनशील स्नायु से युक्त भावनाओं एवं संवेदनाओं का त्वचा से अति निकट का सम्बन्ध है। यह कहना गलत नहीं होगा कि त्वचा भावनाओं का दर्पण है। हमारी त्वचा का सम्पर्क बाहरी वातावरण से एवं अनेक पदार्थों से लगातार बना रहता है। त्वचा की सतह पर एक-एक इंच में करोड़ों जीवाणु छिपे रहते हैं. जिनमें कुछ खतरनाक होते हैं जो शरीर को नुकसान पहुँचा सकते हैं। पर, त्वचा की सक्रिय प्रतिरोधक क्षमता के कारण वे रोग उत्पन्न नहीं कर पाते। हाँ, किन्हीं कारणों से त्वचा की क्षमता कमजोर पड़ जाती है तो वे खतरनाक कीटाणु रोग के लक्षण प्रकट कर देते हैं।

उत्पन्न होने वाले चर्म रोग, कारण एवं लक्षण / त्वचा रोग कितने प्रकार के होते हैं

1. फोड़े-फुन्सियाँ

कारण

जब शरीर में दूषित विजातीय पदार्थों का निष्कासन अवरुद्ध हो जाता है तब रोमकूप में स्टेफ्लोकोकस एल्वस तथा स्टेफ्लोकोकस साइट्स फोड़े की नींव डालते हैं । बाद में अन्य कीटाणु स्टेफ्लोकोकस, पायोजेनिन, ऑरियस तेजी से बढ़कर घाव को उग्र बना देते हैं।

बालों के टूटने से त्वचा के अन्दर गड्ढे बन जाते हैं जिनमें बैक्टीरियम स्टेफ्लोकोकस ओरियस अन्दर प्रवेश करके फोड़ा उत्पन्न कर देते हैं शरीर विषाक्रान्त होने पर पेशाब, पाखाना तथा पसीने से दूषित वस्त्रों का सम्पर्क त्वचा के किसी भी अंग में होने से नये फोड़े हो जाते हैं।

लक्षण

प्राय: रोम कूपों की जड़ों में प्रारम्भ में तीव्र रूप में लाल, राई के दाने से लेकर मटर के बराबर, सूजन वाली ग्रन्थी बन जाती है। सूजन के न बैठने पर चार-पाँच दिनों में उनमें पीव बन जाती है, त्वचा फट जाती है। उन स्थानों को छूने में दर्द होता है जब तक पीव कील के रूप में निकल नहीं जाती तब तक घाव सूखता नहीं है। सामान्य फोड़े कष्टसाध्य रोग तो अवश्य हैं। परन्तु, असाध्य नहीं हैं। जब यह होंठ पर होते हैं तो सेप्टीसिमिया के कारण रोमी की मृत्यु भी हो सकती है।

2. जहरवाद या कार्बकल

कारण

सामान्य फोड़ों की तरह कार्बकल के उत्पन्न होने का कारण भी बैक्टीरियम स्टफ्लोकोकस, पायोजेनीस ऑरियस ही हैं। जब शरीर में दूषित विजातीय पदार्थ, कूड़ा-करकट का जमघट पराकाष्ठा तक पहुँच जाता है तब खून अम्लीय तथा प्रदूषित हो जाता है तथा रोग निरोधक क्षमता क्षीण हो जाती है और इस प्रकार के फोड़े उत्पन्न हो जाते हैं। मधुमेह के रोगियों में इस प्रकार के फोड़े ज्यादा होते हैं। ऐसे फोड़े होते ही रक्त तथा मूत्र में शर्करा की जाँच अवश्य करायें।

लक्षण

सामान्य फोड़े में तो एक ही मुँह होता है, पर इस प्रकार के फोड़े एक से अधिक मुँह होते हैं। यह त्वचा के नीचे फैला रहता है। वैसे तो यह में पीठ, ग्रीवा, जंघा तथा माथे पर ज्यादातर होता है पर शरीर के किसी भाग में इसके होने की सम्भावना नकारी नहीं जा सकती। जब यह फोड़ा निकलने को होता है तो सर्वप्रथम उस स्थान में त्वचा पर लाली आ जाती है। वह जगह सख्त एवं गर्म हो जाती है। यही लाली, सूजन एवं दर्द चारों तरफ के तन्तुओं में फैल जाती है।

रोगी को बुखार आ जाता है तथा उसे कमजोरी महसूस होती है। पाँच-छः दिनों में उस स्थान पर कई छोटे-छोटे मुँह बन जाते हैं, उनमें पीब भर जाता है। आठ-दस दिनों में वहाँ के तन्तु संक्रमित होकर नष्ट हो जाते हैं। उनके चारों ओर एक बड़ा-सा चक्र पैदा हो जाता है।

3. सामान्य घाव

कारण

वस्तुत: जिस अंग की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है तो वहाँ कीटाणुओं का प्रभाव बढ़ जाता है और फोड़े-फुन्सी या घाव हो जाता है। स्टेफिलोकोकी नामक कीटाणु के कारण ही ऐसा होता है। परन्तु कभी-कभी फोड़ा या घाव ट्यूबरकल आर्गेनिज्म के कारण भी उत्पन्न हो जाते हैं।

लक्षण

शरीर के किसी भी हिस्से में पीवयुक्त फोड़ा-फुंसी तथा पिण्ड रचना को घाव कहते हैं। इसमें भी वह स्थान सुर्ख, सख्त एवं दर्दयुक्त होता है। कब्ज, अनिद्रा, सिर दर्द, बुखार, सफेद जीभ आदि लक्षण प्रकट होते हैं। धीरे धीरे त्वचा आक्रान्त एवं पतली होकर फट जाती है, पीले रंग का पीब बाहर निकलता है जिसके संक्रमण से अन्य जगहों पर भी फोड़े-फुन्सी, घाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

4. शैय्या व्रण (बैड सोर)

जब किसी व्यक्ति को दुर्घटना, लकवा अथवा शारीरिक असाध्य रोगों के कारण ज्यादा दिन तक बिस्तर पर ही पड़े रहना पड़ता है तो पीठ की ओर जो घाव हो जाते हैं, उन्हें शैय्या व्रण (बैड सोर) कहते हैं। अधिकांशतः यह घाव अस्थि वाले हिस्से में जैसे: नितम्ब, कन्धे के पीछे, जंघा, गुल्फ तथा कोहनी पर बार बार बिस्तर की रगड़ एवं दबाव के कारण होते हैं।

ऐसी स्थिति में यह विशेष तौर पर ध्यान में रखना चाहिये कि रोगी का बिस्तर सिकुड़ने न पाये और न बिस्तर पर रोटी या भोजन का कोई टुकड़ा पड़ा रह जाये। रोगी को थोड़े-थोड़े समय के अन्तराल में करवट दिलाते रहें। नीम के पानी से अथवा डिटॉल मिलाकर उसके शरीर को स्पंज करें।

5. दाद, खाज, खुजली

यह एक प्रकार का फफूँदी द्वारा संक्रमण है जो अक्सर गीले रहने वाले स्थानों पर जहाँ त्वचा की तहें आपस में रगड़ती रहती हैं, होता है। जैसे-जंघामूल, काँख, पैरों की उँगलियों के पोरों के बीच में। नाइलोन आदि कृत्रिम वस्त्रों तथा गीले अन्त:वस्त्र पहनने के कारण होता है। शरीर के उक्त स्थानों पर त्वचा पर चकत्ते बन जाते हैं जिनमें तीव्र खुजली होती है। वस्तुत: यह रोग आन्तरिक अशुद्धियों की अधिकता तथा कोशिकीय चयापचय द्वारा उत्पन्न अम्लीय पदार्थों का जमाव होने की सूचना देता है। घाव को सूखा तथा धूप एवं हवा में खुला रखना चाहिये । गीले कपड़े अधिक समय तक न पहने, पसीने को बार-बार अच्छी तरह पौंछते रहें ।

6. हर्पीज

यह एक अत्यन्त पीड़ादायक विषाणु संक्रमण (Viral infection) है। यह त्वचा की सतह पर ढेर सारी छोटी-छोटी फुन्सियों के रूप में प्रकट होता है। यह फुन्सियाँ एक पट्टे के रूप में होता है। इन फुन्सियों में पानी भरा होता है। आमतौर पर यह माना जाता है कि बचपन में निकली छोटी माता के रोगाणु स्नायु तंत्र के भीतर पड़े रहते हैं जब शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ जाती है तो वे रोगाणु सक्रिय होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं। यह समस्या अक्सर सीने के एक ओर पसलियों के बीच उभरती है । बुखार के दौरान अथवा उसके उतरते समय मुँह के चारों तरफ छोटी-छोटी फुन्सियाँ निकल आती हैं। ये सर्दी-जुकाम के साथ अक्सर जुड़ी होती हैं।

7. सोरायासिस

यह बार-बार होने वाला चर्म रोग है। त्वचा पर अनेक भद्दे धब्बे उभर आते हैं जो वास्तव में अचेतन मन की गहराई में पनपी विकृति का बाह्य प्रकटीकरण है । असन्तुलित प्राणविहीन आहार, अनियमित, असंयमित जीवनचर्या इसके प्रमुख कारक हैं। अत्यधिक कार्बोहाइड्रेटयुक्त भोजन, चर्बी का गलत समायोजन तथा रक्त एवं त्वचा में कोलेस्ट्राल की अधिकता भी विकृति को बढ़ाते हैं। जीवन में तनावपूर्ण क्षणों में रोग के बड़े-बड़े चकत्ते त्वचा पर एवं सिर में प्रकट होने लगती है। त्वचा की कोशिकाओं का अनियंत्रित चयापचय तथा रक्त संचरण तथा प्रतिरक्षा प्रणाली की जटिल अन्तर्क्रिया विकृत होकर इन चकत्तों को उत्पन्न करती है।

इस रोग का स्थाई निदान चिकित्सा-विज्ञान आज तक खोज नहीं पाया है। धैर्यपूर्वक दीर्घकाल तक नियमित योग चिकित्सा का पालन करने से इस रोग से मुक्त होना सम्भव है। आहार शुद्धि, नियमित दिनचर्या आवश्यक है। यौगिक अभ्यास में सिर के बल किये जाने वाले आसन तथा प्रातःकाल सूर्य की रोशनी में सूर्य नमस्कार एवं प्राणायाम करना लाभदायक है । सात दिन का बासी स्वमूत्र का उस स्थान पर लेप कर धूप सेंकना चाहिये। घाव को ज्यादा से ज्यादा बार खारे पानी से धोना चाहिये।

8. त्वचा का कैंसर

उष्ण कटिबन्धीय देशों में अधिक समय तक त्वचा को सूर्य के प्रकाश में खुला रखने के कारण यह रोग होता है। अतः ऐसी जगह धूप में निकलने से पहले त्वचा पर ‘सन स्क्रीन’ युक्त लेप तथा चौड़े किनारे का हैट रोग से बचाव करता है। यह गौर वर्ण के लोगों के चेहरे तथा बाँहों पर ज्यादा ही होता है। आहार परिवर्तन, प्राणायाम तथा अमरोली का अभ्यास लाभप्रद सिद्ध होता है । इस (त्वचा रोग कितने प्रकार के होते हैं) रोग के उत्पन्न हुए स्थानों की त्वचा पर 3 से 7 दिन पुराने स्वमूत्र की मालिश करनी चाहिये।

9. मुँहासे

कारण

यह युवावस्य का एक आम रोग है। यह उनके सौन्दर्य को रोमकूप बन्द हो जाते हैं। त्वचा की सफाई न होने से वहाँ कीटाणुजन्य संक्रमण होता है। परिणामत: मुँहासे हो जाते हैं। हार्मोन असन्तुलन के कारण विशेष रूप से पुरुष हार्मोन एण्ड्रोजोन्स के अधिक स्राव के कारण, हार्मोन असन्तुलन को दूर करने वाले व्यायाम का अभाव चटपटे, तले-भुने, मैदा-बेसन के आहार ज्यादा खाने, रक्त में शर्करा की अधिकता, अति आहार, चाय, कॉफी, चॉकलेट, ब्रेड, तम्बाकू, मिठाई, ठंडे पेय तथा शराब के सेवन से भी मुँहासे उत्पन्न होते हैं।

लक्षण

प्रारम्भ में चेहरे, छाती, कन्धे तथा पीठ पर छोटी-छोटी फुन्सियाँ होती हैं। बाद में उनमें पीब भर जाता है। इनसे छेड़-छाड़ करने तथा उन्हें दबाने से अधिक उग्र हो जाते हैं तथा अच्छे हो जाने पर भी पीछे निशान छोड़ जाते हैं। चेहरा खुरदुरा हो जाता है तथा सौन्दर्य कम हो जाता है। उक्त पंक्तियों में त्वचा के प्रमुख रोगों का ही वर्णन किया गया है। इनके अतिरिक्त भी निम्नलिखित रोग होते हैं।

उंगली का फोड़ा, एक्जिमा, शीतपित्त, रोजीओला, एरीथीमा, मल्टीफोर्म, रोजेशिया, ल्युपस, ऐरीथेमैटोनिस, पेलेग्रा, हीनिया, सरसीनेटा, इम्पैटिगो कन्टैजिओसा, ल्यूपस वल्गेरिस (त्वचा की टी.बी.), देहली पिडिका, अल्सर, छाले, कार्न्स, स्केलेरोडगी, सफेद दाग (ल्यूकोडर्मा), पिट्रियासिस (सूखी त्वचा से मछली के जैसे बड़े-बड़े छिलके उतरते हैं।) चर्म के रोगों के नाम तो अनेक हैं पर प्रत्येक रोग के कारण समान हैं। जैसे:-

  1. शरीर में दूषित पदार्थों का सीमा से अधिक संचय होना।
  2. रक्त का दूषित होना।
  3. शरीर के साथ त्वचा के उन हिस्सों की रोग-निरोधक क्षमता का क्षीण होना।

यौगिक चिकित्सा

आसन

  1. सूर्य नमस्कार प्रातः निकलते हुए सूर्य के सम्मुख खड़े होकर जब तक पसीना न आ जाये तब तक सूर्य नमस्कार का अभ्यास करना शवासन का अभ्यास करना चाहिये। सबेरे की सूर्य की रोशनी में विशिष्ट किरणों की अधिकता होती है जो शरीर के बाहरी अंगों को सुदृढ़ता एवं स्वास्थ्य प्रदान करती है।
  2. जानुशीर्षासन (महामुद्रा)
  3. अर्द्धमत्स्येन्द्रासन
  4. कूर्मासन
  5. उष्ट्रासन
  6. गोमुखासन
  7. उत्तानपादासन
  8. धनुरासन
  9. चक्रासन
  10. शलभासन
  11. पवन मुक्तासन

प्राणायाम

  1. नाड़ी शोधन प्राणायाम
  2. भस्त्रिका प्राणायाम
  3. शीतली प्राणायाम

इन सबसे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है तथा चर्म रोगों के अतिरिक्त अन्य रोगों से भी रक्षा होती है। आँतों के अलावा पूरे शरीर के मल भी साफ होते हैं। रक्त शुद्ध होता है, प्राणिक नाड़ियों के अवरोध दूर होते हैं।

योगमुद्रा – मानसिक तनावों को दूर करने में यह बहुत सहायक होता है।

आहार सम्बन्धी सुझाव

  1. चर्म रेग के रोगियों को एक साल तक 5 ग्राम नीम की पत्ती प्रातःकाल खाली पेट खिलायें।
  2. चर्म रोग के लक्षण प्रकट होते ही एक दिन पानी का, एक दिन नीबू पानी का, एक दिन नीबू पानी एवं शहद का, एक दिन रसाहार, एक दिन फलाहार, एक दिन सिर्फ सब्जियों का सलाद, एक दिन उबली सब्जी फिर चोकरदार आटे की एक रोटी से शुरू करके अपने सामान्य आहार पर आ जायें।
  3. सामान्य आहार में भी प्रात: नाश्ते में फल, मौसम के अनुसार अंकुरित चना, मूँग, मोठ आदि तथा गाजर, पालक, टमाटर, लौकी आदि सब्जी अथवा संतरा, अनार, मौसम्मी, सेब, अंगूर आदि के रस का सेवन करें।
  4. दोपहर के भोजन में रोटी, सब्जी, सलाद, दही, चटनी का सेवन करें।
  5. सायंकाल के भोजन में मोटे चर्म रोगी सिर्फ फल सब्जियों का सलाद एवं छाछ लें।

निषेध

  • तले भुने, चटपटे आहार, शीतल पेय, अल्कोहल, बिस्कुट, ब्रेड, जेम, जैली, फास्ट फूड, जंग फूड का सेवन न करें।
  • गुड़ आदि मिठाई व खटाई का सेवन बिल्कुल न करें । कब्ज बिल्कुल न रहने दें।
  • नाइलोन के वस्त्र, मोजे, प्लास्टिक की चप्पल, जूतों का प्रयोग न करें। सूती वस्त्र ही पहनें तो अच्छा है।

अन्य उपचार

  1. प्रतिदिन ठण्डे पानी से स्नान तथा मालिश करें
  2. साबुन, शैम्पू तथा सौन्दर्य सामग्री का प्रयोग यथासंभव कम करें।
  3. पानी अधिक से अधिक मात्रा में पियें।
  4. घावों को साफ एवं सूखा रखें, यदि सूखा रखना सम्भव न हो तो उचित प्राकृतिक मलहम से त्वचा को नरम रखें।
  5. यथा संभव को घाव को खुली धूप एवं हवा के सम्पर्क में आते रहने दें।
  6. रोज कम से कम एक बार सावधानीपूर्वक किसी हल्के एण्टीसेप्टिक से धोकर सुखा लें।
  7. तौलिया से शरीर को स्नान के बाद खूब रगड़कर पौंछें।

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अस्वीकरण – यहां पर दी गई जानकारी एक सामान्य जानकारी है। यहां पर दी गई जानकारी से चिकित्सा कि राय बिल्कुल नहीं दी जाती। यदि आपको कोई भी बीमारी या समस्या है तो आपको डॉक्टर या विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। Candefine.com के द्वारा दी गई जानकारी किसी भी जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

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Mamta Jain

मैं ममता जैन मीडिया क्षेत्र में मैं तीन साल से जुड़ी हुई हूं। मुझे लिखना काफी पसन्द है और अब मैने यही मेरा प्रोफेशन बना लिया है। मैं जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएट हूं। हेल्थ, स्वास्थ्य, मनोरंजन, सरकारी योजना, क्रिकेट, न्यूज़ और ब्यूटी पर लिखने में मेरा स्पेशलाइजेशन है। हेल्थ और ब्यूटी से जुड़ी जानकारी जानने के लिए मुझे फॉलो करें।

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