उत्तर प्रदेश में पर्यटन स्थल, ऐतिहासिक एवं धार्मिक, (Uttar Pradesh Tourist Places)

उत्तर प्रदेश में पर्यटन स्थल :- उत्तर प्रदेश ऐतिहासिक दृष्टि से भारत में उच्च स्थान रखता है। यहाँ अनेक ऐतिहासिक महत्व के स्थल हैं। जिन्हें देखने देश-विदेश के अनेकों लोग आते हैं। इसके साथ-साथ उत्तर प्रदेश धार्मिक, सामरिक और पर्यटन के मामले में भी अन्य राज्यों से पीछे नहीं है। उत्तर प्रदेश में अनेकों धार्मिक तीर्थ स्थल भी हैं, जो प्रतिवर्ष हजारों तीर्थ यात्रियों के आकर्षण को केन्द्र होते हैं।

उत्तर प्रदेश में पर्यटन स्थल (Uttar Pradesh Tourist Places)

उत्तर प्रदेश में पर्यटन स्थल

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उत्तर प्रदेश में पर्यटन स्थल

उत्तर प्रदेश के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल :-उत्तर प्रदेश में पर्यटन को मजबूत करने के लिये 1956 में पर्यटन विभाग की स्थापना की गयी। 1972 में पर्यटन निदेशालय की स्थापना की गयी। प्रदेश के यूनेस्कों में शामिल किये गये प्रमुख पर्यटन स्थल निम्न हैं-

  • 1998 में प्रदेश की पहली पर्यटन नीति लागू की गयी।
  • जून 2015 में ग्रामीण पर्यटन नीति की घोषणा की गयी।
  • 2016 में प्रदेश की नयी पर्यटन नीति लागू की गयी। विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के मामले में उत्तर प्रदेश में आगरा प्रथम स्थान पर है। इसके बाद लखनऊ और वाराणसी हैं।
  • 1998 में प्रदेश में पर्यटनों को उद्योग का दर्जा दिया गया।

1. आगरा का किला

इसे अकबर के द्वारा बनवाया गया। यह 1983 में यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया। यह आगरा शहर में स्थित है, 1573 में अकबर ने इसका पुनर्निमाण करवाया।

2. ताजमहल

इसे 1983 में यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया। इसका निर्माण कार्य 1632 में प्रारम्भ किया गया। इसे बनाने में लगभग 21 वर्ष का समय लगा। यह मुगल शासक शाहजहाँ के द्वारा सफेद संगमरमर पत्थर से यमुना नदी के किनारे बनाया गया।

3. फतेहपुर सीकरी

यह मुगल साम्राज्य की राजधानी रही, इस स्थान को अकबर के द्वारा बसाया गया और 1573 से 1588 तक राजधानी बनाया गया। इसे 1986 में यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया। यहाँ पर शेख सलीम चिश्ती का मकबरा, बुलंद दरवाजा, जामा मस्जिद, बीरबल का महल, मरियम का महल, जोधाबाई महल, पंचमहल आदि का निर्माण किया गया है।

4. आलमगीरपुर

मेरठ जिले में हिंडन नदी के किनारे स्थित है। यहाँ से सैधव सभ्यता के साक्ष्य प्राप्त होते हैं। यह स्थल हड़प्पा सभ्यता का भी केन्द्र रहा है। यहाँ से प्राचीन कपास की खेती के साक्ष्य प्राप्त हुए।

5. अयोध्या

यह पवित्र धार्मिक स्थल भगवान श्रीराम की जन्मभूमि है। इस नगर का प्राचीन नाम अयाज्सा था। यहाँ पर जैन धर्म के प्रथम तीर्थाकर रिषभदेव, द्वितीय तीर्थांकर अजित नाथ, चतुर्थ तीर्थांकर अभिनन्दनाथ एवं पांचवे तीर्थाकर सुमितनाथ, चौदहवें तीर्थांकर अनंतनाथ का जन्म हुआ। यह नगर कौशल महाजनपद की राजधानी हुआ करता था। यहाँ पुष्यमित्र शुंग का लेख भी प्राप्त हुआ है। यहाँ कनक भवन, हनुमानगढ़ी, मणि पर्वत आदि तीर्थ स्थल हैं। यहाँ सरयू नदी पर राम की पौड़ी है।

6. अतरंजीखेड़ा

यह एटा जिले में काली नदी के किनारे स्थित है। इस स्थल का वर्णन चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक में किया है। यहाँ प्राचीनकालीन लोहे के साक्ष्य, धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।

7. अहिच्छत्र

यह स्थल बरेली जनपद में स्थित है। यहाँ से मृद्भाण्ड संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। महाजनपदकाल में यह उत्तरी पांचाल की राजधानी था। यहाँ अशोक ने एक स्तूप का निर्माण करवाया।

8. कौशाम्बी

यह नगर प्रयागराज के पास यमुना नदी के तट पर है। इसे आद्य नगरीय स्थल भी कहा जाता है। महाजनपदकाल में यह वत्स जनपद की राजधानी हुआ करती थी, उस समय यहाँ का राजा उदयन था। यहाँ से कनिष्क के काल के सिक्के प्राप्त हुए हैं। यहाँ अशोक व समुद्रगुप्त का प्रयाग स्तम्भ अभिलेख प्राप्त हुआ था। जिसे अकबर ने इलाहाबाद के अपने किले में लगवाया।

9. कालिंजर

यह बांदा जनपद में स्थित विशाल दुर्ग है। यहाँ मध्यकाल के प्रारम्भ में राजपूत शासकों को शासन होता था। 1022 ईस्वी में गजनवी ने कालिंजर दुर्ग पर आक्रमण किया। यहीं पर शेरशाह सूरी की मृत्यु 1547 ईस्वी में हो गयी थी। अकबर ने यह किला यहाँ के शासक रामचन्द्र को पराजित कर हासिल किया।

10. वाराणसी

यह शहर भारत नहीं बल्कि दुनिया का सबसे प्राचीन शहर है। यह शहर वरूणा और अस्सी दो नदियों के बीच में स्थित होने के कारण वाराणसी कहलाता है। एक मान्यता के अनुसार इसकी स्थापना राजा देवोदास ने की। इसका उल्लेख अर्थववेद, रामायण, महाभारत में मिलता है। यहाँ जैन धर्म के छठे तीर्थांकर सुपार्श्वनाथ और तेईसवें पारसनाथ का जन्म हुआ। यहाँ पर अहिल्याबाई होल्कर द्वारा निर्मित काशी विश्वनाथ मंदिर, तुलसीमानस मंदिर, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं गंगा नदी पर अनेकों घाट स्थित हैं। जिसमें अस्सी घाट, तुलसी, दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, अहिल्याबाई आदि घाट हैं।

11. चंदावर

यह स्थल कन्नौज एवं इटावा के मध्य स्थित है। यहाँ पर मोहम्मद गौरी ने 1194 में कन्नौज के गहड़वाल वंश के राजा जयचंद को पराजित किया।

12. चुनार

यह विन्ध्य पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है, इसके एक तरफ गंगा नदी बहती है। जिससे यह कस्बा अत्यंत आकर्षक हो जाता है। यहाँ 14वीं शताब्दी में चन्देल वंश के शासकों का शासन हुआ करता था। मुगल काल में बाबर ने इस क्षेत्र को अपने नियंत्रण में ले लिया। इस किले पर शेरशाह सूरी ने भी विजय प्राप्त की। मध्यकाल में इसे पूर्व का द्वार भी कहा जाता था।

13. झाँसी

झांसी की स्थापना 1631 ईस्वी में ओरछा शासक वीर सिंह बुन्देला ने की। 1732 ईस्वी में झांसी पेशवा बाजीराव को सौंप दी गयी और यहीं से इस पर मराठों का आधिपत्य प्रारम्भ हुआ। बाद में झांसी के राजा गंगाधर राव से लक्ष्मीबाई को विवाह हुआ। झांसी को डलहौजी ने अपनी विलय नीति के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। 1857 की क्रान्ति में रानी ने भाग लिया और अंग्रेजों को पराजित करके झांसी को स्वतंत्र करा लिया परंतु जल्दी ही जनरल ह्यूरोज के नेतृत्व में झांसी को पुनः ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। इसी युद्ध में 18 जून 1858 को रानी ग्वालियर के पास युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुई।

14. अहिच्छत्र

अहिच्छत्र की पहचान राज्य के बरेली जिले में स्थित रामनगर से की गई है। यहाँ से मृद्भाण्ड संस्कृति से लेकर गुप्तोत्तर युग के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। महाजनपद काल में यह भूभाग उत्तरी पांचाल की राजधानी थी। अशोक ने यहाँ पर एक स्तूप बनवाया था। यहाँ से ‘मित्र’ उपाधि वाले सिक्के, कुषाणों के सिक्के तथा गुप्तकालीन एक यमुना की मूर्ति मिली है।

15. कपिलवस्तु (पिपरहवा)

कपिलवस्तु को वर्तमान में पिपरहवा नाम से जाना जाता है, जो वर्तमान में प्रदेश के सिद्धार्थनगर जनपद में है। यह नेपाल सीमा के पास स्थित है। बौद्ध काल में यह शाक्य गणराज्य की राजधानी थी एवं गौतमबुद्ध के पिता शुद्धोधन यहाँ के शासक थे। यहाँ से एक प्राचीनतम बौद्ध स्तूप तथा उसके भीतर रखी हुई बुद्ध की अस्थियाँ युक्त एक पाषाण मंजूषा प्राप्त हुई है। मंजूषा पर ब्राह्मी लिपि के एक लेख में स्पष्ट लिखा हुआ है कि इसका निर्माण शाक्यों ने करवाया था। यहाँ उत्तरी काली ओपदार मृद्भाण्ड युग के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मौर्य सम्राट अशोक ने इस पवित्र स्थल की यात्रा की थी। यहाँ से सालारगढ़ पुरातात्विक स्थल के कुषाणों के सिक्के मिले हैं। यह श्रावस्ती-वाराणसी मार्ग तथा वैशाली-पुरूषपुर मार्ग का एक प्रमुख केन्द्र स्थल था। इसलिए कपिलवस्तु में आर्थिक-व्यापारिक सक्रियता के साक्ष्य मिलते हैं।

16. कड़ा

यह पश्चिम गंगा तट पर कौशांबी जिले में स्थित है। कड़ा से ही अलाउद्दीन खिलजी ने 1296 ई. में अपना देवगिरि अभियान सम्पन्न किया था। 1296 ई. में कड़ा में ही सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की हत्या अलाउद्दीन खिलजी ने करवाई थी और अपने को दिल्ली सल्तनत का सुल्तान घोषित कर लिया था। 1765 ई. में सन्धि में अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अंग्रेज कम्पनी को कड़ा क्षेत्र सौंप दिया था। यहां भक्त सन्त मलूकदास की जन्मस्थली भी है।

17. काल्पी

यह स्थल जालौन में यमुना नदी के तट पर स्थित है। यहाँ दो पौरणिक टीला- व्यास टीला व नरसिंह टीला, हैं। दसवीं शताब्दी ई. में काल्पी में चन्देलों का शासन स्थापित था। बारहवीं शताब्दी के अन्त में कुतुबुद्दीन ऐबक ने काल्पी को दिल्ली सल्तनत का अंग बना लिया। अकबर के काल में यह मुगल साम्राज्य का एक प्रमुख नगर था। बीरबल की जन्मस्थली भी यही है। बीरबल के रंगमहल तथा मुगल टकसाल के अवशेष भी यहीं से प्राप्त हुए। हैं।

18. कुरू

महाभारत काल में यह एक प्रसिद्ध राज्य था, इसकी राजधानी हस्तिनापुर थी। यह आधुनिक दिल्ली व मेरठ के कुछ भूभाग में फैला था।

19. जौनपुर

जौनपुर की स्थापना सन् 1358 ई. में फिरोजशाह तुगलक ने मुहम्मद तुगलक उर्फ जौना खाँ के सम्मान में की थी। तुगलक वंश के पतन के समय जौनपुर मलिक हुसैन शर्की के नेतृत्व में स्वतंत्र हो गया और शर्की सल्तनत की स्थापना की। साहित्य, स्थापत्य (जैसे अटाला मस्जिद, लाल दरवाजा व जामा मस्जिद आदि) व संगीत कला के लिए जौनपुर के शर्की सुल्तानों का योगदान चिरस्मरणीय रहा है। इसी विशेषता के लिये जौनपुर को ‘शीराज-ए-हिन्द’ कहा जाता था।

20. देवगढ़

ललितपुर जिले में बेतवा के किनारे देवगढ़ स्थित है, जिसमें हिन्दु और जैन दोनों धर्मों के महत्वपूर्ण स्थान हैं। यहाँ से गुप्तकालीन हिन्दु मन्दिर एवं मूर्तियों के साक्ष्य मिले हैं। इनमें विष्णु का दशावतार मन्दिर सर्वाधिक उल्लेखनीय है। भगवान विष्णु का यह मन्दिर ईट-स्थापत्य कला का सुन्दर प्रतीक है। यहाँ 31 जैन मंदिरों का समूह है, जिनमें से 11वाँ व 12वाँ मंदिर विशेष है। यहाँ जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की पुत्री ब्राह्मी द्वारा उत्कीर्णित लिपियों के साक्ष्य तथा चन्देलों के अभिलेख भी प्राप्त हुए हैं।

21. पांचाल

यह वर्तमान में बरेली, बदायूँ व फर्रूखाबाद आदि क्षेत्रों पर है। सोलह महाजनपद काल में यह दो राज्यों में बंटा हुआ था। उत्तरी पांचाल व दक्षिणी पांचाल में विभाजित था। दक्षिणी पांचाल की राजधानी कपिल और यह के राजा द्रुपुद हुआ करते थे एवं उत्तरी पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र होती थी।

22. प्रयागराज

प्रयागराज भारत में प्राचीन काल का एक धार्मिक महत्व का शहर है। यह गंगा यमुना व सरस्वती नदियों के संगम पर स्थिति है। अकबर ने यह अशोक स्तम लगवाया। अकबर ने 1574 में इसका नाम बदलकर इलाहाबाद कर दिया था। जिसे 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार ने पुनः प्रयाग राज कर दिया। हर्षवर्धन यह प्रत्येक 5वें वर्ष महामोक्ष परिषद का आयोजन करता था। यहां हर 12 वर्ष में महाकुम्भ व महाकुम्भ के अगले 6 वर्षों में अर्द्ध कुम्भ का आयोजन किय जाता है। यह प्रत्येक वर्ष संगम वर्ष माघ मेले का आयोजन किया जाता है। यहां पर अलोप शंकरी कल्याणी देवी का मंदिर, नागवासुकी मंदिर, भारद्वाज मुनी का आश्रम विस्थित है।

23. भीतरी

यह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में स्थित है। यहाँ से गुप्तकाल के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिनमें स्कन्दगुप्त का स्तम्भ-लेख सर्वप्रमुख है। इस लेख में स्कन्दगुप्त के शासनकाल की महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख है। यह स्तम्भ बलुआ पत्थर का बना है जिसके शीर्ष भाग पर विष्णु की प्रतिमा थी।

24. भीतरगाँव

यह कानपुर में स्थित है। यह गुप्तकालीन शैली का ईंट से निर्मित मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए है। यह मन्दिर चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के काल में बना था। भीतरगाँव के मन्दिर की उल्लेखनीय विशेषता इसमें शिखर का होना तथा ऊँचे चबूतरे पर निर्मित होना है।

25. महोबा

यह उत्तर प्रदेश के बुन्देल खण्ड में स्थित एक जनपद है। यहां 831ई. में चन्देल राजपूतों ने अपनी राजधानी बनाई थीं। चन्देलों का राज्य जेजाकभुक्ति के नाम से प्रसिद्ध था। तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में महोबा पर तुर्की का आधिपत्य स्थापित हो गया था। यहां गोखर पहाड़ी पर 24 जैन तीर्थकरों की प्रतिमाएँ यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।

26. सारनाथ

यह शहर वाराणसी के पास स्थित है। यह बौद्ध धर्म के लिए प्रसिद्ध है। क्योंकि यही पर भगवान गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश दिया था। इस स्थान को ऋषिपत्तनम नाम से भी जाना जाता है। सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया। अशोक स्तभ स्थित है। यहां धमेक स्तूप, चौखण्डी स्तूप, मृगदाव पक्षी बिहार में स्थित है।

27. संकिसा

यह स्थल फर्रूखाबाद जनपद में स्थित है। इसका वर्णन महाभारत आदि में प्राप्त होता है। महाजनपद काल में यह पांचाल का प्रमुख नगर हुआ करता था।

28. सरायनाहर राय

यह स्थल प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में स्थित है। यह खुदाई में लगभग दस हजार वर्ष पूर्व मध्यपाषाण सभ्यता के साक्ष्य प्राप्त हुए है।

29. हुलास

हुलास भारत के प्राचीन इतिहास में काफी महत्व रखता है। यह स्थल प्राचीन भारत में शुंग और कुषाण से संबंधित रहा है। उस समय यहाँ पर बस्तियाँ हुआ करती थी। यहाँ पर उत्तर कालीन हड़प्पा से संबंधित अनेक तरह के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यह स्थल वर्तमान मं सहारनपुर जिले में पड़ता है। यहां मृद्भाण्ड संस्कृति के साक्ष्य भी मिले हैं।

30. बिठूर

ऐसा माना जाता है कि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यहीं पर स्थित था। यह कानपुर नगर जनपद में गंगा के किनारे स्थित है। इसका पुराना नाम ब्रह्मवर्त तीर्थ था। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का पालन-पोषण भी बिठूर में पेशवा के यहाँ हुआ।

31. विन्ध्याचल

मिर्जापुर जिले में स्थित इस स्थान पर विन्ध्यावासिनी देवी का पौराणिक मन्दिर है। यह स्थल विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी पर स्थित है।

32. श्रृंगीरामपुर

यह फर्रूखाबाद जिले में गंगा नदी के दक्षिणी किनारे स्थित है। श्रृंगीरामपुर में श्रृंगी ऋषि ने अपने सिर पर लगे सीगों को हटाने के लिए यहाँ तपस्या की थी व तपस्या के बाद सींगों से मुक्ति मिली। जिससे यह स्थान प्रसिद्ध हुआ और यहाँ पर श्रृंगी ऋषि का मन्दिर बनाया गया। प्रतिवर्ष इस स्थान पर कार्तिक पूर्णिमा तथा दशहरे पर मेला लगता है।

33. नैमिषारण्य

यह स्थल हिन्दू धर्म में 30 हजार तीर्थों का स्थान कहा जाता है। यहाँ पर अनेक दर्शनीय तीर्थ स्थल हैं। जिसमें चक्रतीर्थ, पंच प्रयाग, पुराण मंदिर, भूतेश्वरनाथ मंदिर, बद्रीनारायण मंदिर, पंच पांडव मंदिर व पांडव किला, सूतगद्दी, चक्रनारायण मंदिर, रुद्रावर्त व देव – देवेश्वर आदि हैं। यह स्थल सीतापुर जनपद में गोमती नदी के किनारे स्थित है।

34. गोला गोकर्णनाथ

यह स्थल प्रदेश के लखीमपुर खीरी में स्थित है। यहाँ एक विशाल झील और उसके निकट भगवान गोकर्णनाथ महादेव का प्राचीन मन्दिर है। माना जाता है कि महायोगी गोरखनाथ जी द्वारा खिचड़ी वितरण किया जाता था। नाथ सम्प्रदाय की सिद्धपीठ यहीं पर स्थित है।

35. कन्नौज

कन्नौज प्राचीन काल में पांचाल महाजनपद का हिस्सा हुआ करते थे। उस समय इसे कान्यकुब्ज के नाम से जाना जाता था। कन्नौज का वर्णन महाभारत के पंतजलि द्वारा रचित महाभाष्य में मिलता है। इस शहर का वर्णन चीनी यात्री फाहियान एवं ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा वृतांत में किया है। कन्नौज पर हर्षवर्धन ने शासन किया उस समय इसे महोदय श्री के नाम से जाना जाता था। हर्ष के समय में कन्नौज में दस हजार भिक्षु रहा करते थे। यहां पर क्षेमकली का मंदिर पद्मावति सती का मंदिर जयचंद का किला आदि स्थित है।

36. लखनऊ

लखनऊ में अवध के सूबेदार सआदत खां ने अपनी स्वंत्रत सत्ता स्थापित करके लखनऊ को प्रसिद्धि दिलायी। यहां अवध के नवाव आसफउद्दौला ने अवध की राजधानी परिवर्तित करके इसे अपनी राजधानी बनाया। 1857 के विद्रोह में अंतिम नवाव वाजिदअली शाह कि बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों से डट कर लड़ाई लड़ी और अपने पुत्र बिरजिस कादिर को यहां का नवाव घोषित कर दिया। यहां पर रूमी दरवाजा, इमामबाड़ा, मोती महल आदि स्थित है।

37. बहराइच

यह स्थान प्रदेश तराई भाग में स्थित है। यहाँ पर सैयद सालार व मसूद गाजी की पवित्र दरगाह है। सैयद सालार को हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों धर्मों के लोग मानते हैं और प्रतिवर्ष उनकी मजार पर एकत्रित होते हैं। ये महमूद गजनवी के साथ भारत आये थे।

38. ददरी

यह स्थल भारत में पशु मेला के लिये प्रसिद्ध है, ये मेला कार्तिक मास की पूर्णिमा को लगता है। अनेकों व्यापारी व किसान पशुओं खरीद और बिक्री करते हैं। यहाँ भृगु ऋषि का एक मंदिर है। यह स्थान प्रदेश के पूर्वी जनपद बलिया में स्थित है।

39. पावानगर

यह जैन धर्म का पवित्र स्थल है। यहाँ पर हजारों जैन अनुयायी प्रतिवर्ष आते हैं। इस स्थान पर जैन धर्म के 24वें तीर्थाकर महावीर स्वामी ने 468 ई. पू. में अपने शरीर का त्याग किया था। यह स्थल कुशीनगर जनपद में स्थित है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को जैन धर्म का निर्वाण महोत्सव प्रतिवर्ष यहीं मनाया जाता है।

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